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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; कथा-कहानी</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>कहानी : कटी पतंग</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Feb 2012 09:17:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[story]]></category>

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		<description><![CDATA[कहानी कटी पतंग मकर संक्रांति के दिन अहमदाबाद के मणिनगर इलाके में कई सारी पतंगे... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%97/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">कहानी</span></h3>
<h2>कटी पतंग</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/kati-patang.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-7210" title="kati patang" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/kati-patang.jpg" alt="" width="200" height="185" /></a>मकर संक्रांति के दिन अहमदाबाद के मणिनगर इलाके में कई सारी पतंगे आकाश में बहुत ऊपर तक उड़ रही थी।आकाश रंगबिरंगी पतंगों से भरा पड़ा था जो कि कई बार एक दूसरे में उलझते उलझते बच जाती तो कभी एक दम से बल खा कर डगमगा जाती । हर पतंग उड़ाने वाला एक दूसरे की पतंग काटने पर लगा था।. आकाश में मानो कोई मेला लगा हो। सबकी नजर एक बहुत ऊंचाई पर उड़ने वाली एक सुन्दर  सी रंग बिरंगी पतंग पर थी कि उसे काटे और फिर दबोच कर पकड़ ले।  यह सारा दृश्य  उर्वशी छत पर खड़ी काफी देर से देख रही थी ।एक दूसरे की पतंग को काटने की होड़ के नज़ारे को देखते- देखते वह अपने अतीत की यादों में खो गई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कितना खुशहाल बचपन था उसका ! बड़े- बड़े सपने वह संजोया करती थी । जितनी वह नटखट और बातूनी थी उससे कई गुना ज्यादा पढ़ने में भी होशियार थी। उसे लगता था कि दुनिया उसकी मुट्ठी में है और कुछ भी पा लेना उसके लिए बहुत आसान होगा। उसके माता -पिता का सीना गर्व से फूल जाता था अपनी होनहार बेटी को देखकर । मगर पता नहीं किस्मत उसे कहाँ को लेकर जा रही थी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बचपन से ही तरह- तरह की बीमारियाँ झेलते &#8211; झेलते वह इस कदर कमजोर हो गई कि जैसे तैसे उसने कालेज तक की  पढ़ाई कर ली मगर अपने मन मुताबिक़ मुकाम हासिल ना कर सकी। यह कमी उसे हर वक्त खलती रहती। पर वह कर भी क्या सकती थी ।पढ़ाई का समय तो पार हो चुका था। फिर पीछे लौटना संभव नहीं था. कालेज करने के बाद उसने जॉब ओरिएंटेड़  कोर्स के लिए पत्रकारिता का विषय चुना और अच्छे अंकों से उतीर्ण भी  कर लिया । इसी दौरान उसे धीरज  से प्यार हो गया .घर में इस बात पर  घोर विरोध होने के बावजूद भी उसने धीरज से प्रेम विवाह कर लिया। उसे क्या पता था कि शादी के बाद आने वाली पारिवारिक समस्याएँ इस कदर बढ़ेगी कि वह ना केवल भावनात्मक बल्कि शारीरिक रूप से और भी कमजोर होती चली जाएगी । उसके कृशकाय चेहरे को देखकर अक्सर जान पहचान वाले कहते थे , &#8221; उर्वशी को पता नहीं क्या हो गया है ? दिन रात पता नहीं किस चिंता में रहती है . इसका शरीर कितना सूख गया है . चेहरे पर जरा भी रौनक नहीं है . &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह क्या उत्तर देती ? वह भीतर ही भीतर खून के आंसू पी जाती । रात दिन माता- पिता को याद करके रोती रहती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इधर शुरू से ही उपेक्षा का भाव यहाँ तक कि शादी की मीहंदी  हाथों से अभी उतरी भी नहीं थी कि उसे घर से बाहर ठिठुरती सर्दी में पूरी रात फर्श पर गुजारनी पड़ी पर किसे उसकी परवाह थी।जीने की उसकी इच्छा जैसे मर गई थी।उसकी उसमे क्या गलती थी ? उसने तो केवल सास से छोटे-  मोटे घरेलु मामलों को लेकर जिरह की थी। बदले में क्या मिला धीरज की डांट &#8211; फटकार , उपेक्षा और तिरस्कार . ऊपर से आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह अपनी मन पसंद के छोटे- मोटे सामान , कपड़े आदि तो दूर की बात कभी- कभी  तो दवाई के लिए भी पैसे नहीं होते थे। उसे हर चीज के लिए सास के आगे हाथ पसारने पड़ते थे। धीरज इतना गैर जिम्मेवार था कि कभी उसकी जरूरतों को समझता ही नहीं था । इतना ही नहीं उसके माता- पिता जब भी किसी दिन- त्यौहार पर उसे मिलने आते तो सास के ताने सुनने को मिलते और अपनी इतनी होनहार लड़की को इस तरह के माहौल में देखकर उनके आंसू आ जाते।फिर भी कभी उसने अपने माता- पिता को धीरज की  कमजोरियों के बारे में नहीं बताया था। बताती भी किस मुँह से उसने खुद ही तो अपने आप को कुएं  में धकेला था । वह हर कीमत पर समझौता करना चाहती थी तांकि दुनिया वाले कहीं उसकी खिल्ली ना उडाये॰ सब कुछ सहते हुए भी वह दुःख के भाव कभी अपने चेहरे पर आने नहीं देती थी , क्योंकि वह बचपन से खुद्दार थी। धीरज की  चुप्पी उसे भीतर ही भीतर तोडती रहती । वह उर्वशी  को तिल- तिल मरते देख सब कुछ चुप &#8211; चाप सहता रहता । उसकी सास भले ही उससे कितना भी दुर्व्यवहार करती परन्तु उसके मुँह से एक शब्द भी ना निकलता यहाँ तक कि वह उर्वशी को भी सांत्वना के दो बोल न कह पाता । उर्वशी को अपने चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा नजर आता । धीरज किसी तरह भी उर्वशी की भावनाओं को समझ न पाता । धीरज के दिमाग पर तो हर समय उसके माता &#8211; पिता का डर समाया रहता । उसके पिताजी ने अपनी कंपनी में धीरज की नौकरी क्या लगवा दी थी बस हर समय उसी का अहसान गिनाते रहते। धीरज की तनख्वाह उस समय मात्र चार हजार रुपये थी और वो पैसे भी उसकी सास रख लेती उसमे से २०० रुपये वो उर्वशी को हर महीने देती जैसे कि वह कोई बंधुआ मजदूर हो।. अगर उर्वशी के माता &#8211; पिता धीरज की किसी तरह मदद करना चाहते तो वह उर्वशी से बहुत बुरा भला  कहता , &#8221; क्या मै तेरे माँ &#8211; बाप का गुलाम हूँ , तुम तो यही चाहती हो कि मै तुम्हारे घर वालों के तलवे चाटू  । जितना मै कमाता हूँ उसी में गुजारा  नहीं कर सकती तो ये सब शादी से पहले क्यों नहीं सोचा ? &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इतना ही नहीं वो उर्वशी के माता- पिता को भी  गंदी- गंदी गालियाँ भी निकालता। उर्वशी क्या कह पाती बस सब कुछ चुपचाप सुन लेती और तकिये में मुँह दबा कर रोती  रहती क्योंकि अगर धीरज को जरा भी पता चलता कि वह रोना- धोना  कर रही है तो उसे और खरी खोटी सुनाता कि अगर वह यहाँ  पर दुखी है तो यहाँ से चली क्यों नहीं जाती ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जिस इंसान के हाथ बहुत विश्वास से उसने अपने जीवन की डोर दी थी वो उसे एक दिन ना संभाल कर रख सका ।तभी वह पतंग जैसे ही कटी सब और शोर सुनाई देने लगा और वह कटकर ऊँचाई से लहराते- लहराते एक बहुत ऊँचे पेड़ पर आकर अटक गई ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी दिन रात एक ही प्रार्थना करती कि भगवान् काश उसकी कहीं नौकरी  लगवा दे। इस बारे में एक बार उसने अपने पिता से बात की तो उन्होंने अपने एक जान पहचान वाले के स्कूल में उसकी नौकरी लगवा दी  । उर्वशी को चैन की सांस मिली कि चलो कुछ देर तो वह सकून के बिता सकेगी । वह सुबह घर का सारा काम जल्दी उठा कर कर लेती ।बचपन की उसकी कुछ कर दिखाने की इच्छा और समाज में अपनी पहचान बनाने की इच्छा फिर बलवती हो गई। बस उसे लगता कि भगवान् उसे एक मौका देदे तो वह फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखेगी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसके पिता जी ने उसे बताया , &#8221; उर्वशी मकंदपुर में मेरे एक परिचित ने नया स्कूल खोला है वहाँ पर तुम्हारी नौकरी की बात मैंने कर ली है और वह जगह तुम्हारे घर से नजदीक भी पड़ेगी उसके लिए तुम मेरी लूना ले जाओ , तुम्हे आने जाने में दिक्कत नहीं होगी. &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वहाँ पर जाकर उर्वशी ने सारी बात पक्की कर ली और अगले दिन से ही काम पर आने की बात और वेतन २००० निश्चित हो गई । उसने जब यह बात धीरज को बताई तो उसके भावहीन चेहरे पर कोई भाव नहीं आए । उसकी नीरस प्रवृति से वह अच्छी तरह वाकिफ हो गई थी , इसलिए किसी तरह की प्रतिक्रिया की उसे कोई उम्मीद भी नहीं थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सैंट जेवियर स्कूल की यह नई  ब्रांच खुली थी जहाँ पर उसे दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना था ।उर्वशी  बहुत मेहनती थी उसने अपनी तरफ से स्कूल की उम्मीदों पर खरा  उतरने की पूरी कोशिश की । एक दिन स्कूल के प्रिंसिपल भाटिया ने उसे अपने कक्ष में बुलाया और कहने लगे , &#8221; उर्वशी , बच्चों द्वारा तुम्हारी शिकायतें आ रही है कि तुम उनसे इंग्लिश में बात नहीं करती हो ।तुम्हे पता है कि हमारे कोंवेंट स्कूलों में हिंदी में बात करने की सख्त मनाही है &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी अपनी सफाई देते हुए बोली , &#8221; नहीं सर , मै तो इंग्लिश में ही बात करती हूँ , जिस तरह से आपके स्कूल की दूसरी टीचर्स करती हैं बल्कि मै तो उनसे भी अच्छी इंग्लिश बोल सकती हूँ । आपने तो मेरा एकेडेमिक रिकार्ड देखा है कि बाकी सभी टीचर्स के मुकाबले मेरे अंक हर सब्जेक्ट में ज्यादा है। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रिंसिपल , &#8221; देखो उर्वशी में बच्चों की शिकायत को नजर अंदाज नहीं कर सकता क्योंकि अगर इनके माता पिता तक यह बात पहुँची तो स्कूल का नाम खराब होगा । हाँ, अगर तुम चाहो तो मै तुम्हारा साथ दे सकता हूँ अगर &#8221; ऐसा कहते-कहते प्रिंसिपल उसके पास आकर खड़े हो गए और उसके कंधे पर हथ रख लिया । उर्वशी झट से चौंक कर खड़ी हो गई तो प्रिंसिपल ने उसे अपनी बाहों में जकड लिया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; उर्वशी , मेरे घर पर कोई नहीं है अगर आज शाम तुम मेरे घर आ जाओ मै सारा मामला संभाल लूँगा &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी की समझ में कुछ नहीं आया तो वह जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई और स्टाफ रूम में जाकर बैठ गई । अगर वह घर जल्दी जाती है तो पति और सास के ताने सुनने को मिलेंगे . उसका दिमाग सुन्न-सा हो गया । कुछ देर बाद अपने को थोड़ा संभाल कर वह भारी क़दमों से घर पहुँच गई । बिना किसी से कुछ कहे वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गई । बरबस ही उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी । उसके पति कमरे में आकर ताने मारने लगे पर जैसे उसके कानों तक कोई बात पहुँच ही नहीं रही थी मानो उसका शरीर पत्थर का हो गया हो । धीरज के साथ कोई भी बात करने का कोई फायदा नहीं था क्योंकि न तो उसने उसे कभी समझा था न कोशिश की थी । स्कूल छोड़ने की बात वह उसे कैसे कहती यही विचार बार-बार उसके मन में खलबली मचा रहे थे ।एक तरफ कुआं था तो एक तरफ गहरी खाई थी । उसकी किस्मत यहाँ भी उसे मात दे रही थी। भारी मन से आखिर उसने धीरज को कह ही दिया , &#8221; धीरज मैंने वह नौकरी छोड़ दी है क्योंकि हर रोज स्कूल में ४ बजे तक रुकना पड़ता है और अब तो शाम की  क्लासिस भी शुरू हो रही है तो मै अपनी बेटी को इतनी देर नजर अंदाज नहीं कर सकती। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आकाश साफ-सुथरा दिखने लगा था, तभी अचानक कहीं से रेत भरा अंधड़ आने लगा। देखते-देखते सारा आकाश काला भूरा हो गया । पतंग उड़ाने वाले कहीं और चले गए ,मगर वह पतंग आसमान की ऊंचाइयों को छूने लगी और कहीं दूर जाकर एक बड़े बरगद के पेड़ की शाखा पर अटक गई ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उस दिन उनकी कालोनी में समाज सेवा के तहत शिकायत- निवारण शिविर लगा। अपनी सहेली के साथ वह उस शिविर में गई जहाँ पर राज्य के गण्य मान्य व्यक्ति , अधिकारी सब मौजूद थे ।उस शिविर में अपनी कालोनी की समस्याओं को जिस बखूबी से उसने सबके सामने रखा तो अधिकारी गण के समूह ने सभी काम तुरंत करने के वहीँ निर्देश दे दिए । एक तरफ बैठे विधायक महोदय राम स्वरुप ने सस्नेह उसे अपने पास बुलाया और उसका परिचय लेने लगे , &#8221; बेटी , अगर किसी प्रकार की कोई दिक्कत या असुविधा हो तो बेझिझक मेरे कार्यालय में आ जाना । मुझसे जो बन पड़ेगा यथा संभव तुम्हारी मदद करूँगा । &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">विधायक के मुँह से इस तरह का आश्वासन पाकर उर्वशी का मन खुश हो गया . मन ही मन वह विधायक महोदय के व्यक्तित्व से गहराई में प्रभावित थी . वह मन ही मन हवाई किलें निर्माण कर आसमान में उड़ने लगी ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसे लगने लगा कि कुछ कर दिखाने का मौका उसे भगवान् ने दे दिया है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">एक बार विधायक महोदय से जब उसने कोई काम दिलवाने की बात कही तो उन्होंने उसे अपने चमचे बनवारी के पास भेज दिया । उस शहर में बनवारी के कई काल सेंटर चलते थे । बनवारी ने उसे काल सेंटर में नौकरी करने की पेशकश की । उर्वशी रात में काल सेंटर में काम पर जाने से झिझक रही थी तो बनवारी ने समझाते हुए कहा , &#8221; देखो उर्वशी , अगर तुम काल सेंटर में काम करोगी तो दिन भर तुम साथ साथ समाज सेवा भी कर सकती हूँ इसमें भी मै तुम्हारा भरपूर सहयोग करूँगा , बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए बस कुछ पल सकून के तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ. मै तुम्हे राजनीति के भी सरे दाव &#8211; पेच सिखा दूंगा &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पता नहीं, बनवारी की बातों में कैसा सम्मोहन था कि वह उसकी तरफ आकर्षित हो गई । वैसे भी घर पर तो उसे ना ही प्यार न कोई सम्मान मिला था आजतक , बल्कि हर समय दुत्कार ही मिलती थी । उसे लगा जिस प्यार की तलाश उसे है शायद उसे पाने का समय आ गया है । मन ही मन सोचने लगी कि जिस इंसान के लिए उसने अपने समाज , अपने जीवन तक को दाव पर लगा दिया उसने आज तल दो पल सुख के उसे नहीं दिए थे ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">धीरज का नीरस व्यवहार , घर की आर्थिक हालत , बच्चों की परवरिश को लेकर बढती जिम्मेवारियां और भविष्य के सुनहरे सपनों का सारा संसार उसके सामने मुँह खोल कर खड़ा था और उसे अपनी तरफ बुला रहा था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी ने बनवारी की हर बात में हाँ में हाँ मिला डी . मन ही मन सोचने लगी ईश्वर खुद थोड़ा किसी की मदद करने आते है किसी इंसान को ही फ़रिश्ते के रूप में भेजते हैं। पार्टी में भी उसने अपनी काबलियत और मेहनत के बलबूते पर अच्छा नाम कमा लिया था । आए दिन किसी न किसी प्रोग्राम में भाग लेने जाती और इस तरह वह बहुत व्यस्त हो गई कि भीड़ में वह खुद को भूल गई । बस एक आवेग में वह बहती जा रही थी ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जब भी उसके पास कोई भी किसी काम से आता तो उसे बहुत अच्छा लगता  और अपनी और से पूरा आश्वासन देते हुए कहती , &#8221; आप लोग चिंता मत करें , आपका काम हो जाएगा , बस आप लोग मुझे अपना सहयोग और आशीर्वाद देते रहें &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">हर रोज उसकी दिनचर्या में वह सुबह जल्दी उठ कर सब काम निबटा कर तैयार होकर बैठ जाती तांकि किसी काम से आने वाले को इन्तजार ना करना पड़े।अपने अंदर वो अजीब सा साहस महसूस करती । घर , बाहर , बच्चे सभी काम वो बखूबी संभाल रही थी , अद्दभुत शक्ति की मालकिन थी उर्वशी । अपने इलाके के कई बुजुर्ग लोगों और विधवा औरतों की पेंशन का काम भी उसने दिन रात एक करके करके दिखाया जिससे हर बुजुर्ग उसे आशीर्वाद देता ना थकता । परन्तु उर्वशी इतनी खुद्दार थी या फिर उसकी कमजोरी कि लोगों के काम तो विधायक महोदय से कहकर करवा लेती परन्तु अपने किसी निजी काम के लिए बोलने के लिए उसकी जुबान को ताला लग जाता ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बरगद पर अटकी हुई उस पतंग की डोर किसी के हाथ में आ गई ,वह उसे अपनी और खीचने लगा । मौसम भी साफ हो गया ,हवा भी रूक गई थी । वह पतंग आसानी से उस आदमी के कब्जे में आ गई ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उस दिन वह काल सेंटर में अपने आफ़िस में बैठी कुछ सुस्ता कसी रही थी , कई ख्याल दिमाग में आ जा रहे थे कि अचानक वहाँ बनवारी आ गया । उसे देखकर उर्वशी एक दम से झेंप गई और अपने काम में व्यस्त होने का अभिनय करने लगी । बनवारी उसके पास आकर बैठ गया और पूछने लगा , &#8221; क्या बात उर्वशी कई दिनों से देख रहा हूँ कुछ उखड़ी-उखड़ी सी हो । क्या कोई बात है मन में क्या ? &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; नहीं बनवारी जी ऐसी कोई बात नहीं है । बस, दिन भर सामजिक कामों में उलझी रहती हूँ और रात को यहाँ की ड्यूटी थक जाती हूँ । मन नहीं लग रहा आज कल किसी काम में &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; क्यों तुम्हारे पति तुम्हारा हाथ नहीं बँटाते क्या ? मैंने तो उन्हें किसी कार्यक्रम में तुम्हारे साथ आते-जाते भी देखा नहीं है। