विजय कुमार सप्पत्ति की एक व्यंग्य कथा : अटेंशन
थक –हार कर मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त को फोन लगाया और उससे अपना दुखडा रोया . उसने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की ,कि अटेंशन पाने के चक्कर में मेरी टेंशन बढ जायेंगी . उसने कहा कि , अटेंशन सिर्फ बुरे कामो में ज्यादा मिलती है , अच्छे कामो में कम मिलती है . अब इतने बरसो से मैं अच्छा बनकर रहा हूँ , लेकिन मुझे तो कोई अटेंशन नहीं मिली , सो सोच लिया कि बुरा बनकर ही अटेंशन लूँगा .उसने बहुत समझाया ;लेकिन मैंने एक न सुनी , मैंने उससे कह दिया कि अगर वो मुझे कोई उपाय न बताये तो वो मेरा दोस्त नहीं .
लेखक परिचय :
Filed in: हास्य-व्यंग्य



परिकल्पना की टीम को मैं धन्यवाद देता हूँ , कि उन्होंने मेरी लिखी कहानी को छापा.
आपका
विजय
अच्छे भाव और संवेदना से परिपूर्ण व्यंग्य कहानी !
सुन्दर और सारगर्भित कहानी है यह, अच्छी लगी !
विजय बाबू,बढ़िया है !
वाह मज़ा आ गया,अटेंशन जिंदाबाद !!
अच्छी है !
वाह ..बहुत बढि़या।
बहुत बढ़िया….
व्यंग्य की तलवार धारदार है , बधाई