” नहीं श्मशानी शन्ति चाहिए
नहीं वैष्णवी शन्ति चाहिए
नहीं भैरवी शन्ति चाहिए
नहीं निर्गुणी शन्ति चाहिए
हम इच्छुक हैं सगुण शक्ति के “
नागार्जुन आधुनिक युग की नव-चेतना के प्रगतिशील कवि हैं.उन्होंने एक ओर तो वर्ग-संघर्ष से समस्त मानवता के प्रति गहन संवेदना व्यक्त करते हुए इसके लिए उत्तरदायी व्यवस्था के विरुद्ध तीव्र आक्रोश प्रकट किया है ,तो दूसरी और स्वतंत्रता –प्राप्ति के उपरान्त भी बहुसंख्यक जनता को अभावो ,कष्टों एवं पीड़ाओं में लीन देखकर स्वदेशी शासकों के अनुचित कार्यों पर प्रखर एवं प्रकृष्ट व्यग्यं-बाणों की बौछार करते हुए उसे बेनकाब किया है.इसलिए उन्हें समाज तथा देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ एवं कर्मयोगी कवि कहा जाता है.उनके जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव महापण्डित राहुल सांकृत्यायन और कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का पड़ा.कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला से प्रेरित होकर ही नागार्जुन ने साहित्यिक क्षेत्र में कलम सँभाली .इसी कारण उनकी कविताओं में निराला -सा आक्रोश ,क्षोभ,अक्खड़ता ,व्यग्यं ,तड़पन,ललक,क्रांति का स्वर ,विद्रोही भावना ,ललकार व मानवीय सरोकार मौजूद हैं .निस्संदेह जिस प्रकार निराला ने अपने साहित्य के माध्यम से साधारण जन के दुख -दर्द को समझकर अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाते हुए मानवता के प्रति सहानुभूति व्यक्त की.ठीक उसी प्रकार नागार्जुन ने भी पीड़ित जनता के कष्टों को स्वर प्रदान करते हुए मानवता के उत्थान के लिए क्रांति का आह्वान किया.कवि ने अपने युग में उत्पन्न सभी हलचलों ,समस्याओं एवं परिस्थितियों का अध्ययन बहुत गहनता व तीव्रता के साथ किया है.कवि जानता है कि जहाँ एक ओर भारत का दलित वर्ग अभावों की चक्की में पिस रहा है वहाँ दूसरी ओर उच्च-वर्ग वैभव एवं विलास के पालने में झूलता हुआ ऐशोआराम का जीवन बिता रहा है.कवि निम्न-वर्ग की दलित अवस्था को देखकर पुकार उठता है–
“खादी ने मलमल से अपनी साठ-गाँठ कर ड़ाली है
बिरला-टाटा-ड़ालमिया की तीसों दिन दिवाली है “
नागार्जुन ने बड़ी लगन व गम्भीरता के साथ तत्कालीन समाज की धार्मिक,राजनीतिक,आर्थिक,राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय घटनाओं का सूक्ष्म निरीक्षण करके उन पर कटु एवं तीखे व्यग्यं लिखे.उस समय समाज में फैली मँहगाई की समस्या की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है
“ पैटन टैंक उन्होंने तोड़ें,
मँहगाई के टैंक कौन तोड़ेगा ?’’
कवि देश के महान नेताओं ,साहित्यकारों एवं महापुरुषों के प्रति श्रद्धावनत होकर उनका गुणगान करता है.इसलिए वह स्वार्थी एवं लालची काँग्रेसियों से घृणा भी करता है.कवि ने महात्मा गाँधी जी के नाम पर वोट लेने वाले स्वार्थी ,अवसरवादी नेताओं के ऊपर व्यग्यं करते हुए अपनी विद्रोही भावना को इस तरह प्रस्फुटित किया:-
“बेचबेचकर गाँधी जी का नाम
बटोरो वोट
बैक बैलेंस बढ़ाओं
राजघाट पर बापू की वेदी के आगे अश्रु बहाओ ”
देशव्यापी भ्रष्टाचार को देखकर भी कवि का हृदय कराह उठा और वह भ्रष्टाचार को रावण का रूप देकर अपना आक्रोश प्रकट करने लगा:-
“ राम-राज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है
सूरत शक्ल वही है भैया ,बदला केवल ढ़ाँचा है ”
कवि ने अपने काव्य में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के निधन पर श्रद्धांजलि भी अर्पित की.कवि के मन में यह शंका उठी कि वैभवपूर्ण परिवार में जन्म लेकर भी उनके हृदय में जन-जन की पीड़ा को समझने की शक्ति और अनुभूति कहाँ से आई :-
कहाँ से मिली तुम्हें इतनी अनुभूतियाँ
पीड़ित मनुष्यता के निम्न स्तर की ?’’
