12:45 am - Tuesday May 21, 2013

हम पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें : उषा वर्मा

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भारत में जन्मीं लेखिका उषा वर्मा जी वर्तमान में ब्रिटेन में रहकर हिन्दी के विकास में अपना योगदान दें रही हैं l संघ बरेली से सम्मानित उषा जी ‘शाने अदब’ भोपाल, ‘निराला सम्मान’ हैदराबाद, तथा कथा यू.के. लंदन से कहानी संग्रह ‘कारावास’ पर पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी अबतक की प्रकाशित पुस्तकों में ‘क्षितिज अधूरे’, ‘कोई तो सुनेगा’(कविता संग्रह ) ,‘कारावास’ (कहानी संग्रह) और संपादित पुस्तकों में सांझी कथायात्रा’,एवं ‘प्रवास में पहली कहानी’और अनूदित पुस्तकों में बच्चों की पुस्तक ‘हाउ डू आई पुट इट आन’, का हिन्दी अनुवाद व पचीस उर्दू कहानियों का हिन्दी अनुवाद मुख्य हैं l प्रस्तुत है उषा वर्मा जी की डॉ.प्रीत अरोड़ा से विशेष बातचीत l


(1)    प्रश्न–उषा जी आपने संगीत में उच्च शिक्षा प्राप्त की और फिर दर्शन शास्त्र में एम.ए। तो इसके बाद आपकी रुचि हिन्दी साहित्य में कैसे हुई?

उत्तर–प्रीत जी आपके इस प्रश्न के उत्तर में मुझे अमृता प्रीतम याद आती हैं। दर्शन मेरे लिए सारा आकाश है, व्यापक है विस्तृत है पर उस आकाश के नीचे मुझे रहने के लिए एक घर चाहिए,और यह घर मेरे लिए साहित्य है, जहां मैं क्लांत हो कर विश्राम लेती हूं।इस घर में कई कमरे हैं,संगीत का कमरा अधिकतर बंद ही रहा । जब दर्शन  में एम.ए. किया तो वही मेरे जीवन का पाथेय बना । साहित्य की आत्मा का जो भी विस्तार हुआ उसमें दर्शनशास्त्र का बहुत बड़ा योगदान है । मेरे शिक्षक डा.देवराज, डा.सुरमा दासगुप्ता  थीं   जिनसे मुझे प्रेरणा मिली ।डा.देवराज उन दिनों हिंदी में ख़ूब लिख रहे थे और प्रायः साहित्य और दर्शन में किसे चुने इस अन्तर्द्व्नद की बात भी करते थे।संभवतः मेरे मन पर उसी का प्रभाव पड़ा। साहित्य में विस्तार की संभावनाएं मुझे अपने लिए अधिक रुचिकर लगीं।

(2) प्रश्न- क्या आप के साहित्य पर दर्शनशास्त्र का प्रभाव पड़ा?

उत्तर-जी हां कविता में यह अधिक मुखर हो सका है।मैं समझती हूं कि मनुष्य अपने जीवन संघर्ष में विराट से टकराता है,बार-बार प्रश्न पूछता है,आत्म विश्लेषण करता है, सब कुछ नकार देता है,और नए नैतिक आग्रहों की खोजबीन करता है।मेरी कविताओं में मिथक प्रतिरोध की मुद्रा में ही आए हैं।और यह सब कुछ कहीं बहुत अंदर से आता है। दर्शन, हमें जीवन के तमाम पक्षों को उलट पुलट कर देखने की दृष्टि देता है।और ये पक्ष साहित्य के अंग हैं।  कह सकती हूं कि साहित्य पर दर्शन का काफ़ी प्रभाव पड़ा। इसने मुझे साहित्य को सही अर्थ में समझने  की शक्ति दी, साथ-साथ जीवन की विषमताओं से जूझने की सामर्थ्य दी।दर्शन में तत्व मीसांसा के प्रश्नों ने तरह तरह से घेरा है।मैं तुम्हारा प्रतिबिम्ब हूं।(तुम्हें मूं चिढ़ाता हुआ, इस भूखंड पर खड़ा हुआ और नहीं कुछ बस, तुम्हारा ही आईना हूं।) और यह घेरना मुझे बहुत हूर तक नहीं ले जाता। (क्या तुम अर्धसत्य नहीं हो।)इन सब का सामना ज़मीन की सच्चाइयों में ही ढूंढने का प्रयास किया है।(मरने वाले से तुम्हें क्या मिलेगा,ज़िंदा रहने वाला तुम्हारे नाम को चलाता हैँ)दर्शन की विवेचना ने ही मुझे इन ज़मीनी सच्चाइयों तक पहुंचाया है।

