9:43 am - Sunday May 19, 2013

पवन श्रीवास्तव की दो गज़लें

(1)

मौसम के मिजाजों सा परिवेश बदल लेते हैं
मन रंग बदलता है हम वेश बदल लेते हैं .

बचपन के रिश्तों को कैसे कोई ढूँढे
हम उम्र बदलते हैं ,वो देश बदल लेते हैं

हममें उनमें यारों बस इतना अंतर है
हम मूल बदलते हैं वो शेष बदल लेते हैं

संकेत की दुनिया में कोई हेरा-फेरी है
वर्ना कैसे कुछ लोग सन्देश बदल लेते हैं

मुझे क़ैद उमर भर की और तुमको सजा-ए-मौत
आओ     मेरे भाई        आदेश बदल लेते हैं.

(2)

सृष्टि ,कुछ नातों का संबंधों का एक विस्तार है
एक आकर्षण खिंचा इस पर से इस पार है.

एक यह संसार है ,और एक हमारी कल्पना
कल्पनाओं से परे भी एक और संसार है

सबसे मिलिए,प्रेम से मिलिए ,लिपट कर रोइए
आपके भावों का दर्पण , आपका व्यवहार है.

घूमिए और घूमते रहिए,जहाँ तक बन पड़े
घूमते रहना ही अपनी सृष्टि का आधार है

क्या ‘ पवन ‘ तुम भी नयापन ढूंढते रहते हो हरदम
ये तुम्हारी जिंदगी है या कोई अख़बार है

पवन श्रीवास्तव
३३,ए,-मिनिस्त्रिअल क्वार्टर .आरा ,बिहार -८०२३०१..
मो -.०९४७१२३७६४४.

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