8:26 pm - Thursday May 23, 2013

शालिनी!..तुम क्यों हो उदास?

(विमर्श :डॉ.अरुणा कपूर)

पहले एक गृहिणी के घर में झाँक कर देखिए…सुबह सवेरे नींद खुलने से ले कर रात के सोने तक की उसकी दिनचर्या देखिए….अगर वह जवान है;तो उसके बच्चे छोटे है…सब से पहले उन्हें स्कूल के लिए तैयार करने की मानसिकता लिए हुए वह घर-गृहस्थी के काम काज की शुरूआत करेगी!…पति, स्वयं और सास-ससुर साथ रह रहे है तो उनके लिए चाय तैयार करना उसका सबसे पहला काम होगा!..उसके बाद बच्चों को जगा कर उनको दूध वगैरा देना और उनको स्कूल के लिए तैयार करना गृहिणी का दूसरा काम होगा!…स्कूल ले जाने के लिए लंच-बॉक्स तैयार करना भी महत्वपूर्ण काम है! यह भी गृहिणी बखूबी मन लगा कर करेगी!…

…हाँ!..कुछ स्कूलों में बच्चों के लिए लंच उपलब्ध होता है…ऐसे में लंच-बॉक्स तैयार करने के काम से कुछ गृहिणियों को राहत मिल सकती है!

…उसके बाद बच्चों को विदा करना और पति एवं अन्य परिवार जनों के लिए नाश्ता तैयार करने का काम शुरू हो जाता है!….सास,ननद या देवरानी-जेठानी मिलनसार स्वभाव के है तो उत्तम संजोग है…अन्यथा अकेले ही रसोई में खटना पड़ता है!…बीच बीच में चाय की फरमाइशें आती है…वह भी पूरी करनी पड़ती है!…फिर ऑफिस जाने वाले पति,ननद या ससुरजी के टिफन तैयार करने का समय आता है!…बस!…काम करते जाइए!

….घर काम के लिए रखी हुई मेहरी आ गई तो गनीमत है…नहीं तो झाडू,पौछे और बर्तन मांजने का काम भी गृहिणी को ही करना पड़ता है!…यहाँ भी परिवार की अन्य स्त्री की मदद मिल गई तो समझ लीजिए कि उत्तम संजोग है!

….काम से निबट कर बारह एक बजे के बाद कुछ सुस्ताने का मौक़ा मिलता है!…इस सुस्ताने के मौके का भी कुछ गृहणियां सदुपयोग करती देखी गई है!…सिलाई, कढाई या बुनाई का काम कुछ गृहिणियां करती है…तो कुछ जमाने के साथ कदम मिला कर चलने वाली गृहिणियां, कंप्यूटर पर काम करती है!…यह काम फेसबुक या ट्वीटर पर मित्रों से मिलना या ब्लॉग लिखना या अन्य लेखन कार्य करना भी हो सकता है!..कुछ गृहणियां इस समय टी.वी.पर अपने मन-पसंद कार्यक्रम देखना पसंद करती है!
…दोपहर दो बजे तक का समय गृहिणी को अपना मनपसंद काम करने के लिए मिल जाता है!…उसके बाद बच्चों का स्कूल से आना और गृहिणी का फिर रसोई में रम जाना!…स्कूल से पढ़ कर आए बच्चों को गरम गरम स्वादिष्ट भोजन खिलाने का काम गृहिणी कितनी खुश हो कर करती है!

…फिर बच्चों के आराम का समय होता है…और गृहिणी रसोई समेटती है और थोडीसी झपकी भी ले लेती है!…बस!…उसके बाद बच्चों को जगा कर उनको होमवर्क में मदद करनी होती है!..फिर शाम पांच बजे वही चाय-पानी और नाश्ता तैयार करना होता है!..बच्चे साढ़े-पांच बजे खेलने चले जाते है और गृहिणी के पतिदेव का ऑफिस से आने का समय शुरू हो जाता है!….सामान्य तया छह बजे से आठ बजे के बीच परिवार के पुरुष अपने कार्यस्थल से घर लौट आते है!…उनके लिए पहले चाय,नाश्ता और बाद में परिवार के लिए रात का भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी गृहिणी की होती है!…

…हाँ!…कुछ पुरुष शाम का समय-एक या आधा घंटा- पत्नी और बच्चों के साथ बिताना जरुर पसंद करते है!…

…गृहिणियां सामान्यत: रात साडे दस या ग्यारह बजे तक घर का काम करती है..उसके बाद उन्हें विश्राम मिलता है!

