सफाई करते करते एक बूढ़े सफाई कर्मचारी की नजर एक चिट्ठी पर पड़ी ! उसमे पत्र को उठाया और खोला ! पत्र पढ़ते पढ़ते उसके चेहरे के रंग बदलने लगे ! माने अतीत की कोई भूली बिसरी याद उसके मनों मस्तिक पर छा रही हो ! एक पल तो यही लगा की मानों पत्र उसी का लिखा हो ! पत्र एक पिता का था जिसने अपने बेटे को पत्र लिखा था ! उस पिता को ये भी नही मालूम था की उसका बेटा रहता कहाँ है ? पत्र पर कोई पता नही लिखा था शायद इसलिए वह इधर उधर कोरे कागज की तरह भटक रहा था ! पत्र कुछ इस तरह था -
हो सकता है ये मेरे जीवन का आखिरी पत्र हो ! इसलिए बेटा तुम जहाँ भी रहों, खुश रहों! मेरी दुआएं सदा तुम्हारे साथ रहेंगी !..
..जाने कितने ही लाचार माँ-बाप की यही कहानी हर बार हमारे इर्द-गिर्द घूम-फिरकर नेपथ्य में चली जाती हैं फिर भी औलादें जिनके लिए माँ-बाप क्या-क्या नहीं करते, समय रहते समझ नहीं पाते ..क्यों वे यह भूल जाते हैं यह आंखिर हमें भी उसी राह चले जाना होता है ….
बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..आभार
यथार्थ को कहती अच्छी कहानी
aaj ki marmik kahani.
http://laghu-katha.blogspot.com/
behtareen!!
विधु ने बड़ी मार्मिक और हृदयस्पर्शी कथा लिखी है. इसके लिए विधु को अनेक बधाई-तथा आगे और लिखने की शुभकामनाएं.
well written story Vidhu. You have brought out the emotions of an old man quite beautifully. Keep on writing.
मार्मिक कहानी।
मर्म को छूने वाली कहानी !एक वृद्ध उपेक्षित पिता के मनोभावों का बारीकी से विश्लेषण किया है |कृतघ्न ता किसी के भी पर क़तर सकती है |कहानीकार को बधाई |
good……….