(3) प्रश्न–आप किन साहित्यकारों से अत्याधिक प्रभावित हुई हैं?

उत्तर–प्रीत जी यह तो लम्बी श्रंखला है, यदि आप का आशय भारत के साहित्यकारों से है, तो एक उम्र में टैगोर, शरत ,प्रेमचन्द, यशपाल आदि ने फिर प्रसाद, पंत निराला, महादेवी , अज्ञेय मुक्ति बोध नागार्जुन दिनकर और रेणु आदि को पढ़ा। किन्तु नागार्जुन तथा निराला जी ने अत्यधिक  प्रभावित किया। उसके बाद एक लम्बा अंतराल। यहां आने के बाद नए परिवेष में तालमेल बिठाना सब कुछ समझना। साहित्य कब कहां  छूट गया, कु छ पता ही न चला। वे दिन बेहद संघर्ष के थे, बेपनाह चिंताएं।  संघर्ष तो सब जगह है ही। एक दूसरा दौर शुरू हुआ, बीच के साहित्यकारों को मैने इधर 1990 के बाद पढ़ा, जब हाई कमिश्नर सिंघवी दम्पति ब्रिटेन आए। उससे पहले सभी अपनी अपनी सामर्थ्य भर लिख रहे थे। लेकिन उन्हों ने सब को एक सूत्र में बांधा। भारत के साहित्यकारों में डा. नामवर सिंह ,डा.विश्वनाथ त्रिपाठी, गिरधर राठी, चित्रा मुदगल,.सूर्यबाला, ममता कालिया,रवीन्द्र कालिया डा. गंगाप्रसाद विमल  डा महीप सिंह डा. कैलाश बाजपेई, कमलेश्वर और सीतेश आलोक इन सब का मैं बहुत सम्मान करती हूं,मैने इनका साहित्य पढ़ा मैं इनके साहित्य के अलावा इनके व्यक्तिगत गुणों के लिए भी सम्मान करती हूं। भारत इतना बड़ा है बहुत से साहित्यकार हैं, लेकिन  मैं  थोड़े से  लोगों को जानती हूं।

(4) प्रश्न– क्या विदेश में रह कर अन्य साहित्यकारों से आपका मिलना जुलना होता है?

उत्तर–जी हां,साहित्यकारों से मिलना तो बराबर ही होता रहता है।और मैं उनके प्रोग्राम भी यॉर्क में करती हूं। नेहरू सेंटर में जब कभी कोई साहित्यिक  उत्सव होता है तो जाती रही हूं। किन्तु यॉर्क लंदन से दूर है इसलिए विशेष अवसर पर ही जाती हूं। विराट कवि सम्मेलन में जो साहित्यकार आते हैं वे यॉर्क भी आते हैं ।यॉर्क में हम अपनी संस्था  भारतीय भाषा संगम में साल में तीन या चार छोटी गोष्ठिय़ां भी करते हैं।अतः मिलना जुलना तो होता ही है।

(5) प्रश्न–अब तक आपकी कौन कौन सी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं