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; नहीं, बनवारी जी काम काज की इतनी बात नहीं है . असल में घर की जिम्मेवारियां दिन भर बढती जा रही है और सामाजिक और राजनैतिक दायरा बढता जा रहा है और खर्चे भी बढ़ गए हैं परन्तु आमदनी वही की वही &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8216; उर्वशी तुम चाहो तो मै तुम्हारे पति को दिन भर अपने आफ़िस संभालने का काम दे सकता हूँ जिससे उनकी एक्स्ट्रा आमदनी हो जाएगी &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह सुनकर उर्वशी की बांछें  खिल गई । वो बार- बार बनवारी का अहसान मानते हुए उसका शुक्रगुजार करने लगी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मन ही मन उर्वशी सोचने लगी कि बनवारी जी कितने नेक इंसान है। इतना नाम पैसा शोहरत होने पर भी अहंकार रत्ती भर नहीं है उनमे ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; अरे उर्वशी कहाँ खो गई , चलो आज काम की छुट्टी करो , कहीं  चल कर काफी पीते है . तुम्हारी थकान भी उतर जाएगी । आज घर जल्दी जाकर आराम करो। सुबह अपनी पति को मेरे आफ़िस लेकर आ जाना। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस तरह उर्वशी बनवारी के अहसानों के तले दबती जा रही थी और उसकी बातों से मंत्र मुग्ध हो जाती .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">एक दिन उर्वशी शाम को अपने काल सेंटर जाने के लिए तैयार हो रही थी कि अचानक उसके फोन की घंटी बजी , दूसरी तरफ बनवारी था और कहने लगा , &#8221; उर्वशी आज आफ़िस से छुट्टी कर लो ।मैंने आज एक छोटी-सी पार्टी रखी है। मै तुम्हे लेने आ रहा हूँ । मुझे पास वाली मार्किट में मिलो। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी बनवारी पर इस कदर भरोसा करने लग गई थी कि मना  ना कर सकी । बनवारी उसे लेकर एक बड़ी सी बिल्डिंग में पहुँच गया और सीढियां चढकर एक फ़्लैट के दरवाजे को उसने चाबी से खोला और उर्वशी को अंदर आने को कहा । अंदर मेज पर खाने-पीने का सामान और एक शराब की बोतल पड़ी थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी ने झिझकते-झिझकते पूछा , &#8221; बनवारी जी यहाँ पर तो कोई और नहीं है हमारे अलावा &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; अरे,घबराओ न, थोड़ी देर बैठ कर बातें करेंगे कुछ विचार-विमर्श करेंगे । एक दूसरे से बात करके मन हल्का हो जाएगा &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कहते कहते बनवारी ने दो ग्लासों में शराब डालनी शुरू कर दी और एक गिलास खुद ले लिया और दूसरा उर्वशी की तरफ बढ़ा दिया .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी  मना करते हुए , &#8221; बनवारी जी मैंने कभी शराब नहीं पी आजतक . &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; तो कोई बात नहीं , हर कोई पहली बार कभी न कभी तो पीता ही है . लेलो शरमाओ मत . राजनीति में आगे बढना है तो ये सब तो बहुत आम-सी बातें हैं &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">झिझकते- झिझकते आखिर उर्वशी ने गिलास पकड़ लिया । उसे हल्का- हल्का सरूर सा होने लगा तो बनवारी कहने लगा , &#8221; मुझे मालूम है उर्वशी तुम्हे अपने पति से वह प्यार वह सुख नहीं मिल पाता जिसकी तुम हकदार हो , कोई बात नहीं मै तुम्हारा दोस्त हूँ तुम्हारे सुख दुःख को समझता हूँ और तुम्हारे साथ हमेशा खड़ा रहूँगा। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था परन्तु वह उसकी बातों में फंसती जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी । वह जानती थी कि वह सही ही तो कह रहा है कि उसे उसके पति से  प्यार और सुख नहीं मिला रहा यही सोचते सोचते वह शराब के सरूर में डूबती जा रही थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बनवारी उसे अपनी योजना बताने लगा , &#8221; उर्वशी , मेरी तरकीब है कि आगामी चुनावों में मै विधायक महोदय को हरा दे और उसकी जगह ले ले अगर तुम मेरा साथ दो तो । बदले में मै तुम्हे हर सुख ऐशो आराम दूंगा। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह कहते- कहते उसने अपना बायाँ हाथ उर्वशी के कंधे पर रख दिया। चाहते हुए भी आगे के हसीन सपने देख वह बनवारी को मना नहीं कर पाई । धीरे- धीरे उसका हाथ उर्वशी के सारे शरीर में घूमने लगा । उर्वशी को भी कुछ नशा सा लगने लगा , वैसे भी वह उसके आभार तले दबी हुई थी।सोचने लगी कि जो काम पति नहीं कर सकता अगर बनवारी कर रहा है तो उसमे खराबी क्या है ? धीरे धीरे वह भी फिसलने लगी । आचरण में पवित्र रहने वाली उर्वशी कब बनवारी की बाहों में नंगे बदन सो गई । जब नींद खुली तो सर भारी भारी लग रहा था और अपराध बोध भी मन को घेरने लगा था।मगर शास्त्रों में उसने नियोग के बारें में पढ़ा था॰ शास्त्रों के अनुसार नियोग में दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाने की अनुमति दी जाती है और इसे पाप नहीं माना जाता और प्राचीन काल में भी यह मान्यता प्राप्त कृत्य था ।तरह तरह के विचारों से अपने आप को ढांढस बंधाती और पाप-पुण्य के द्वंद्व से ऊपर उठने का बार बार प्रयास करती रही उर्वशी। बनवारी ने उर्वशी की उलझन को सुलझाने का प्रयास किया , &#8221; उर्वशी , कार्ल मार्क्स का नियम शायद तुमने पढ़ा होगा कि जो चीज आसानी से हासिल नहीं होती उसे छीन झपट के कब्जे में  किया जाता है । तुमने कोई अपराध नहीं किया है। जो कुछ हुआ हम दोनों की सहमति से हुआ और जहाँ सहमति हो उसे गलत नहीं माना जाता । आजकल तो हर क्षेत्र में महिलायें अलग अलग हथकंडे अपना कर तरक्की करना चाहती है और तुम इतना सोच विचार कर ख्वाम-ख्वाह अपने को कसूर वार मान रही हो। हम दोनों दोस्ती के नाते एक दूसरे से हर दुःख-सुख बाँट सकते हैं।&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">धीरे- धीरे उर्वशी और बनवारी की चाहत शारीरिक भूख की तृप्ति की आदि होती गई। उर्वशी को तो अब किसी तरह भी जीवन में सबको कामयाब होकर दिखाना था इसलिए अब वह अपने मन में किसी तरह का गलत विचार न आने देती , क्योंकि घर की चिक चिक से दूर उसे वक्त बिताना अच्छा लगता।उसे बनवारी में अपना सच्चा प्यार नजर आने लगा , पर उसे क्या पता था कि हाई प्रोफाइल सोसायटी में जिस्मानी सम्बन्ध बहुत आम-सी बात है। अगर एक आदमी कई औरतों से रिश्ता रख सकता है तो क्या औरत ऐसा नहीं कर सकती और स्वेच्छा से किया परकीय प्रेम अपराध की श्रेणी में नहीं आता है । कहीं कहीं तो कितने अखबारों में तो उसने औरत और मर्दों की दोस्ती के लिए बने ऐसे कई क्लबों के बारें में भी पढ़ा हुआ था । विभिन्न किस्म की परिभाषाएं वह अपने मन-मस्तिष्क में खोजती हुई विचारों के महासागर में गोते खाती रहती .इस तरह वह बनवारी को अपना तन , मन , आत्मा , दिल सब कुछ सौंप चुकी थी और उसे एक मसीहा समझते हुए अपना सच्चा हमदर्द समझती थी। उसे सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसने स्थानीय चुनावों में खड़े होने के लिए बनवारी से भरोसा माँगा तो उसने बदले में उसे कहा , &#8221; उर्वशी मैंने जो मेरी तरफ से जो हुआ तुम्हारी हर संभव मदद की परन्तु ये मेरे भविष्य का सवाल है और राजनीति में मेरा असूल है कि मै पढ़े-लिखे लोगों पर भरोसा नहीं करता क्योंकि वो पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं।&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तभी उस  पतंग का धागा उस ऊँचे पेड़ से टूट गया और वह फिर उड़ने लगी और हिचकोले खाते- खाते सात आठ पेड़ो से टकराते ,अटकते- अटकते बचती हुई एक बिजली के खंबे पर जा कर फिर से फस गई ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी पर तो मानो आसमान टूट पड़ा हो , जिस इंसान को उसने अपना सर्वस्व सौंप दिया उसने उसे दूध में से मक्खी की तरह निकाल फैंका । किसे जाकर वह अपनी अर्ज सुनाये ? कहाँ जाकर अपने दुःख की गुहार लगाए ? एक बार तो उसके कदम रेल की पटरी तरफ मुड़ गए. बेजान-सी पत्थर की मूर्त बनी वह बेसुध चली जा रही थी तभी एक जान-पहचान के व्यक्ति ने जब वह उनकी साइकिल से टकराने लगी , &#8221; मैडम जी , किधर जा रही है पैदल पैदल , आपका घर तो दूसरी तरफ है । क्या बात ? अगर तबीयत ठीक नहीं है तो मै आपको रिक्शा पर बिठा देता हूँ । &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी जैसे कोई बुरे सपने से जागी हो , &#8221; अरे नहीं-नहीं भाई साहिब , दरअसल सर में कुछ चक्कर सा लग रहा था , परन्तु अब ठीक है। मै धीरे -धीरे चली जाउंगी।आप चिंता न करे। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कहते-कहते उर्वशी वापिस अपने घर की तरफ मुड़ गई । घर पहुँची तो उसके बच्चे भागे-भागे उसके पास आए , &#8221; मम्मी कहाँ रह गई थी ? आज बहुत देर में  लौटी हैं। बड़ी भूख लग रही है , कुछ बना कर दो न ? &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी मन ही मन सोचने लगी , हाँ शायद बहुत देर हो गई है !</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भगवान् के भरोसे अपने जीवन को छोड़ने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था । वह तो इस समय चाह कर भी ना रो सकती थी ना मर सकती थी । उसके बच्चों के मासूम चेहरे उसकी नजरों के सामने घूमने लगते।उर्वशी अब पूरी तरह टूट चुकी थी और एक जिन्दा लाश की तरह्हो गई थी।वह हमेशा तनाव और अवसाद की हालत में रहती । इसी कारण एक बार स्कूटर पर उसका एक्सीडेंट हो गया और उसकी टांग की हड्डी टूट गई । उसके माता पिता उसके इलाज के बाद उसे अपने घर ले गए । वहाँ वह छः महीने रही । उसका पति वहाँ पर छोड़कर उसे बेफिक्र हो गया . उसकी माँ उसके बच्चों को वहीँ से स्कूल भेजती और सारे काम करती . उसके भाई ने भी उसके लिए रात-दिन एक कर दिया । उर्वशी को लगता जैसे उसका जीवन ठहर गया हो । परन्तु अपने बूढ़े माता- पिता के मुरझाए चेहरे देखकर उसे जीने की हिम्मत दोबारा बटोरनी पड़ी। इस तरह पूरी तरह ठीक होते-होते उसे लगभग एक वर्ष लगा गया। स्थानीय चुनावों की तारीख नजदीक आ गई। उसने आजाद होकर चुनाव लड़ने का फैंसला किया भले ही उसे राजनीति के दांव पेंच की कोई जानकारी नहीं थी परन्तु वह चुनाव जीतकर बनवारी के मुँह पर तमाचा मारना चाहती थी। परन्तु यहाँ भी उसकी किस्मत एक बार फिर उसे धोखा देने के लिए खड़ी थी । उसके माता-पिता का पैसा बर्बाद हुआ। उसके लिए उसे बार बार ताने सुनने पड़ते थे । अब तो उसकी ताकत बिल्कुल दम तोड़ गई । उसे शराब की लत लग गई ।अपने दुःख भुलाने के लिए उसे कोई सहारा नजर नहीं आता था । उसके पति धीरज को उसकी किसी भी परेशानी से कोई फर्क नहीं पड़ता था । बस, उसे तो समय पर अपने हर काम किया हुए चाहिए  थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">टूटी हुई पतंग नीले आकाश की ओर फिर एक बार बढ्ने लगी । इस बार पास के किसी मोहल्ले वाले ने उसे अपने कब्जे में करना चाहा ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">घर के खर्चों में सहयोग के लिए उसने पोस्ट आफ़िस की एजेंसी ले ली और दिन भर वहाँ खड़ी होकर काम करती । वहाँ एक दिन एक आदमी आय जिसका नाम जीत पन्नू था . उसने उर्वशी को बीस हजार रुपये देकर इन्वेस्ट करने को कहा । उर्वशी को बड़ी हैरानी हुई कि बिना जान पहचान वो इतनी बड़ी रकम कैसे दे सकता है । उसे क्या पता था वो तो उसके सुन्दरता की तरफ आकर्षित हुआ है । कभी कभी उसे अपनी सुन्दरता अभिशाप लगने लगती जो हर जगह बाधा बन कर खड़ी हो जाती है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह तो हर इंसान में भगवान् का रूप देखती पर जब असलियत खुलती तो उसे शैतान नजर आता । इसी तरह जीत पन्नू ने भी एक दिन किसी काम से उसे अपने घर बुलाया । उसका घर काफी बड़ा था । जब वह सहमते-सहमते अंदर गई तो वह ड्राइंग हाल के एक कोने में सिमट कर बैठ गई और जल्दी से पेपर साइन करने को कहने लगी।  उसे बड़ी हैरानी हो रही थी कि इतने बड़े घर में कोई और सदस्य नहीं दिखाई दे रहा । थोड़ी देर बाद वह कमरे में आया और अपने होंठों पर मुस्कराहट  बिखेरते हुए बोला , &#8221; उर्वशी क्या लोगी ? &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“नहीं- नहीं पन्नू जी , बस आप इन पेपर पर साइन कर दे मुझे जल्दी है . &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; अरे इतनी भी क्या जल्दी है । कुछ पीने को लाता हूँ तुम्हारे लिए। क्या  लोगी ठंडा या गर्म ? आज तो तुम बहुत हसीन दिख रही हो। चलो, तुम्हे अपना घर दिखाता हूँ ?&#8221;<br />
उर्वशी को डर लगने लगा। उसे उसकी नियत पर शक होने लगा । तभी वह बहाना बना कर बाहर चली गई , &#8221; ओह ! मै तो कागज़ बाहर ही भूल आई । अभी लेकर आती हूँ &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; अरे कागज़ वागज मारो गोली , तुम जैसी हसीना पर तो मै अपनी सारी जायदाद वैसे ही कुर्बान कर दूँ । ये क्या दो-चार सौ रुपये के लिए धक्के खाती रहती हो । मेरी बाहों में आ जाओ तुम्हे जीवन भर कोई काम नहीं करना पड़ेगा। &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी उसकी बातों को नजरअंदाज कर बाहर चली गई और जल्द से अपना स्कूटर स्टार्ट किया और पीछे मुड़कर नहीं देखा । बाद में कई दिन पन्नू उसे फोन करता रहा पर उसने ना तो उसका फोन उठाया ना ही कई दिन काम पर गई । कभी-कभी उसे अपने आप से नफरत होने लगती।  जहाँ पर भी वह जाती हर कोई उसे उसके जिस्म को घूरता हुआ दिखाई देता । किस किस का नाम लेती वह .उसकी तालिका लम्बी होती जा रही थी ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पकड़ते पकड़ते वह पतंग उसके हाथ से छुट गई थी और जाकर किसी समाज सेवी के घर के आगे एंटीना पर फंस गई ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जब वह समाज सेवा के तहत पौधा-रोपण के कार्यक्रम किए तो वहाँ पर समाज सेवा के तहत मदद के बदले उसके जिस्म को पाने की भरपूर कोशिश की कुलभूषण नाम के व्यक्ति ने।  वह हर दिन त्योहार पर उसके बच्चों के लिए महंगे तोहफे लेकर आता जो कि वह अपने बच्चों को खरीद कर नहीं दे सकती थी । एक दिन वह अचानक उसके पति की गैर हाजिरी में उसके घर आ गया और उसे अपने साथ किसी काम के बहाने ले जाने लगा  तो उर्वशी की समझ में सारा माजरा आ गया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी का धीरे- धीरे आदमी जात पर से विश्वास उठता जा रहा था .उर्वशी जो कि किसी समय में इतनी चुलबुली हुआ करती थी धीरे- धीरे अंतर्मुखी होती गई । बस, हर समय घर पर रहती न किसी से मिलना पसंद करती और न ही उसकी किसी काम करने में दिलचस्पी रही ।  हर समय अपनी दुनिया में खोई रहती ।  मन ही मन आत्म मंथन करती रहती कि औरत को जीवन में कुछ कर दिखाने के लिए ना सिर्फ अपने परिवार के दायरे में संघर्ष करना पड़ता है बल्कि मानसिक और शारीरिक तोर पर भी प्रताड़ना सहनी पड़ती है । क्या उसकी भावनाओं की कोई कद्र नहीं ? वह एक कटी पतंग की तरह उसे अपना जीवन बेरंग लगने लगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अंत में वह पतंग जब एक खंबे पर आकर अटक गई तो उर्वशी के पड़ोस का एक मासूम-सा गंभीर प्रवृति का लड़का भागा भागा आया , वहाँ बहुत से लड़के उस पतंग को उतारने की कोशिश में लगे थे । परन्तु उस लड़के ने अपनी सहनशीलता और अदम्य साहस का परिचय देते हुए बड़ी खूबसूरती से उस पतंग को उतार लिया और उसे लेकर तेजी से अपने घर की तरफ भागा ।  सब बच्चे उसका मुँह देखते रह गए ।  वह भागता रहा जब तक कि वह उसे अपने घर के अंदर सुरक्षित नहीं ले गया ।  वह अपनी इस प्राप्ति पर बहुत खुश था ।  वह पतंग धीरे धीरे उसकी कमजोरी बन गई । वह जब भी वह पतंग उड़ाने लगता तो उसे उसके कट जाने का डर फिर सताने लगता कि पता नहीं अगर इस बार यह पतंग कट गई तो इसकी क्या दुर्दशा होगी ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">और उसने फिर उस पतंग को उड़ाना ही छोड़ दिया। वह उस पतंग को बड़े प्यार  से अपने पास संभाल कर रखता ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उर्वशी ने जब उस लड़के का उस कटी पतंग के लिए इतना मोह देखा तो बरबस ही उसकी आँखों में आंसू आ गए ।  मन ही मन उस लड़के के भोले पन से वह सोचने लगी कि भला कोई एक कटी हुई पतंग से भी इतना मोह कर सकता है जबकि बाजार में एक से एक नई पतंगे मिलती हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसे अपना वजूद भी एक कटी पतंग कीतरह लगने लगा जिसे हर कोई अपना समझ कर पकड़ कर उडाना चाहता है । वह सोचने लगी कि काश उस लड़के की तरह उसे भी कोई मसीहा मिल जाता जो उसकी कद्र करता और उसे इस तरह अपने पास सहेज कर रखता । पर वह तो पतंग है परन्तु वह खुद एक औरत है , किसमे इतनी हिम्मत है आजकल के जमाने में कि एक कटी पतंग को इतनी आत्मीयता से रखे ?</span></h3>
<h2>अलका सैनी</h2>
