5:05 am - Thursday June 20, 2013

मनोज भावुक की तीन कविताएँ

1.
बस तुम अच्छे लगते हो अब क्यों लगते हो क्या बोलूँ
मेरे भीतर रहते हो अब क्यों रहते हो क्या बोलूँ

वक्त मिले तो तुम सोचो कि क्या लगता हूँ मै तेरा
तुम तो मेरे लगते हो अब क्यों लगते हो क्या बोलूँ

कैसे दूर करोगे मुझको जबकि मेरे अन्दर तुम
हरदम चलते रहते हो अब क्यों चलते हो क्या बोलूँ

जैसे तुमको देखूं वैसे और किसी को देखूं तो
साथी तुम भी जलते हो अब क्यों जलते हो क्या बोलूँ

मना करूं कि मत काटो नाखून दांत से ए भावुक
फिर भी ऐसा करते हो अब क्यों करते हो क्या बोलूँ

2.
दोस्त तुम यादों में हो ,वादों में हो , संवादों में हो
गीतों में हो , ग़ज़लों में हो , ख़्वाबों में हो ,
चुप्पी में हो, खामोशी में हो , तन्हाई में हो ,
महफिल में हो, कहकहो में हो और बेवफाई में भी हो
तुम उन चिठ्ठियों में हो जो तुम्हें दे न सका ,
तुम उस टीस में भी हो जो तुम देते रहे
और मै उस मीठे दर्द को अल्फाजों में बदलता रहा
तुम उस खुशी में भी हो जो तुमने मुझे अनजाने में दी
.. इतना कुछ होने के बाद तुम अगर मुझसे रूठ भी जाओ
तो अलग कैसे हो पावोगे ?
नाराज होकर फेसबुक से अन्फ्रेंड कर दोगे ,
डायरी से फाड़ दोगे, ग्रीटिंग्स कार्ड जला दोगे
लेकिन मेरी यादें ?
जानते हो ….
यादें और चुप्पियाँ एक दुसरे के directly proportional होतीं हैं
चुप्पियाँ ..यादों के समन्दर में डुबोती चली जाती हैं
कहते हैं .. खामोशी और बोलती है …..echo भी करती है .
पगला देती है आदमी को …..
इसलिए शब्दों का और आंसुओं का बाहर निकलना बहुत जरुरी है.
मै बाहर निकल आया हूँ , तुम भी बाहर आ जाओ .
अपने ego के खोल से .
मै भी sorry बोलता हूँ , तुम भी बोलो
….. बोलो , तुम्हारा भी कद ऊंचा हो जाएगा
— अब छोडो भी इन बातों को , गलती किसी की भी हो ..
पर ह्त्या तो दोस्ती की हुई न ?
….और हमारी दोस्ती इतने कमजोर धागों से नहीं बंधी है
कि एवीं टूट जाय .
न दोस्ती को एवीं टूटने देंगे… न जिन्दगी को
क्योंकि दोनों अनमोल हैं .

3.
बसंत आया, पिया न आए, पता नहीं क्यों जिया जलाये
पलाश-सा तन दहक उठा है, कौन विरह की आग बुझाये

हवा बसंती, फ़िज़ा की मस्ती, लहर की कश्ती, बेहोश बस्ती
सभी की लोभी नज़र है मुझपे, सखी रे अब तो ख़ुदा बचाए

पराग महके, पलाश दहके, कोयलिया कुहुके, चुनरिया लहके
पिया अनाड़ी, पिया बेदर्दी, जिया की बतिया समझ न पाए

नज़र मिले तो पता लगाऊं की तेरे मन का मिजाज़ क्या है
मगर कभी तू इधर तो आए नज़र से मेरे नज़र मिलाये

अभी भी लम्बी उदास रातें, कुतर-कुतर के जिया को काटे
असल में ‘भावुक’ खुशी तभी है जो ज़िंदगी में बसंत आए

मनोज भावुक

2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की  चर्चित पुस्तके हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। बेबसाइट- WWW.MANOJBHAWUK.COM

Filed in: कविता

2 Responses to “मनोज भावुक की तीन कविताएँ”

  1. August 13, 2012 at 3:24 pm #

    sundar bhavpoorn rachnayein

  2. August 22, 2012 at 5:15 pm #

    कैसे दूर करोगे मुझको जबकि मेरे अन्दर तुम –बहुत ही भावुक भरी,प्रेममयी अभिव्यंजना |

Leave a Reply