“परिकल्पना ब्लागोत्सव“ पर प्रकाशित डा. प्रीत अरोड़ा की कहानी संयोग को वूमन आन टाप पत्रिका (मई-२०१२ में) की ओर से पुरस्कृत किया गया है. उन्हें इस उपलब्धि के दृष्टिगत बहुत-सी बधाईयां आ रही है और एक लेखक ने इस की समीक्षा भी करके भेजी है, प्रस्तुत है डा. रमा शंकर शुक्ल की कथा समीक्षा..
() परिकल्पना संपादकीय टीम |
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“परिकल्पना ब्लॉगोत्सव” पर डा० प्रीत अरोड़ा की कहानी “संयोग” को पढ़ने का संयोग बन गया. पूरी कहानी कन्या शिशु के कूड़ेदान में छोड़कर माता-पिता और दादी के लौट आने की है. बाद में अजीत नाम के एक व्यक्ति का उसे पाकर निहाल होने का दृश्य है. ख़ास बात यह, जब एक सप्ताह बाद डाक्टर माता-पिता को बताता है कि गर्भाशय में इन्फेक्शन होने क कारण उसे काट कर निकालना पडा और अब वह कभी माँ नहीं बन पायेगी, तो उनके होश उड़ जाते है. माँ पागल की तरह पति के साथ कूड़ेदान तक कार से पहुँच कर बेटी खोजती है, पर वह तो किसी के घर और दिल की रोशनी हो चुकी होती है.
पंजाब मूल की रहने वाली प्रीत ने अपने गिर्द नितप्रति होती घटनाओं का बेहतर ढंग से स्वर प्रदान किया है. इन स्वरों से छिटक कर कई सवाल हमारे मस्तिष्क को खटखटाने लगते हैं. एक: यह कहानी किसी कंगाल घर की नहीं है, जहाँ बेटी के विवाह के खर्चे से डर कर मजबूरी में कूड़ेदान में फेंका गया हो. दो: बेटी के त्याग का कारण यह भी नहीं है कि उसके पहले कई बेटियां हो चुकी हैं और यह एक नयी गृह के रूप में आ पडी हो. तीन: ऐसा भी नहीं है कि बेटी के प्रति माँ को गहरा लगाव हो और पिता-दादी जबरन छीनकर फेंक आये हों. बल्कि बेटी से नफ़रत में माँ एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. चार: बेटी को फिर से खोजने की जरूरत इसलिए नहीं पडी कि किसी संत-महात्मा ने अचानक कोई इश्वर का सन्देश पंहुचा दिया हो, बल्कि इसलिए कि डाक्टर ने बता दिया कि उसका गर्भाशय काट कर निकाल दिया गया है और अब वह माँ नहीं बन सकती. वह बेटी को खोजने इसलिए दौड़ पड़ती है कि कम से कम उसे एक वारिश तो मिल जाएगा. बेटी ही सही. पांच: यह भी नहीं है कि अब उस कन्या को किसी मनुष्य का प्यार ही हासिल न होगा. बल्कि वह तो एक ऐसी जगह पहुँच जाती है, जहां वह किसी परी से कम नहीं महसूस होती. कहानी की मुख्य धारा में दो महिलायें और एक पुरुष षड्यंत्रकारी भूमिका निभाते हैं. इसमें भी नफ़रत की आग पुरुष चरित्र से ज्यादा दोनों महिलाओं में है.
इस कहानी के आलोक में अब कुछ ख़ास बिंदु गौरतलब हैं. स्त्री-पुरुष लिंगानुपात अपने देश में दुरुस्त होता नहीं प्रतीत होता. २१वी सदी के १२ साल गुजरने के बाद भी कन्या शिशु के प्रति घ्रिनास्पद सोच बनी हुई है. वह भी महिलाओं में. विश्व स्तर पर नारी आन्दोलन कन्या शिशु और भ्रूण हत्या या उत्पीडन के खिलाफ आन्दोलन चला रहा है. लेकिन एक महिला लेखक जो युवा साहित्यकारों का पुरजोर प्रतिनिधित्व कर रही है, बड़ी बेबाकी से इस आन्दोलन पर सवाल खडा कर देती है. प्रीत ने सगी माँ और सगी दादी के कन्या के प्रति उपजे नफ़रत को सामने धर दिया. संतो बेटे और अनु पति बिधु द्वारा बेटी होने की सूचना पर घबरा जाती हैं. बची को घर के भीतर नहीं ले जाया जाता, बल्कि बरामदे में पड़े पालने में एक तरह से फेंक ही दिया जाता है. घर की रोशनी बुझा दी जाती है, कि कहीं गाँव के लोगों को इस बारे में जानकारी न हो जाए. यह इंतजाम भी साबित करता है कि पूरा गाँव कन्या विरोधी है. सभी अवगत हैं कि प्रसवोपरांत मंगल गीत और सोहर-बधाई गाने कौन आता है. सिर्फ महिलायें. और इन्ही महिलाओं से अनु और संतो को डर है. यही महिलायें अपने घरों को लौटने के बाद पतियों को बेटी होने की सूचना भी देंगी. सूचना के बाद आग फैलाने का काम भी तो तब वही करेंगी! पूरी कहानी में पुरुष चरित्र विधु केवल महिलाओं की सोच और उनके द्वारा सृजित माहौल का तमाशबीन और अनुयाई सा प्रतीत होता है. अब सवाल खडा होता है कि क्या महिला समाज ही सबसे अधिक कन्या जन्म और अस्तित्व का दुश्मन है! नारी आन्दोलन की प्रतिनिधियों का तर्क हो सकता है कि बेशक कन्या को ठिकाने लगाने का उपक्रम महिलाओं द्वारा तैयार किया गया हो, पर यह है लम्बे समय की पुरुष सत्तात्मक सृष्टि का प्रेरित परिणाम. उनका यह भी तर्क हो सकता है कि ठीक है संतो और अनु ने उस कन्या को ठिकाने लगाने की योजना बनाई तो विधु ने क्या कर दिया. उसने विरोध क्यों नहीं किया.