<h3><span style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/ALKA-SAINI.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-7209" title="ALKA-SAINI" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/ALKA-SAINI.jpg" alt="" width="120" height="150" /></a>लेखिका का परिचय :</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">हिंदी साहित्य में अपने सक्षम लेखन-कार्य के लिए एक सुपरिचित नाम . अलका सैनी की कहानियों में नारीत्व का अहसास , सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति, गहरा जीवनबोध तथा कलात्मक परिधियों को ऊंचाई तक पहुंचा पाने का श्रेय कहानीकार को जाता है.अलका सैनी संवेदना से कहानीकार ,दृष्टि से साधारण गृहिणी तथा मन से सक्रिय नारीवादी कार्यकर्ता हैं.जन्म : १८ फरवरी १९७१ को चंडीगढ़ में . शिक्षा : लोक -प्रशासन में पंजाब यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर उपाधि (१९९३ ), भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में डिप्लोमा। चंडीगढ़ की सुंदर घाटियों जन्मी अलका सैनी को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। कॉलेज जमाने से साहित्य और संस्कृति के प्रति रूझान बढ़ा। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती, कार्यक्षेत्र : न मैं कोई लेखिका हूँ ,न मैं कोई कवयित्री , न मेरी ऐसी कोई खवाहिश है , बस ! ऐसे ही मन में एक उमंग उठी, कि साहित्य -सृजन करूँ जो नारी-दिल की व्यथा को प्रकट करें एक सच्चे दर्पण में , एक आशा के साथ , कवि की पंक्तियों कि कभी पुनरावृति न हो , हाय ! अबला तेरी यही कहानी , आँचल में है दूध और आँखों में पानी .<br />
इनके ब्लॉग हैं : <a href="http://alkasainisheroshaayri.blogspot.com/">http://alkasainisheroshaayri.blogspot.com/</a><br />
<a href="http://alkasainipoems-stories.blogspot.com/"> http://alkasainipoems-stories.blogspot.com/</a><br />
<a href="http://alkasainiarticles.blogspot.com/"> http://alkasainiarticles.blogspot.com/</a></span></h3>
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		<title>कहानी : एक आंसू गुनगुनाता रहा उम्र भर</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Feb 2012 08:56:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[कहानी&#8230; एक आंसू गुनगुनाता रहा उम्र भर इंट्रो &#8211; निहारिका को प्रेम मिला, साथी मिला... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%82-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b0/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">कहानी&#8230;</span></h3>
<h2>एक आंसू गुनगुनाता रहा उम्र भर</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment?ui=2&amp;ik=7dbf6d2052&amp;view=att&amp;th=1356c261cfa81313&amp;attid=0.1&amp;disp=inline&amp;realattid=f_gy90br5w0&amp;safe=1&amp;zw&amp;saduie=AG9B_P9nfk1u9tlZlurnla94bvqc&amp;sadet=1329296035205&amp;sads=_ofh4AMOkokAL7SaeQutKB5yjyc" alt="" width="272" height="216" />इंट्रो &#8211; निहारिका को प्रेम मिला, साथी मिला और फिर सब छूट गया। उसके साथ हर वक्त रहे आंसू, जीवन संगी बनकर और जब वह सबसे ज्यादा निराश थी, भीगी आंखों ने ही समझाया – आने वाला कल होगा बहुत खूबसूरत&#8230; बस, आस न छोड़ो&#8230; ये एहसास एक बार फिर से उसकी आंखें नम कर गया। हो भी क्यों न, आंसुओं की जुबान बे-आवाज़ बहुत जोर से सुनाई देती है&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रात का दामन ठिठुरा हुआ था। लगातार गूंजने वाली, जागते रहो की आवाज़ कोहरे से डरकर कंबल में कहीं गुम हो गई। दिशाओं ने मुंह पर चुप्पी की पट्टी बांध ली। कड़वाहट भरी नज़रें पलकों में ढकने की कोशिश करते परिंदे अलसाते रहे। हाथों की पहुंच से बहुत दूर, निगाह के नजदीक, माथे के ऊपर तारों की बारात उमड़ने लगी। एक के बाद एक कर, इठलाते तारे आते और फिर छुपन-छुपाई खेलने लगते, मद्धम-सी चमक बिखेरकर। कढ़ाई से सजे किनारे वाली एक सफेद चादर नील में डुबाकर किसी ने आसमान पर उछाल दी। ब्लैक कॉफी से भरे मग की खाली होती सतह देख निहारिका बुदबुदाई – सो जाओ कि रात बहुत गहरी है, काली है&#8230; पर नींद का नाम-ओ-निशान तक नहीं था। मॉनिटर भले बंद था, लेकिन सीडी चल रही थी। एसडी बर्मन टीस बिखेरते हुए – मोरे साजन हैं उस पार&#8230;मैं इस पार&#8230;। तभी मोबाइल चहका – सोईं नहीं अब तक? तुम्हारे कमरे में खुदकुशी के सारे सामान मौजूद हैं न!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignright" src="https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment?ui=2&amp;ik=7dbf6d2052&amp;view=att&amp;th=1356c261cfa81313&amp;attid=0.2&amp;disp=inline&amp;realattid=f_gy90br631&amp;safe=1&amp;zw&amp;saduie=AG9B_P9nfk1u9tlZlurnla94bvqc&amp;sadet=1329296082953&amp;sads=DpCOPkxovlwFy7UnBf-Slf2f3xI" alt="" width="289" height="248" />मल्हार का संदेश पढ़ निहारिका को गुदगुदी सी हुई। अगरबत्ती सुलगने के आखिरी कगार तक पहुंचकर थम चुकी थी, लेकिन महक ऐसी, ज्यूं बहार ने दरवाजे पर ताजा-ताजा दस्तक दी हो। निहारिका नए-नए प्रेम में थी, अंखुआ ही रहा था उसका और मल्हार का प्रेम। दूसरे दिन की शुरुआत के ऐन पहले, इस पहर, उसके घर से आठ सौ किलोमीटर दूर, किसी और ही शहर में मौजूद है इस वक्त मल्हार, पर दोनों कितने जुड़े हुए हैं — यही सोचते हुए, हंसते-हंसते जाने कैसे छलक उठे निहारिका के नयन। बिना कुछ कहे, भीगी आंखों ने बयां कर दिया सब हाल!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्यार सबको होता है न कभी-कभार। जब-जब ये आता है, दुनिया में कुछ और बाकी नहीं बचता। दिल की लगी से निकलने के बाद भी कहां कुछ शेष रहता है, लेकिन निहारिका को कहां होश था। रात यूं ही गुजरती रही। मल्हार के संदेश पढ़ते और जवाब में बार-बार कुछ लिखते-मिटाते हुए। कॉफी खत्म हो चुकी थी, लेकिन यादें अंतहीन हैं। एक सिरा टूटता तो दूसरा उभर आता।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">`बहुत ब्लैक कॉफी पीती हो तुम, देखना काली हो जाओगी’, कभी मल्हार ये कहता तो अगले ही पल ये – `थोड़ी चीनी डाल लो, मुझसे नहीं पी जाती तुम्हारी बदसूरत कॉफी’। निहारिका नाराज होती, इससे पहले ही खिलखिलाहट की घंटियां बजाने लगता – `अच्छा, अच्छा! अब रंगभेद की नीति पर लेक्चर मत शुरू कर देना। सॉरी-सॉरी। याद आ गया, गोरा-काला कुछ नहीं होता&#8230; और ये भी कि तुम्हारे प्रिय भगवान कृष्ण श्याम रंग के हैं। चीनी नहीं तो अपनी लंबी अंगुलियां ही कॉफी में घोल दो, मीठी हो जाएंगी।‘ निहारिका बेसाख्ता हंस पड़ती और साथ ही उंगलियों से पलकों की कोर टटोलने लगती — गीली जो हो गई होतीं तब तक, निगाहें उसकी। मल्हार बोलता – `अपने आंसू जमीन पर मत गिरने देना, ये मोती टूट जाएंगे।‘ क्या कहती निहारिका, बस इतना सा ही तो – `धत! एकदम फिल्मी!’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">ऐसा हरदम ही होता। निहारिका के बैग में दो जोड़ी रुमाल हमेशा मौजूद रहते। पर्मानेंट जुकाम की पेशेंट है वो। आंखें और नाक पोंछती हुई, न&#8230;न, रोती नहीं थी, पर मल्हार हंस देता – `इनसे मिलिए, एकता कपूर के सीरियल्स की बड़ी बहू। इनका हंसना-गाना, खाना-पीना, सब आंसुओं के साथ होता है।‘</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बस, ऐसी ही है निहारिका। जिसकी जो मर्जी, सोच ले। उसको शर्म नहीं आती। बुक्का फाड़कर, मजलिस के बीच भी, क्लास रूम में, जब चाहे, जहां जी करे, रो देने वाली। उसकी समझ में नहीं आता कि हंसना-रोना कौन-सी अभद्रता की बात है, जो उसके लिए `एक्सक्यूज मी, एक्सक्यूज मी’ का रट्टा लगाती फिरे, इसलिए `मिस इमोशनल’ का तमगा लग जाने से भी वो नहीं डरती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दिन गुजरते रहे, साल-दर-साल, मल्हार और निहारिका का प्रेम मजबूत होता गया। प्यार में कंट्रोल की स्टियरिंग अपने हाथ में कहां होती है। मेहंदी हसन की आवाज़ में अक्सरहा सुनते हुए ग़ज़ल — प्यार जब हद से बढ़ा सारे तक़ल्लुफ़ मिट गए, आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गए,  दोनों नजदीक-दर-नजदीक आते गए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">***<br />
निहारिका ने सीने में दम भर सांस कैद कर ली और फिर फूंक बाहर निकाली। डायरी पर जमा धूल पूरी तरह बेदखल होकर मेजपोश के कोनों में सिमट गई। कितने ही दिन गुजर गए। निहारिका और मल्हार अब पति-पत्नी हैं, लेकिन दोनों का साथ रहना अब भी मुमकिन नहीं हो पाया है। अलग-अलग शहरों में नौकरियों में ज़िंदगी खर्च करते हुए, बस तनहा रातें हैं और ब्लैक कॉफी के भरते-खाली होते कप। डायरी के पहले ही पन्ने पर मल्हार ने लिख दी थी एक इबारत &#8230;<br />
रोना नहीं, कभी न रोना</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यादों की पछुआ हवा निहारिका का तन-मन सिहरा गई। याद आए, वे पल, जब प्रेम पर पढ़ाई-लिखाई का बोझ भारी पड़ने लगा था। रात-रात भर मल्हार संदेश पर संदेश भेजता रहता और उसकी अंगुलियां टेक्स्ट बुक के पन्ने पलटने में मुस्तैद रहतीं। एक्जाम के बाद, बहुत अरसा गुजरने पर जब दोनों मिले तो मल्हार चीखने वाले अंदाज में शिकायतें सुनाता रहा। वो खोई रही, गुमसुम और फिर वही हुआ&#8230; उसकी आंखों में पानी ठहरा हुआ था। छलछलाया हुआ&#8230; टपक पड़ने को बेकरार। ये देखकर मल्हार हंस दिया – `मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का / उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले’। निहारिका क्या कहती। बोली – `शब्दों में प्रेम करना तो कोई तुम से सीखे मल्हार।‘</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">***<br />
प्रेम के दिन भी कितने गिने-चुने होते हैं। कोटे से मिले राशन की तरह, खर्च होने की उतावली में। उनकी शादी तो हो गई, लेकिन कितनी ही मुश्किलों से जूझते हुए। मां बचपन में ही रूठकर दुनिया से चली गई थीं। पिता ने नन्ही नीहू को बहुत-से अरमानों के साथ बड़ा किया था। विजातीय लड़के से शादी की बात सुनकर उन्होंने धैर्य की पूंजी खो दी थी। वे गुस्से की कैद में थे। मां के फोटो की रंगत तांबई हो चुकी थी। उदास निहारिका एक बार फिर, आसमान से बिना कुछ कहे, बातें करती चुपचाप लेटी थी, तभी एक तारा टूटा, बेआवाज़। निहारिका ने दुआ के लिए हाथ जोड़ लिए। पलकें बंद थीं और आंखों के आंचल में सिमटा था, वही सदा का साथी – आंसू।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भोर में सबसे पहले पिता का ही स्वर सुनाई दिया। उन्होंने पुकारा – नीहू! उनकी पुकार में गुस्सा न था, बस आशंका और दुख के कुछ निशान थे। आंखों में पूरे बदन का लहू इकट्ठा था, पर मुंह से आवाज़ का कतरा भी न निकला, टपका सिर्फ एक आंसू। निहारिका ने हिम्मत कर उन्हें फिर से मल्हार के बारे में बताया। उसने पिता की हथेलियां कसकर थाम ली थीं। पिता ने सारी बात सुनी और फिर उसके थरथराते हाथों पर एक बूंद आंसू टप से गिरा। निहारिका ने पलकें बंदकर बदले में भी आंसू ही लौटा दिए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">***<br />
डायरी के पन्ने पर एक और रात टंकी थी, लेकिन तारों से भरी नहीं। नहाकर ताजादम हुई एक धुली रात। मल्हार के साथ ज़िंदगी शुरू करने की गवाही देती हुई। बड़ी-बड़ी आंखें खोलकर मल्हार को देखते हुए निहारिका बोली – `ये ख्वाब है या मेरी ख्वाबगाह, जहां मैं आ गई हूं?’  मल्हार ने कहा – `न्यू पिंच’ और उसके कंधे पर चुटकी भर ली। ततैया ने डंक मारा हो, ऐसे चिंहुक पड़ी निहारिका और आंख में फिर लहलहा उठी एक नदी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">`गीजर के पानी से नहाकर आई हो क्या, तुम्हारे आंसू बहुत गुनगुने हैं?’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अपने पोरों पर मल्हार की आंख से रिसा हुआ एक आंसू थामती हुई निहारिका गुनगुनाई – `और तुम्हारे आंसू इतने नमकीन क्यों हैं? अरब महासागर का सारा नमक एक ही में सिमट गया लगता है। इसमें ज़िंदगी के सब दुख घोल लिए हैं क्या?<br />
दूर कहीं एक दीवाना रेडियो पर भूले-बिसरे गीत सुन रहा था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">***<br />
बस, इतनी-सी थी उनकी कहानी? नहीं&#8230; ज़िंदगी बहुत लंबी होती है, सो उन दोनों की भी थी। कभी साथ रहते हुए, कहीं बरसों तक, बस मिलने की चाह में गुजरती हुई। एक दिन, मल्हार ने हमेशा के लिए निहारिका का साथ छोड़ दिया। किसी तरह की बीमारी का संकेत भी नहीं दिया था उसने। छुट्टियों में घर आया था, तब एक दिन बुखार से बदन तपने लगा। निहारिका अस्पताल ले गई तो पता चला – कैंसर की आखिरी स्टेज है और फिर दोनों बिछड़ गए। वायलिन का उदास सुर अब निहारिका के कानों में अक्सर बजता है और उसे वह अकेले सुनती है। पुरानी डायरी के पन्ने पलटती हुई। दूसरे कमरे में सो रही है गुलाब की पंखुरी-सी बेटी – कोमल!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">***<br />
`मम्मा! मैंने कल रात ही कहा था कि सुबह कढ़ी-चावल खाऊंगी। बनाया क्या?’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">निहारिका बुदबुदाई— `नहीं ! बेसन लाना भूल गई।‘ कोमल रूठ गई, लेकिन निहारिका को सुध नहीं थी। उसके कानों में कुछ संवाद उभर रहे थे –<br />
मल्हार से वह लड़ रही थी – ` तुम खटाई नहीं लाए। अब कढ़ी कैसे बनाऊं?’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह बोला – `कढ़ी में खटाई थोड़े ही पड़ती है। इसमें तो तुम अपना गुस्सा ही घोल देना।‘</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">` हां, और नमक की जगह आंसू, है न&#8230;!’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">और दोनों ठठाकर हंस दिए थे। उनके खिलखिलाते चेहरों पर होली के सब रंग जवान हो गए थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">निहारिका ने खिड़की के पार देखा। सुबह अब दोपहर से मिलने चल पड़ी थी। एक गड्ढे में जमा पानी में कमर तक डूबी हुई कोमल कुछ ढूंढ रही थी।<br />
निहारिका ने आवाज़ लगाई – `क्या कर रही हो? पानी से बाहर निकलो, ठंड लग जाएगी।‘</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कोमल घर के अंदर आई। उसके हाथ में एक भीगा हुआ खरगोश था। कांपता हुआ। निहारिका ने कोमल के गुलाब जैसे हाथ अपनी हथेली पर फैला लिए और उसकी लकीरों में कुछ तलाशने लगी। दुख के समुद्र के पार, उम्मीद का एक कल उन सबको पुकार रहा था। निहारिका की आंख में कुछ कांप रहा था, खरगोश की पलकें भी भीगी थीं।</span></h3>
<h2>चण्डीदत्त शुक्ल</h2>
<p style="text-align: justify;"><em><strong><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/_8zc7wNz_30Y/TG6K3TPI2PI/AAAAAAAAAiE/iQjnBNCKT14/S220/140820101188.jpg" alt="My Photo" width="176" height="132" /></strong></em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><em><strong>(चंडीदत्त शुक्‍ल</strong>। यूपी के गोंडा ज़िले में जन्म। दिल्ली में निवास। लखनऊ और जालंधर में पंच परमेश्वर और अमर उजाला जैसे अखबारों व मैगजीन में नौकरी-चाकरी करने, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद दैनिक जागरण, नोएडा में चीफ सब एडिटर रहे। अब फोकस टीवी के प्रोग्रामिंग सेक्शन में स्क्रिप्टिंग की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद आजकल अहा ज़िन्दगी/ भास्कर लक्ष्य में फीचर संपादक हैं । ब्लॉग … <a href="http://www.chauraha1.blogspot.com/">chauraha</a>)</em></p>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>पवित्रा अग्रवाल की लघुकथा : दोनों एक है</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Feb 2012 05:51:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
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		<description><![CDATA[नेता जी अपनी गाड़ी में बैठे ही थे कि पत्रकार ने रोका&#8211;&#8221;सर मुझे आप से... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%aa%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/neta-ji.jpg"><img class="size-full wp-image-7161 alignnone" title="neta-ji" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/neta-ji.jpg" alt="" width="175" height="210" /></a></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/neta-ji.jpg"></a>नेता जी अपनी गाड़ी में बैठे ही थे कि पत्रकार ने रोका&#8211;&#8221;सर मुझे आप से दो मिनट बात करनी है।&#8217;<br />
&#8216;अरे अभी नहीं बाद में पूछना ।अभी मैं जल्दी में हूँ,मुझे एयर पोर्ट पहुँचना है ।&#8217;<br />
&#8220;सर कहीं बाहर जा रहे हैं ?&#8217;<br />
&#8220;गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने दिल्ली जा रहा हूँ।&#8217;<br />
&#8220;सर सिर्फ दो सवाल ।&#8217;<br />
&#8220;अच्छा सिर्फ दो, जल्दी से पूछो ।&#8217;<br />
&#8220;सर गणतंत्र दिवस क्यों मनाते हैं ?&#8217;<br />
नेता जी सिर खुजाते हुए झल्लाए &#8211;&#8221;यह भी कोई सवाल है ?&#8217;<br />
पी ए ने स्थिति भाँपते हुए बात संभाली &#8211;&#8221;आप पत्रकार लोग भी नेताओं को इतना बेवकूफ क्यों समझते हैं ?&#8230;क्या नेता जी को यह भी नहीं पता होगा कि इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था&#8230;अब हटिए नेता जी को देर हो रही है ।&#8217;<br />
&#8220;बस आखिरी सवाल सर &#8230;हमारा राष्ट्रीय गीत कौन सा है और उसे किसने लिखा था ?&#8217;<br />
नेता जी मन ही मन खुश हुए कि कितना आसान सवाल पूछा है बेवकूफ ने।वह पी. ए. को बोलने का मौका दिए बिना बोले &#8212; &#8220;क्यों बच्चों के से सवाल पूछ रहे हो,यह तो देश का बच्चा बच्चा जानता होगा कि &#8220;जन गण मन&#8217; हमारा राष्ट्रीय गीत है और इसे रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था।&#8217;<br />