उत्तर–लिखा तो बचपन से, पर उसे कहीं छपवाया नहीं। एक तो सुविधा नहीं थी। दूसरी बात कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं कि मैं अपनी लिखी चीज़ों को छपवा सकती हूं। मेरी पहली किताब इंग्लैंड आने पर 1998 में  छपी। इसके पहले कुछ कविताएं हैदराबाद से प्रकाशित हुई थीं।वाणी प्रकाशन दिल्ली से “प्रवास में पहली कहानी” और प्रभात प्रकाशन दिल्ली से “सांझी कथायात्रा”,  विद्या विहार दिल्ली से “कारावास” और बोडली हेड प्रकाशन  लंदन से “ हाउ डू आई पुट इट आन” का हिन्दी अनुवाद तथा दो कविता संग्रह “क्षितिज अधूरे” बुकप्ल्स दिल्ली से, मेघा प्रकाशन दिल्ली से “कोई तो सुनेगा”तीन और किताबें यदि संभव हुआ तो शीघ्र आएंगी।

(6) प्रश्न–आप अपनी रचनाओं में किन विषयों को उठाती हैं, और आपके कविता संग्रह “कोई तो सुनेगा” में किन विषयों को संजोया गया है?

उत्तर–मेरी कविताओं में विश्वजनीन समकालीन विषय ही होते हैं।इन रचनाओं पर दर्शन का प्रभाव स्पष्ट  है।कहीं पहुंचने की तीव्र इच्छा,वह न हो सका तो निराशा,फिर आत्म-विष्लेषण। धार्मिक विषयों पर व्यंग्य, और मिथक मेरी कविताओं में  प्रतिरोध की मुद्रा में आए हैं। इसका दूसरा स्वर प्यार है। प्यार हमारे अहं को तोड़ता है।“कोई तो सुनेगा” पुस्तक का शीर्षक ही यह संकेत देता है कि इसमें एक पुकार है, और यह आकांक्षा भी है कि इस पुकार को  कोई न कोई सुनेगा। इसके दो पक्ष है एक तरफ़ गहरे मानवीय संबंधों की रक्षा के लिए, तो दूसरी तरफ़ संशय से घिरा आर्त मन पूछता है “क्या तुम अर्ध-सत्य नहीं हो”।इसमें प्रश्न हैं प्रतिप्रश्न हैं, बाजारवाद के खिलाफ़ आवाज़ मुखर हुई है,- “कौन छीन ले गया ,हमारी संवादनाओं को, हमारे प्यार को, जो तुम्हारे प्रति समर्पित था”। इतिहास के प्रति एक चेतना है, यद्यपि मैं समझती हूं कि इतिहास निष्पक्ष नहीं होता, न कोई उससे कुछ सीखता ही है।मेरी कविताओं में न कोई शिक्षा है, न कोई नारा, न कोई वाद ही है। कहीं- कहीं अपने को समझने का प्रयास है। आत्म-विवेचना है। मेरे घनीभूत अनुभव के दायरे में जो कुछ भी आया चाहे वह सुख, दुःख या विचित्र उसे मैंने स्वर देने का प्रयास किया है। अपने अंदर के अंदर झांकने की प्रबल इच्छा है।अतः कह सकते हैं कि यही विचार- तत्व लगातार काम कर रहा है।

(7 )प्रश्न– आपने हिन्दी कहानियों का उर्दू अनुवाद भी किया है । उर्दू का ज्ञान आपने कहां से लिया?

