पीढ़ियों का अन्तराल महत्वपूर्ण नहीं होता, यदि पुरातन पीढ़ी वर्तमान परिवेश में भी अपनी प्रासंगिकता बनाये रहें. ऐसे ही पीढ़ी की एक जिंदादिल महिला कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल थीं. उन्हें किताबों में पढ़ा, चित्रों में देखा, पोर्टब्लेयर गया तो वहां सेलुलर जेल की दीवारों पर देखा और कानपुर में रहने के दौरान एक साक्षात्कार के लिए उनसे रू-ब-रू भी हुआ. उनके बारे में इतना कुछ सुन रखा था कि कहीं-न-कहीं उनके व्यक्तित्व से आतंकित भी महसूस करता. पर जब पहली बार मिला तो इतना निश्छल और ममत्व भरा आत्मीय व्यवहार देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यह आजाद हिन्द फौज की वही कर्नल हैं, जिन्होंने अपने साहस और बुद्धिमता के बल पर न सिर्फ आजादी को परवान पर चढ़ाया बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को आजादी की जंग में नारी-शक्ति में अटूट विश्वास करने पर बाध्य भी कर दिया. देश की आजादी के बाद हर किसी ने उसे भुनाया और सत्ता की चांदी की होड़ में दिल्ली में बसकर अपनी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना सुनिश्चित किया, पर 98 वर्षीया यह डाक्टर जीवन के अंतिम समय तक (24 जुलाई, 2012) लोगों का इलाज करती रहीं. देश-सेवा को भुनाने की बजाय उन्होंने जीवन के ठाटबाट को त्याग कर दलितों, शोषितों, मेहनतकशों, उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए और मानव-सेवा के पीछे अपना पूरा जीवन ही लगा दिया. उन्होंने लाखों लोगों को स्वास्थ्य, सुरक्षा, साहस व आत्मविश्वास की नेमत दी । कानपुर शहर में उन्होंने दंगों के दौरान दोनों संप्रदायों के बीच जांबाजी से जाकर उन्हें समझाने के साथ घायलों का इलाज करके मानवता की सेवा की जो मिसाल रखी वह हमेशा आने वाले पीढि़यों को प्रेरित करती रहेगी। वयोवृद्ध कैप्टन डॉ.लक्ष्मी सहगल को गरीब मरीजों का इतना ध्यान रहता था कि दिल का दौरा पड़ने से करीब 15 घंटे पहले तक अपने शहर में स्थित आर्य नगर के क्लीनिक में बैठकर मरीजों को देख रही थीं। मजदूर आदोलनों में सड़क पर सोने से लेकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने तक डा. लक्ष्मी सहगल का पूरा जीवन संघर्ष, त्याग व देश भक्ति की अप्रतिम गाथा है।
सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं।श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर’ और ‘डाकिया डाक लाया’ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं.