3:16 am - Sunday May 26, 2013

एक पत्र पुत्र के नाम

(विमर्श:विधू यादव)

सफाई करते करते एक बूढ़े सफाई कर्मचारी की नजर एक चिट्ठी पर पड़ी ! उसमे पत्र को उठाया और खोला ! पत्र पढ़ते पढ़ते उसके चेहरे के रंग बदलने लगे ! माने अतीत की कोई भूली बिसरी याद उसके मनों मस्तिक पर छा रही हो ! एक पल तो यही लगा की मानों पत्र उसी का लिखा हो ! पत्र एक पिता का था जिसने अपने बेटे को पत्र लिखा था ! उस पिता को ये भी नही मालूम था की उसका बेटा रहता कहाँ है ? पत्र  पर कोई पता नही लिखा था शायद इसलिए वह इधर उधर कोरे कागज की तरह भटक रहा था ! पत्र कुछ इस तरह था -


” प्रिय बेटा !
आशा है कि तुम ठीक होगे! और तुम्हारा परिवार भी कुशल मंगल होगा ! हम भी तुम लोगों के बिना ठीक ही है, बस बुढ़ापे कि वजह तुम्हारी तरह अब मेरा ये शरीर भी साथ नही दे रहा है ! पहले से पत्र लिख रहा हूँ क्यूंकि तुम्हारा जन्मदिन आने वाला है सोचा बेटे के लम्बी उम्र के लिए दुआये भेज रहा हूँ ! और ऐसे में पत्र समय से ना पंहुचा तो फिर मेरे पत्र लिखने का कोई मायने नही रहेगा ! सुना है आज कल पत्र नहीं सीधा सन्देश पहुचने के लिए मोबाईल फ़ोन आ गए है !  परन्तु बेटा ! तुम तो जानते हो मुझे इन सब चीजों कि क्या आवश्कता! तुम ठीक ही कहा करते थे और अब तो मै वैसे ही कब्र में जाने वाला हूँ ! और हाँ बेटा ! तुम अपनी माँ के विषय में नही जानना चाहोगे ? खैर कोई बात नही मै बताये देता हूँ !

तुम्हारी माँ का स्वस्थ ठीक नही है ऊपर से ये बुढ़ापा ! बस जसतस दिन कट रहे है !

पता है बेटा ! जब तुम्हारा जन्म नही हुआ था बहुत ख्वाहिश थी कि घर में चिराग आये जो हमारे घर को रोशनी से भर दे ! पर हमे नहीं मालूम था कि कभी कभी चिरागों से भी घर जल जाया करते है ! अब तो ख्वाहिश ही ना रही कि घर में दिया भी जलाऊ !

पहली बार जब तुमने मेरी उंगली थमी थी सोचा था कि एक दिन जब मै बूढा हो जाऊंगा तो तू मेरी इन्ही उंगलिओं को थामकर मुझे बुढ़ापे में सहारा देगा ! तब नही जान सका था कि एक दिन जिन हाथों को पकड़कर चलना सिखाया कल वही अपना हाथ देने से कतरेंगे !

फिर धीरे धीरे तुम बड़े होने लगे ! लगा कि जीवन को नया आयाम मिल गया ! बेटे को  पढ़ा लिखा कर अफसर बनने की सोचा पर ख्वाहिशों की इस अधेड़बुन में ये भूल गया कि बेटा तो अफसर बन जायेगा पर मै तो फिर रह जाऊंगा एक बेटे का लाचार बाप !

याद है तुम्हे जब तुम मिठाई खाने की जिद किया करते थे तो तुम्हारी माँ से छुपके तुम्हे मिठाई खिलाया करता था ! परन्तु तुमने हमे दो कौर रोटी भी खिलना अपना धर्म ना समझा !

खैर इन सभी बातों का कोई मतलब नही है अभी जब तुम एक दिन बूढ़े हो जाओगे तो तुम्हे ये सब बातें ख़ुद ब ख़ुद समझ में आ जायँगी !
हो सकता है ये मेरे जीवन का आखिरी पत्र हो ! इसलिए बेटा तुम जहाँ भी रहों, खुश रहों! मेरी दुआएं सदा तुम्हारे साथ रहेंगी !

तुम्हारा लाचार बाप  ”


पत्र पढ़ कर वह बूढ़ा कर्मचारी इसलिए परेशान हो गया था क्यूंकि वह भी एक बेटे का लाचार बाप था और उसका पुत्र भी उसे अकेला छोड़कर
अपने परिवार संग अलग रहने लगा था ! इसलिए एक लाचार बाप का दर्द उससे ज्यदा और कोई नही समझ सकता था ! उसने उस पत्र को अपनी जेब में रखा और आगे सफाई करता हुआ चला गया !

विधू यादव

विधू यादव लखनऊ के एक कस्बे अर्जुनगंज में रहती हैं । ये लखनऊ यूनिवर्सिटी से  जनसंचार एवं पत्रकारिता से M.Sc.कर रही हैं ! साथ ही आंचलिक विज्ञान नगरी में science communicator हैं। इनका ब्लॉग हैhttp://haoslonkiudaan.blogspot.in/

इसके अलावा इनकी लेखन में  काफी रूचि है ! इसलिए ये script writing  भी करती हैं ।

Filed in: आलेख, विविध

9 Responses to “एक पत्र पुत्र के नाम”

  1. July 9, 2012 at 1:24 pm #

    हो सकता है ये मेरे जीवन का आखिरी पत्र हो ! इसलिए बेटा तुम जहाँ भी रहों, खुश रहों! मेरी दुआएं सदा तुम्हारे साथ रहेंगी !..

    ..जाने कितने ही लाचार माँ-बाप की यही कहानी हर बार हमारे इर्द-गिर्द घूम-फिरकर नेपथ्य में चली जाती हैं फिर भी औलादें जिनके लिए माँ-बाप क्या-क्या नहीं करते, समय रहते समझ नहीं पाते ..क्यों वे यह भूल जाते हैं यह आंखिर हमें भी उसी राह चले जाना होता है ….
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..आभार

  2. July 9, 2012 at 3:11 pm #

    यथार्थ को कहती अच्छी कहानी

  3. pavitra agrawal
    July 9, 2012 at 4:15 pm #

    aaj ki marmik kahani.

    http://laghu-katha.blogspot.com/

  4. July 9, 2012 at 4:59 pm #

    behtareen!!

  5. V.K. Joshi
    July 9, 2012 at 9:37 pm #

    विधु ने बड़ी मार्मिक और हृदयस्पर्शी कथा लिखी है. इसके लिए विधु को अनेक बधाई-तथा आगे और लिखने की शुभकामनाएं.

  6. sanjay pandey
    July 11, 2012 at 7:59 am #

    well written story Vidhu. You have brought out the emotions of an old man quite beautifully. Keep on writing.

  7. July 11, 2012 at 11:07 am #

    मार्मिक कहानी।

  8. July 11, 2012 at 9:48 pm #

    मर्म को छूने वाली कहानी !एक वृद्ध उपेक्षित पिता के मनोभावों का बारीकी से विश्लेषण किया है |कृतघ्न ता किसी के भी पर क़तर सकती है |कहानीकार को बधाई |

  9. nagendra
    July 12, 2012 at 9:30 pm #

    good……….

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