जयपुर। हर भाषा का अपना सॉफ्टवेयर होता है और साथ ही उसकी अपनी प्रकृति और अपना मिजाज होता है। उसी के अनुरूप अभिव्यक्ति में प्रभावोत्पादकता बनती है।
संगोष्ठी के अध्यक्ष और आकाशवाणी केन्द्र, जयपुर के कार्यक्रम प्रमुख हरीश करमचन्दानी ने हिन्दी और वर्तमान परिदृष्य विषय पर विचार व्यक्त करते हुए हिन्दी के प्रति हीनता के भाव को त्यागने का आव्हान किया। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और गौरव है और इसके लिए भी हमें इस तरह से चिंता करनी पड़ रही है।
संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि और मुख्य वक्ता के तौर पर जाने-माने रचनाकार आलोक श्रीवास्तव ने हिन्दी की विकास-यात्रा को सिलसिलेवार और प्रभावी ढंग से रखा। उन्होंने कहा कि हिन्दी के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है – इससे पैदा होने वाले रोजगार के अवसरों की कमी का होना। उन्होंने लम्बे समय तक की गुलामी और उस कारण से बनी मानसिकता को विकृति बताया, जिस वजह से हिन्दी को लेकर देषवासियों में कोई विशेष उत्साह और सम्मान देखने को नहीं मिलता। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हमें अंग्रेजी हटाओ के नारे को छोड़कर समय की मांग को देखते हुए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होना होगा।