&#8220;सर यदि यह राष्ट्रीय गीत है तो फिर हमारा राष्ट्र गान कौन सा है ?&#8217;<br />
&#8220;दोनों एक ही हैं &#8216; कहते हुए नेता जी ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और एअर पोर्ट की तरफ रवाना हो गए ।&#8217;<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/pavitra_pic2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7160" title="pavitra_pic2" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/pavitra_pic2-253x300.jpg" alt="" width="91" height="108" /></a></h3>
<h3 style="text-align: justify;">पवित्रा अग्रवाल<br />
<span style="font-weight: normal;"> घरोंदा , 4 -7 -126 ,इसामियां बाजार ,हैदराबाद -500027 आ .प्र ./  ब्लॉग : </span><a style="font-weight: normal;" href="http://bal-kishore.blogspot.com">http://bal-kishore.blogspot.com</a></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><a style="font-weight: normal;" href="http://laghu-katha.blogspot.com/" target="_blank">http://laghu-katha.blogspot.com/</a></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>कहानी:दो नावों की सवारी</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Jan 2012 07:17:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[आधुनिक युग में मनुष्य जहां निसंगता से लड़ता है ,वहीं पर वह अपने मन से... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/01/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #800000;">आधुनिक युग में मनुष्य जहां निसंगता से लड़ता है ,वहीं पर वह अपने मन से कुछ खुशी के क्षण बिताना चाहता है परंतु किस तरह उसकी अंतरात्मा मूल्य-बोध के तले उसे धिक्कारता है और वह निर्णयहीन अवस्था में पहुँच जाता है ,क्या करूँ, क्या न करूँ। इसी संवेदना को प्रस्तुत <span style="color: #000080;">अलका सैनी </span>की कहानी &#8220;दो नावों की सवारी&#8221; ।<br />
<span style="color: #000080;"> मुख्य संपादक</span></span></h3>
<p><span style="color: #800000;"><span style="color: #000080;"><br />
</span></span></p>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">(कहानी)<br />
<span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/01/15-Stri-Swabhaw.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7084" title="15 Stri Swabhaw" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/01/15-Stri-Swabhaw-213x300.jpg" alt="" width="213" height="300" /></a>अभिनव सोच रहा था ,कि कब उसकी नाव प्रशांत महासागर में पलट जाएगी और वह हमेशा के लिए शांत हो जाएगा । हर समय तरह तरह की आशंकाओं,वहम तथा अंधेरे के साये में खोया रहता था । बचपन से काफी सुकोमल एवं भावुक प्रवृति का था वह । कभी उसने सोचा तक नहीं था कि उसकी यह प्रवृति उसके जी का जंजाल बनेगी । पड़ोस में रहने वाले एक नामी लेखक ने उसका ब्लॉग बनाकर अपनी कहानियाँ पोस्ट करना सीखा दिया था । साहित्य की यह नई विधा सीखकर वह बहुत खुश था । उसे क्या पता था ,ब्लॉग पर उसकी प्रकाशित होने वाली कहानियाँ उसे अपने जीवन में उस इंसान से मुलाक़ात करवा देगी, जो उसके जीवन की काया-पलट कर देगी । वह इंसान उसके जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगा । फेसबुक पर काम करते हुए उसे थोड़ा समय ही बीता था कि अनीता ने उसकी फ्रेंड-रिक्वेस्ट स्वीकार कर चैट-बॉक्स पर बात करना शुरू कर दी । तब तक तो उसके कोई दोस्त भी नहीं बने थे और यहाँ तक कि उसका प्रोफाइल फोटो तक नहीं लगा था। उससे पहले भी वह कई दोस्तों से चैटिंग कर चुका था मगर अनीता के बातों में जितनी आत्मीयता थी ,उतनी उसे किसी से भी नहीं मिली थी ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">वह अपने आप को ऐसे बहुत परिपक्व समझता था मगर अनीता से बात करते समय लगा कि वह उससे बहुत पीछे है । किसी प्रकार के उपयुक्त शब्दों का मितव्ययता से प्रयोग करना कोई उससे सीखे । गागर में सागर भर देती थी वह । उसकी तार्किक बुद्धि की कोई मिशाल नहीं थी । बातों-बातों में पता नहीं, कब अनीता और अभिनव अपने दिल के किसी खाली कोने को भरने के लिए एक–दूसरे को समर्पित हो गए ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">मज़ाक-मज़ाक में अनीता ने चैटिंग में एक बार उससे पूछा: “अभिनव,सही-सही बताना ,तुम्हारे जीवन में अब तक कितनी औरतें आई हैं ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> इस सवाल का क्या उत्तर देता ! उसने लिखा , “मेरे जीवन में अभी तक तो कोई नहीं आया है । वैसे भी मैं शादीशुदा आदमी हूँ । दो बच्चे है और खुशहाल जिंदगी जी रहा हूँ।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> मगर अनीता ने कैसे भाँप लिया, उसकी जिंदगी खुशहाल नहीं है । कहीं न कहीं उसे निसंगता महसूस हो रही है ।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “अगर ऐसा है तो फिर मेरे से बात क्यों कर रहे हो ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उसके बाद तो तरह तरह के ऊटपटाँग सवालों का प्रश्न करते और उत्तर देते दोनों को बात करने का नशा-सा हो गया । निर्धारित समय पर अपने टेबल पर आकर फेसबुक खोलकर एक दूसरे का फेस देखना शुरू करते थे । जब कोई नहीं दिखता था वहाँ पर ,तो बहुत बैचेनी होने लगती थी ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“ क्या हुआ ,इतना लेट हो गई ? अभी तक फेसबुक नहीं खोला।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “बस ,ऐसे ही सर में हल्का दर्द हो रहा था । बच्चे और वे भी पास में थे। ”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> अभिनव के पास कहने को कुछ नहीं होता था । कभी वह पूछती,” नेट पर हिन्दी में कैसे काम करते हो ? ज्यादा काम करने से तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी । अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकती हूँ।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“क्या ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “ मैं तुम्हारे रफ-ड्राफ्ट के एडिट करने का काम कर सकती हूँ। और वैसे भी मैंने पत्रकारिता तथा हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “अंधे को और क्या चाहिए सिर्फ दो आँखें । अगर तुम मेरा यह काम कर सकती हो तो मुझे फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तुम्हारी पत्नी को तो कोई आपत्ति नहीं होगी?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “बिलकुल नहीं ,हम कोई गलत काम थोड़े ही कर रहे है। ”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> इस तरह दोनों ने अपने-अपने कहानियों एवं कविताओं के ब्लॉग बनाकर साहित्य लिखने का काम प्रारम्भ किया ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">देखते-देखते दोनों के संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए कि फेसबुक और जी-मेल के पासवर्ड दोनों के एक दूसरे के पास थे । जब जी चाहता उन्हें खोलकर एक–दूसरे के काम को पूरा कर देते । यहाँ तक कभी-कभी एक दूसरे के दोस्तों को टटोलने के लिए हल्की फुलकी चैटिंग भी कर लेते । अनीता के फेसबुक से जब अभिनव उसके किसी दोस्त से बात करता तो उसे खूब मजा आता । लड़की समझकर वे लोग क्या क्या बात नहीं कर लेते ! पहली बार उसे लगा कि आदमी का हृदय कितना रहस्यमयी है । कितने तिलस्म छुपे हुए होते है इसके अंदर । वे दोनों अपने जीवन में एक नएपन का अनुभव करते । जीवन जीने में कुछ आनंद भी आने लगा । बढ़ते-बढ़ते विश्वास व नज़दीकियाँ इतनी बढ़ी कि एक-दूसरे के सुख दुख उन्हें अपने लगने लगे । एक जरा-सा भी बीमार होता तो दूसरे को पहले से ही उसका आभास होने लगता था । प्रेम के जिगीषा-जाल में ऐसे फंसे कि अपने अपने घरों के त्योहार-पर्व,पूजा-पाठ,जन्मदिन के आयोजन के फोटो एक –दूसरे को भेजकर त्वरित प्रतिक्रिया लेने में अपार खुशी होती थी।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अनीता ने एक बार अपने मन की इच्छा प्रकट की ,” भले ही, हम  इस जन्म में मिलें या न मिलें ,  मगर एक दूसरे की सुख-दुख की बातें शेयर कर अच्छे से जीवन जीने का ढंग तो कम से कम हम लोगों ने सीख लिया।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">कितनी मासूमियत और सहजता झलकती थी अनीता के सवालों में । कहीं न कहीं वह भी भीतर ही भीतर अपने को अधूरा समझती थी । कुछ खालीपन तो जरूर था, नहीं तो ऐसी बातें क्यों लिखती । अभिनव जानते हुए भी अनजान बनने की कोशिश करता था। वह अच्छी तरह जानता था कि यह क्षणिक खुशी उन दोनों के भरेपूरे घर में आग लगा देगी और उन्हें तिल-तिलकर मरने के लिए छोड़ देगी । उसे इस बात का अच्छी तरह एहसास हो चुका था,इस बार भगवान ने उसके जीवन में उस भोले जीव को भेजा है, जिसे वह न तो कभी भुला पाएगा और न ही अंगीकार कर पाएगा । अनीता के जीवन की दुखभरी गाथा ने उसे भीतर तक हिला दिया था । उसके संघर्षों की कहानी सुनकर एक मंझे कहानीकार की तरह उसे कई कथांनक नजर आने लगे ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">मौका पाकर एक दिन अभिनव ने कहा, “अगर तुम अपने जीवन के इन अनुभवों को कथानक समझकर अगर नई नई कहानियों की रचना करती हो तो तुम्हारी ये कहानियाँ आधुनिक समाज के लिए प्रेरणा-स्रोत का काम करेगी॰”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अनीता ने कोई उत्तर नहीं दिया। मगर उस बात को ध्यान रखते हुए अपने जीवन की सारी सच्चाइयों को बिना किसी लाग लगाव के बिना कोई बिम्ब बनाए अपने ब्लॉग में प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया , जिसने पाठकों के एक विशिष्ट बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित किया । उसकी कहानियों में प्रेम,वासना,जीवन की भूलें, दलित व नारी-विमर्श के अतिरिक्त मानव-मन के सुषुप्त पहलुओं को उजागर करने की अनोखी क्षमता थी। मगर पाठकों का एक अन्य वर्ग उसके बेबाकी से लिखने तथा फेसबुक के प्रोफ़ाइल पर बने आकर्षक फोटो को देखकर कभी कभी ओछी एवं संकीर्ण प्रतिक्रिया देकर उसके मन को ठेस पहुँचाने का भी प्रयास करते । उसका दिल हतोत्साहित देख </span><span style="font-weight: normal;">अभिनव उससे कहता था,” इन लोगों कि प्रतिक्रियाओं पर ध्यान दिए बगैर तुम अगर इसी तरह मेहनत करती रही तो एक न एक दिन जरूर तुम्हें अपनी मंजिल मिल जाएगी और दुनिया तुम्हें एक अच्छी लेखिका के रूप में जानने लगेगा।“</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अनीता फिर अनुत्तरित मानो चुप रहना उसकी आदतों में शुमार हो गया हो । उसे याद हो आया कि उसने जीवन भर लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा की है ,चाहे वह उसका राजनैतिक अथवा सामाजिक कार्यकर्ता का केरियर क्यों न रहा हो । मगर बदले में समाज ने उसे क्या दिया, उल्टा उसे नोचने-खसूटने पर उतारू हो गए ।  जिन्हें वह अपना सच्चा हमदर्द समझती थी, वे सारे तो उसके सुंदर शरीर के भूखे थे ।  अपने शालीनता को बचाते हुए वह अपने मुकाम को पाना चाहती थी । मगर आधुनिक युग में क्या यह संभव था ? द्वापर के द्रौपदी के चीर-हरण की कहानी उसे याद हो आई । उसने जल्दी ही राजनीति से संन्यास लेकर अपने छोटे परिवार के साथ मिलकर एक साधारण जीवन जीने की इच्छा व्यक्त की ।  एक बार अनीता ने अपने दुख को ई-मेल द्वारा अभिनव को बताया था ,” जब मैं म्युंसिपालिटी के चेयरमेन में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव हारी ,तब से वह न केवल आर्थिक संकट से वह गुजर रही है वरन वह कई पारिवारिक समस्यों को भी झेल रही है यहाँ तक कि उसके पति का भी भरपूर सहयोग प्राप्त नहीं हो रहा है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अभिनव समझ गया था कि वह कुछ और कहना चाहती थी मगर दिल में घुमड़ते दर्द की वजह से हो न हो उसकी आँखों में पानी भर आया हो और अपनी उस संवेदना को अभिव्यक्त करने के लिए उसके पास कोई शब्द नहीं है ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">ठाठस बंधाते हुए अभिनव ने लिखा,” अगर इतना जल्दी तुम हिम्मत हार जाओगी तो काँटों से भरा अपना जीवन कैसे पार कर सकोगी ? मैं तो तुम्हें हिम्मतवाला समझता था मगर तुम तो कमजोर व डरपोक निकली।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अनीता क्या चुप रहती तुरंत ही उसने लिखा,” डरपोक मैं नहीं हूँ ,डरपोक तो तुम हो । जो अभी तक अपने दोस्त को मिलने नहीं  आ सकते । तुम्हें डर लगता है । अगर तुम कहो तो मैं तुम्हें मिलने के लिए कहीं भी आ सकती हूँ । इतनी हिम्मत है मेरे में । एक बार आजमा कर तो देख लो । मैं अपनी समस्याओं का मुक़ाबला खुद कर सकती हूँ । उसमें मुझे तुम्हारे किसी भी सहयोग की कोई जरूरत नहीं है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">वह अभिनव के परिवार के बारे में अच्छी तरह जानती थी । अपनी झूठी सामाजिक मान-मर्यादा,प्रतिष्ठा और लोक-दिखावे के आगे उसका प्रेम सही मायने में तुच्छ लगने लगा था। वह हमेशा अपने बीबी और बच्चों में उलझा रहता था । कहीं उन्हें अगर उसके गुप्त संसार के बारे में पता चल गया तो उसका जमा जमाया बसेरा हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा । कहीं यह भी हो सकता है कि उसकी पत्नी क्रोध में आकर उसके ऊपर गरम पानी या तेजाब या केरोसिन डालकर उसे जला सकती है । कभी कभी उसे इस बात की भी आशंका सताने लगती है कि वह उसके बच्चों को जहर खिलाकर खुद आत्म-हत्या न कर दें । वह उसके इन  विचारों से भलीभाति अवगत थी क्योंकि वह पहले ही इस बारे में बता चुका था । मगर उसका अवसादग्रस्त चेहरा देख उसे अच्छा नही लगता था , वह उसे हँसाने के लिए कहती थी </span><span style="font-weight: normal;">“तुम क्या सोच रहे हो , मैं अपना भरापूरा परिवार छोडकर तुम्हारे गले पड जाऊँगी । अगर मुझे किसी के गले लटकना ही होता तो मेरे लिए दुनिया की कोई कमी नहीं है । मगर जो हमदर्दी,सहानुभूति और जीवन जीने के दृष्टिकोण का अहसास जो तुमसे मुझे मिला ,बस वही मेरे लिए बेशकीमती है । तुम हमेशा सपरिवार खुश रहो , मैं तो यही चाहती हूँ।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">शुरू –शुरू में बहुत कुछ बातें अभिनव अपनी पत्नी से शेयर करता था, उस समय पत्नी की प्रतिक्रिया न तो सकारात्मक होती थी और न ही नकारात्मक । चुटकी लेते हुए एक बात अवश्य कहती थी ,”मैं नहीं समझ पाती हूँ ,तुम्हारे औरतें ही क्यों दोस्त होती हैं ? क्या आदमियों की दुनिया में कोई कमी है ?” इस बात का वह क्या जवाब देता ,केवल इतना ही कहता,” तुम नहीं जानती हो ,तुम खुद एक औरत हो और यह भी सही है औरत खुद ज्यादा साहित्यिक और अनुशासित होती है।“ इस प्रकार हंसी-मज़ाक में कहते हुए वह बात तो इधर –उधर घुमा देता था।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">उसे वह कैसे अपनी गुप्त दुनिया के बारे में बता पाता । अगर बताने का साहस भी करता तो क्या होता ,उल्टा अनर्थ होने की जायदा संभावना थी । वह नहीं जानती थी कि कोई संवेदनशील आदमी कैसे अनीता की प्रत्यक्ष वेदना को अपने भीतर अनुभूत कर नजर अंदाज कर देता । एक बार उसे बहुत बड़ा झटका तब लगा जब उसने अपनी एक किताब अनीता को साहित्यिक जगत में लाने के लिए प्रोत्साहनवर्धक समर्पण उसके और अपने एक मित्र के नाम लिखा । उस किताब को पढ़कर अभिनव के पत्नी की टिप्पणी थी, “ बेशरम ,दो बच्चों के बाप होकर इस तरह का घिनौना काम करते हो!” वह नहीं समझ पाया कि ऐसा उसने क्या घिनौना काम कर दिया । क्या किसी औरत को दोस्त बनाने का और कोई मायने नहीं होते । वह तो उसकी भावनाओंकों समझने की भी कोई कोशिश नहीं कर रही थी । उसे तो अनीता में उसकी सौत नजर आने लगी । ईर्ष्या-वश जल भूनकर कुढ़ने लगी थी । उसे देखना तो दूर की बात नाम सुनना भी उसे पसंद नही था ।.</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">जबकि अनीता के दिल में ऐसी कोई बात नहीं थी । वह सहृदया थी । अपने माँ-बाप,बच्चों,परिवार ,परिजनों और दोस्तों को लेकर काफी संवेदनशील थी । यहाँ तक अभिनव तो उसके लिए पराया था ,मगर उसके अच्छे स्वास्थ्य और तरक्की के लिए भी भगवान से पूजा-अर्चना और व्रत रखती थी । इतनी ज्यादा प्रेम की प्रगाढ़ अभिव्यक्ति पाकर मन ही मन उसे मनोरोगी समझने लगता था । जब स्वयं के घर वाले इतना नहीं करते है तो वह कौन होती है ? यह पागलपन नहीं तो और क्या है किसी अनजान अज्ञेय आदमी के प्रति इतना लगाव ,इतना प्रेम ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">जब कभी अभिनव इस बात कि उसे उलाहना देता तो वह सरल लहजे में कहती थी,”तुम आदमी लोग किसी औरत की भावनाओं को कैसे समझ सकते हो ?  मीरा के लिए तो कृष्ण भी तो अज्ञेय थे,क्या शास्त्रों में उसके प्रेम का उल्लेख नहीं आता है । मगर तुम्हारे मन में यही भावना होगी कि मेरा इस प्रेम के पीछे जरूर कोई राज है । भले वह शारीरिक भोग क्यों न हो या मानसिक संतुष्टि या फिर कोई वित्तीय लाभ । मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ ,मेरे मन में इस प्रकार का कोई स्वार्थ नहीं रम रहा है । जब मैं मर जाऊँगी तब तुम्हें मेरे सच्चे प्यार का भान होगा।