प्रीत अरोड़ा जन्म – २७ जनवरी १९८५ को मोहाली पंजाब में। शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनो वर्षों में प्रथम स्थान के साथ। कार्यक्षेत्र- अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद। अनेक प्रतियोगिताओं में सफलता, आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन जिनमें प्रमुख हैं- हरिगंधा, पंचशील शोध समीक्षा, अनुसन्धान, अनुभूति, गर्भनाल,हिन्दी-चेतना(कैनेडा),पुरवाई (ब्रिटेन),आलोचना, वटवृक्ष,सृजनगाथा,सुखनवर, वागर्थ,साक्षात्कार,नया ज्ञानोदय, पाखी,प्रवासी-दुनिया, आदि मे लेख,कविताएँ,लघुकथाएं,कहानियाँ, संस्मरण,साक्षात्कार शोध-पत्र आदि।वेब पर मुखरित तस्वीरें नाम से चिट्ठे का सम्पादन. [email protected]
इस सवाल के उत्तर के लिए ऐतिहासिक सन्दर्भों और मनोविज्ञान के गह्वर में प्रवेश करना होगा. भारतीय पुरुष महिलाओं के प्रति कठोर तो होते ही हैं, पर संजीदा भी होते हैं. वे घर में पत्नी-माँ से चाहे जितना भी लड़ लें, पर अंततः वे आत्मसमर्पण के लिए विवश होते हैं. “कान्ता सममितयोपदेश्युजे” पुरुष समाज के लिए आदिकाल से ही प्रभावकारी रहा है. पुरुष के लिए पत्नी या प्रेयसी की इच्छा -आकांक्षा बहुत मायने रखती है. उनके लिए इसका अतिक्रमण कर पाना मुश्किल होता है. विधु का सम्पूर्ण अनुशरण इसी ओर संकेत करता है. गाँव से २५ किलोमीटर दूर शहर के करीब पड़े हुए कूड़े और मंडरा रहे कुत्तों के बीच क्रोध से आँखें लाल कर बच्ची को छोड़ने उतरने वाली भी संतो ही है, विधु नहीं. इतना ही नहीं, दूसरी जगह बच्ची को पाकर निहाल होने वाला कोई और नहीं बल्कि एक पुरुष ही है. लेकिन वह शहर का है.

प्रीत अरोड़ा जन्म – २७ जनवरी १९८५ को मोहाली पंजाब में। शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनो वर्षों में प्रथम स्थान के साथ। कार्यक्षेत्र- अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद। अनेक प्रतियोगिताओं में सफलता, आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन जिनमें प्रमुख हैं- हरिगंधा, पंचशील शोध समीक्षा, अनुसन्धान, अनुभूति, गर्भनाल,हिन्दी-चेतना(कैनेडा),पुरवाई (ब्रिटेन),आलोचना, वटवृक्ष,सृजनगाथा,सुखनवर, वागर्थ,साक्षात्कार,नया ज्ञानोदय, पाखी,प्रवासी-दुनिया, आदि मे लेख,कविताएँ,लघुकथाएं,कहानियाँ, संस्मरण,साक्षात्कार शोध-पत्र आदि।वेब पर मुखरित तस्वीरें नाम से चिट्ठे का सम्पादन. [email protected]



आदरणीय सम्पादक जी.
परिकल्पना ब्लागोतासव
नेट पत्रिका के प्रति अभी तक मै अनजान था. प्रीत जी की वाल पर लिंक देखकर यूं ही क्लिक कर दिया. सामने आपकी पत्रिका थी और बेहद खूबसूरत. आप हिंदी के विकास में महनीय योगदान कर रहे हैं. प्रीत जी वाकई बहुत अच्छा लिखती हैं. अभी तक मैंने उनकी मात्र एक कहैं पढ़ी है, लेकिन बटुली के भात का अंदाज एक दाना चावल को छूकर लग जाता है. मै लेखिका और सम्पादक दोनों को साधुवाद देता हूँ. मरी समीक्षा के लिए आपने पत्रिका में स्थान दिया, इसके लिए आभारी हूँ. कितना अच्छा होता कि यह पत्रिका नेट और प्रिंट दोनों रूपों में होती. यदि कभी ऐसा विचार आये तो हम सभी लेखक आपके साथ हर प्रकार से खड़े रहेंगे.
प्रीत जी का लेखन सच्चाई को परख उन्हें शब्दों में उतारता हुआ भावमय करता है … बहुत ही अच्छी समीक्षा की है आपने ;;;
Dr.PREET ARORA KEE DIL MEIN UTARNE WAALEE KAHANI ` SANYOG ` PAR
Dr. RAMAA SHANKAR SHUKL KEE SMEEKSHA UTTAM BAN PADEE HAI .
behtareen…
ाच्छी कहानी के माध्यम से बहुत सार्थक स्त्री विमर्श।