उत्तर–उर्दू मैने स्वयं सीखा है । मैने उर्दू कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया है। यदि हो सका तो यह पुस्तक शीघ्र हिंदी लिपि में आएगी ।एक छोटी सी घटना, जब मैने स्कूल में उर्दू पढ़ी तो उस्तानी जी ग़लती करने पर कान मरोड़ देती थीं। मैं रोज़ मन ही मन बिनती करती थी कि उस्तानी जी बीमार पड़ जाएं । छः सात महीने बाद उनकी नौकरी खतम हो गई, तब क्या पता था कि उसी  उर्दू से मुझे इतना प्यार हो जाएगा। बाद में एम,ए. करते समय मैने उर्दू स्वयं पढ़ी ।बहुत मन से उर्दू साहित्य पढ़ा और पढ़ाया भी। मेरी दो संपादित पुस्तकों में ब्रिटेन की महिला उर्दू कथाकारों की कहानियों का अनुवाद उर्दू से हिन्दी में मैने स्वयं किया है।समय निकाल कर मैं अभी भी उर्दू साहित्य पढ़ती रहती हूं । मुझे भाषा सीखने का शौक़ है।बगंला भाषा मेरी मां को आती थी। मैने इसे भी उनकी मदद से घर पर ही सीखा।

(8 )प्रश्न–आप स्वयं को एक सफल कवयित्री मानती हैं या सफल कहानीकार और क्यों?

उत्तर–प्रीत जी यह तो टेढ़ा प्रश्न है। जब आप साहित्यकार की बात करती हैं तो मुझे अत्यंत संकोच होता है।अपने बारे में मुझे कोई मुग़ालता नहीं है। मैं कविता, कहानी, लेख लिखती हूं पर अपने मन की डिमांड पर । बाज़ार साहित्य में बुरी तरह घुस गया है जिस सफलता की हम बात करते हैं उस कसौटी पर तो मैं कहीं भी नहीं हूं। ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में मार्च- अप्रैल 2010 के 209पृष्ट पर ‘कोई तो सुनेगा’ का मूल्यांकन छपा है।और ‘कारावास’ पुस्तक की समीक्षा ‘संचेतना’ के 2009के जून-अगस्त अंक छपी है, ‘संचेतना’ के2010 मार्च –से मई के अंक में एक साक्षात्कार छपा है। मुझे लगा बिना किसी शोर शराबे के भी कोई सुन रहा है।मैं अपने को साहित्य का विद्यार्थी ही मानती हूं।

(9) प्रश्न–आपने पुस्तकों का संपादन भी किया है, आपका संपादन के क्षेत्र में क्या अनुभव रहा है?

उत्तर–संपादन का काम श्रम  साध्य होता है। और इसे योजनाबद्ध तरीके से करना पड़ता है । सबसे पहला काम पत्र लिखना, वर्ड प्रोसेस से लेकर अंत तक सारी रचनाओं को इकट्ठा करना ,काट-छांट करना, पढ़ना, कभी कोई तथ्य ग़लत लगे तो उसे लाइब्रेरी जा कर देखना आदि ज़रूरी और समय की मांग करता है।मैने किताबों का संपादन अपनी छोटी बहन चित्रा  के साथ किया था । और फिर छोटी बहन के साथ तो काम करना एक सुखद अनुभव  रहा ।मुझे टीम में काम करना अच्छा लगता है। किसी भी टीम में काम करने के लिए सब कुछ पहले से तय करना ठीक रहता है। यदि आप अनजान संपादक हैं तो प्रकाशक  का मिलना ही मुश्किल होता है। मैं इस विषय  से बहुत ख़ुश हूं कि मुझे वाणी प्रकाशन तथा प्रभात प्रकाशन का पूरा सहयोग मिला। मैं उनका आभार मानती हूं

(10) प्रश्न–क्या आपने साहित्य के अलावा किसी और क्षेत्र में भी क़दम रखा

उत्तर–स्कूल से वि,वि. तक सभी सांस्कृतिक कार्य़क्रम, नृत्य, संगीत, ड्रामा वाद- विवाद सब में भाग लिया। अन्तर्रविश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता में गोल्ड-मेडल मिला । किंतु संगीत और नृत्य में आगे कुछ नहीं किया।उसके लिए सुविधा नहीं थी।

(11 )प्रश्न–आपको कौन से कार्य के लिए निराला सम्मान से नवाजा गया.?

