8:42 pm - Tuesday May 21, 2013

डॉ. अनिता कपूर की चार कविताएं

सीधी बात

आज मन में आया है
न बनाऊँ तुम्हें माध्यम
करूँ मैं सीधी बात तुमसे
उस साहचर्य की करूँ बात
रहा है मेरा तुम्हारा
सृष्टि के प्रस्फुटन के
प्रथम क्षण से
उस अंधकार की
उस गहरे जल की
उस एकाकीपन की
जहाँ  तुम्हारी साँसों की
ध्वनि को सुना है मैंने
तुमसे सीधी बात करने के लिए
मुझे कभी लय तो कभी स्वर बन
तुमको शब्दों से सहलाना पड़ा
तुमसे सीधी बात करने के लिए
वृन्दावन की गलियों में भी घूमना पड़ा
यौवन की हरियाली को छू
आज रेगिस्तान में हूँ
तुमसे सीधी बात करने के लिए
जड़ जगत, जंगम संसार
सारे रंग देखे है मैंने
ए कविता ………
तुम रही सदैव मेरे साथ
जैसे विशाल आकाश,
जैसे स्नेहिल धरा,
जैसे अथाह सागर,
तुमको महसूस किया मैंने नसों में, रगों में
जैसे तुम हो गयी, मेरा ही प्रतिरूप
शब्दों के मांस वाली जुड़वा बहनें
स्वांत: सुखाय जैसा तुम्हारा सम्पूर्ण प्यार…
इसीलिए
आज मन में अचानक उभर आया यह भाव-
कि बनाऊँ न तुम्हें माध्यम
अब करूँ मैं सीधी बात तुमसे
-0-
उम्र को कैद करना चाहती हूँ

घरौंदा कैसे बनता है
यह तो मुझे बचपन से ही मालूम था
पर रूप अलग था
बचपन में घरौंदा रेत से बनाया
अगर टूटा, बिखरा
फिर समेटा, फिर बनाया
कोई दुख न था…..
जवानी में घरौंदा प्रेम का बनाया
परिवार और बच्चों से बसाया
घरौंदे का रूप बढ़ाया
यह भी रूठा, यह भी बिखरा
पर संस्कार की कड़ियों से
फिर-फिर जोड़ा
कोई मलाल न था……
अब एक घरौंदा बुढ़ापे का भी होगा
सहमी हूँ, सोच में हूँ
न्यूक्लियर परिवारों का चलन
पता नहीं घरौंदे का रूप क्या होगा?
इसीलिए
कुछ स्वार्थी हूँ
मैं ,
उम्र को कैद कर लेना चाहती हूँ…..
-0-
साँसों के हस्ताक्षर

हर एक पल पर अंकित कर दें
साँसों के हस्ताक्षर
परिवर्तन कहीं हमारे चिह्नों   पर
स्याही न फेर दे
साथ ही
जिंदगी के दस्तावेजों पर
अमिट लिपि में अंकित कर दे
अपने अंधेरे लम्हों के स्याह हस्ताक्षर
कल को कहीं हमारी आगामी पीढ़ी
भुला न दे हमारी चिन्मयता
चेतना लिपियाँ
प्रतिलिपियाँ….
भौतिक आकार मूर्तियां मिट जाने पर भी
जीवित रहे हमारे हस्ताक्षर
खोजने के लिए
जीवित रहें हमारे हस्ताक्षर
कहीं हमारा इतिहास
हम तक ही सीमित न रह जाये
इसीलिये आओ
प्रकृति के कण-कण में
सम्पूर्ण सृष्टि में
चैतन्य राग भर दें
अपनी छवि अंकित कर दें
दुनिया की भीड़ में खुद को
शामिल न करें।
भविष्य की याद हमें स्वार्थी बना कर
आज ही पाना चाहती है
अपना अधिकार
न हम गलत है, न हमारे सिद्धांत
फिर भी
स्वार्थी कहला कर नहीं लेना चाहते
अपना अधिकार
आओ
अंकित कर दें
हर पल पर
अपनी साँसों के हस्ताक्षर
-0-
अलाव

तुमसे अलग होकर
घर लौटने तक
मन के अलाव पर
आज फिर एक नयी कविता पकी है
अकेलेपन की आँच से

समझ नहीं पाती
तुमसे तुम्हारे लिए मिलूँ
या एक और
नयी कविता के लिए ?

डॉ अनिता कपूर

13 अप्रैल 1957 को जन्मी अनीता कपूर ने एम.ए. हिन्दी, अँग्रेजी एवं संगीत (सितार), पी.एचडी (अँग्रेजी) तथा पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है । बिखरे मोती, अछूते स्वर, ओस में भीगते सपने और कादंबरी (4 कविता-संग्रह) इनकी प्रकाशित कृतियाँ है । इन्हें प्रवासी हिन्दी सेवी सम्मान-2012,प्रवासी कवियत्री सम्मान-2012, कायाकल्प साहित्य कला फ़ाउंडेशन-12, पॉलीवूड स्टार मीडिया अवार्ड-2011, सामाजिक सेवा अमरीका अवार्ड-2009 आदि सम्मनों से नवाजा गया है । ये ब्रूस ड्राइव,फ्रेमोंट,कैलिफोर्निया (यू एस ए ) मे रहती हैं । अमेरिका मे हिन्दी की अलख जगाने वालों मे ये सबसे अग्रणी हैं।

Filed in: कविता

4 Responses to “डॉ. अनिता कपूर की चार कविताएं”

  1. August 1, 2012 at 2:55 pm #

    अच्छी कवितायें, सारगर्भित विचारों के साथ ।

  2. Balbir Rana
    August 5, 2012 at 10:53 pm #

    सारगर्भित और आत्मिक कवितायेँ बहुत सुन्दर

  3. August 10, 2012 at 9:45 pm #

    ACHCHHEE KAVITAAON KE LIYE DR. ANITA KAPOOR KO BADHAAEE
    AUR SHUBH KAMNA .

  4. November 3, 2012 at 8:28 am #

    sidhi baat shirshak kavita ek achcha sabad chitra hai jo manav ke parsprik sambandho or bhavnaon kai tane baane ko ek lay kai saath prastut karti hai jaise ..sahchry ki baat.
    badhai

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