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">इस तरह की भावुक बातें कर वह सुबकने लगती कि अभिनव की आँखों में भी आँसू आ जाते थे । एक बार जब उसने अपनी एक कविता “मैं तो राधा बन गयी मगर तुम नहीं बन पाये श्याम” उसके फेसबुक के होमपेज पर पेस्ट की तो अभिनव ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ा । अपने यथार्थ को स्वीकार करते हुए वह यह बात मानने पर आमादा हो गया कि प्रेम की अनुभूतियों के भी अनेक रंग होते हैं। कुछ समय के लिए मन ही मन वह उसे समझने का प्रयास करता । मगर जैसे ही उसका ध्यान अपने पारिवारिक जीवन,बंधन और सामाजिक मान-मर्यादा का ख्याल आता तो उसके पैर स्वतः पीछे चलने लगते । रह-रहकर खतरनाक-खतरनाक आशंकाए उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगती ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">कभी सपने में अपने आप को पंखे से रस्सी द्वारा लटका हुआ पाता । कभी उसे लगता कि पुलिस पकड़कर जेल में बंदी बनाकर उसे प्रताड़ित कर रही है । कभी लगता कि किसी बड़ी अस्तपताल में भर्ती है , सीने में ज़ोरों से दर्द हो रहा है , कभी भी उसका हार्ट-फेल हो सकता है और वह इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो सकता है ।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> इस प्रकार कि मानसिक अवस्था में उसे न खाना खाना अच्छा लगता और नहीं कोई अच्छे कपड़े पहनना। बाल-दाढ़ी रंगने की दूर की बात कटाने की भी इच्छा नहीं होती थी । कभी अपने को नागार्जुन समझकर एक दार्शनिक की  तरह अपनी सीमित वैचारिक दुनिया में अपने सुख-दुख,व्यथा,इच्छा-अनिच्छा,अनुभूतियों और संवेदनाओं को पोसते हुए तरह-तरह की कहानियों और कविताओं की कुछ पंक्तियों की रचना कर फेसबुक पर डालकर लोगों की प्रतिक्रियाओं का इंतजार करता । सोचता कौन उसके दिल की थाह को जल्दी जान पाएगा । कभी कभी वह अपने खयालातों से भी इतना डरा हुआ रहता कि अपने नाम से रचनाएँ प्रकाशित न करवाकर दूसरों के नाम से फर्जी ई-मेल या फेसबुक के माध्यम से करता था । गजानन माधव मुक्तिबोध की तरह अंधेरे और आशंका के द्वीप का अपने आप को निर्वासित राजा समझता।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">अनेक दहशत भरी कल्पनाओं में खोया हुआ अपने जीवन के हर दिन को अंतिम दिन समझ कर गुमसुम और उदास रहता था । उसे ऐसा लगता था वह एक ऐसा मल्लाह है जो दो नावों पर एक साथ सवारी कर रहा है । कभी उसकी पत्नी मरने की धमकी देती तो कभी अनीता उसके बिना जीवन त्यागने की । ‘एक फूल–दो माली’ वाली उक्ति तो उसने सुनी थी मगर इस समय मानो वह ‘दो फूल–एक माली’, वाली उक्ति का वह आविष्कार कर रहा हो । वह नहीं समझ पाया कि वह प्रेम के किस मायाजाल अथवा त्रिकोण में बुरी तरह फंस गया है कि उसका जिंदा निकालना शायद नामुमकिन है ।  उसे लगने लगा था कि वह मौत के काफी करीब है । किसी ने उसके दिमाग में चाबी भरकर एक टाइम-बंब फिट कर दिया ,उसकी घड़ी टिक-टिक कर चल रही है । जब कोई जैसे ही उसके रिमोट का ट्रिगर दबा देगा, उसका मस्तिष्क चिथड़े-चिथड़े होकर ज्वालामुखी के परित्यक्त लावे की तरह इधर उधर बिखर जाएगा और उसकी अशांत आत्मा हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो जाएगी ।</span></span></h3>
<h3>() अलका सैनी</h3>
<h3><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/01/ALKA-SAINI_3b061d80c0672356a1a44c65cee57682.jpg"><br />
<img class="alignleft" title="ALKA SAINI_3b061d80c0672356a1a44c65cee57682" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/01/ALKA-SAINI_3b061d80c0672356a1a44c65cee57682.jpg" alt="" width="120" height="150" /></a></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हिंदी साहित्य में अपने सक्षम लेखन-कार्य के लिए एक सुपरिचित नाम . अलका सैनी की कहानियों में नारीत्व का अहसास , सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति, गहरा जीवनबोध तथा कलात्मक परिधियों को ऊंचाई तक पहुंचा पाने का श्रेय कहानीकार को जाता है.अलका सैनी संवेदना से कहानीकार ,दृष्टि से साधारण गृहिणी तथा मन से सक्रिय नारीवादी कार्यकर्ता हैं.जन्म : १८ फरवरी १९७१ को चंडीगढ़ में . शिक्षा : लोक -प्रशासन में पंजाब यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर उपाधि (१९९३ ), भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में डिप्लोमा। चंडीगढ़ की सुंदर घाटियों जन्मी अलका सैनी को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। कॉलेज जमाने से साहित्य और संस्कृति के प्रति रूझान बढ़ा। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती, कार्यक्षेत्र : न मैं कोई लेखिका हूँ ,न मैं कोई कवयित्री , न मेरी ऐसी कोई खवाहिश है , बस ! ऐसे ही मन में एक उमंग उठी, कि साहित्य -सृजन करूँ जो नारी-दिल की व्यथा को प्रकट करें एक सच्चे दर्पण में , एक आशा के साथ , कवि की पंक्तियों कि कभी पुनरावृति न हो , हाय ! अबला तेरी यही कहानी , आँचल में है दूध और आँखों में पानी .</span></h3>
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		<title>आलोक कुमार सातपुते की लघुकथाएं</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Dec 2011 05:36:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[short story]]></category>

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		<description><![CDATA[संदेह आज सुबह जब मेरे पड़ोसी ने फूलों का गुच्छा देकर मेरी श्रीमती जी को... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/12/%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81-2/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/laghukatha.jpg"><img class="size-medium wp-image-6920 alignnone" title="laghukatha" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/laghukatha-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a></h3>
<h3>संदेह</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">आज सुबह जब मेरे पड़ोसी ने फूलों का गुच्छा देकर मेरी श्रीमती जी को हैप्पी बर्थ-डे भाभीजी कहा तो मैं चौंक पड़ा&#8230;अरे! आज तो मेरी श्रीमती का जन्मदिन है। अब मरे मन में सन्देह के बीज का अंकुरण होने लगा कि मेरे पड़ोसी को बर्थ-डे की बात कैसे पता चली&#8230;? कहीं उसे मेरी पत्नी ने तो नहीं बताया । अब मुझे अपनी पत्नी कुलटा जान पड़ने लगी, जबकि किसी को कुछ बताकर उसे भूल जाने की अपनी बीमारी को मैं भूल गया था।.</span></h3>
<h3>अनुभव</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">उसके मित्र उससे हमेशा धोखा करते। उसने जितने भी मित्र बनाये, सभी धोखेबाज़ निकले। अब उसने अपने मन में ठान लिया कि वह मित्र तो किसी को भी नहीं बनायेगा, और एक औपचारिक परिचय के दायरे से आगे वह नहीं बढ़ेगा। धीरे-धीरे वह सफल से सफलतर होता गया।<br />
आख़िर क्यों न हो, उसने मित्रता की क़ीमत पर अनुभव जो हासिल कर लिया था।</span></h3>
<h3>तर्कवादी</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">मेरी माँ मुझसे हमेषा कहती कि बेटा ईष्वर में आस्था रखो। मेरे यह पूछने पर कि ईश्वर कहाँ है, वह कहती &#8211; वे तो सर्वत्र व्याप्त हैं। उसे आँाखों से देखा नहीं जा सकता, सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। मैं बालसुलभ प्रष्न पूछता तो क्या ईष्वर हवा है ? इस पर वह हँसती और कहती दुनिया में सब कुछ उसकी मर्जी से ही चलता है, सृष्टि  में होने वाली सभी घटनाओं के लिये वही जिम्मेदार है। माँ की बातें मुझे प्रभावित करतीं और मैं घीरे-धीरे करके पूरा आस्थावादी बन गया।<br />
एक दिन मेरी माँ मर गयी। मैं अपनी माँ से बहुत प्यार करता था। मैंने उसे पुनर्जीवित करने के लिये ईष्वर की खोज षुरू की। मैंने उसे नदियों में तलाषा फिर पहाड़ों पर जाकर उसे आवाज़ दी। मेरी आवाज़़ पहाड़ों से टकराकर वापस मुझे आ लगी। इस घटना के बाद से मेरे अहसास मरने लगे, और मैं आस्थावादी से तर्कवादी में तब्दील होने लगा।</span></h3>
<h3>हिजड़ा</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">मेरे एक अंतरंग मित्र ने सकुचाते हुए मुझसे कहा-यार आजकल न जाने मुझे क्या हो गया है। सेक्स के प्रति एकदम अरूचि सी हो गयी है। मुझे औरतों की तरह रहना अच्छा लगने लगा है, और हिजड़ों की तरह ताली बजा-बजाकर नाचना भी भाने लगा है। मेरी औरत मुझे हिजड़ा कहने लगी है और मैंने तो यह भी सुना है कि वह आसपास ताक-झांक भी करने लगी है।<br />
तू ऐसा कर अपने-आपको किसी पौराणिक-कथा की महिला पात्र घोषित कर दे, और फिर जो जी में आये वो कर- मैंने सलाह दी । </span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;">आलोक कुमार सातपुते</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span><img class="alignleft" src="http://1.bp.blogspot.com/-7gMDTmQYOeg/Tr6B7LIgFYI/AAAAAAAAAA8/Dt-wUIPjVBc/s220/alok%2Bphoto.JPG" alt="My Photo" width="111" height="154" />लेखक का संक्षिप्त परिचय :</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span><span style="font-weight: normal;">नाम – आलोक कुमार सातपुते/जन्म – 26/11/1969/शिक्षा- एम.काॅम./प्रकाशित रचनाएंॅ- देश के लगभग सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।/संग्रह का प्रकाशन- 1 शिल्पायन प्रकाशन समूह दिल्ली के नवचेतन प्रकाशन,से लघुकथा संग्रह अपने-अपने तालिबान का प्रकाशन।/2 सामयिक प्रकाशन समूह दिल्ली के कल्याणी शिक्षा परिषद से एक लघुकथा संग्रह वेताल फिर डाल पर प्रकाशित।/3 डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से कहानियों का संग्रह मोहरा प्रकाशित ।/4 डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से किस्से-कहानियों का संग्रह बच्चा लोग ताली बजायेगा प्रकाशित ।/5 आत्मकथा कुण्ठाकथा शीघ्र प्रकाश्य।/अनुवाद – अंग्रेजी उडि़या ,उर्दू एवम् मराठी भाषा में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन ।/सम्पर्क -एलआईजी-832, सेक्टर-5 हाउसिंग बोर्ड कालोनी, सडडू, रायपुर 492007 छत्तीसगढ़/मोबाइल -09827406575/E-mail 1<a href=" satputealok@readiffmail.com"> satputealok@readiffmail.com</a>/2 <a href="satputealokkumar@gmail.com">satputealokkumar@gmail.com</a>/Blog- <a href="laghukathakranti.blogspot.com">laghukathakranti.blogspot.com</a></span></span></h3>
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		<title>संगीता पुरी की कहानी : मिथ्‍या भ्रम</title>
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		<pubDate>Fri, 14 Oct 2011 08:10:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[कहानी क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/10/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a5%8d/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">कहानी</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/10/womenin-train-325_020311090335.jpg"><img class="size-medium wp-image-6588 alignleft" title="womenin train -325_020311090335" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/10/womenin-train-325_020311090335-300x156.jpg" alt="" width="300" height="156" /></a>क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन नों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी । उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले  में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया,वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम, जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता।पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता।दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान, हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी,क्‍यूंकि इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।<br />
एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को हचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी,जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया। उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां,उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।</span></h3>
<h2><img class="alignleft" src="https://lh5.googleusercontent.com/-Zog_Q4veJLE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAABKE/gG-JzC7yN6g/photo.jpg?sz=200" alt="" width="120" height="120" /></h2>
<h2>संगीता पुरी</h2>
<p><a href="http://www.gatyatmakjyotish.com/">http://www.gatyatmakjyotish.com/</a></p>
<h3><span style="font-weight: normal;">जन्‍म- १९ दिसंबर १९६३ को पेटरवार, बोकारों में/ शिक्षा- अर्थशास्‍त्र में एम. ए. करने के बाद पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा पूरे जीवन ज्‍योतिष में किए गए रिसर्च को आगे बढाने के लिए मैने भी अपना जीवन ज्‍योतिष को ही समर्पित कर दिया /कार्यक्षेत्र-ज्‍योतिष का जो स्‍वरूप समाज में प्रचलित है, वो उसका वास्‍तविक स्‍वरूप नहीं। समाज में फैले ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करना अब मेरा एकमात्र उद्देश्‍य रह गया है और इसी दिशा में प्रयास जारी है। ईमेल- <span style="color: #cc3300;"><a href="gatyatmakjyotish(at)gmail.com">gatyatmakjyotish(at)gmail.com</a></span></span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>डा.श्याम गुप्त की लघु कथा &#8230;बच्चे</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Sep 2011 10:11:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>dr shyam gupta</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[short story]]></category>

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		<description><![CDATA[बच्चों को  अपने से अलग रखना आजकल माँ बाप का एक फैशन बन चला है...जो मूल में सारी बाल व युवा विश्रन्खलताओं का कारण है...]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="text-decoration: underline;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/bach.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-6456" title="bach" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/bach-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" /></a>लघु कथा..</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="text-decoration: underline;"><br />
</span>“ बच्चों के लिए मेजिक-शो रख लेते हैं, वे विजी रहेंगे, शैतानी नहीं करेंगे, माँ- बाप के साथ लटके नहीं रहेंगे, खूब एन्जॉय भी करेंगे |”  निलेश ने पार्टी-प्रवंधन की चर्चा के दौरान कहा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘क्यों ? बच्चों को भी माँ-बाप के साथ एन्जॉय करने दो न |’ रमेश जी ने कहा |<br />
‘नहीं, पापा, बढ़ा डिस्टर्ब होता है |’ सुरभि ने कहा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘क्या डिस्टर्ब होता है ? पार्टी में क्या आप लोग आफीशियल मीटिंग करते हैं ?’ रमेश जी ने प्रश्न किया |<br />
‘पर अच्छा रहता है, सभी अच्छी तरह एन्जॉय कर पाते हैं’ , निलेश बोला |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
रमेश जी सोचने लगे, ‘क्या यह वास्तव में एक अच्छा  ट्रेंड है ?’ उन्होंने स्वयं से ही प्रश्न किया | प्रारंभ से ही बच्चों को अलग रखने का भाव &#8230;.लगता है माँ-बाप बच्चों को बोझ समझते हैं | अपने उठने बैठने की, खाने-पीने की, गप-शाप करने की स्वतन्त्रता में बाधा | क्या बच्चे यह महसूस नहीं करते होंगे ! क्या वे यह जानने को उत्सुक नहीं रहते होंगे कि उनके माता-पिता क्या कर रहे हैं, कैसे उठ-बैठ रहे हैं,..शायद अवश्य |   परन्तु उसी प्रक्रिया को बार बार घटित होते देखकर, वही बच्चा-कंपनी को अलग-थलग रखे जाने वाले ट्रेंड को  सभी को अपनाते देख, वही उनके लिए भी एक सामान्य भाव बन् जाता है और फिर बच्चे भी माता-पिता से स्वतन्त्रता चाहने लगते हैं, उनके साथ नहीं रहना-जाना चाहते |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
रमेश जी बोले,’ परन्तु क्या यह आदर्श स्थिति है &#8230;शायद नहीं |’  वे कहने लगे – हमारे बचपन में तो माता-पिता हम सब भाई-बहनों को हर जगह, मेले, शादी-विवाह, पारिवारिक या मित्रों की पार्टी –सभी जगह अपने साथ ही रखते थे | सारे मित्र, परिजन, पडौसी मिलते ही कुशल-क्षेम के साथ बच्चों के बारे में भी पूछते व उनसे वार्तालाप करते थे | शिक्षा व अन्य कलापों के बारे में जानकारी लेते व मंगल कामनाएं एवं आशीर्वाद देते थे |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