उत्तर–मुझे 2005 में मेरे काव्य संग्रह “क्षितिज अधूरे” पर निराला सम्मान मिला।2009 में कहानी संग्रह “कारावास” पर कथा यू.के का पद्मानंद साहित्य सम्मान मिला।

(12) प्रश्न–आपको अपनी कौन सी रचना सर्वाधिक प्रिय है और क्यों”?

उत्तर–प्रीत जी, मैंने इतना अधिक तो नहीं लिखा है कि चुनाव करूं, जो भी लिखा है वह मन से पूरे सुख-दुखमें डूब कर ,और वह सब प्रिय है। शायद कभी आपसे मिलना हो तो इस पर चर्चा कर सकूं।

(13 )प्रश्न–आजकल विदेश में रह रहे हिन्दी साहित्यकारों  के लिए प्रवासी शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, आप इससे कितनी सहमत हैं?

उत्तर–‘प्रवासी’ शब्द हो या ‘शुद्ध हिन्दी’ या ‘नॉस्टेलजिया’ या फिर और बहुत से स्लोगन चर्चा में बने रहने के लिए अच्छे हैं। साथ ही साथ ये प्रयास थोड़ा हवा को साफ़ भी करते हैं। किन्तु मुझे नहीं लगता कि इस से साहित्य सृजन में कोई अंतर आएगा । ‘प्रवासी’ शब्द से अधिक प्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रति भारतीय मुख्यधारा के कुछ हिन्दी साहित्यकारों का रवैया इस तरह का रहा कि यहां के साहित्यकारों को यह प्रश्न उठाना पड़ा । इसका कोई समाधान होगा मुझे नहीं लगता। किन्तु विस्थापन का संघर्ष, जिसे बिना जाने समझे आपके कुछ साहित्यकार नास्टाल्जिया, खंडित व्यक्तित्व, और विभाजन की त्रासदी कह कर यहां के लेखन को दर किनार कर देते हैं, इस तरह के विशेषण न हमें उत्साहित करते हैं न सदभावना पैदा करते हैं। संभवतः ये लोग अपने पूर्वाग्रह से आगे सोच नहीं सकते। ऐसे लोग अगर भारत में हैं तो यहां भी हैं।

(14) प्रश्न–विदेश में रह कर आपको साहित्य के क्षेत्र में किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

उत्तर–लेखन में चुनौतियां तो हैं ही आप कहीं भी रहें। बाज़ार साहित्य में अपने पूरे ताम- झाम के साथ पसर कर बैठ गया है। बाज़ार ही साहित्य के आदर्श को तय कर रहा है। क्या बिक सकता है? जैसे लोग रातो-रात करोड़पती बनना चाहते है, उसी तरह लेखक भी रातो-रात शिखर पर पहुंच जाना चाहता है।और इसके लिए लेखन के अलावा लेखक को और भी बहुत कुछ करना पड़ता है। यह तो सामाजिक चुनौतियां हैं, पर व्यक्तिगत रूप से मैं राजधानी से दूर हूं।, साहित्यकि गोष्ठियों का अभाव, पुस्तकों का अभाव। लंदन में हाई-कमीशन है जहां किताबें भी हैं, किंतु जिनका वितरण हिंदी अधिकारी को एक सहायक न मिलने के कारण सुचारु रूप से नहीं होता । सांस्कृतिक केंद्र नेहरू सेंटर है जहां भारत से साहित्यकार आते हैं।सबका राजधानी पहुँचना हमेशा संभव नहीं हो पाता न ही वे उन क्षेत्रों में  साहित्यकारों को भेजने को प्रबन्ध करते हैं।

(15 )प्रश्न– आपके घर में कौन सा सदस्य आपके साहित्य-लेखन में साधक या बाधक सिद्ध हुआ?