….सप्ताह के छह दिन ऐसे ही बीतते है…फिर आता है रविवार!…

…रविवार भी सभी परिवारों कोई खास दिन नहीं होता!…पति कहते है कि वह छह दिन काम करते है…घर से बाहर रहते है…तो उन्हें आराम करने के लिए एक रविवार ही मिलता है…अत: वे घर पर रहना ही पसंद करतें है!…बच्चों के भी स्कूल की रविवार के दिन छुट्टी होती है…अत:वे भी घर पर ही होते है!…उन्हें इंडोर-गेम्स या आउट डोर गेम्स खेलनी होती है, टी.वी. पर मनचाहे प्रोग्राम देखने होते है!…

…इस तरह से पति और बच्चे तो खुश रहते है…लेकिन रविवार के दिन गृहिणी का काम बढ़ कर दुगुना हो जाता है!…जाहिर है परिवार जनों को अपनी पसंद के स्वादिष्ट व्यंजन चखने होते है!…और ऐसे में मेहमान आ गए तो गृहिणी को मशीन बन कर, बिना चूं-चा किए….काम करना पड़ता है!…चेहरे पर मुस्कुराहट भी बनाएं रखनी पड़ती है!

…कुछ गृहिणियां पति के सामने अपनी मानसिकता जाहिर कर देती है!….फरमाइश करती है!…समझ लीजिए कि गृहिणी का नाम शालिनी है!…एक सुबह चाय पीते हुए वह अपने पति से कहती है…

“सुनिए जी!…आज रविवार है!…कहीं घुमने-फिरने चलो!…कुछ खरीदना है; शौपिंग करने ले चलो या फिल्म देखने ही चलते है!…लेकिन आज मन उदास है…कहीं घर से बाहर  चलो!”

….लेकिन पतिदेव झल्ला कर कहते है कि…

“…हूँ…कहाँ?…क्या नींद अभी तक खुली नहीं तुम्हारी?”

“…जी!…मैंने कहा कि कहीं बाहर चलते है!…किसी अच्छी सी जगह पर पिकनिक मनाने ही चलते है!…बच्चे भी खुश हो जाएंगे!…खाने के कुछ पदार्थ मै घर से ले लूंगी…कुछ बाहर खा लेंगे! आज मन बहुत उदास है…कहीं घर से बाहर चलो!”

“देख शालू!…मुझे यह पिकनिक वगैरा सब पसंद नहीं है!…बच्चें तो स्कूल की तरफ से कहीं न कहीं जाते ही रहते है!…फिर भी अभी कुछ दिन पहले तो नजदीक के शौपिंग-मॉल में गए थे…तुमने पता नहीं क्या…साड़ी या सूट खरीदा था!..और अभी दो महीने पहिले तो तुम लोगों को आगरा घुमा कर लाया था मैं!…फिल्म देखने कहीं बाहर जाने की क्या जरुरत है?”…कहते हुए पतिदेव चाय का खाली कप टेबल पर रखते है!

“…फिल्म देखने तो जा सकते है!”…शालिनी ने अपनी बात जारी रखी है!…

“ घर पर टी.वी. है,…जब दिल करें..जितनी फिल्में देखनी हो…देख लिया करों…सारा दिन घर में करना भी क्या होता है?…तुम लोगों के लिए मैं इतना कुछ करता हूँ…खटता रहता हूँ…पूरा हप्ता काम कर कर के थक जाता हूँ…एक दिन रविवार को आराम करना चाहता हूँ तो तुमने इतना लंबा लैक्चर सुना दिया!…तुम्हारी शिकायतें खतम होने का नाम नहीं लेती!…तुम्हे तो सिर्फ अपनी पडी है…”..पतिदेव कुछ देर के लिए रुक जाते है….फिर आगे बोलते है…

“तुम्हारे उदास होने का कारण तो मेरी समझ से बाहर है!”…पतिदेव कान पर हाथ रख कर कहते है! मानों शालिनी की आवाज अपने कानों पर पड़ने ही नहीं देना चाहते!
…इस पर शालिनी कहती है कि….

