9:24 am - Wednesday May 22, 2013

उदारीकरण के बाद का सुनहरा भारत

विकास के लिए देश में विदेशी पूंजी निवेश की चाह लिए करीब दो दशक पहले जिस उदारीकरण का सपना देश की जनता को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने दिखाया था उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या ? आज जबकि उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही है ।

उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है ? यदि इसउदारीकरण को आम आदमी के नजरिए से देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह सिर्फ़ एक धोखे के अलावा कुछ भी नहीं लगता । सच तो यह है कि उदारीकरण ने सीधे-सीधे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाया, आम आदमी की आर्थिक स्थिति तो पहले भी खराब थी और धीरे-धीरे और बिगड़ती ही चली गयी। अमीर और गरीब के बीच जो खाई दरअसल आज इस देश में है उसकी जड़ भी उदारीकरण ही है। मुनाफे पर आधारित विकास की परंपरा की नींव पर अगर विकास का मकान खड़ा किया जाए तो वह किसके हित में होगा यह सहज ही समझा जा सकता है ।

20 साल पहले बजट पेश करते हुए तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जो बातें देश के सामने रखी थी और उस समय देश के जो हालात थे वैसे में उन परिस्थियों से निपटने का जो रास्ता तात्कालीन वित्तमंत्री ने उदारीकरण के रूप में सुझाया था जिस कारण तात्कालीन वित्तमंत्री ने खूब वाहवाही भी लूटी थी, लेकिन इसके दुष्परिणामों से आने वाले समय में क्या प्रभाव देखने को मिलेगा इसकी चिन्ता किसी को नहीं थी ।उससे पहले की कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा और जनता दल सरकारों की गलत नीतियों के कारण हमें विश्व पटल पर अपनी गलत नीतियों के कारण शर्मसार होना पड़ा था। बैंक ऑफ इंग्लैंड से लोन लेने के लिए 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा। इसके बाद महंगाई का सवाल तब भी था और आज भी वही सवाल जस का तस खड़ा है। तो फिर आर्थिक उदारीकरण के उस लॉलीपॉप का फायदा आखिर सरकार ने और उनकी नीतियों ने किसे दिया ?24 जुलाई, 1991 के दिन को हमारे देश के बड़े पूंजीपति घरानों ने ऐतिहासिक दिन बताया। क्योंकि इसी दिन देश में उदारीकरण और निजीकरण के नाम से पूंजी के वैश्विकरण ने देश के दरवाजे से अपने आप को बिना रोक-टोक अंदर दाखिल होने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया था। ऐसे में स्वाभाविक है कि पूंजीपति उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को अत्याधिक सफल मानते हैं क्योंकि इसके जरिए उन्हें बहुत मुनाफा हुआ है। लेकिन, हिन्दुस्तान अभी भी एक ऐसा देश है जहां गरीबों की संख्या सबसे ज्यादा है। अपने देश में विभिन्न बीमारियों से सबसे अधिक संख्या में लोग मरते हैं। देश के अधिकांश इलाकों में, बहुत ज्यादा संख्या में नवजात बच्चों और माताओं की मौत होती है। करोड़ों लोगों को साफ पेयजल तक उपलब्ध नहीं है। एक बाल्टी पानी लाने के लिए लोगों को घंटों लाईन में खड़े होकर बिताना पड़ता है।

ऊपर से योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने एक बहुत ही बेतुका दावा किया है कि एक काम करने वाला व्यक्ति 30 रु. प्रति दिन में गुजारा कर सकता है। यह दिखाता है कि पूंजीपति और उनके प्रवक्ताओं को मेहनतकश लोगों की असली परिस्थिति, उनकी जरूरतों और उनकी अभिलाषाओं का कोई अंदाजा नहीं है । वे गरीबी रेखा को बहुत ही नीचे तक ले जाकर यह दिखाने की कोशिश में लगे हैं कि देश में गरीबी पर काबू पाया जा रहा है।

ये रोजगार के वो आंकडे हैं जो शायद आपके अंदर उदारीकरण के फायदे की स्पष्ट तस्वीर आप तक पहुंचा दें। 1991मे कुल बेरोजगारी 9.02 मिलियन थी, 2004-05 में 10.51 मिलियन जबकि अभी 16.00 मिलियन है। यह तो केवल बेरोजगारी का आंकडा है अभी तो और भी आंकडे हैं जो आपके सामने रखे जाएंगे। अगर हम बैंकिंग, व्यापार, प्रशासन और रक्षा से जुड़ी चीजों की कृत्रिम मूल्य वृद्धि को अलग कर दें, तो अन्य क्षेत्रों में लोगों को उतना फायदा नहीं मिल पाया है या यूं कहें की विकास की दर इनमें इतनी नहीं है जितना हमारे शासक दावा करते हैं। मतलब साफ और स्पष्ट है कि उदारीकरण और निजीकरण का सीधा सा मतलब देश में श्रम का अत्यधिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट करना था और इसकी अनुमति देश के इज्जतदार पूंजीपतियों को देने का यह सीधा सा रास्ता था।यानि यह एक मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी और समाज-विरोधी साम्राज्यवादी कार्यक्रम की शुरुआत थी।

ऐसे में इस सुनहरे भारत के भविष्य का सपना कितना सुनहरा और चमकीला होगा आप इसका अंदाजा अपने आप हीं लगा सकते हैं। जिस बाजारवाद ने हमें पश्चिमी सभ्यता सीखने कोमजबूर कर दिया उसी बाजारबाद को पैदा करने वाले देश अब भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार अपने देश में चाहते हैं और हम बाजारवाद की दौड़ में अंधे उन से अलग न जाने किन ख्यालों में खोए हैं कि हमें तो इस बाजारवाद और उस संस्कृति के बिना देश की सुनहरी तस्वीर और देश की तकदीर दोनों हीं धुंधली दिखती है। देश या देश के लोग आज भी उस व्यवस्था के विरोधी नहीं है बल्कि विरोधी हैं तो उस व्यवस्था की खामियों के जिस वजह से देश की हालत आज ऐसी हो गई है । शहरों और महानगरों में सड़कों और बड़ी-बड़ी इमारतों की लंबी कतार खड़ी कर देना सड़कों पर तेज भागती गाड़ी की श्रृंखला देख खुश होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए विकास का सूचक नहीं है न ही देश की अर्थव्यवस्था में और देश के नागरिकों के जीवन स्तर में इससे कुछ बदलाव आना है । ऐसे में हमें एक मजबूत और तटस्थ अर्थव्यवस्था की स्थापना की जरूरत है और साथ ही आधुनिक समाज में भी पूरानी विचारधाराओं और चीजों की समान सहभागिता हो इसपर जोर देने की जरूरत है तभी उदारीकरण के साथ देखा गया सुनहरे भारत निर्माण का यह सपना पूरा हो सकेगा

ANSHUL ANANT
M.J.MC,
D.S.V.V.(HARDWAR)

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