1:51 pm - Monday May 20, 2013

देवी नागरानी की दो गज़लें

(1)

धुंधला सा कुछ छुपा हुआ सच्चाइयों में था
मेरा ही था वजूद जो परछाईयों में था

दीवार उठ गई है घरों के यूँ दरमियाँ
बाक़ी रहा न प्यार जो, दो भाइयों में था

हर एक से और ख़ुद से भी पूछा यही सवाल
अब वो सिला कहाँ है जो, अच्छाइयों में था

पंछी परों में हौसला लेकर उड़ा मगर
खुद खो गया था जब भी वो , ऊँचाइयों में था

रस्मों से पाँव बंध गये कुछ इस तरह मेरे
मिलने का अब ख़्याल भी रुसवाइयों में था

जो तजुरुबे थे उम्र के सब हो गए ग़लत
बदलाव इक ज़माने की अंगड़ाइयों में था

‘देवी’ तुम्हारे साथ तो कल था हुजूम एक
कुछ और था वो लुत्फ़ जो तन्हाइयों में था

(2)
ये दुनियाँ हैं घबराई महंगी दरों से
परेशां है उसपर वो बढ़ते करों से

मैं सुनसान बस्ती में जैसे ही आई
हुई बात  मेरी  कई  पत्थरों से

घरों के किये बंद सब दर-दरीचे
सभी सहमे-सहमे हैं फ़ितनागरों से

नज़र आए आसार हड़ताल के जब
तो मालिक ने की सुलह कारीगरों से

जो हिम्मत से जाते हैं जंगो-जदल में
वो अच्छे हैं बेशक सभी कायरों से

लगा कर वो माथे पे टीका लहू का
कफ़न वीर बांधे चले हैं सरों से

हवाओं में तकरार होती है ‘देवी’
ये जाना परिन्दों के गिरते परों से

देवी नागरानी

रचनाकार परिचय: 11 मई 1949 को कराची (पाकिस्तान) में जन्मीं देवी नागरानी हिन्दी साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम हैं। आप की अब तक प्रकाशित पुस्तकों में “ग़म में भीगी खुशी” (सिंधी गज़ल संग्रह 2004), “उड़ जा पँछी” (सिंधी भजन संग्रह 2007) और “चराग़े-दिल” (हिंदी गज़ल संग्रह 2007) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप वर्तमान में न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) में एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।…वर्तमान संपर्क : Devi Nangrani, 9-D, Corner View Society, 15/33 Road, Bandra, Mumbai 400050. Ph: 9987928358

Filed in: ग़ज़ल

9 Responses to “देवी नागरानी की दो गज़लें”

  1. October 13, 2012 at 5:47 pm #

    दोनों ही ग़ज़लें काबिले तारीफ हैं देवी नागरानी के साथ शेयर करने वालों को भी बधाई एवं आभार

  2. October 13, 2012 at 5:50 pm #

    देवी नागरानी जी ग़ज़ल की उस परंपरा से हैं जो सहज संप्रेषणीयता में विश्‍वास रखती है। पहेलियॉं बूझते उलझे हुए शेर कहना उनके मिज़ाज़ में नहीं; और यही उनकी ग़ज़ल को आम आदमी से जोड़ता है।
    दो खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई।

  3. October 13, 2012 at 10:11 pm #

    दीवार उठ गई है घरों के यूं दरमियाँ
    बाक़ी रहा न प्यार जो दो भाइयों में था
    दोनों ग़ज़लें अच्छी हैं…नागरानी जी को बहुत-बहुत बधाई

  4. Rajkumartiwari
    October 14, 2012 at 9:52 am #

    DEVIL NAGRANI GI KI DONO GAJALE KABLE TARIF HEA ESME AAM VA KHASH AADMI KA DARD CHUPA HUAA HEA.

  5. mahendra mishra
    October 14, 2012 at 10:49 am #

    devi nagarani ji ki gajalen bahut badhiya lagi .. prastuti ke liye abhaar …

  6. Dharmendra Singh Kaushik
    October 14, 2012 at 1:53 pm #

    BAHUT HI SUNDER GAZAL Devi ji

  7. October 15, 2012 at 3:58 pm #

    Dono hi ghazalen achchhi hain nayapan liye huye, badhai

  8. October 17, 2012 at 9:18 pm #

    Devi Nangrani kee dono gazalen bahut khoob hain . unhen badhaaee aur shubh kamna .

  9. pratima tiwari
    May 16, 2013 at 12:28 pm #

    Nangrani ji..namskaar…
    aapki dono hi gazals bahut hi achhi lagi ..mei shubh kaamnaye aapke saath hai..
    maine bahut si gazals suni aur padhi hai but aapki pahli gazal ki pahli line ne hi prabhavit kar dia…aise hi likhte rahiye..

Leave a Reply