2:03 pm - Wednesday May 22, 2013

मोतीलाल की कविता : पता नहीं

तुम सुनो उतना ही
जितना मैं देखती हूँ
अवसन्न हवा में
सोचो की आहटें
कब जान पाती है
वर्तमान की मेरी
अकथ वेदना को ।

आधे चाँद की साक्षी में
गली के सूने को ताकती मैं
जब नींद के पर्वत से उठकर
घुसती हूँ रसोई में
परछांईयां ढहती मीनारों सी
मैं दीवार घड़ी बन जाती हूँ ।

न जाने कब ठीक होगा समय
मैं पढ़ पाऊँगी कविताएं
दे पाऊँगी दस्तक
उन ऊँचे दरख्तों को
जो ऊँचा कर सके
मेरे विचारों को ।

मैं कैलेण्डर नहीं बन सकती
जहाँ तुम गोद सको
अपने स्वार्थी साक्षात्कार के दिन
क्या तुम नहीं आंक सकते
मेरे ह्रदयपुष्प में एक हरा पत्ता
और मेरे मन के आंगन में
क्या कोई तुलसी नहीं मुस्कुरायगी ।

तुम उतना ही सुनो
जितना मैं देख सकती हूँ तुम्हें
किसी ठीक होते समय में
फूलों के गुच्छों के बीच
और बची रहे वे आँच
जब तुम पहली बार
मेरी आंखों में उतरे थे ।

* मोतीलाल

परिचय :
नाम – मोतीलाल/ जन्म – 08.12.1962/शिक्षा – बीए. राँची विश्वविद्यालय संप्रति – भारतीय रेल सेवा मेँ कार्यरत प्रकाशन – देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं
में लगभग 200 कविताएँ प्रकाशित यथा – गगनांचल,भाषा, मधुमति, साक्ष्य, अक्षरपर्व, तेवर, संदर्श, अभिनव कदम, उन्नयन, संवेद, अलाव, आशय, पाठ, प्रसंग, बया, देशज, अक्षरा, साक्षात्कार, प्रेरणा, लोकमत, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, नवज्योति, भास्कर, जनसत्ता आदि । कुछ कविताएँ मराठी में अनुदित । इप्टा से जुड़ाव । संपर्क – विद्युत लोको शेड, बंडामुंडा, राउरकेला – 770032, ओडिशा

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