वे कहते गए ..इस प्रकार बच्चों का अपने परिवार, समाज, संस्कृति के अनुसार उठना-बैठना, अनुशासन, रीति-रिवाज़ आदि के बारे में प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त होता रहता था | बड़ों से, छोटों से, साथ वालों से आदरणीयों व अभिभावकों से व सभी से उचित व्यवहार, यथा-योग्य संवाद करने का उचित तरीका व भाव सिखाने की प्राथमिक शालाएं होती थीं ये सब बातें व क्रिया-कलाप | साथ ही साथ परिजनों, प्रियजनों व स्वयं माता-पिता के प्रति आदरभाव की उत्पत्ति भी होती थी और श्रृद्धा की भी | यद्यपि किशोर होते होते बच्चे स्वयं ही अपनी दुनिया बनाने लगते थे, स्वाभाविक तौर पर, परन्तु तब तक उनमें पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय भाव बन् चुके होते थे जो संस्कार रूप में जीवन भर मार्ग दर्शन करते थे |  एक बात यह भी है कि इसी कारण बच्चों के साथ होने से प्रौढ़ व युवा माता-पिता भी अनर्गल बातें व व्यवहार से बचे रहते थे, और समाज में द्वेष- द्वंद्व कम होने की परम्परा बनती थी |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘परन्तु आजकल तो यही ट्रेंड है’,  निलेश ने कहा |  ‘बच्चे आजकल अधिक होशियार होते हैं, उनमें  आत्म-विश्वास, स्व-निर्भरता, शार्पनेस, दुनियादारी तेजी से विकसित होती है | फिर आज इतना समय भी किस के पास है | क्या अपना काम-धंधा छोडकर पहले के लोगों की भांति बस बच्चे खिलाएं तो आज की तेजी से बढती हुई दुनिया में हम पीछे नहीं रह जायेंगे |  लोगों से मिलेंगे-जलेंगे नहीं तो प्रगति कैसे करेंगे | इसके लिए हमें भी तो अपना समय चाहिए | विज्ञान के युग में हर वस्तु उपलब्ध है, हर बात का आल्टरनेटिव है | बच्चों को आत्मनिर्भरता सिखाने के लिए उन्हें स्वतन्त्रता देना भी जरूरी है |’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हो सकता है, परन्तु आज पाश्चात्य प्रभाव वश, प्रारम्भ से ही बच्चों को पृथक बिस्तर पर सुलाना, अलग कमरा, सब कुछ उनका निजी, अलग.. |  पार्टी, शादी, क्लब, जलसों में भी बच्चा पार्टी अलग |  यह अलगाव निश्चय ही एक उन्मुक्तता, स्वच्छंद-भाव बच्चों में उत्पन्न करता है | प्रारम्भ से ही निजता, परिजनों से अलगाव, और परिणामी अहमन्यता व पारिवारिक-सामाजिक मोह –लगाव की समाप्ति | प्रेम डोर बन् ही नहीं पाती | आज विभिन्न बाल -किशोर- युवा द्वंद्वों , उच्छ्रन्खलता, अनुशासन हीनता का यही कारण है |  अलगाव के भाव-रूप द्वारा पारिवारिक सान्निध्यता, आत्मीयता, मोह का भाव पनप ही नहीं पाता | बच्चा माता-पिता के शरीर व सान्निध्य के स्नेहताप, उनके सान्निध्य की बौद्धिक क्षमता, अनुभव व ज्ञान की तेजस्विता के स्नेहिल भाव को प्राप्त ही नहीं कर पाता | परिणाम स्वरुप बच्चे माता-पिता को सिर्फ आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र समझने लगते हैं | वे माता-पिता, अभिभावकों की बातें सुनने-मानने की अपेक्षा अपने मित्रों व अन्य लोगों से, टीवी, कमर्सिअल्स, सिनेमा, हीरो-हीरोइनों से, विदेशी संस्कृतिपरक मारधाड –खून खराबा वाले वीडियो गेम्स से सीखता है जो प्राय: मूलतः अप-संस्कृति के वाहक होते हैं | वे तमाम जानने –न जानने योग्य विषयों, तथ्यों की जानकारी तो देते हैं परन्तु उनकी तार्किक उपयुक्तता व अच्छाई-बुराई के तथ्यों की प्रामाणिकता नहीं; जो बच्चों के मानस में अनिश्चितता व भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है एवं आगे के जीवन में द्वंद्वों का कारण बनती है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘पर पापा आप यह भी तो सोचिये कि आज धीरे धीरे आराम से काम करने का समय नहीं है अपितु वैज्ञानिक उन्नंति  के युग में तेजी से प्रगति के पथ पर चलने के लिए कुछ समझौते तो करने ही  पड़ते हैं | दुनिया से इंटरेक्शन करने व कार्य-कुशलता विकसित करने के लिए हमें भी तो अपना समय चाहिए, अपनी स्वयं की दुनिया चाहिए |’&#8230;सुरभि ने कहा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
सही है, समझौते तो करने ही पड़ते हैं; रमेश जी बोले, “पर किसका पलडा भारी है यह देखना भी आवश्यक है | अपनी उन्नति, भौतिक प्रगति का या अपने मनोरंजन या फिर संतति को उचित दिशा निर्देशन द्वारा समाज, संस्कृति, देश ,राष्ट्र व मानवता के सर्वांगीण उत्थान का |”</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>दिलबाग विर्क की कहानी : कीमत</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Sep 2011 09:45:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8221; अभी तो मेरे हाथों की मेहँदी भी नहीं उतरी और आप &#8230;.&#8221; -शारदा ने... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/09/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%a4/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/women_hand111_f.jpg"><img class="size-medium wp-image-6410 alignleft" title="women_hand111_f" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/women_hand111_f-300x194.jpg" alt="" width="300" height="194" /></a>&#8221; अभी तो मेरे हाथों की मेहँदी भी नहीं उतरी और आप &#8230;.&#8221; -शारदा ने अपने आंसू पोंछते हुए डबडबाई आवाज़ में अपने पति राधेश्याम से पूछा ,लेकिन राधेश्याम ने उसे बात पूरी नहीं करने दी और बीच में ही उसे टोकते हुए बोला &#8211; &#8221; तुम सारी की सारी औरतें ही एक जैसी होती हो , मैं तुम्हारी मेहँदी को देखता रहूँ या कुछ कमाई करूं ? &#8221;<br />
&#8221; कमाई तो यहाँ भी हो सकती है .&#8221;<br />
&#8221; यहाँ क्या खाक कमाई होती है , खेत में फसल तो होती नहीं , कर्ज़ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है , अगर कुछ दिन और खेती से कमाई की उम्मीद में बैठे रहे तो ये रही &#8211; सही जमीन भी बिक जाएगी . &#8221;<br />
&#8221; खेती के सिवा और भी काम धंधे हैं .&#8221;<br />
&#8221; हम किसान होकर मजदूरी कैसे कर सकते हैं ?&#8221;<br />
&#8221; विदेश जाकर भी मजदूरी ही करनी पड़ेगी .&#8221;<br />
&#8221;वहाँ कोई अपना तो नहीं होगा देखने वाला और यहाँ रहकर अगर मजदूरी करेंगे तो लोगों के ताने सहने पड़ेंगे .&#8221;<br />
&#8221;लोगों का क्या है , लोग तो कुछ &#8211; न &#8211; कुछ कहते ही रहते हैं .&#8221;<br />
&#8221;लोगों के कहने पर ही सब कुछ निर्भर करता है . समाज में रहकर लोगों की बातों से कैसे बचेंगे . अब तुम्हीं सोचो यदि मैं पहले मजदूरी करता होता तो क्या तुम्हारी शादी मेरे साथ होती . बताओ मुझे ?&#8221; थोड़ी देर रूककर वह खुद ही जवाब देते हुए कहता है &#8211; &#8221; कभी नहीं ,क्योंकि तुम्हारे माँ-बाप और सगे-सम्बन्धियों ने कहना था कि लड़का तो मजदूर है और हम ठहरे इज्जतदार लोग . मेरा मजदूर होना इज्जितहीन हो जाना था क्योंकि समाज की प्रथा ही ऐसी है . यहाँ पैसे को पूजा जाता है , पैसा कमाने वाले को पूजा जाता है और पैसा कमाने के लिए विदेश जाना जरूरी है . यहाँ रहकर पैसा बचाना तो दूर , भरपेट रोटी मिल जाए वही गनीमत है .&#8221;<br />
&#8221; यदि पैसे कमाने के लिए आपने विदेश जाना ही था तो फिर शादी क्यों की . आपको चाहिए था कि पैसा कमाकर लाने के बाद ही शादी करते &#8221;- शारदा ने इस प्रकार बेबसी के साथ ये शब्द कहे जैसे राधेश्याम की बात को काटने के लिए उसके पास कोई तर्क न हो .&#8221;<br />
&#8221; यदि मेरे वश में होता तो मैं ऐसा ही करता लेकिन तब विदेश जाने का कोई जुगाड़ ही नहीं बना , अब बड़ी मुश्किल से विदेश जाने का प्रबंध हुआ है तो तुम घडियाली आंसू बहाने लग गई हो .&#8221;<br />
&#8221; आपको तो मेरे आंसू घडियाली आंसू ही लगते हैं ,लेकिन मुझसे पूछो मुझ पर क्या गुजर रही है . कैसे जीऊँगी आपके बिना ?&#8221;<br />
&#8221; पहले भी तो जीती थी .&#8221; &#8211; राधेश्याम ने बड़ी बेरुखी से कहा .<br />
&#8221; पहले की बात ओर थी , अब आप मेरे सब कुछ हैं और आपके बिना इस पराए घर में मेरा है ही कौन ?&#8221;<br />
&#8221; यह घर पराया नहीं ,तुम्हारा अपना है .&#8221;<br />
&#8221;हाँ , यह घर मेरा अपना है ,लेकिन आपके कारण और यदि आप इस घर से चले जाएंगे तो यह घर भी मेरे लिए पराया हो जाएगा .&#8221;<br />
&#8221; कुछ वर्षों के लिए जा रहा हूँ , सदा के लिए तो नहीं .&#8221;<br />
&#8221; कुछ वर्ष भी कैसे गुजरेंगे &#8221;<br />
&#8221; हमारे बच्चे खुश रह सकें , वे ऐशो-आराम का जीवन जी सकें ,इसके लिए हमें कुछ-न-कुछ त्याग तो करना ही होगा .&#8221;<br />
&#8221; मगर&#8230;.&#8221;<br />
&#8221; अगर-मगर को छोडो और हाँ ,माँ को अभी कुछ नहीं बताना .&#8221;-सख्ती के साथ निर्देश देकर राधेश्याम तो बाहर चला गया और शारदा को छोड़ गया अपनी किस्मत को कोसने के लिए . दुल्हन बनकर आई थी तो कितने अरमान थे उसके दिल में ,मगर अब सब कुछ तबाह -सा होता लगता है उसे . वह भी चाहती है कि अच्छा पहनने को हो , खाने को हो मगर खाने-पहनने की वस्तुएं पति से दूर रहने की कीमत पर तो प्राप्त नहीं कर सकती वह .पति का प्यार सबसे जरूरी है ,लेकिन कौन मानेगा उसकी बात . पति तो ठहरा परमेश्वर और परमेश्वर तो मनमर्जी करेगा ही , क्यों मानेगा वह किसी की बात .&#8221;<br />
शारदा के दिल में कसक थी तो आँखों में आंसू . बहुत चाहा की जहर के इस घूँट को पी जाए , दुखी होकर भी अपने दुःख को प्रकट न होने दे , घर के ख़ुशी भरे माहौल को मातमी न बनाए , पर आंसू थे कि बरबस ही आँखों में भर आते थे .<br />
शारदा तो शायद छुपा ही जाती अपने दुःख को मगर रोते-रोते गोरे चेहरे का सुर्ख लाल हो जाना उसके दिल की कहानी को , उस कहानी को , उस दर्द को , जो उसके पति ने छुपाने को कहा था ,को सरेआम कर रहा था और शारदा की सास भी इस चेहरे को देखते ही भांप गई थी कि कुछ-न-कुछ बात जरूर है . असली बात को जानने के लिए उसने शारदा से पूछा &#8211; &#8221; क्या बात है बहू , राधेश्याम ने कुछ कहा क्या ?&#8221;<br />
&#8221; कुछ नहीं माँ जी , बस यूं ही मायके की याद आ रही थी .&#8221;- अपने आसुंओं को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए शारदा ने उत्तर दिया .<br />
&#8221; मायके की याद आ रही थी या &#8230;&#8221;- माँ ने शक्की निगाहों से उसे देखते हुए कहा .<br />
&#8221; नहीं , सच कह रही हूँ .&#8221;<br />
&#8221; तू कुछ छुपा रही है बहू .&#8221;- राधेश्याम की माँ शारदा के पास बैठते हुए बोली और प्यार से उसका सिर सहलाते हुए बोली &#8211; मैं तेरी माँ हूँ बहू , जो भी बात है साफ-साफ बता मुझे .&#8221;<br />
&#8221; कुछ खास नहीं माँ जी &#8221;- यह कहते-कहते वह फूट-फूट कर रोने लगी .शारदा की सास ने उसे गले से लगा लिया और प्यार से उसकी पीठ सहलाते हुए बोली &#8211; &#8221; जो भी बात है , मुझे बता , तुझे मेरी कसम .&#8221;<br />
रोते-रोते शारदा ने सारी बात अपनी सास को बता दी . उसकी सास ने उसे सांत्वना देते हुए कहा &#8211; &#8221; मुझे इसी बात का डर था ,लेकिन तू रो मत बहू , कुछ नहीं होगा मेरे जीते जी , मैं कहीं नहीं जाने दूँगी उसे .&#8221;<br />
शारदा चुप तो कर गई लेकिन अपनी सास के आश्वासन को महज एक झूठी तसल्ली के सिवा कुछ नहीं समझ सकी . समझती भी कैसे , सब जानते हैं कि कितनी बात मानते हैं बेटे आजकल अपने माँ-बाप की ,लेकिन शाम के वक्त हालात कुछ ऐसे बन गए जिसकी कल्पना उसने स्वप्न में भी नहीं की थी .माँ-बेटे में जमकर तकरार हुई . बेटा वही एकमात्र रट लगाए हुए था कि इस देश में रहकर धन नहीं कमाया जा सकता जबकि माँ , सिर्फ माँ ही नहीं अपितु एक आहत पत्नी आज विरोध पर अड़ी हुई थी ,एक नव विवाहिता को आहत होने से बचाने के लिए . वह पूछ रही थी &#8211; &#8221; क्या इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें जन्म दिया था ? क्या इसी दिन के लिए मैंने मर-मर कर तेरा पालन पोषण किया था ? &#8221; वह कह रही थी &#8211; &#8221; जब वह अकेली औरत होते हुए उसका पालन पोषण कर सकती है तो क्यों वह पुरुष होते हुए अपनी सन्तान का पालन पोषण नहीं कर पाएगा ? ठीक है विदेश में कमाई अधिक है लेकिन किसकी खातिर करोगे तुम कमाई ? तुम्हारे पिता जी भी गए थे विदेश . क्या मिला उन्हें विदेश से ? क्या मिला हमें , उनके परिवार को उनकी कमाई से ? कागज के चंद नोट , बहुत कीमत मानते हो तुम इनकी मगर इन नोटों की खातिर तुम्हारे पिता जी अपनी बहन की शादी में नहीं आ सके , उनके माँ-बाप उन्हें याद करते मर गए , उनके दाह-संस्कार पर भी वे नहीं आ सके . क्या तुम्हे पता नहीं कि वे नहीं आए उनके मरने की खबर आई थी ? क्या अब तुम चाहते हो कि हम भी वैसी ही स्थिति से गुजरें ? क्या चंद नोटों के लिए हम भी तड़पें तुम्हें देखने के लिए ? और फिर उसके बारे में तो सोचो जिसे कुछ ही दिन पहले ब्याह कर लाए हो , मैंने तो तेरे सहारे काट ली जिन्दगी , यह किसके सहारे काटेगी ?<br />
माँ की बातें राधेश्याम को गलत लगी हों ऐसा नहीं और न ही वह इन बातों से अनजान था .बचपन में उसकी छोटी-बड़ी ख्बाहिशें तो पूरी हुई थी लेकिन पिता का प्यार उसे नहीं मिला था . पिता के होते हुए भी पिता के प्यार से वंचित रहा था वह और शायद इसीलिए कुछ वर्ष पहले तक वह भी विदेश जाने को बुरा समझता था , लेकिन अब परिस्थितियों के कारण उसका इरादा बदल चुका था . हालात उसे बता रहे थे कि इस देश में रहकर वह घुट-घुट कर मर सकता है , ख़ुशी-ख़ुशी जी नहीं सकता . अपनी माँ से उसे भी प्यार था . वह भी चाहता था कि वह अपनी नव विवाहिता के साथ रहे लेकिन क्या उसका प्यार ही उनका पेट भर सकेगा ? क्या वही कल को ये नहीं कहेंगी कि कुछ कमाओ ? तब कहाँ से कमाएगा वह ? नौकरी यहाँ मिलती नहीं , खेती में सिर खपाने के सिवा और कुछ नहीं , और व्यापर बिना धन-दौलत के शुरू नहीं होता . रही मजदूरी , कैसे करेगा वह मजदूरी ? चलो कर भी लेगा तो क्या मजदूरी से चल पाएगी गृहस्थी ? महंगाई के इस जमाने में मजदूरी से प्राप्त आय से दाल-रोटी का खर्चा बमुश्किल चल पाएगा , फिर अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएगा वह ? कैसे पूरे करेगा वह उन नन्हीं जानों के छोटे-छोटे अरमान ?<br />
दोनों के अपने-अपने तर्क थे , अपनी-अपनी सोच थी ,ऐसे में कोई समाधान निकलना कहाँ संभव था , इसीलिए माँ-बेटे की तकरार बेनतीजा ही रही . हाँ , इस तकरार के बाद कुछ दिन तक घर में ख़ामोशी रही . घर के तीनों सदस्य इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए थे . कोई भी इस विषय पर बातचीत शुरू नहीं करना चाहता था . राधेश्याम ने चुपके-चुपके अपने जाने की तैयारियां शुरू कर दी थी . पैसे के लिए जमीन गिरवी रखने की तैयारी थी . उसे लग रहा था शायद माँ उससे सहमत हो गई है ,लेकिन रविवार के दिन जब उसके सुसराल और ननिहाल पक्ष के कुछ आदमी आए तो उसे समझ आ गया कि यह ख़ामोशी तूफान से पहले की ख़ामोशी थी . असली तूफान तो आज आना था . उसके मामा जी नौकरी पेशा थे , वे भी आए थे . उसके ससुर और उनके साथ आए उनके भाई भी पढ़े-लिखे थे . सबके आने पर राधेश्याम की माँ ने उसके विदेश जाने वाली बात को उठाया . राधेश्याम की स्थिति से सभी परिचित थे . पांच एकड़ जमीन थी उसके पास . गुजारा हो सकता था लेकिन बिजली-पानी की कमी ने खेती को जी का जंजाल बना दिया था ,ऊपर से प्रकृति भी मानव की दुश्मन हुई जा रही है , ऐसे में खेती से खुशहाली आएगी ऐसी उम्मीद किसी को नहीं थी . राधेश्याम ने यही तर्क आए हुए सज्जनों के सामने रखा .<br />
नौकरी की उम्मीद भी उसे नहीं थी , ऐसा नहीं कि उसने प्रयास नहीं किया बल्कि वह कई बार इंटरव्यू तक पहुंचा , लेकिन इंटरव्यू में वही कामयाब होते हैं जिनके पास सिफारिश होती है या फिर वे इक्का-दुक्का लोग जो इतने कुशाग्र बुद्धि होते हैं कि उन्हें किसी तरह रोका नहीं जा सकता . दुर्भग्यवश उसके पास ये दोनों योग्यताएं नहीं थी . ऐसे में उसे विदेश जाना ही उचित लगा . उसने आए हुए सज्जनों से प्रश्न किया &#8211; &#8221; क्या आप लूट-चोरी को छोड़कर उसके लिए कोई ऐसा जरिया बता सकते हैं जिससे वह आठ-दस हजार रूपए महीना नियमित रूप से कमा सके . &#8221;<br />
जवाब इसका क्या होगा सब यही समझा रहे थे कि तुम ठीक कह रहे हो लेकिन देश देश होता है , अपने देश की रूखी-सूखी भी अच्छी होती है ,लेकिन वह फकीरों जैसी ये बातें सुनने को तैयार नहीं था . वह बोला &#8211; &#8221; दुःख तो हमारा मुकद्दर है . मेरा भी दिल करता है कि अपने गाँव में अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी जीवन व्यतीत करूं लेकिन यहाँ यह संभव नहीं है . कर्ज़ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है , चिंताएं रात को सोने नहीं देती . दुखी तो अब भी हैं , यदि थोडा वियोग सहने से सुख मिलते हों तो क्या यह अच्छा नहीं है ?&#8221;<br />
&#8221; तुम्हारे पिता जी भी &#8230; &#8221; माँ ने बोलना चाहा . राधेश्याम ने बात को बीच में काटते हुए कहा &#8211; &#8221; पिता जी भी विदेश गए थे . जब तक वे वहाँ थे हमारे दिन अच्छे बीते , भले ही हमें उनका प्यार नहीं मिला . अगर उनके साथ वहाँ हादसा न होता तो आज मुझे यूं बेघर होने की नौबत नहीं आती . अब अगर मैं कुछ वर्ष विदेश लगा आया तो आगे का जीवन सुधर जाएगा .&#8221;<br />
&#8221; लेकिन इन वर्षों में हम कैसे जीएंगे .&#8221; &#8211; शारदा और उसकी सास एक साथ बोलीं .<br />
&#8221; सुख के लिए दुःख तो उठाना ही पड़ता है . आने वाली पीढियां खुशहाल हों इसके लिए हमें ही कुछ करना होगा .&#8221;<br />
&#8221; तो इसका मतलब है तुम अपना इरादा नहीं बदलोगे .&#8221;- राधेश्याम के ससुर ने हताश होकर कहा .<br />
&#8221; मैं इरादा बदलने के लिए तैयार हूँ , आप सब लोग इस देश के हालात बदल दो . भ्रष्टाचार , भाई-भतीजाबाद , लाचारी , गरीबी को जड़ से हटा दो .&#8221;- रोष और हताशा मिले स्वर में राधेश्याम ने कहा .<br />
&#8221; ये हमारे बस की बात कहाँ है बेटा &#8221;<br />
