पवन श्रीवास्तव की दो गज़लें
मौसम के मिजाजों सा परिवेश बदल लेते हैं
बचपन के रिश्तों को कैसे कोई ढूँढे
हममें उनमें यारों बस इतना अंतर है
संकेत की दुनिया में कोई हेरा-फेरी है
मुझे क़ैद उमर भर की और तुमको सजा-ए-मौत
सृष्टि ,कुछ नातों का संबंधों का एक विस्तार है
एक यह संसार है ,और एक हमारी कल्पना
सबसे मिलिए,प्रेम से मिलिए ,लिपट कर रोइए
घूमिए और घूमते रहिए,जहाँ तक बन पड़े
क्या ‘ पवन ‘ तुम भी नयापन ढूंढते रहते हो हरदम
Filed in: ग़ज़ल



पवन श्रीवास्तव