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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; बतकही</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>डर्टी पिक्‍चर ऊ ला ला ऊर्फ बावरी मस्जिद राम लला :अविनाश वाचस्‍पति</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Dec 2011 12:33:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविनाश वाचस्पति</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[हास्य-व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[व्यंग्य डर्टी की पॉवर बहुत ज्‍यादा है, गंदगी का ट्री बहुत घना है। मन पर... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/12/%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%9a%e0%a4%b0-%e0%a4%8a-%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%8a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">व्यंग्य</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/dirtypicture_1350111_f.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6917" title="dirtypicture_1350111_f" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/dirtypicture_1350111_f.jpg" alt="" width="250" height="250" /></a>डर्टी की पॉवर बहुत ज्‍यादा है, गंदगी का ट्री बहुत घना है। मन पर विचारों का कोहरा जमा है। बावरी मस्जिद का मसला पुराना नहीं पड़ा है। कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है। प्रत्‍येक मन पर इसकी ही छाया है। यह सब बुराईयों की ही माया है। डर्टी अलग नहीं है, जो आपकी काया है उसे ही गंदा बतलाया है। ऐसा नहीं है कि साफ पिक्‍चर पर मिट्टी मल कर उसे डर्टी बताया है। यही काया अच्‍छाईयों के प्रचार-प्रसार की संवाहक बनती है। चंद चुनिंदा के मन में ही वास करती है। डर्टी मतलब गंदगी – गरीबी गंदी नहीं है। बुराईयां खूब तेज चैनल हैं। अच्‍छाईयों को कोई नहीं पूछता है। डर्टी को अपने प्रचार की जरूरत भी नहीं है। वह तो सबके सिर पर तेजी से दौड़ती है, साफ मन में नफरत का जहर घोलती है। ऊह ला ला, राम लला, ऊ ला ला।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">फिल्‍म में एक सैकंड में 24 फ्रेम्‍स होते हैं परंतु डर्टी के फ्रेम्‍स का तो आप अंदाजा ही नहीं लगा सकते। सब सबसे अधिक उसी के दीवाने हैं। कहते हैं कि जानेंगे नहीं, तो बचने के उपाय कैसे करेंगे। इसी बहाने सब इसी के चारों ओर मंडराते हैं। गंदगी का साम्राज्‍य कभी ध्‍वस्‍त नहीं हो सकता क्‍योंकि राग-द्वेष से किसी का भला नहीं हो सकता। सब उसी ओर बढ़ रहे हैं, खाई गहरी में गिर रहे हैं। सबसे अधिक डिमांड में डर्टी है, इसी से उम्‍मीदें बंधी हैं। नेताओं की डिमांड में पावर्टी है। वहीं से वोट मिलते हैं। मिलते कम हैं, खरीदे ज्‍यादा जाते हैं। इसी वजह से नफरत का ज्‍वालामुखी फटता है। कभी बावरी मस्जिद गिराई जाती है। वहां का ऊह ला ला बन जाता है राम लला। और कुछ नहीं है, इन सबमें भावना डर्टी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">डर्टी पिक्‍चर सभी को लुभाती है। ऊह ला ला उ ला ला। चाहे कितना हो पाला, इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया, चाहे कितना ही पॉवरफुल हो साला। ऊह ला ला उ ला ला। सबसे आंख बचाकर सब इसी के पास जाते हैं, वहां पर सब बेशर्म हो जाते हैं। बिग बॉस का धंधा मंदा है तो क्‍या हुआ, सन्‍नी लियोन है न, ऊह ला ला। उसने भी इसकी ब्रांडिंग शुरू कर दी है। फिल्‍मों में गालियों का प्रचार, रेडियो स्‍टेशनों पर एफ एम चैनलों पर बीप बीप, सब डर्टी पिक्‍चर ही चित्रण है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जिसका पेट खाली है, वहां पर डर्टी की दिवाली है। उसका