&#8221; फिर आप मुझे भूखा मरने की सलाह क्यों देते हो . हमारे वश में जो है वही क्यों नहीं करने देते . विदेश जाना कोई आसान काम तो नहीं , कितने पापड़ बेले हैं मैंने इसके लिए मैं ही जानता हूँ . जमीन गिरवी अलग से रखनी होगी अब जब सारा काम बन चुका है तो क्यों मेरे मार्ग में रोड़े अटका रहे हो .&#8221;<br />
&#8221; मगर बेटा &#8230;&#8221;<br />
&#8221; माँ ,अब छोडो भी इसे . रोज़ी रोटी जरूरी है . अगर हमारी किस्मत अच्छी होती तो यहीं नौकरी मिल जाती . अब नहीं मिली तो कडवा घूँट तो पीना ही होगा .&#8221;<br />
ये शब्द सुनते ही शारदा उठकर भीतर चली गई . आसुंओं की अविरल धारा उसकी आँखों से बह रही थी . महान भारत के गरीब मध्यम वर्गीय परिवार की सदस्य होने कीमत , रोज़ी-रोटी कमाने की कीमत सबसे ज्यादा उसी को तो चुकानी पड़ रही थी .</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;"><strong><span style="color: #0000ff;">दिलबाग विर्क </span></strong></span></h2>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #000099; font-size: medium;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/dsvirk-1.jpg"><img class="size-medium wp-image-6409 alignleft" title="dsvirk (1)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/dsvirk-1-300x240.jpg" alt="" width="126" height="101" /></a></span></span><span style="font-weight: normal;"><br />
जन्म तिथि &#8211; 23 -10 -1976<br />
सम्प्रति &#8211; प्रवक्ता हिंदी<br />
लेखन विधाएं &#8211; अगज़ल , कविता , व्यंग्य , कहानी , लघुकथा आदि<br />
प्रकाशित पुस्तकें &#8211; चंद आंसू , चाँद अल्फाज़ ( अगजलें ) ; निर्णय के क्षण ( हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित कविता संग्रह )<br />
ब्लॉग &#8211; <a href="http://sahityasurbhi.blogspot.com/">साहित्य सुरभि </a></span></h3>
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		<title>विनीत उत्पल की कहानी: हाइली टेंपर</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Sep 2011 06:38:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[(यह कहानी मेरी-आपकी हर किसी की हो सकती है. चाहे आपकी जिंदगी की हो या... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/09/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">(यह कहानी मेरी-आपकी हर किसी की हो सकती है. चाहे आपकी जिंदगी की हो या फिर आपके आस-पड़ोस की. इस कहानी में कई शब्द असामाजिक या असंसदीय मिलेंगे, इसके लिए कहानीकार कतई जिम्मदार नहीं है क्योंकि उन शब्दों को इसी समाज ने बनाए है. इसलिए इस कहानी को पढने से पहले या बाद में कोई विचार नहीं बनानी चाहिए क्योंकि इससे आपका समय और दिमाग की सोच प्रभावित होगी, जो जाया होगा. इस कहानी को काल्पनिक तो नहीं कही जा सकती लेकिन किसी से या किसी की जिंदगी से तालमेल रखता है तो यह महज संयोग है- लेखक)</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/unhappy-job.jpg" alt="unhappy-job" width="260" height="200" />मामले ने तूल तो तभी पकड़ लिया था जब ग्वालियर के एक बाभन ने फेसबुक पर एक कविता पोस्ट कर दी, &#8216;एक बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा/ एक रक्त से सबहीं बने हैं, को बाभन को सूदा&#8217;। लेकिन बात सिर्फ पोस्ट करने की नहीं थी। बात थी जातिवाद को लेकर लड़ाई की। क्योंकि इसके बाद ही शुरू हुआ था आरोप-प्रत्यारोप का दौर। पटना, रांची, रायपुर, अहमदाबाद से लेकर मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियो तक में उबाल आया था। दिल्ली के मंडी हाउस के आसपास के लॉन में तो हर कोई इसी मुद्दे पर थियेटर करने का प्लान कर रहा था, वहीं भोपाल में भी यह आंधी पहुंच चुकी थी। अपने घर में जनेऊ की कसम खाने वाले लोग बाहर निकलते ही दलितों के मसीहा बन रहे थे और उधर दलितों को यह समझ नहीं आ रहा था कि इन उच्च वर्णों को आखिर क्या हो गया जो अपने गोत्र, मूल, मूल के गांव की लड़ाई को छोड़कर वे उनके हमदर्द बनते जा रहे हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हर कोई खुद के गिरेबान में झांकने के बदले दूसरों को दोष दे रहा था। यही वह दौर था, जब कारगिल युद्ध हुआ और बरखा दत्त नामक पत्रकार रातोंरात युद्ध की रिपोर्टिंग कर अधिकतर लड़कियों के लिए हीरो बन जाती है और उसकी तरह पत्रकार बनने के लिए देश के कोने-कोने की लड़कियां हर शहर, हर मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह खुले मीडिया संस्थानों से डिग्री लेने के लिए मचल उठती है। यह वही दौर था, जब नोएडा में आई बारात को निशा नामक दुलहन ने दहेज के कारण लौटा दिया था। इसी दौर में झारखंड के कोडरमा की रहने वाली पत्रकार निरूपमा की मौत हत्या और आत्महत्या के बीच अनसुलझी रह जाती है। फिर मंडल आयोग लागू करने वाले प्रधानमंत्री कैंसर से जूझते हुए दम तोड़ देते हैं और लोग कहते कि उन्हें बाभन-राजपूत-कायस्थ-बनिया का शाप लगा है लेकिन उनके मरने तक पूरा समाज काफी जागरूक हो चुका होता है। मंडल-कमंडल ने कईयों की जान तो ले ली लेकिन लोगों को सपने देखने और उनके यथार्थ में परिणत होने से नहीं रोक सकी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बहरहाल, कई सवर्ण ऐसे भी सामने आए जो सार्वजनिक तौर पर दलितों के हिमायती, स्त्री के पैरोकार बनते थे लेकिन वास्तविक धरातल ऐसे मामलों से कहीं कोई सरोकार नहीं था। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि हम जिन संस्कारों की बात करते हैं और कहते हैं कि वह घर से ही उत्पन्न होता है, और वह घर में ही न हो। यही हाल तो उस लड़की का था जिनके बहनोई तमाम तामझाम के साथ दलितों के पैरोकार बनते फिरते थे और अपने देह पर कम्युनिस्ट का लबादा ओढ़कर अपनी जमींदारी की जमीन बचाने में जी-जान से लगे थे। लड़की के माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी और बड़ी दोनों बहनों की शादी हो जाने के बाद उनके हालात उससे देखा नहीं जाता था। दोनों का ससुराल काफी समृद्ध था लेकिन शराब पीने-पिलाने और पुरुष प्रधान परिवार में उसकी दोनों बहनों की हैसियत किसी &#8216;दाई&#8217; से अधिक न थी। फिर इस घर में भी तो कोई गार्जियन के तौर पर नहीं था, बहनोई की मर्जी से पूरा घर चलता था। ऐसे में जाहिर सी बात थी कि उस लड़की को अपने मन की इच्छा दबाना पड़ता था। बहनोई अपनी पत्नी की जगह इस साली को ज्यादा तवज्जो देते क्योंकि सभी बहनों के मुकाबले यह कुछ ज्यादा ही सुंदर और स्मार्ट थी। उसके सामने उसकी बहनों को मारते-पीटते। वह भीतर-ही-भीतर घुटती रहती लेकिन मन में पुरुषों से बदला लेने का बवंडर मचता रहता। उसे अपनी जिंदगी अंधे सुरंग जैसी दीखती थी। ऐसे में एक दिन उसने कुछ ठान लिया और फिर बस उसका एक ही सपना बन गया, &#8216;बरखा दत्त-टू&#8217; बनना, &#8216;मीडिया&#8217; के पावर के जरिए सभी को सही रास्ते पर लाना। इधर, बहनोई बिना उससे पूछे लंदन में रह रहे स्वजातीय लड़के से उसकी शादी तय कर दी। लड़की ने उससे यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि वह तो अभी &#8216;बच्ची&#8217; है और घर के लोग जबर्दस्ती उसकी शादी तय कर दिए हैं। शादी टूटने से घर में कोहराम मच गया। उसका जीना दूभर हो गया और फिर एक शाम किसी तरह लुक-छिप कर &#8216;संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस&#8217; में साधारण टिकट के जरिए करियर को नई मंजिल तक पहुंचाने के लिए दिल्ली आई गई। किसी को कुछ बताया तक नहीं। उसके कुछ सपने थे, अरमान थे और उसे जिंदगी की नई मंजिल की तलाश थी। पूरी कहानी हमें पता भी न चलता यदि उस दिन उसके पागल होने की खबर राष्ट्रीय अखबार में न पढ़ता। फिर दिल्ली राजधानी से करीब 1500 किलोमीटर दूर जब मैं बिहार में अपने खेतों में काम कर रहा हूं तो दिल्ली की बातें कहां यहां तक आ पाती हैं। मैंने भी कभी बड़े-बड़े सपने देखे थे और दिल्ली गया भी था लेकिन वहां की रौनक, मंडी हाउस, मेट्रो ट्रेन, कनाट सर्कस, हैबिटेट सेंटर आदि लुभा नहीं पाया और फिर कदम-कदम पर धोखा मिलना कहीं हमें लुभा पाता भला।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
वह नवम्बर का महीना था, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में तीन दिनों का मीडिया वर्कशॉप हुआ था और मैं भी उसमें भाग ले रहा था। वह वही तो लड़की थी, जो दरवाजे के कोने में खड़ी थी, पीले रंग की टीशर्ट पहने, पूरी तरह गुड़िया जैसी लग रही थी और कमलनाथ सिंह ने मिलवाया था। फिर तो कब एक-दूसरे के दोस्त बन गए पता ही नहीं चला। बातें-मुलाकातें आई गई हो गईं। एक दिन पता चला कि वह &#8220;राष्ट्रीय उदय&#8217; में इंट्रनशिप कर रही है लेकिन तब तक मैं एक राष्ट्रीय दैनिक में काम करने के लिए अजमेर जा चुका था। अरे, मैं तो भूल ही गया उसका नाम बताना। छोड़िए वैसे भी नाम में क्या रखा है। नहीं, कहानी कहने के लिए तो उसका नाम बताना जरूरी है। लेकिन आप चाहें जो सोचें, जो कहें, मैं उसका असली नाम नहीं बताने वाला। बस इतना जान लीजिए कि उसके मोबाइल में मेरा मोबाइल नंबर &#8216;परेशान आत्मा&#8217; के नाम से सेव था और मेरे मोबाइल में उसका नंबर &#8216;हाइली टेंपर&#8217; के नाम से। दोनों ने अपने-अपने मोबाइल में ऐसा नाम क्यों रखा था, यह आप बखूबी समझ गए होंगे, क्योंकि &#8216;परेशान आत्मा&#8217; का कहना था ही वह तुरंत टेम्पर में आ जाती है, उधर &#8216;हाइली टेंपर&#8217; का आरोप था कि वह उसे काफी परेशान करता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
तो साहेबान, कद्रदान, पूरा मामला &#8216;परेशान आत्मा&#8217; और &#8216;हाइली टेंपर&#8217; के बीच का है और पूरी दिल्ली की मीडिया उन दोनों को देख रही थी। एक दिन &#8216;परेशान आत्मा&#8217; को मालूम हुआ कि उसकी &#8216;गर्ल फ्रेंड&#8217; जो तब तक सिर्फ &#8216;फ्रेंड&#8217; थी, रांची से छपने वाले छोटे-से अखबार में काम करने लगी है। वह वहां &#8216;अंगूठी वाले बाबा&#8217; की पैरवी से आई है और उन्हें कहती तो सर है लेकिन &#8216;सर&#8217; से भी आगे बहुत कुछ है। पटना से आई वह लड़की दिल्ली के चकाचौंध में पूरी तरह डूब चुकी थी, शाम में इंडिया गेट पर &#8216;अपने सर&#8217; के साथ आइसक्रीम खाना खूब भाता था। या फिर अकसर पुराना किला, सेंट्रल पार्क या फिर आफिस के पीछे छोटे से ढाबे में दोनों बैठे मिलते। वहीं उसकी मुलाकात रामेंद्र राजेश से हुई। हालांकि वह काफी शांत, संस्कारवान था और हिन्दी साहित्य का अनुरागी भी। &#8216;हाइली टेंपर&#8217; की नजर जब उस पर पड़ी तो उसने मन ही मन तय कर लिया कि इसके कंधों पर सवार होकर दिल्ली की पत्रकारिता और साहित्यिक यात्रा पूरी करेगी। रामेंद्र राजेश इतने भद्र पुरुष थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कौन उनको यूज कर रहा है और कौन नहीं। रामेंद्रजी चुपचाप उसके लेखों के शब्दों को बखूबी ठीक करते और लोग &#8216;हाइली टेंपर&#8217; की वाहवाही। इसके एवज में वह उन्हें &#8216;प्यार&#8217; का झांसा देती रहती। तभी तो जब &#8216;जोशी&#8217; जी के निधन पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन के द्वारा सभा आयोजित हुई थी तो रामेंद्र उस लड़की के पास बैठने तब तक नहीं गए जब तक लड़की के बहनोई उसके पास बैठे थे। जैसे ही वह सभा के बीच से लघुशंका के लिए हॉल से बाहर निकले तब तक रामेंद्र &#8216;हाइले टेंपर&#8217; की दूसरी तरफ खाली कुर्सी पर आसन ग्रहण कर लिए और बहनोई के आने पर नमस्ते कर अपनी सफाई दे दी की अभी-अभी सभा में पहुंचा हूं, आफिस में बहुत कम था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बहरहाल, मैं कहां से कहां भटक कर आपसे क्या बात करने लगा। रांची के लोकल अखबार का दफ्तर कनाट प्लेस के एक बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल पर थी। सामने ही &#8216;दैनिक भारत&#8217; की बिल्डिंग अपनी चमक-दमक के साथ लोगों को आकर्षित कर रहा था। लेकिन वहां बाभनों की भीड़ मौजूद थी। या तो जाति के नाम पर ही वहां लोगों को रखा जाता या फिर जो किसी अधिकारी के तलुवे चाटते। &#8216;परेशान आत्मा&#8217; को नौकरी मिलने में वहां कठिनाई सिर्फ इसलिए नहीं हुई क्योंकि अजमेर में जिस बड़े पत्रकार से उनकी जान-पहचान हुई थी, वह &#8216;दैनिक भारत&#8217; में बड़े पोस्ट पर आए थे। लेकिन पटना की उस लड़की यानि &#8216;हाइले टेंपर&#8217; को लगा कि यदि उसे वहां नौकरी नहीं मिलती है तो उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी हार होगी। वह अपने परिवार को भी दिखाना चाहती थी कि अपने बलबूते भी वह कुछ कर सकती है। क्योंकि उसने जिन्दगी में जितने दर्द झेले थे, वह घाव बार-बार टिहुक उठता था और एक दर्द यह भी था कि &#8216;राष्ट्रीय उदय&#8217; में इंट्रर्नशिन के लिए उनके बहनोई ने जमकर पैरवी लगाई थी तब जाकर इंट्रर्नशिप मिला था और इसके लिए वे बार-बार उसे उलाहना देते थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
आखिर वह दिन आ गया जब नवसिखुआ स्त्रीवादी लेखिका का चोंगा पहन वह लड़की बाइस मंजिले उस बिल्डिंग में जिसके साथ नौकरी ढूंढने आई थी, वह वही &#8216;बाबा&#8217; था जिसे वह &#8216;सर&#8217; कहती थी और बाबा की जीवन परिभाषा &#8216;बाभन आपन करैं बड़ाई, गागर छुअन न देहिं/वैस्या के पायन तर सोवैं, यह देखो हिंदुआई&#8217; दोहे में सिमटी हुई थी। यहां &#8216;परेशान आत्मा&#8217; उसके लिए बेस तैयार कर चुका था और यहां नौकरी मिलने में कोई परेशानी भी नहीं हुई। बिना टेस्ट, बिना रिज्यूमे जमा कराए, उसे नौकरी मिल गई। पहले तो कहा गया कि जूनियर कॉपी एडिटर बनाया जाएगा लेकिन जब पत्र आया तो उसमें &#8216;स्ट्रींगर&#8217; लिखा था। कहा गया था कि सात हजार सेलरी मिलेगी लेकिन पत्र में लिखा था पांच हजार। आपत्ति जताने पर बॉस ने कहा कि आपलोग फीचर में कुछ लिखें और इसके एवज में दो हजार रुपए दिला देगें। इस पर उस वक्त तो &#8216;परेशान आत्मा&#8217; के साथ &#8216;हाइली टेंपर&#8217; साथ थी लेकिन बाद में &#8216;हाइली टेंपर&#8217; ने &#8216;परेशान आत्मा&#8217; को धोखे में रखकर उस ज्वाइनिंग लेटर अपने पास रख लिया। मीडिया भले ही दूसरों की खामियों को सामने रखता है लेकिन इसकी खामियों को कौन उजागर करे। उस दौर में &#8216;मोहल्ला&#8217; या &#8216;भड़ास&#8217; का जन्म नहीं हुआ था जो मीडियाकर्मी के दर्द को लोगों को सामने रखने का काम कर सके। ऐसे में &#8216;दैनिक भारत&#8217; में कम से कम तेरह पदों पर बाभन अपना आसन जमाए बैठे थे, तो निचले स्तर पर कितने होंगे, इसका अंदाजा तो किसी को था भी नहीं। ऐसे में दलित, स्त्रीवादी का चोंगा &#8216;हाइली टेंपर&#8217; ने उतार फेंका और खुलेआम कह दिया कि मैं भी तो &#8216;ब्राह्मण&#8217; हूं। फिर जाहिर सी बात है कि दलित और स्त्रीवादी की छवि तो उतारना तो था ही, अपने भेदिये को भी खत्म करना जरूरी था। भेदिया था वही &#8216;परेशान आत्मा।&#8217; तभी तो उसने अपने मोबाइल में यही नाम रखा था। उसे डर था कि कभी वह उसकी पोल खोल न दे। ऐसे में उसने जहां उसे अपने मोह-पाश में बांधना शुरू किया वहीं खुलेआम यह कहने से भी नहीं हिचकती कि &#8216;परेशान आत्मा&#8217; उसके परेशान करता है। जब भी किसी काम से वह उसे फोन करता तो वह किसी और को अपना फोन पकड़ा देती, यह जताने की कोशिश करती कि वह उसे परेशान करता है। वहीं अकेले मिलने पर &#8216;परेशान आत्मा&#8217; से कहतीं, &#8216;तुम कितने खुशनसीब हो, जो गर्लफ्रेंड साथ में है, एक ही ऑफिस तुम्हारे साथ नौकरी करती है और एक ही साथ शाम में घर भी लौटते हो&#8217;। ऐसे ही एक दिन दोनों &#8216;बेसिक इंस्टिंक&#8217; फिल्म भी देखने गए थे। ऐसा हम नहीं कह सकते कि लड़के को दिल नहीं था, वह तो ऐसी चिकनी-चुपड़ी बातों में रह जाता लेकिन उसे लगता कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। लड़की के कई दोस्तों से उसकी दोस्ती थी। वे बताते थे कि कॉलेज के दिनों में कॉलेज पत्रिका निकालने के क्रम में उसका अफेयर प्रकाश झा के साथ था। एक बार तो प्रकाश झा ने खुद यह बात कही थी। फिर &#8216;बाबा&#8217; वाले &#8216;सर&#8217; और उसे कई बार रंगे हाथ पकड़ा भी था। उधर, आफिस या उससे बाहर उनके बारे में गॉसिप होती, लोग मिर्च-मसाला लगाकर बातें करते। अब तो &#8216;दैनिक भारत&#8217; में बॉस लेकर छोटे स्तर के  कर्मचारी भी दोनों को लेकर ही बातें करते। फिर &#8216;हाइली टेंपर&#8217; का नाम और चेहरा-मोहरा थोड़ा-बहुत &#8216;दैनिक भारत&#8217; के संपादक से मिलता था तो जाहिर-सी बात है कि उसका फायदा वह उठा ले जाती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