नागार्जुन का सर्वाधिक झुकाव उस जन-जीवन की ओर है जो अभावों एवं विषमताओं से जूझता है,जो आपत्तियों का ड़टकर मुकाबला करके भी शोषण का शिकार बनता है,जो भ्रष्ट एवं व्यभिचारी नेताओं की वासना –तृप्ति का साधन बनता है, और जो धर्म एवं सँस्कृति की चकाचौंध से अंधा बनकर पग-पग पर ठोकरें खाता है .समाज की इन सभी स्थितियों से परिचित होकर नागार्जुन का सच्चा कवि हृदय विद्रोह करके क्रांति का शंख फूँकता है.वह कभी अन्यायी एवं अत्याचारी साम्राज्यवादी को ड़ाँटता है,तो कभी श्रमिकों को पीड़ा देने वाले पूँजीवादियों को ललकारता है .कवि के काव्य में भारत –भूमि के अणु-अणु एवं कण-कण के प्रति अगाध श्रद्धा –भक्ति भरी हुई है.इसलिए कवि ने जन-जीवन को अपनी कविताओं का माध्यम बनाया.कवि के हृदय में सामाजिक वैमनस्य एवं अभावों की कटुता के रहते हुए भी अपने देश,समाज ,राष्ट्र ,देशवासी ,नदी-वन-पर्वत ,खेल-खलियान ,गाँव –नगर एवं सभी पदार्थो के प्रति गहन लगाव दिखाया है.वह अपनी मातृभूमि का अनन्य पुजारी,अपने राष्ट्र का अनन्य भक्त और अपनी जनता का अनन्य सेवक सिद्ध हुआ.नागार्जुन ने अपने देश के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा :-
“ खेत हमारे,भूमि हमारी ,सारा देश हमारा है
इसीलिए तो हमको इसका चप्पा-चप्पा प्यारा है ”
इस प्रकार कवि ने समसामयिक बोध को अपने-काव्य में मुखरित करते हुए युग-जीवन के सभी पहलुओं पर दृष्टि ड़ाली.देश में व्याप्त नैतिक आचरण,अन्याय ,शोषण आदि का पर्दाफाश करते हुए शोषित एवं दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रकट करके मानवीयता का परिचय दिया.निश्चित रूप से नागार्जुन द्वारा सर्वहारा वर्ग के प्रति संघर्ष की आवाज को बुलंद करने का प्रयास सराहनीय है !
डॉ.प्रीत अरोड़ा
शिक्षा-एम.ए हिन्दी पँजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से (यूनिवर्सिटी टापर),पी.एचडी(हिन्दी)पँजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से,बी.एड़ पँजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से . कार्यक्षेत्र—शिक्षिका अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद । अनेक प्रतियोगिताओं में सफलता, आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में नियमित लेखन । वेब पर मुखरित तस्वीरें नाम से चिट्ठे का सम्पादन. अनेक किताबों में रचनाएँ प्रकाशित सम्मान-अमर उजाला की ओर से सम्मानित पुरस्कार-‘वुमेन आन टाप ’पत्रिका के ओर से कहानी पुरस्कृत (मई-2012 ) युवा लेखिका के लिए राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड (2012) से सम्मानित “अनुभूति” नामक काव्य-संग्रह का सम्पादन (प्रकाशाधीन ) मनमीत पत्रिका का अतिथि सम्पादन ।
परिकल्पना संपादकीय टीम
परिकल्पना ब्लॉगोत्सव की यह प्रस्तुति आपको कैसी लगी, हमें पूरी विनम्रता के साथ बताएं, क्योंकि विनम्रता एक विवेकशील ह्रदय की अभिव्यक्ति है तथा दूसरों द्वारा अनुसरण किये जाने के लिए महानता का उदाहरण प्रस्थापित करती है ! इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराएं .....!
behtareen…
बहुत बढ़िया ….!
Ek kavi ya sahityakar apne samaj ko aaina dikhata hai. samaj ki jivant tasveer hamare samne rakhta hai. Nagarjun ji ne yahi kaam apni kavitaon ke madhyam se kiya or apne samay ki Samajik or Rajnaitik paristhition se hume robaro krwaya… or iss drishti se Nagarjun MANAVTA KE SACCHE PUJARI hain…
नागार्जुन जन्मशती के अवसर पर एक बेहतरीन लेख के लिए धन्यवाद.
सुंदर आलेख के लिए बधाई
dr preet ji ne prakhyat shityakar naagarjun ji ke jeewan ke har pahloo par parkash dalte hue bahoot hi umda lekh likha hai aur tark de ye sidh kiya hai ki ve “manavta ke sachhe poojari” the,uttam lekh ke liye hardik badhai.,
सभी का कोटि-कोटि आभार