दिमाग देता सिर्फ गाली है। दुआ तब निकलती है जब सामने वाला भर देता है पेट। भरपेट खाने के बाद लेट, खूब नींद आती है, वही नींद डर्टी पिक्‍चर तक ले जाती है। डर्टी पिक्‍चर ऊह ला ला ऊ ला ला। खूब डर्टी ला, खूब डर्टी खा। फिर सारे समाज को डर्टी पिक्‍चर बनाकर दिखा। चमड़ी दिखाना और दमड़ी के ढेर लगाना। बस बिना कपड़ों के अपनी दिगंबरावस्‍था में ऊह ला ला ऊ ला ला का जाप करना है। आप तो बिना कपड़ों के मस्‍त रहिए। डर्टी पिक्‍चर का खिताब न मिले तो कहना। डर्टी पिक्‍चर के लिए नहीं चाहिए एक भी गहना। पड़ जाए वास्‍तविक सच्‍चाई से पाला। बीच में न हो कोई ताला। कोई ताली भी न हो। खुली हुई नाली भी न हो कि उलझ कर गिर पड़ने का खतरा हो। नाली में चाहे गंदगी का एक भी कतरा न हो। जान लो डर्टी पिक्‍चर पोर्न पिक्‍चर की है खाला। क्‍या खा और क्‍या ला। पर ऊह बोलते ही डर्टी गीत-संगीत बजने-गूंजने लगता है मानस में। दिमाग की प्रत्‍येक नस नस में।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">फिर सब कुछ ला। गंदा ला कसैला ला। विषैला ला। ऊह ला ओह लाल। सब कुछ मेरे पास लाकर डाल। मीठी मस्‍त आवाजें ला। आवाजों की किश्तियां ला। मैं उसे बिग बॉस में परोसूं – बाजार को नए शिखर तक ले जाऊं – भरा पूरा बाजार है डर्टी पिक्‍चर का, उसकी मस्‍त मस्‍त आवाजों का। इसी को इसकी सदाशयता में सजाऊं। डर्टी पिक्‍चर का सुंदर सा बाजार सजाऊं, जिसमें सेल लगाऊं, देखने सुनने के लिए लाईनों की रेल चलाऊं। ऊह ला ला उ ला ला।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बुलाओ जल्‍दी से कहां गए लाला। लाला मतलब असली दुकानदार का सच्‍चा व्‍यापार। व्‍यापार में प्रवीण। चाहे किसी को पिन चुभे पर अपना धेला न अधमरा हो। डूब रहे हों पानी में, जा रहे हों प्राण पर छोड़ें न बिजनेस का ईमान। कोई हाथ मांगे तब भी न दें। कहे कोई मेरा हाथ ले तो तुरंत पकड़ लें। मिल ही रहा है न, है पक्‍का और सच्‍चा लाला। इसलिए डर्टी पिक्‍चर भी असली माल (धन) पाने के लिए है ऊह ला ला ऊ ला ला। तिजोरियां बैंक खाते हमारे विदेशी खातों को लबालब भर जाए। बिना दिए कोई कैसे जाने पाए। आए तो बिना दिए जाने न पाए। लौट के आ तुरंत देकर जा। ऊह ला ला ऊ ला ला।</span></h3>
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		<title>एक गर्दन की दास्ताँ&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Nov 2011 09:36:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Abhishek Prasad</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/6a00d8341c074953ef0120a8acde29970b-800wi.gif"><img class="alignleft size-full wp-image-6759" title="6a00d8341c074953ef0120a8acde29970b-800wi" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/6a00d8341c074953ef0120a8acde29970b-800wi.gif" alt="" width="296" height="276" /></a>आज हाजिर हूँ आप सबके सामने&#8230; रविवार का दिन है.. फुर्सत ही फुर्सत है&#8230; कुछ ही देर पहले सोकर उठा हूँ&#8230; रात १ बजे सोया था और ठीक आधे घंटे बाद एक बुरी खबर ने नींद उड़ दी&#8230; मेरे साथ ही काम करने वाले एक लड़के, विजय सिंह, का कल शाम ऑफिस से लौटते वक़्त एक्सिडेंट हो गया&#8230; हालात नाजुक तो नहीं है पर फिर भी चोटें ज्यादा है&#8230; दुआ करता हूँ कि जल्द पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर वो हम सबके बीच होगा&#8230;. चलिए अब सबको एक दास्ताँ सुनाता हूँ&#8230; हाँ वही जिसकी घोषणा मैंने अपने पिछले पोस्ट में की थी&#8230;. एक गर्दन की दास्ताँ&#8230; पढकर आप लोग सेंटी मत होइएगा और न अपना और न मेरा गर्दन दबाईएगा&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