उत्तर–मैं स्वयं ही बाधक और साधक दोनो ही हूं।मेरा छोटी बहन चित्रा, मेरे पति महेन्द्र तथा दोनों बेटे और बहू तथा परिवार के अन्य सदस्यों ने मुझे मेरी साहित्यिक यात्रा में सदा प्रोत्साहन दिया है। हर तरह से इसे सुविधाजनक बनाया है।मेरा पहला कविता संग्रह छप ही सका क्यों कि महेन्द्र मेरी इधर उधर पड़ी  हुई कविताओं को सम्हाल कर रख देते थे।अपनी पहली पुस्तक ‘क्षितिज अधूरे’ छपी, देख कर इतनी ख़ुशी हुई कि अब मैं स्वयं सब कुछ सम्हाल कर रखती हूं।मैं ही बाधक हूं क्योंकि लिखने के लिए बैठती हूं तो किताबों में मन उलझ जाता है। पढ़ना तो होता है पर उसी तरह लिखना नहीं हो पाता। हर दिन अपने से किया वादा तोड़ती हूं। साधक इस लिए कि जो कुछ भी लिखा गया है वही मेरी साधना है। और अब तो बाधक मेरा स्वास्थ्य है।

(16 )प्रश्न– उषा जी क्या आप जीवन पर्यन्त विदेश में रहना चाहेंगी या आपकी मातृभूमि की ओर भी वापसी होगी।?

उत्तर–प्रीत जी –आपके इस प्रश्न ने मन को कहीं बहुत गहरे छुआ है। मातृ-भूमि की तरफ़ वापसी का प्रश्न अब कहां उठता है। निश्चय ही लौटना नहीं होगा। अकेला-पन हर हालत में है। मेरे और महेन्द्र के भाई बहन भारत में हैं, हमारा परिवार यहां, तो दोनों तरफ़ अकेले-पन का यह सिलसिला जीवन भर बना रहेगा। जितने दिन शरीर साथ दे बार-बार सब से आकर मिल सकूं यही इच्छा है।वापसी  न होने पर भी लौटने की ललक तो साथ जाएगी ही।

(17 )प्रश्न–हिन्दी साहित्य के प्रेमियों के लिए कोई संदेश देंगी।

उत्तर–हम सब की पारस्परिक सद्भावना और विश्वास में आस्था निरंतर बनी रहे।हम ‘पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें’।

साक्षात्कार प्रस्तुति : ड़ॉ प्रीत अरोड़ा

जन्म – २७ जनवरी. शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनों वर्षों में प्रथम स्थान के साथ और मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य . कार्यक्षेत्र-. अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद।

Filed in: साक्षात्कार, सीधी बात

19 Responses to “हम पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें : उषा वर्मा”

  1. इतना अच्छा साक्षात्कार साझा करने के लिए आपका आभार!
    ऊषा वर्मा जी को शुभकामनाएँ!

  2. rasprabha
    June 21, 2012 at 6:02 pm #

    जिसके लिए साहित्य घर हो , आकाश भी हमसफ़र बन जाता है

  3. kavita vikas
    June 21, 2012 at 6:19 pm #

    उषाजी का साक्षात्कार प्रीतजी के द्वारा लिया गया ,दो साहित्यकार जब आमने सामने हों तो प्रश्न और उत्तर का तालमेल बेहद आकर्षक हो जाता है ।उषाजी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला ,बहुत से अनछुए पहलुओं को प्रीतजी ने सामने रखा । इस सार्थक संवाद के लिए प्रीतजी को हार्दिक बधाई ।

  4. krishna kant madhur
    June 21, 2012 at 6:25 pm #

    bahut sunder prashn kiye hen preet arora ji aapne , aur utne hi sahaj sunder shabdon me usha ji ne uttar diye hen. ushaji ka drishtikon sahity premi evam rachna dharmi logon ke liye shiksha prad he. chnotiyon ke baare me unke vichar mujhe bahut pasand aaye me unse sahmat hun.

