9:18 am - Thursday May 23, 2013

लक्ष्मण रेखा

वही तन वही मन
खूबसूरत -प्रेम प्यार
बीस की दहलीज पार
अंगारों से भरी राह
बेचैनी आह
पाँव जल जायेंगे
उधर मत जाना
ये मत करना
वो मत करना
लक्ष्मण रेखा
खींच दी गयी थी
तितली सी उडती -दौड़ती
उस बगिया में जाना
उस पेड़ -लता से चिपक जाना
घंटों बतियाना उससे
बहुत कचोटता था अब मन को
दिल में उफान हाहाकार !
छोटी सी नदिया
तब -बाँधी जा सकती थी
जब छोड़ दी गयी थी उन्मुक्त
अब बाढ़ आ चुकी थी
उछ्रिन्खल-जोश -जोर
हहर-हहर बार बार उफनती
शांत होती ..
कुछ कीचड़ कुछ फूल
संगी -साथी
सब बहा जा रहा था
तेज गति से
न जाने कब तक
ये बंधन ये बाँध
अब इससे लड़ पायेगा -
बांधे रहेगा ?
कभी न कभी
आज नहीं तो कल ये
टूट जाएगा …….
और
सरिता -सागर के आगोश में
पुरजोर दौड़ लगा
खो जायेगी !
——————
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
३.४६-४.०२ पूर्वाह्न
कुल्लू यच पी १३.०२.२०१२

Filed in: कविता

2 Responses to “लक्ष्मण रेखा”

  1. July 25, 2012 at 2:50 pm #

    Ras bhari kavitayen, laghu kathayen geet atyant ruchikar aur gyanvardhk hain.

  2. Balbir Rana
    August 6, 2012 at 5:17 pm #

    SUndar abhivyakti Shukl jee
    निर्दयी मेघ
    ये क्या कर गया
    आना था धरती को सींचने
    विभित्सिका छोड़ गया
    हाहाकार मचा गया
    निर्दोष जीवन पर
    दोष लगाकर चल गया

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