5:18 am - Monday May 20, 2013

लघु कथा – वचन

ऐतिहासिक पात्र आम्रपाली के रोल में तनया ने प्राण फूँक दिए थे . दर्शकों और मीडिया वालों को लगा कि साक्षात आम्रपाली धरती पर उतर आयी है ।
सभीने मुक्त कंठ से तनया के सौंदर्य और अभिनय की प्रशंसा की . प्रशंसा करने वालों में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता चंद्रभान भी था ।
उसने फ़ौरन ही अपनी आगामी फिल्म में तनया को हेरोइन बनाने का मन बना लिया ।
यूँ भी उसको ऐसी ही सुन्दर और सौम्य लड़की की तलाश थी ।
तनया उसका फैसला जानकर फूली नहीं समायी ।  घर पहुँचते ही उसने चहक कर मम्मी और पापा को निर्माता का फैसला सुनाया ।  मम्मी ने तो हरी झंडी दिखा
दी लेकिन पापा ने लाल झंडी दिखायी ।  वे आग बबूला हो कर बोले – ” छि: छि: , आजकल की हिन्दी फिल्मों में काम करके क्या तू हमारे नाक कटवाएगी ?
हीरोइनों के नंगे बदन देख कर शर्म के मारे सर झुक जाता है ।  हम खानदानी लोग हैं । हम तेरा वैसा रूप देखने के पहले आत्म हत्या कर लेंगे । ”
” पापा , मैं आपको वचन देती हूँ कि वैसा रोल कभी नहीं करूँगी ।  आप और परिवार के मान – सम्मान की रक्षा करूँगी मैं ।  अपनी बेटी पर भरोसा रखिये । ”
बेटी के बार – बार आश्वासन पर पापा मान गये ।
तनया ने दो साफ़ – सुथरी फ़िल्में की . पापा खुश थे . सगे – सम्बन्धियों और यारो – दोस्तों के सामने वे फख्र के साथ चलने लगे ।
दो साफ़ – सुथरी फ़िल्में देने के बावजूद तनया को वो सफलता नहीं मिली जो नयी आयी अभिनेत्रियों को मिली थी । उस पर निराशा छा गयी ।
एक शुभ चिन्तक ने सलाह दी – ” देखिए , तनया जी , सही सफलता पाने के लिए हीरोइनों को बोल्ड और सेक्सी सीन देते पड़ते हैं ।  बोलीवुड का ये नया ट्रेंड है ।
बोल्ड और सेक्सी सीन देने से ही बिपासा बासु , विद्या बालन , करीना कपूर , मल्लिका शेरावत वगैरह यहाँ टिकी हैं . सती सावित्री और सीता बनी रहेंगी तो आपका यहाँ टिकना मुश्किल हो जाएगा ।
सही सफलता पाने के लिए खानदानी तनया को कपड़े उतारने में देर नहीं लगी ।
वह पापा को दिया अपना वचन भूल गयी ।

प्राण शर्मा

ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान)  में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्‍वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्‍तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं।

Filed in: कथा-कहानी

9 Responses to “लघु कथा – वचन”

  1. July 18, 2012 at 6:42 pm #

    संवेदनाओं को झकझोरती हुयी लघुकथा, आभार पढ़वाने के लिए ।

  2. July 19, 2012 at 3:50 am #

    Achchi Laghu katha..yahi yatharth hai safalta kaa aaz ke yug me- jo sanskriti ko taak par rakh ke bhi haasil ho jaye, to kisi ko gurez nahi…

  3. binu bhatnagar
    July 19, 2012 at 9:27 am #

    थोड़े से शब्दों मे आपकी लधुकथा बहुत कुछ कह गई।अति उत्तम।

  4. बीनू भटनागर
    July 19, 2012 at 9:29 am #

    थोड़े से शब्दों मे आपकी लधुकथा बहुत कुछ कह गई।अति उत्तम।

  5. girish pankaj
    July 19, 2012 at 1:21 pm #

    वाह प्राण जी..हमेशा की तरह आपने इस बार भी दिल जीत लिया. गहरा कटाक्ष किया है आपने..

  6. तिलक राज कपूर
    July 19, 2012 at 1:48 pm #

    परिस्थिति अनुसार मूल्‍यों का बदलाव स्‍वाभाविक है, सामाजिक स्‍वीकार्यता अनुसार व्‍यक्ति का आचरण व चरित्र बदलना सामान्‍य है/

  7. July 21, 2012 at 1:41 pm #

    प्राण जी !

    ज़िंदगी का आइना है यह लघुकथा। सच है की हर कोई बिकाऊ होना चाहता है टिकाऊ नहीं।

  8. July 22, 2012 at 3:31 pm #

    समय के सामने मापदंड कोई मायने नहीं रखते … वैसे भी जब हर चीज़ के मापदंड सफलता ही रह गए हों तो देरी काहे की … सार्थक कथा …

  9. August 22, 2012 at 2:52 pm #

    महत्वाकांक्षा के पंख न जाने कहाँ -कहाँ ले जायेंगे इस नई पीढ़ी को |अच्छा कटाक्ष !

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