  5. June 21, 2012 at 6:37 pm #

    आपका आभार!
    ऊषा वर्मा जी को शुभकामनाएँ!

  6. renu
    June 21, 2012 at 6:39 pm #

    britain mei rehte hue bhi HINDI ke vikas ke prati roochi.bahut khoob. i wish ur creationns to be included in n.c.e.r.t. books. pl try for that

  7. सधा हुआ सार्थक साक्षात्कार
    वाह ..
    उषा वर्मा जी के प्रति आदर के साथ आभार

  8. June 21, 2012 at 8:10 pm #

    USHA VERMA JI AUR PREET ARORA JI KAA SANWAAD BAHUT ACHCHHAA LAGAA
    HAI .DONO KO SHUBH KAMNAAYEN .

  9. June 21, 2012 at 8:10 pm #

    प्रीत जी….सुंदर साक्षात्कार लेने के लिए बधाई और शुभकामनाएँ

  10. suresh yadav
    June 21, 2012 at 9:21 pm #

    डा.प्रीती अरोड़ा ने लेखिका के साथ सार्थक प्रश्नों को उठाया है ,परिणाम स्वरुप उषा जी ने पूरी गंभीरता के साथ उत्तर प्रस्तुत किये .बधाई

  11. उषा राजे सक्सेना
    June 21, 2012 at 9:24 pm #

    साक्षात्त्कार में उषा जी की सुलझी हुई सोच की अभिव्यक्ति है.
    बधाई!

  12. June 21, 2012 at 9:38 pm #

    nice

  13. Prem Janamejai
    June 21, 2012 at 11:37 pm #

    प्रीति जी
    उषा जी के साथ आपका साक्षात्कार पढ़ा , आपने बहुत ही सार्थक प्रश्न उठायें हैं , प्रश्नों के अनेक शेड्स हैं . उषा जी कि इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि — बाज़ार साहित्य में अपने पूरे ताम- झाम के साथ पसर कर बैठ गया है। बाज़ार ही साहित्य के आदर्श को तय कर रहा है। क्या बिक सकता है? जैसे लोग रातो-रात करोड़पती बनना चाहते है, उसी तरह लेखक भी रातो-रात शिखर पर पहुंच जाना चाहता है।”
    उनका एंटी कथन बहुत ही अच्छा लगा — हम ‘पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें’।
    बधाई

  14. amar tak
    June 22, 2012 at 12:08 am #

    Dr priti arora ji ne usha verma ji ka sakshatkar karte samai unke jeewan ke purteyk pahloo ko chchute hua prashan kiye usha ji ne utni hi khppbsoorti se steek utter diye.sunder sakshatkar lene ke liye priti ji badhai ki patar.hai.usha verma ji ko malkamnaen.

  15. June 22, 2012 at 8:07 am #

    साहित्य के बाजारुपन से अछूती उषाजी से मिलना अच्छा लगा !
    उन्होंने सार्थक सन्देश भी दिया !

  16. June 22, 2012 at 11:28 am #

    बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति… आभार

  17. June 22, 2012 at 2:56 pm #

    साक्षात्कार द्वारा उषा वर्मा जी के साथ कुछ कदम साथ चल कर आनंद की अनुभूति हुई |उनका साहित्यसृजन संसार प्रशंसनीय हैं |

  18. ड़ा प्रीत अरोड़ा
    June 22, 2012 at 3:18 pm #

    आप सभी का कोटि-कोटि धन्यवाद कि आपने अपने अमूल्य विचार साँझे किए.और मेरा हौसला बढ़ाया.एक बार फिर दिल से धन्यवाद.सादर,प्रीत अरोड़ा

  19. Drona Sharma
    June 24, 2012 at 2:52 pm #

    The questions are probing and empathic whilst the answers are introspective , poignant and ,at times, nostalgic!
    I enjoyed reading it-and could identify with the schism of living abroad-thank you for this excellent interview.

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