“चलिए!…मेरी उदासी से तुम्हे क्या लेना देना!…पर उस शौपिंग-माल से मुझे सूट खरीदे छह महीने हो चले है!…और जी!….आगरा तो हम लोग दो साल पहले गए थे…आपकी बहन के देवर की शादी में!…याद आया?…बच्चों ने जिद की थी…लेकिन ताज-महल देखने जाने का समय कहाँ मिला था हम लोगों को?…उसके बाद घुमाने कहाँ ले गए आप…?…फिल्म थिएटर पर जा कर देखें तो अरसा हो गया!…”

….अगर शालिनी बात को यहीं खतम कर देती है तो ठीक है…अगर अपनी बात पर डटी रहती है…तो पतिदेव भी गुस्से में आ कर कुछ भी बोल देते है!…शालिनी के मायके वालों पर भी शाब्दिक प्रहार करतें है!…ऊँचा बोलना झगड़े का रूप ले लेता है!…बच्चे अगर उस समय आसपास है तो उन पर बुरा असर पडेगा सोच कर शालिनी को…हमारी गृहिणी को…ही चुप हो जाना पड़ता है!…और समय आगे बढ़ता है!…

…हमारे समाज में ज्यादा तर गृहिणियों का यही हाल है!…इन गृहिणियों के चेहरे पर तो मुस्कुराहट होती है..लेकिन दिल रो रहा होता है!…बुझे दिल से ये अपना कर्तव्य निभा रही होती है!…अपनी शारीरिक परेशानियों को भी ये नजर अंदाज करती है!…शरीर के किसी हिस्से में दर्द है…या बहुत समय से खांसी है…या नजर धुंधली होती जा रही है…गृहिणियां अपना दुःख:दर्द परिवार जनों को बताती नहीं है!….जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है और खुद-बा-खुद सामने आ जाती है…तब तक बहुत देर हो चुकी होती है!…क्या यह एक माँ,बहन या पत्नी के साथ अन्याय नहीं है?

….अगर आप शालिनी के जीवन-साथी है तो उसकी मानसिकता को समझे!…कभी यह जानने की कोशिश करें कि ‘शालिनी उदास क्यों है?’…आप उसे दिल से तो चाहते है लेकिन क्या उसे कभी’ आई लव्ह यू’ कहने की जहमत उठाई है?…कभी कभी उसके मन-मुताबिक़ भी व्यवहार करें!..वह आपकी पसंद-नापसंद का ख़याल रखती है तो क्या आप उसकी पसंद-नापसंद का ख़याल नहीं रख सकते?…आप को गुस्सा आता है तो वह सहन कर जाती है…क्या उसका गुस्सा आप को सहन नहीं करना चाहिए?…वह गुस्से में आ कर कुछ बोलती है …तो उसे बोलने दें…रोकिएँ मत!…वरना वह मन ही मन में घुटन का अनुभव कर के ‘डिप्रेशन’ जैसी बीमारी की चपेट में भी आ सकती है!…या अन्य मानसिक बीमारी की शिकार भी वह हो सकती है!…

इस पर एक बढ़िया चुटकुला है…

एक पति अपनी बीमार पत्नी को ले कर एक मनो-चिकित्सक के पास जाते है!..कहते है…

“..डॉक्टर साहब!..हमारी शादी को 40 साल हो गए!…अब तक मेरी पत्नी इतनी अच्छी थी…मेरी हर बात ध्यान से सुनती थी!…मेरी हर ‘हाँ’ में ‘हाँ’ और ‘ना’ में ‘ना’ कहती रहती थी!…कभी डांट भी देता था,तो तुरंत माफी मांग लेती थी!…कभी उसने किसी चीज की फरमाइश नहीं की!…कभी इसने मुझे या मेरे घरवालों को पलट कर जवाब नहीं दिया…हंमेशा चुप ही रहती थी डॉक्टर साहब!

