6:56 pm - Monday May 20, 2013

बदलते युग में शिक्षक और शिष्य की भूमिका

आज के इस भौतिकवादी युग में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका बदल रही है और ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थी -वर्ग कैसे अछूते रह सकते हैं l ऐसा माना जाता है कि एक बच्चे के सर्वांगीण विकास में शिक्षक अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसमें वह उसका शैक्षणिक,मानसिक,भावनात्मक,सामाजिक व साँस्कृतिक विकास भी करता है l यदि इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो हमें ऐसे पौराणिक प्रमाण प्राप्त होंगे जिसमें गुरू-शिष्य परम्परा के तहत शिक्षक निःस्वार्थ रूप से शिक्षा प्रदान करते हुए परस्पर सुदृढ़ सम्बन्ध स्थापित करता था l उस समय में न शिक्षक ही पूरी तरह कर्तव्यनिष्ठ होकर अपने कर्म को ही पूजा मानता था अपितु शिष्य भी गुरू को भगवान का दर्जा देता था l कुल मिलाकर दोनों का सम्बन्ध एक आदर्श उपस्थित करता था.परन्तु वर्तमान समय में समाज के बदलाव के साथ-साथ इनकी आदर्शवादी भूमिका में गिरावट आ गई है l चूंकि पैसा,नाम और शोहरत के कारण दोनों अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे हैं l

आए दिन अखबारों ,टीवी चैनलों पर देखने-सुनने को मिलता है कि एक शिक्षक स्वयं विद्यार्थियों से पैसे लेकर नकल करवाते हुए रंगें हाथों पकड़ा गया और तो और कक्षा में सरेआम एक शिक्षक द्वारा अपने छात्र की पिटाई करके बेहाल कर दिया या फिर पढ़ाई के बोझ से मानसिक तनाव से ग्रस्त होकर एक बालक ने आत्महत्या कर ली या एक शिष्य ने दिनदहाड़े अपने शिक्षक का कत्ल कर दिया.ऐसी खबरें शिक्षक-शिष्य के सम्बन्धों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं l परन्तु क्या ऐसी दिल दहला देने वाली वारदातों से छुटकारा पाना सम्भव होगा ? आज शिक्षक-शिष्य वर्ग का मानस एक ऐसी रूढ़िवादिता से ग्रसित हो रहा है जिसमें अब न तो पहले जैसे शिक्षक हैं और न ही पहले जैसे शिष्य.कहने का भाव है कि कहीं सरेआम शिक्षक अनुशासन को तोड़ते हैं तो कहीं यह भूमिका शिष्य निभाते हैं l

आज आधुनिकता की चकाचौंध में शिष्य अपने माता-पिता समान शिक्षक से दूर हो इंटरनेट की मायावी और आभासी दुनिया के अधिक नजदीक हो गए हैं जहाँ वे गलत आदतों का शिकार होकर अपने संस्कारों को भूलकर अपराधों को भी बढ़ावा दे रहें हैं l वहाँ वे अपने नैतिक मूल्यों को भी भूलते जा रहे हैं l अगर दोनों की भूमिका में आ रहे बदलावों के कारणों की जाँच की जाएँ तो यह बात सामने आती है कि आज के शिक्षक द्वारा शिष्यों में भेदभाव करना,अशैक्षणिक वातावरण बनाना,हिंसक प्रवृत्ति को जन्म देना ,पैसों को ही अपना लक्ष्य बनाना इत्यादि भावनाओं के कारण ही स्थिति तनावग्रस्त बन रही है और दूसरी तरफ आज के शिष्य भी संस्कारहीन ,मर्यादाहीन व चरित्रहीन बनकर शिक्षक-शिष्य के मधुर सम्बन्धों की छवि को खराब कर रहे हैं l आज सबसे ज्यादा जरूरत है कि शिक्षक-शिष्य दोनों ही अपनी भूमिका और सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने के लिए अनुशासन में रहकर अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाएं और यदि कहीं स्थिति तनावग्रस्त बनती भी है तो आपस में मिलजुलकर उस समस्या का समाधान ढ़ूँढ़ें l तभी दोनों सही अर्थों में अपनी सही भूमिका निभाते हुए सम्बन्धों में सामजंस्य और सन्तुलन बना पाएंगे l

डॉ.प्रीत अरोड़ा

पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ से हिंदी साहित्य में पी-एच.डी. (हिन्दी )विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी नारी विमर्शपरक रचनाओं का नियमित प्रकाशन l पता- मकान नम्बर—405,गुरूद्वारे के पीछे/दशमेश नगर,खरड़/जिला–मोहाली/पँजाब—140301

Filed in: आलेख, विमर्श

One Response to “बदलते युग में शिक्षक और शिष्य की भूमिका”

  1. September 5, 2012 at 11:06 am #

    लेख को लिखते वक़त लेखक ने इस मुद्दे को बड़ी सहजता के साथ रखा हैं !

Leave a Reply