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बस तुम अच्छे लगते हो अब क्यों लगते हो क्या बोलूँ
मेरे भीतर रहते हो अब क्यों रहते हो क्या बोलूँ
वक्त मिले तो तुम सोचो कि क्या लगता हूँ मै तेरा
तुम तो मेरे लगते हो अब क्यों लगते हो क्या बोलूँ
कैसे दूर करोगे मुझको जबकि मेरे अन्दर तुम
हरदम चलते रहते हो अब क्यों चलते हो क्या बोलूँ
जैसे तुमको देखूं वैसे और किसी को देखूं तो
साथी तुम भी जलते हो अब क्यों जलते हो क्या बोलूँ
मना करूं कि मत काटो नाखून दांत से ए भावुक
फिर भी ऐसा करते हो अब क्यों करते हो क्या बोलूँ
फिर भी ऐसा करते हो अब क्यों करते हो क्या बोलूँ



2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तके हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। बेबसाइट-
sundar bhavpoorn rachnayein
कैसे दूर करोगे मुझको जबकि मेरे अन्दर तुम –बहुत ही भावुक भरी,प्रेममयी अभिव्यंजना |