परिकल्पना संपादकीय टीम
परिकल्पना ब्लॉगोत्सव की यह प्रस्तुति आपको कैसी लगी, हमें पूरी विनम्रता के साथ बताएं, क्योंकि विनम्रता एक विवेकशील ह्रदय की अभिव्यक्ति है तथा दूसरों द्वारा अनुसरण किये जाने के लिए महानता का उदाहरण प्रस्थापित करती है ! इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराएं .....!
संवेदनाओं को झकझोरती हुयी लघुकथा, आभार पढ़वाने के लिए ।
Achchi Laghu katha..yahi yatharth hai safalta kaa aaz ke yug me- jo sanskriti ko taak par rakh ke bhi haasil ho jaye, to kisi ko gurez nahi…
थोड़े से शब्दों मे आपकी लधुकथा बहुत कुछ कह गई।अति उत्तम।
थोड़े से शब्दों मे आपकी लधुकथा बहुत कुछ कह गई।अति उत्तम।
वाह प्राण जी..हमेशा की तरह आपने इस बार भी दिल जीत लिया. गहरा कटाक्ष किया है आपने..
परिस्थिति अनुसार मूल्यों का बदलाव स्वाभाविक है, सामाजिक स्वीकार्यता अनुसार व्यक्ति का आचरण व चरित्र बदलना सामान्य है/
प्राण जी !
ज़िंदगी का आइना है यह लघुकथा। सच है की हर कोई बिकाऊ होना चाहता है टिकाऊ नहीं।
समय के सामने मापदंड कोई मायने नहीं रखते … वैसे भी जब हर चीज़ के मापदंड सफलता ही रह गए हों तो देरी काहे की … सार्थक कथा …
महत्वाकांक्षा के पंख न जाने कहाँ -कहाँ ले जायेंगे इस नई पीढ़ी को |अच्छा कटाक्ष !