उसी दिन की बात है, जिस दिन अपने टूटे हाथ पर ख़ुशी और दुसरे बचे हाथ के लिए दुःख मना रहा था&#8230; अचानक मेरी गर्दन तुनक गयी कि उसे मैंने क्यों अनदेखा किया&#8230; समझ में ही नहीं आया कि दो हाथों की कहानी के बीच ये मुई गर्दन की दास्ताँ कहाँ से आ गयी&#8230; बड़े प्यार से अपनी गर्दन को सहलाते हुए पूछा पर कमबख्त गर्ल-फ्रैंड से ज्यादा नखरे दिखा रही थी&#8230; इतनी खुशामद तो मैंने कभी किसी की नहीं की&#8230; आ गया गुस्सा मुझे, पकड़ ली गर्दन अपनी और जोर से दबाते हुए पूछा तब जाकर साली ने मिमियाते हुए जवाब दिया&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
<em><strong>गर्दन&#8230;</strong> &#8220;अभिषेक तुम्हे अपने बांये हाथ के आराम की ख़ुशी है, दाहिने हाथ के दुगने बोझ हो जाने का दुःख भी है&#8230; पर मेरा कौन सोंचेगा?&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;तुम्हारा??? तुम्हे क्या हुआ? तुम्हे कौन सी चोट लगी है?&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230;</strong> &#8220;मेरे अन्दर चोट लगी है&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;पर मुझे तो इसका अहसास नहीं हुआ&#8230; ये साला दिमाग भी आज कल बंद पड़ गया है क्या&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230;</strong> &#8220;अरे नहीं दिमाग भैया तो सही काम कर रहे है&#8230; दिल दीदी का ध्यान कहीं और है&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;हाँ ये तो है&#8230; तुम्हारी दिल दीदी तो बस एक ही ख्वाब में डूबी रहती है, न किसी बात का पता है और न ही होश&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230;</strong> &#8220;वो भी क्या करेगी बेचारी, उसकी गलती थोड़े ही है&#8230; ये तो आँखों का कसूर है जिन्होंने उसे इस काम में लगा दिया&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230;</strong> &#8220;अभिषेक जी आपने सोंचा है कि आपके हाथ टूटने से सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे होने वाली है&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;वो कैसे?&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;ये आपका बिगड़ा-लाडला बांया हाथ लटका हुआ तो मुझसे ही रहेगा&#8230; एक तो पहले ही मेरे ऊपर भैंस से भी बड़े और भारी दिमाग भैया का बोझ है&#8230; और अब ये आधा किलो का हाथ और दो किलो का प्लास्टर का वजन&#8230; मेरी तो गर्दन&#8230; उफ़ मतलब मैं ही टूट जाउंगी&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;अरे हाँ यार&#8230; ये तो मैंने सोंचा ही नहीं था&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;एक तो गलती दिल दीदी की, ध्यान कहीं और था उनका&#8230; फिर पैर चाचा का जो संभल नहीं पाए&#8230; और उस पर से हाथ भाई, जो छोटी से बात पर टूट कर बैठ गए&#8230; फिर सबकी गलती की सजा मैं क्यों भुगतूं?&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;सब भाई बंधू है तुम्हारे&#8230; तुम नहीं देख-भाल करोगी तो और कौन करेगा&#8230;?&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;पर हर बार&#8230; जुबान बहन कुछ गलती करेगी और लोग मुझे पकड़ लेते है&#8230; आँखें गलती करें और लोग मुझे मरोड़ देते है&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;अब जुबान और आँखें किसी के हाथ नहीं आते न इसलिए&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;और हाथ और दिमाग भैया मिलकर कोई गलती करें तो तलवार मेरे ऊपर क्यों लटकती है?&#8221;<br />
</em><em>&#8220;&#8230;&#8230;.&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;कोई गुनाह हाथ करें और फांसी का फंदा मुझे मिलता है&#8230; &#8221;<br />
