12:21 am - Monday May 20, 2013

हिन्दी की दशा या दुर्दशा

राष्ट्रभाषा अपनी क्षीणतर हो चली
हिन्दी का हिंग्लिस बन खिंचडी बन चली
अपनो के ही ठोकर से
अपने ही घर में पराई बनके रह गयी
आज विदेशी भाषा अपने ही घर में घुस
मालिकाना हक जता रही
उसके प्यार में सब उसे सलाम बजा रहे
यस नो वेलकम सी यू कहकर
शिक्षित सभ्य होने की मातमपुर्षी बघार रहे
अंग्रेजी बोलने वाला कुलीन शिक्षित है
ना बोलने वाला गंवार अनपड
राष्ट्रनेता हिन्दुस्तान के
राष्ट्रभाषा के नाम पर ऊँचा भाषण
ऊँची योजना बनाते
नाक रखने के लिए कभी कभार
रोमन में लिखी भाषण कुंडली
हिन्दी में पढ लेते
नयीं पीडी हिन्दी बोल तो लेते
पढ लिख नही सकते
नयीं पीडी के आदर्श बने
खिलाडी चलचित्र सीतारे
हिंग्लिस की गिटपिट से
हिन्दी की रूप सज्जा करते फिरते
अब वो दिन दूर नहीं
संस्कृत की तरह हिन्दी भी
पूरी तरह उपेक्षित होने वाली है
ज्ञान विज्ञान के भण्डार ग्रन्थ
पुस्तकालयों के में
चिस्कटों के शूल से जीवन की आखरी शांसे गिनने वाले हैं
ग्रन्थो का विदेशी अनुवाद
अपभ्रंषक होकर और ही अर्थ समझाने वाले हैं
हिन्दी की दशा या दुर्दषा के लिए
कौन जिम्मेवारी लें
तुम्हें क्या पडी रहती साहित्यकारो
हिन्दी की दुर्दषा पर लिखते रहते
राष्ट्रभाषा ठेकेदारों की तरह तुम भी
हिन्दी दिवस पर वार्षिक कर्म कांड कर लो
पितृ पक्ष के श्राद्ध की औपचाकिता निभा लो

बलबीर राणा “भैजी”

परिचय : इनका जन्म उत्तराखण्ड में जिला चमोली मल्ला दशोली पटटी के ग्राम मटई बैराशकुण्ड क्षेत्र में हुआ। बचपन पहाडी सीढ़ी नुमा खेतों में कुदते फांदते गाय बकरियों के पीछे भागते बीता। इनके मन के एक कोने में आंशिक सन्तोष तो है कि देश का प्रहरी होने के नाते किसी एक रूप में ये जीवन देश के लिए सर्मपित है ।

इनका ब्लॉग है :अडिग शब्दों का पहराhttp://balbirrana.blogspot.com/

Filed in: कविता

2 Responses to “हिन्दी की दशा या दुर्दशा”

  1. वाह… कड़ी पर खरी बात….

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