आखिरकार, &#8216;हाइली टेंपर&#8217; की मेहनत रंग लाई और &#8216;परेशान आत्मा&#8217; का ट्रांसफर इलाहाबाद कर दिया गया। जिसके कंधों पर सवार होकर वह इस बीस मंजिले दफ्तर में नौकरी पाई थी, उसका पत्ता साफ करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब तो बॉस भी खुलेतौर पर &#8216;हाइली टेंपर&#8217; का साथ देने लगे थे। समय बीतते गया और अब उसका ऑफिस के दाढ़ी वाले बाबा के चमचे से टांका भिड़ चुका था। लड़की को लगने लगा था कि अब यही उसका पार लगाएगा और किसी दिन वह देश की सबसे बड़ी पत्रकार होगी। &#8216;परेशान आत्मा&#8217; को परेशान करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। जितना बदनाम करना था, कर डाला। उसकी भेजी खबरों में तमाम खामियां निकालतीं और बॉस से उसकी शिकायत भी करती। दूसरी ओर वह &#8216;परेशान आत्मा&#8217; जो चुपचाप सब कुछ सहते जा रहा था। तभी बॉस बदल गए और अब &#8216;हाइली टेंपर&#8217; के पलटी मारने की बारी थी। नए बॉस के कान पहले से ही भरे जा चुके थे। एक दिन इलाहाबाद से &#8216;परेशान आत्मा&#8217; को दिल्ली आना था और उसने &#8216;हाइली टेंपर&#8217; की नई कारस्तानियों के बारे में जानकारी नहीं थी। उसने उसके मोबाइल पर मैजेस भेजा,</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
&#8216;केन यू मीट मी वन्स!&#8217;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बात तो पांच शब्दों की थी लेकिन उसके इलाहाबाद से दिल्ली पहुंचते-पहुंचते यह आग बन चुकी थी। कनॉट प्लेस की उस दफ्तर में वह सबसे मिला, नए बॉस से भी, लेकिन नहीं मिली तो वह थी &#8216;हाइली टेंपर&#8217; थी, उसने उसे देख कर मुंह घुमा लिया। जब वह बस पकड़कर वापस आ रहा था, तभी उसके मोबाइल पर घंटी बंजी। पॉकेट से मोबाइल निकालकर देखा तो नंबर दिल्ली आफिस का था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
&#8216;हैलो&#8217;<br />
&#8216;हैली&#8230;।&#8217; उधर नए बॉस थे।<br />
&#8216;ऐसा है कि आज के बाद तुम कभी उस लड़की को फोन नहीं करोगे।&#8217;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
जब तक वह कुछ माजरा समझ पाता तब तक बॉस ने कहा, &#8216;बिना मेरी अनुमति के तुम फिर कभी ऑफिस आए तो मैं तुम्हें पांच दिन के अंदर निकाल दूंगा।&#8217;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
तब तक &#8216;परेशान आत्मा&#8217; परेशान हो चुका था और उसने सीधे कहा, &#8216;सर, ऐसी कोई बात अब नहीं होगी और मैं कहां जाऊं या ना जाऊं, इसके मालिक आप नहीं है। और रही नौकरी की बात और आप धमकी दे रहे हैं कि पांच दिन में निकाल दूंगा तो मैं आज से पांच दिन के भीतर नौकरी छोड़ रहा हूं।&#8217; वह एक ही सांस में पूरी बात कह फोन काट दिया। चेहरा लाल-लाल हो गया था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
फिर वही हुआ जो &#8216;परेशान आत्मा&#8217; ने कहा था। पांच दिनों के भीतर वह दूसरे अखबार में सीधा स्ट्रिंगर से सीनियर सब एडिटर की नौकरी करने लगा। तनख्वाह तीन गुना से भी अधिक। कई जिम्मेदारियां भी उसके सिर पर आ गईं। शादी हो गए। बीबी-बच्चों में वह रम गया, बच्चे भी सेट्ल हो गए और वह आज राजधानी दिल्ली से करीब 1500 किलोमीटर दूर अपने खेतों में काम करता है और जमकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखता भी है। हालांकि &#8216;हाइली टेंपर&#8217; के बारे में उसने फिर कभी कोई सुध नहीं ली। उसके पागल होने की जानकारी तो अखबार में खबर पढ़कर हुई लेकिन इसके बाद की कहानी उसे मालूम भी न हुई होती यदि उसके एक दोस्त का मेल उस दिन नहीं आया होता। इस ई-मेल का मजमून कुछ यों हैं,</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8216;डियर फ्रेंड,<br />
हम कई सालों से दोस्त रहे हैं। यह और बात है कि मैं दिल्ली के चकाचौंध में फंसकर यही रह गया और बच्चे बिगड़ गए लेकिन तुमने हमेशा सही वक्त पर सही कदम उठाया है। वैसे तो मैं मेल करने वाला था लेकिन अपनी पुरानी प्रेयसी के बारे में शायद ही तुम्हें मालूम हो। हालांकि तुम्हारे इस संस्था को छोड़े करीब तीस साल बीत चुके हैं लेकिन तुम्हारी प्रेयसी की कहानी जानकर न सिर्फ तुम हैरान होगे बल्कि यही कहोगे कि भगवान दुश्मन के साथ भी ऐसा न करे। तुम तो &#8216;दैनिक भारत&#8217; के उस दाढ़ी वाले बाबा को तो जानते ही थे जिन्होंने तुम्हें अजमेर से दिल्ली आने से मना किया था। वह उनके चमचों में फंस गई। उन लोगों के साथ घूमना, शॉपिंग करना उसे भाने लगा। नशे की भी शिकार हो गई। लोगों का तो यहां तक कहना था कि मीडिया की गंदगी ने उसे लील लिया। कहां वह &#8216;बरखा दत्त&#8217; बनने का ख्वाह देखकर दिल्ली आई थी और अब महज &#8216;कॉल गर्ल&#8217; के रूप में तब्दील हो गई थी। दाढ़ी वाले बाबा चूंकि उसके दफ्तर में बड़े पद पर थे, तुम्हारी प्रेयसी को करियर में मुकाम हासिल करने और दूसरों को नीचा दिखाने का शौक शुरू से था, तो वह उनके बातों में आ गई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इतना ही नहीं, कुछ सालों के बाद तो वह ऑफिस भी सिर्फ कहने के लिए आती थी और दारू का नशा उसकी आंखों में बोलता था, कदमों में लड़खड़ाता था। ऐसे में उसे जो भी कोई कुछ भला सलाह देता, उसे खराब लगता। तुम्हें तो मालूम ही होगा कि उसे बाजार के ठेलों पर बिकने वाली 30-40 रुपए की ब्लू फिल्म की सीडी देखने में कितना आनंद आता था। आफिस के लोग कहते थे कि ऐसा शायद ही कोई होगा जिसने उसके लिए सीडी न लाई हो। चाहे वह पालिका बाजार में मिलता हो, या सराय काले खां से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तरफ जाने वाली सड़क के किनारे की दुकानों में या लक्ष्मीनगर में कैसेट के दुकानों में। लोग कहते, यह जिन बड़े-बड़े नामों के पीछे भाग रही है, उसके काले चेहरों को वह नहीं जानती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
डियर, तुम तो जानते ही हो कि आज भी भारतीय महिलाएं या लड़कियां कितनी भी एडवांस हो जाएं लेकिन शीलभंग होने के बाद उस पर क्या बीतती है। फिर वही हुआ तुम्हारी प्रेयसी के साथ। तुम तो कुछ कर नहीं पाए लेकिन हमदर्दी जताने के साथ उसके जिंदगी में आगे बढ़ाने का झांसा देते-देते उसके साथ किसने क्या किया, यह शायद भगवान भी नहीं जानता। अति सर्वत्र वर्जियेत। यही हुआ उसके साथ। &#8216;टर्निंग-30&#8242; देखी होगी तुमने ना। वही हालत हो गई थी, तुम्हारे दोस्त की। घर के लोग शादी के लिए कहते और मीडिया ऑफिस के लोगों से वह लगातार धोखा खा रही थी। ऐसे में वह बड़ी शिद्दत से तुम्हें याद करती लेकिन तब तक तुम काफी दूर जा चुके थे। वह आखिर क्या करती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
दाढ़ी वाले बाबा के एक चमचे &#8216;अमित अमन&#8217; से उसने शादी कर ली। लोग कहते कि वह उसकी तीसरे पत्नी है। पहली भू़कंप में मरी, दूसरी को तलाक दे दिया अब यह तीसरी है, भगवान जाने इसका क्या होगा। यह और बात है कि तब तब वह दलित और स्त्रीवादी लेखिका के तौर पर लेख लिखने लगी थी जिसमें दलित और स्त्री से ज्यादा उसका दर्द सामने आता, उसने जिस लड़के से शादी की वह बाभन ही था। हालांकि यह और बात है कि ऐसे में किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि दलितों और स्त्री की हमदर्द के रूप में खुद को शो करने वाली इस लड़की ने किसी दलित से शादी क्यों की, सभी ने चुप्पी साध ली थी। हालांकि माना जाता है कि &#8216;हाइली टेंपर&#8217; शादी के बाद भी रामेंद्र से जुड़ी हुई थी और ऑफिस में होने वाली तमाम बातों के साथ गॉसिप्स का पता उसे नहीं था। फिर एक दिन तो उसके पति अमित अमन ने उसे रामेंद्र के साथ रंगेहाथों पकड़ भी लिया था, इसके बाद से दोनों के संबंधों में खटास आना शुरू हो गया। वैसे भी अमित महिलाओं के मामले में कैसा था, यह किसी से कुछ छुपा नहीं था। लोग कहते थे की दिल्ली के जीबी रोड के कई महिलाएं उनकी &#8216;दीवानी&#8217; हैं और उसकी कमाई का काफी पैसा उनके सुख-सुविधा में खर्च होता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
मैं तुम्हें क्या बताऊं। अब तो जब वह ऑफिस आती तो उसके चेहरे पर पिटाई के निशान होते। दूसरी स्त्रियों के दर्द को लोगों के सामने रखने वाली एक स्त्रीवादी खुद पुरुष प्रताड़ना की शिकार हो रही थी। जब एक दिन सब्र की सीमाएं टूट गई तो उसने अमित अमन को छोड़ने का निश्चय किया। तुम तो अब दिल्ली में थे नहीं और तुम्हारा उससे दूर-दूर का कोई वास्ता न था। ऐसे में उसे रामेंद्र की याद आई। वह उसके पास गई भी, गिड़गिड़ाई भी, लेकिन रामेंद्र नहीं पिघला। उसने सीधे तौर पर कह दिया जिस तरह अपने करियर के लिए तुमने मुछे यूज किया, उसी तरह अपनी दैहिक भूख के लिए मैंने तुम्हारे शरीर का किया। हम-दोनों का हिसाब-किताब बराबर।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
अब तुम्हारे इस तथाकथित प्रेमिका के पास कोई चारा नहीं था। घर के लोगों ने उससे दूरी पहले से ही बना ली था। वह अपने भाई-बहनों-बहनोईयों के लिए मर चुकी थी। बहनोई और भाई के पास बिहार में काफी जमीनें थीं और जाति के बाभन होने के कारण जमीन बचाने के लिए कम्युनिष्ट बनने के अलावा कोई चारा नहीं था। बाहर की दुनिया में उनके परिवार के सभी लोग दलितों के मसीहा बनते फिरते थे लेकिन घर में अपनी जाति-बिरादरी में ही शादी करने से लेकर अपने खेत को बचाने की जद्दोजहद चलती रहती थी। मां-पिता को अब इस दुनिया में थे नहीं। फरीदाबाद में जो उसने अपना घर लिया था उसे कब का अमित अमन अपने नाम करा चुका था क्योंकि मकान हड़पने के लिए उसे पागल घोषित करना जरूरी था। लोगों का बेसिक इंस्टिंक्ट से कभी नाता नहीं टूटता है और यही कारण था कि &#8216;हाइली टेंपर&#8217; को घर से निकालने के बाद अमित का अधिकतर समय जीबी रोड में बीतता था। मीडिया में अमित और उसके &#8216;बाबा&#8217; का वर्चस्व तो था ही, पागल घोषित कर दिए जाने के कारण राष्ट्रीय महिला आयोग, दिल्ली महिला आयोग के अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कोई भी उसके सहायता करने नाहिया आया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बहरहाल, तुम्हें इतना बड़ा मेल लिखकर पुरानी यादों में ला खड़ा किया। लेकिन एक बात जरा सोचना भारतीय मीडिया की अंदरूनी हालत, जहां मैं हूं। किस तरह लड़कियों को प्रताड़ित किया जाता है। जाति पूछकर प्यार किया जाता है। जाति पूछकर प्रमोशन भी। लड़के और लड़कियां प्रभाष जोशी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, राजदीप सरदेसाई, दिलीप पडगांवकर, प्रणव राय आदि को देखकर दिल्ली तो आज जाते हैं लेकिन यहां की चकाचौंध उन्हें ऐसे दलदल में खड़ा कर देती हैं जहां न तो उनके पास अपनी जमीन रह जाती है और न ही यहां के जमीन पर खड़े रहने लायक ही बन पाते हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
आशा है, तुम ठीक -ठाक होगे।<br />
तुम्हारा&#8230;।&#8217;</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/vinit-utpal.jpg"><img class="size-medium wp-image-6260 alignleft" title="vinit utpal" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/vinit-utpal-300x295.jpg" alt="" width="108" height="106" /></a></span></h2>
<h2><span style="font-weight: normal;">विनीत उत्पल</span></h2>
<p><span style="font-weight: normal;"><a href="http://vinitutpal.blogspot.com/" target="_blank">http://vinitutpal.blogspot.com/</a></span></p>
<p><span style="font-weight: normal;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-weight: normal;">(समसामयिक विषयों पर अच्छी पकड़ रखने वाले विनीत उत्पल राष्ट्रीय सहारा में सिनिनियर सब एडिटर हैं और आजकल  नोएडा में निवास कर रहे हैं )</span></p>
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		<title>आलोक कुमार सातपुते की लघुकथाएं</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Sep 2011 07:16:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[short story]]></category>

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		<description><![CDATA[एक आधुनिक आदमी वह तपती दुपहरी में कोट-टाई लगाकर घूमने निकला। घूमते-घूमते वह अपने एक... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/09/%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2><span style="font-weight: normal;"><img src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/admi-300x184.jpg" alt="admi" /></span></h2>
<h2><span style="font-weight: normal;">एक आधुनिक आदमी</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह तपती दुपहरी में कोट-टाई लगाकर घूमने निकला। घूमते-घूमते वह अपने एक परिचित के घर पर पहुँचा। वहाँ नाश्ता परोसे जाने पर उसने थोड़ा सा ही खाया और बाक़ी का छोड़ दिया, जबकि उसे बड़ी ही तेज़ भूख लगी हुई थी। चाय भी उसने आधी ही पी । फिर उसने पास ही रखे स्टूल पर से अंग़रेज़ी अख़बार उठा लिया और मात्र पन्ने पलटकर उसे वहीं पर ज्यों का त्यों धर दिया । थोड़ी देर बाद कैसेट प्लेयर को देख उसने शास्त्रीय संगीत सुनने की फ़रमाईश की, और संगीत शुरू होने पर वह बाक़ायदा सर भी हिलाने लगा, साथ ही वह अपनी इन हरक़तों पर उपस्थित लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिये कनखियों से देखने लगा। उनके भावहीन चेहरों को देखकर वह बड़ा ही निराश हुआ, इस पर वह खीझ उठा और वहाँ से उठकर वापस अपने घर आ गया । </span><span style="font-weight: normal;">क्या आपको मालूम है कि वह आदमी कौन हेै ? शायद वह आदमी आपके पडोस में, या आपके घर में, या फिर शायद आप में ही रहता हो एक आधुनिक आदमी&#8230;।</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;">प्रतिघात</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसने उसे काट चुके मच्छर को अपनी मुठ्ठी में ज़िन्दा पकड़ लिया, और उसे उसके पंखों से पकड़कर वहीं घूमती हुई दो लाल चीटियों के हवाले कर दिया । उन दोनों चीटियों के बीच फड़फड़ाते हुए उस मच्छर को देखकर उसे आनंद की अनुभूति होने लगी । दोंनां चीटियाँ अब उस मच्छर को अपने झुंड की ओर ले जाने लगीं तभी उन्हें दो चीटियाँ और मिल गईं । अब वह मच्छर और अधिक तड़पकर फड़फड़ाने लगा। ऐसा देखकर उस व्यक्ति को और अधिक आनन्द आने लगा। थोड़ी ही देर बाद चीटियाँ उस मच्छर को खींचती हुई अपने झुण्ड के क़रीब ले र्गइं । उस मच्छर की तड़पन ज़ल्द ही शांत न हो जाये, सोचकर उसने उसे चीटियांे से छुड़ा लिया। मच्छर मृतप्रायः स्थिति मंे पहुँच चुका था&#8230;उसे बड़ी ही निराशा हुई। और अंत में उसने उसे चीटियों के झुण्ड के हवाले कर दिया ।&#8230;अब उसके चेहरे पर विजयी भाव थे ।</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;"><br />
अन्तर्द्वंद्व</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह बस में बैठा मूंगफल्ली खा रहा था । थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी। अगले स्टॉप पर एक महिला अपने दुधमुँहे शिशु के साथ बस में चढ़ी, लेकिन बस में भीड़ हो जाने की वज़ह से वह खड़ी ही रही । वह सोचने लगा कि लोगों मंे मैनर्स नाम की चीज़ ज़रा भी नहीं रह गयी है । कोई भी उठकर उस बेचारी को जगह नहीं दे रहा है । क्या जमाना आ गया है छी। तभी उसे उसके अन्तस ने कचोटा, -तुममें यदि मैनर्स है, तो तुम ख्ुाद ही खडे़ होकर उसे जगह क्यों नहीं दे देते ? उसने अपने अन्तस को समझाने का प्रयास किया-मैं तो खड़ा हो जाता, पर क्या करुँ, खडे़ होने पर मेरे जोड़ दुखने लगते हैं। उसी समय उस महिला की याचनापूर्ण दृष्टि उस पर पड़ी । उसने नजरें चुरा ली । तभी उसके अन्तस ने कहा- अब नज़रेें क्यों चुरा रहे हो ? उसने फिर अपने अन्तस को समझाने का प्रयास किया-खड़े रहने पर जेब कटने की संभावनाएँ अधिक होती हैं, और चूँकि मेरी जेब में पैसे भी बहुत है, इसीलिये मैं चाहकर भी खड़ा होकर उसे जगह नहीं दे पा रहा हूँ। इस अन्तर्द्वंद्व के बीच उस महिला की मंज़िल आ गयी, और वह उतर गयी । अब उसने फिर अपने अन्तस को समझाने का प्रयास किया- मैं तो खड़ा होकर उसे जगह देने ही वाला था कि, वह उतर गई ।<br />
अब अन्तस की आवाज़ें आनी बंद हो गयी थी। शायद वह परास्त हो गया था ।</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;">आलोक कुमार सातपुते</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;">लेखक का संक्षिप्त परिचय :</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नाम &#8211;   आलोक कुमार सातपुते/जन्म &#8211;   26/11/1969/शिक्षा-   एम.काॅम./प्रकाशित रचनाएंॅ- देश के लगभग सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।/संग्रह का प्रकाशन- 1 शिल्पायन प्रकाशन समूह दिल्ली के नवचेतन प्रकाशन,से लघुकथा संग्रह अपने-अपने तालिबान का प्रकाशन।/2 सामयिक प्रकाशन समूह दिल्ली के कल्याणी शिक्षा परिषद से एक लघुकथा संग्रह वेताल फिर डाल पर प्रकाशित।/3 डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से कहानियों का संग्रह मोहरा प्रकाशित ।/4  डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से किस्से-कहानियों का संग्रह बच्चा लोग ताली बजायेगा प्रकाशित ।/5  आत्मकथा कुण्ठाकथा शीघ्र प्रकाश्य।/अनुवाद &#8211; अंग्रेजी उडि़या ,उर्दू एवम् मराठी भाषा में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन ।/सम्पर्क -एलआईजी-832, सेक्टर-5  हाउसिंग बोर्ड कालोनी, सडडू, रायपुर                                                            492007 छत्तीसगढ़/मोबाइल -09827406575/E-mail 1 <a href="satputealok@readiffmail.com">satputealok@readiffmail.com</a>/2 <a href="satputealokkumar@gmail.com">satputealokkumar@gmail.com</a>/Blog-  <a href="laghukathakranti.blogspot.com">laghukathakranti.blogspot.com</a></span></h3>
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