</em><em>&#8220;&#8230;..&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;क्या हुआ जवाब नहीं है न? पार्टी में अच्छा दिखना हो टाई बाँध देते हो मुझे&#8230; कितना सफोकेसन होता है कभी महसूस किया है&#8230; चेहरे को सुन्दर बनने के लिए न जाने कितने क्रीम लगा लेते हो&#8230; बदन के लिए भी न जाने कितने सुगन्धित साबुन और इत्र हैं आपके पास&#8230; पर मेरे बारे में कभी सोंचा&#8230; नहीं न?&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;अब छोडो इन बातों को&#8230;.&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;क्यों छोडूँ? आपके लाडले को सँभालने के लिए पट्टा मुझे लगा दिया&#8230; पट्टे की रगड़ से कितनी जलन होती है मुझे&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;तुम तो मुझे शमिन्दा करने लगी अब&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;क्यों न करूँ? मेरी तो औकात ही नहीं है आपकी नजर में&#8230; &#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;औकात कैसे नहीं है&#8230; जिसे भी चाहता हूँ, जो भी अजीज है उसे पहले तुमसे ही तो मिलाता हूँ&#8230; गले लगा लेता हूँ..&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;बस इतना ही न&#8230; और?&#8221;<br />
</em><em><strong>मैं&#8230; </strong>&#8220;एक मिनट रुको&#8230; आता हूँ&#8230; मेरा फ़ोन बज रहा है&#8230;&#8221;<br />
</em><em><strong>गर्दन&#8230; </strong>&#8220;जवाब नहीं है तो फ़ोन का बहाना करके भाग लिए&#8230; अब आप ही लोग मेरे दुःख और दर्द का रास्ता बताइये&#8230;&#8221;<br />
</em>अब आप लोग ही बातों यार&#8230; मैं क्या करूँ? ये तो नाराज बैठी है मुझे&#8230; कहीं किसी दिन लचक गयी तो लेने के देने पड़ जायेंगे&#8230; उससे पहले प्लीज रास्ता बता देना&#8230;</span></h3>
<div></div>
<div></div>
<div></div>
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		<title>&#8220;पता नहीं&#8221;</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Aug 2011 07:38:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Abhishek Prasad</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[Abhishek Prasad]]></category>
		<category><![CDATA[Khamoshi]]></category>

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		<description><![CDATA[ये मत समझिएगा कि मुझे कुछ पता नहीं&#8230; दोस्तों मुझे सब पता है, पर मैं... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/default.jpg"><img class="size-full wp-image-5863 alignleft" title="default" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/default.jpg" alt="" width="180" height="75" /></a>ये मत समझिएगा कि मुझे कुछ पता नहीं&#8230; दोस्तों मुझे सब पता है, पर मैं तो उनकी बात कर रहा हूँ जिन्हें कुछ भी पता नहीं. कभी आपने किसी समाचार पत्र या अन्य किसी और पत्रिका में &#8220;पोल&#8221; पर गौर फ़रमाया है&#8230; तीन आप्शन होते है किसी भी प्रश्न के लिए. पहले दो तो मेरी समझ में आता पर तीसरा आप्शन &#8220;पता नहीं&#8221;, ये मेरी समझ में नहीं आता (औरों को भी नहीं समझ में आता होगा इसलिए लोग उसी पर अपना मुहर लगा देते है). अब इसे समझने के लिए मैं एक उदाहरण रखता हूँ आपके सामने.</p>
<p>प्रश्न: <strong>क्या आपको भूख लगी है और आप भोजन करना चाहते है?</strong></p>
<p><strong>आप्शन:</strong></p>
<p><strong>A) हाँ ============= ५२%</strong></p>
<p><strong>B) नहीं ====== ३६%</strong></p>
<p><strong>C) पता नहीं === १२%</strong></p>
