7:11 am - Tuesday May 21, 2013

व्यंग्य : बाधा स्पीड ब्रेकर्स की

व्यंग्य

ओवर फ्लो करती हुई मस्कुलर जवानी में स्किन टाईट टी-शर्ट, जीन्स और गॉगल्स से लैस कोई सो काल्ड इक्कीसवीं सदी का बन्दा, किसी हाई स्पीड धूम स्टाईल बाईक से सौ की स्पीड को पार करता हुआ अपने बाईकिंग टैलेन्ट का प्रदर्शन करते हुए नवयौवनाओं को इम्प्रेस करता हुआ बेचारा जब स्पीड ब्रेकर्स के आने पर ब्रेक लगाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसके अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को रोककर उसके चक्रवर्ती सम्राट बनने का सपना चकनाचूर कर दिया गया हो।

ऐसा नहीं है कि रोड का यह स्पीड ब्रेकर रूपी विलेन सिर्फ स्पीड में रोड़े अटकाने के काम ही आता है। कुछ मजनू टाईप्ड बाईक सवार जो अपनी लैलाओं को पीछे बैठाये फर्राटे मारते हैं, वह मोस्टली ब्रेक लगाने के सुअवसरों की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं। धन्य है यह स्पीड ब्रेकर्स जो ऐसे मजनुओं की हार्दिक इच्छा की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैैं। उनके लिए स्पीड ब्रेकर्स का आना किसी मन चाही मुराद का पूरा होने से कम नहीं लगता है।

चलो स्पीड ब्रेकर्स अगर स्कूलों के आगे, पार्को के आगे, अस्पतालों के आगे हों तो ठीक भी है। इन दिनों तो स्पीड ब्रेकर्स का ऐसा फैशन सा हो गया है, या यूं कह लीजिये कि हाई स्पीड बाईक्स का इतना आतंक लोगों के दिलों में इस कदर बैठ गया है कि अब तो हर दो कदम पर आपको एक स्पीड ब्रेकर जरूर मिला जायेगा। अब लोग घरों के अन्दर स्टेयर्स भले न बनवायें अलबत्ता बाहर स्पीड ब्रेकर्स जरूर बनवा लेते हैं।

वैसे ही हमारी इण्डियन रोड्स में इतने गड्ढे होते हैं कि हायाबूजा जैसी गाड़ी भी बैलगाड़ी से ज्यादा स्पीड नहीं पकड़ पाती है। ऐसे मंे जब स्पीड ब्रेकर्स पड़ते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी फेवरेट प्रोग्राम में बार-बार बिजली जा रही हो और जब बिजली आये तो ब्रेक हो जाता है। इन मुए स्पीड ब्रेकर्स की वजह से जैसे ही गाड़ी में फोर्थ गियर डालो वैसे ही अगला स्पीड ब्रेकर आ जाता है और आपको अपने गियर्स का काउन्ट डाउन यानी फोर, थ्री, टू, वन शुरू करना पड़ जाता है। लगता है वन टू का फोर, फोर टू का वन गाने की इंस्पीरेशन यहीं से ली गई थी।

स्पीड ब्रेकर्स अगर स्पीड ही ब्रेक करे तो गनीमत है। यह तो स्पीड ब्रेकर्स कम पीठ ब्रेकर्स ज्यादा होते हैं। सुबह से शाम तक आपको इतने स्पीड ब्रेकर्स झेलने पड़ जाते हैं कि शरीर के हर हिस्से में शॉक एबजार्बर की जरूरत महसूस होने लगती है। स्पीड ब्रेकर्स भी अब ऐसे वैसे नहीं बनाये जाते हैैं। ऐसा लगता है कि सड़क पर ही हर्डल रेस यानी बाधा दौड़ का पूरा इंतजाम कर दिया हो। ऊँचे- ऊँचे स्पीड ब्रेकर्स अगर आप रात बिरात देख न पायें तो आपकी सुबह अगर अस्पताल में हो तो कोई बड़ी बात नहीं।
आज के जमाने में तो ऐसी और भी कई चीजें हैं जिनकी बढ़ती स्पीड पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। अन्धाधुन्ध स्पीड से फर्राटे मारते हुए भ्रष्टाचार को, समाज में फैलते हुए अत्याचार को, अधिकारियों में पनपते कदाचार को, नेताओं में घुसते हुए अनाचार को और न्यूज चैनलों मे चल रहे संसेशनल समाचार को भी आज प्रभावशाली स्पीड ब्रेकर्स से रोकने की जरूरत है।

वैसे देखा जाये तो स्पीड ब्रेकर्स का भी अपना एक दर्शन होता है। स्पीड ब्रेकर्स प्रतीक होता है ‘ठहराव’ का। आज का जीवन भी कोई हाई स्पीड की गाड़ी से कम तेज नहीं चलता। आज जिसको देखो वही धन, एश्वर्य, प्रतिष्ठा, पद, सम्पन्नता की होड़ में फंसा भागता ही चला जा रहा है। भले ही इस दौरान वह अपनी जड़ों से दूर होता चला जा रहा हो। आज ज़रूरत है ऐसे ही कुछ स्पीड ब्रेकर्स की जो आदमी के जीवन को भी कुछ देर के लिए ठहराव दे सके, उसे उसके परिवार के पास ला सके, जड़ों से जोड़ सके।

अलंकार रस्तोगी

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