साँप सीढी
साँप सीढी का खेल
ज़िन्दगी सिखलाती है।
आशा बंधते बधते,
टूट जाती है।
अथक परिश्रम,
सीढी चढ चढ,
निकट शिखर जब आता है,
तभी कोई एक सांप बड़ सा,
डस जाता है।
पुनः शुरू होता है सिलसिला,
सीढी सीढी चढने का,
कौन शिखर पर,
कब पंहुचेगा,
कोई नहीं बता पयेगा,
फिर भी भाग्य के हाथों मे,
जीवन ना छोड़ा जायेगा।
श्रम करते करे साँप डसेंगे,
फिर भी कुछ तो हासिल होगा,
साँप के डर से,
सीढी चढना छोड़ दिया तो,
कैसे उन्नति कर पायेंगे,
हताश निराश
कोने मे बैठ कर क्या पायेंगे,
चढना शुरू करें तो,
चढने चढने का सुख तो पायेंगे
क्या मिला मुझे
क्या मिला उसे
मत सोचो
शांत भाव से
साँप सीढ़ी का खेल खेलते,,
जीवन के सोपान चढो।
शिमला से….
खिड़की खोली,
दर्शन किये प्रभात के,
सूर्य की किरणे पड़ी जब,
हिम शिखर पर,
विस्तार ज्योतिपुंज का,
मेरे द्वार पे।
ये नोकील पेड़
देवदार के,
प्रहरी बने खड़े हैं,
पर्यावरण के बहार के।
एक सौ तीन सुरंगे,
पार करती
घूमती चढ़ती हुई,
रेल की ये पटरियां,
दौड़ती हैं जिन पर
सुन्दर ,सजीली गाड़ियां।
अति सुखद है यात्रा,
शिवालिक पहाड़ की।
ऊंचे नीचे, टेढे मेढे,
रास्ते पहाड़ के,
रेंगते हैं इन पर वाहन प्रवाह से
ऊंचे शिखर ,नीची वादी,
सौन्दर्य रचनाकार के।
जीवित हूं या स्वर्ग में,
भ्रम मुझे होने लगा है,
मुग्ध मुदित मन मेरा,
होने लगा है।
चारों ओर फैला है,
बादलों का एक घेरा,
छू लिया है बादलों को,
मुट्ठी में बन्द किया है,
पागल आशिकों को।
शाम ढली पुलकित हुई मैं,
ठंडी बयार से,
तन मन शीतल हो रहा है
रात्रि के प्रहार से।
तारों भरा आसमां
नीचे कैसे हो गया,
आकाश ऊपर भी नीचे भी,
फिर मुझे कुछ भ्रम हो गया।
स्वप्न है या यथार्थ,
यथार्थ कबसे इतना सुखद हो गया।
ऊपर निगाह ङाली तो बादलों के घेर थे,
बूंदें गिरी मौसम ज़रा नम हो गया
यह सुख फिर कंहीं खो गया।
सूखी चट्टानें, कटे पेड़,
देखकर मन विचलित हो गया।
सीढियों पर उगती फ़सल देखकर,
फिर दिल ख़ुश हो गया।
धरती के इस स्वर्ग को बचायेंगे,
ये पेड़ देवदार के।
देवदार के,
प्रहरी बने खड़े हैं,
पर्यावरण के बहार के।
पार करती
घूमती चढ़ती हुई,
रेल की ये पटरियां,
दौड़ती हैं जिन पर
सुन्दर ,सजीली गाड़ियां।
शिवालिक पहाड़ की।
रास्ते पहाड़ के,
रेंगते हैं इन पर वाहन प्रवाह से
ऊंचे शिखर ,नीची वादी,
सौन्दर्य रचनाकार के।
भ्रम मुझे होने लगा है,
मुग्ध मुदित मन मेरा,
होने लगा है।
बादलों का एक घेरा,
छू लिया है बादलों को,
मुट्ठी में बन्द किया है,
पागल आशिकों को।
ठंडी बयार से,
तन मन शीतल हो रहा है
रात्रि के प्रहार से।
नीचे कैसे हो गया,
आकाश ऊपर भी नीचे भी,
फिर मुझे कुछ भ्रम हो गया।
यथार्थ कबसे इतना सुखद हो गया।
बूंदें गिरी मौसम ज़रा नम हो गया
यह सुख फिर कंहीं खो गया।
देखकर मन विचलित हो गया।
फिर दिल ख़ुश हो गया।
ये पेड़ देवदार के।
- बीनू भटनागर

जन्म ०४ सितम्बर १९४७ को बुलन्दशहर, उ.प्र. में हुआ। शिक्षा: एम.ए. ( मनोविज्ञान, लखनऊ विश्वविद्यालय) १९६७ में। आपने ५२ वर्ष की उम्र के बाद रचनात्मक लेखन प्रारम्भ किया। आपकी रचनाएँ- सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी, माधुरी, सृजनगाथा, स्वर्गविभा, प्रवासी दुनियाँ और गर्भनाल आदि में प्रकाशित। आपकी कविताओं की एक पांडुलिपि प्रकाशन के इंतज़ार में हैं। व्यवसाय – गृहणी। सम्पर्क: ए-१०४, अभियन्त अपार्टमैंन्ट, वसुन्धरा एनक्लेव, दिल्ली, – ११००९६



बीनू जी अच्छा लिखती हैं । उनकी रचनाओं में आशा की किरण होती है ।
विजय निकोर
SAHAJ BHASHA AUR SAHAJ BHAVABHIVYAKTI KE LIYE BINU JI KO BADHAAEE .
very good presentation. keep it up.