उडिया भाषा की चर्चित कथा लेखिका सरोजिनी साहू की दलित कहानियों की श्रृंखला के अंतर्गत आज दलित विमर्श पर आधारित उनकी एक वहुचर्चित कहानी को हम प्रस्तुत कर रहे हैं,जिसका अनुवाद किया है दिनेश कुमार माली ने ..!
मुख्य संपादक
=================================================================

सरोजिनी साहू ओडिया साहित्य के साम्प्रतिक प्रमुख साहित्यकारों मे मानी जाती है.साहित्य साधना मे अपने योगदान हेतु उन्हें ओडिसा साहित्य अकादेमी पुरस्कार, झंकार पुरस्कार, प्रजातंत्र पुरस्कार, भुबनेश्वर पुस्तक मेला पुरस्करोंसे सम्मानित किया गया है। ओडिया साहित्य मे नारीवाद के प्रमुख प्रबकता यह साहित्यकार का जन्म १९५६ मे ओडिसा के धेंकनाल मे हुआ था। ओडिया साहित्य मे स्नातकोत्तर तथा पीएचडी तथा कानून मे स्नातक की उपाधि से सम्मानित यह लेखिका सम्प्रति बेलपहाड़ कॉलेज मे कार्यरत हैं। श्री इश्वर चन्द्र साहू तथा श्रीमती नलिनी देवी की कन्या तथा ओडिया साहित्य के प्रमुख लेखक जगदीश मोहंती की धर्मपत्नी और दो संतानों की माता सरोजिनी की अबतक पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे आठ कहानी संग्रह और सात उपन्यास शामिल है.

सरोजिनी साहू ओडिया साहित्य के साम्प्रतिक प्रमुख साहित्यकारों मे मानी जाती है.साहित्य साधना मे अपने योगदान हेतु उन्हें ओडिसा साहित्य अकादेमी पुरस्कार, झंकार पुरस्कार, प्रजातंत्र पुरस्कार, भुबनेश्वर पुस्तक मेला पुरस्करोंसे सम्मानित किया गया है। ओडिया साहित्य मे नारीवाद के प्रमुख प्रबकता यह साहित्यकार का जन्म १९५६ मे ओडिसा के धेंकनाल मे हुआ था। ओडिया साहित्य मे स्नातकोत्तर तथा पीएचडी तथा कानून मे स्नातक की उपाधि से सम्मानित यह लेखिका सम्प्रति बेलपहाड़ कॉलेज मे कार्यरत हैं। श्री इश्वर चन्द्र साहू तथा श्रीमती नलिनी देवी की कन्या तथा ओडिया साहित्य के प्रमुख लेखक जगदीश मोहंती की धर्मपत्नी और दो संतानों की माता सरोजिनी की अबतक पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे आठ कहानी संग्रह और सात उपन्यास शामिल है.


अनुवादित कहानी गैरेज पढ़ने को मिली |उपेक्षित ,शोषित और भ्रमित नारी के लिए गैराज भी एक भ्रम बन कर रह गया है |छलाबे के बीच में वही नारी जो थी –है –और –रहेगी |मर्मान्तक पीड़ा से भरपूर |