…लेकिन आज दोपहर जब मैंने इसे कहा कि ‘आज भिंडी क्यों बनाई?…गोभी क्यों नहीं बनाई?’..तो ये ऐसी फूट पडी कि गालियां देने लगी और मुझे मुंह पर थप्पड़ मार दिया!…मैं कुछ बोलने लगा तो मुझे मारने के लिए कपडे धोने वाला डंडा उठा कर लाई!…बड़ी मुश्किल से अपने आप को मैंने बचाया!..प्लीज डॉक्टर साहब!…इसका इलाज कीजिए!”

…क्या आप चाहते है कि आप के साथ भी ऐसा ही हो!..आपने शालिनी के साथ प्रेम विवाह किया है…तो याद करें वो दिन…जब आप उसकी एक मुस्कान के लिए कितनी बातें मान जाया करते थे!…कितने काम छोड़ कर उससे मिलने जाया करते थे!….उसकी आवाज सुनने के लिए तरसतें थे!…

…आपका प्रेम विवाह नहीं भी हुआ है तो क्या हुआ?…आपने शादी के बाद तो शालिनी से प्यार किया है…उसे अपना माना है…तो क्या अपनों की कदर करना भी नहीं जानते आप?…क्या आप नहीं चाहते कि आप की शालिनी तन और मन से स्वस्थ रहे…उसके चेहरे पर बनावटी नहीं…अपितु असली मुस्कान हो!…वह आप को सिर्फ खुश करने के लिए..’आई लव्ह यू’..न कहें…बल्कि आप को दिल से चाहते हुए.. ‘आई लव्ह यू’ कहें!

…तो शालिनी आप की अपनी है…उसकी भी सुनें…उसे उदास मत होने दें!

डॉ. अरुणा कपूर

डॉ. अरुणा कपूर पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं! डॉक्टरी के पेशे से फुरसत निकालकर लिखने का शौक ज़िंदा रखा है…हिंदी के अलावा मराठी और गुजराती में भी लेख, कविताएं और कहानियाँ प्रकाशित हुई है! हिंदयुग्म के सहयोग से जल्द ही एक उपन्यास भी प्रकाशित होने को है।

Filed in: आलेख, विमर्श

6 Responses to “शालिनी!..तुम क्यों हो उदास?”

  1. July 9, 2012 at 3:00 pm #

    सार्थक लेख

  2. July 9, 2012 at 4:41 pm #

    उसकी भी सुनें…उसे उदास मत होने दें!
    सार्थकता लिए सटीक लेखन … आभार

  3. July 9, 2012 at 11:13 pm #

    gruhaniyon ke kam ko abhi bhi log koi tavajjo nahi dete…aise me unka is ekrasta se ub kar is tarh udas hona swabhavik hi hai….badiya post.

  4. July 11, 2012 at 11:09 am #

    सार्थक आलेख।

  5. July 11, 2012 at 9:52 pm #

    यथार्थ से भरपूर रचना |

  6. -डा.अरुणा कपूर.
    July 24, 2012 at 3:41 pm #

    माननीय संगीता जी, सदा जी,कविता जी,निर्मला जी और सुधा जी!
    …आप सभी ने इस कहानी को पसंद किया बहुत बहुत धन्यवाद!….लिखना सार्थक हुआ, इस बात का संतोष है!

    ….लगता है कि गूगल वेबसाइट में कोई प्रोबलम आ रही है!…मैं बहुत दिनों से कोशिश कर रही थी लेकिन पेज खुल नहीं रहा था!…रविन्द्र प्रभात जी को इ-मेल पर संदेशा भेजा!..उन्होंने ही यह समस्या दूर की और आज मैं यहाँ उपस्थित हो पाई!…उनका भी यहाँ पर धन्यवाद करती हूँ!

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