<p>५२ प्रतिशत लोगों ने कहा हाँ, ३६ प्रतिशत लोगों ने कहा नहीं, पर अब मुझे कोई समझाएगा कि इन १२ प्रतिशत लोगों को कैसे नहीं मालूम कि उन्हें भूख लगी है ये नहीं? ये तो मेरा काल्पनिक सा सवाल था और काल्पनिक जवाब भी. आप किसी भी पोल को उठा लीजिये &#8220;पता नहीं&#8221; वालों की एक अलग समूह नजर आएगी. भाई किसी भी सवाल का जवाब या तो हाँ होगा ये नहीं, पर ये &#8220;पता नहीं&#8221; कौन सा जवाब होता है? क्या बौधिक स्तर इतना भी नहीं बचा कि अपनी तार्किक क्षमता से हाँ या नहीं का चुनाव कर सकें?  अगर बौधिक क्षमता नहीं भी बची तो हर बार की तरह तुक्का तीर का ही इस्तेमाल कर लिए जाये.</p>
<p>खैर अपने देश की आदत है हम किसी भी विषय पर सोंचना ही नहीं चाहते. कहीं भी नजर घुमाऊं तो मुझे तो दो आप्शन ही नजर आते है. आकाश के साथ धरती (पातळ की चर्चा है पर विश्वशनीय नहीं), मनुष्य के साथ पशु-पंछी है, थल-स्थल के साथ जल-स्थल है, अच्छे के साथ बुरा है, सच के साथ झूठ है, ख़ामोशी के साथ शोर है, मेरे साथ आप है और आपके साथ में हूँ. भाई यहाँ तो मुझे कोई तीसरा आप्शन नजर नहीं आता फिर ये तीसरे लोग कहाँ से आ गए? इसका जवाब &#8220;पता नहीं&#8221;</p>
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		<title>तनख्वाह लेने वाल़े कर्मचारी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए क्या ?</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Aug 2011 05:08:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[हास्य-व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[व्यंग्य जब से मैने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने की सुगबुगाहट देखी-पढ़ी-सुनी है... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bc%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">व्यंग्य</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
<a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/Bratnal.jpg"><img class="size-full wp-image-5905 alignleft" title="Bratnal" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/Bratnal.jpg" alt="" width="220" height="280" /></a>जब से मैने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने की सुगबुगाहट देखी-पढ़ी-सुनी है तब से मुझ जैसे तुच्छ सरकारी जन-सेवक का मन, विचारों की नैय्या सरीखा अशांति के समन्दर में डगमगा रहा। क्या करूँ? क्या इस नैय्या को ओसामा (जी) बिन लादेन की तरह समन्दर में ही डुबो दूँ हमेशा के लिए या फिर कोई इसे सोमालियाई डाकूओं के हमले से बचाने जैसा काम कर किनारे सुरक्षित ले आएगा?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
सचिन (जी) को भारत रत्न की बात पर मैंने सबसे पहले तो यह ढ़ूँढ़ा कि इससे पहले यह सम्मान किन्हें दिया गया है। सूची कुछ इस प्रकार मिली: डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकट रामन, डॉक्टर भगवान दास, सर डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या, पं. जवाहर लाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, डॉ. धोंडो केशव कर्वे, डॉ. बिधान चंद्र राय, पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, डॉ. पांडुरंग वामन काणे, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, वराहगिरी वेंकट गिरी, के. कामराज, मदर टेरेसा, आचार्य विनोबा भावे, ख़ान अब्दुलगफ़्फ़ार ख़ान, मरुदुर गोपाला रामचन्द्रन (एम जी आर), डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर, नेल्स न मंडेला, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे. आर. डी. टाटा), सत्यजीत रे (राय), ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, गुलज़ारीलाल नन्दा, अरुणा असिफ़ अली, एम.एस. सुब्बालक्ष्मी, सी. सुब्रह्मणियम, जयप्रकाश नारायण, पं. रवि शंकर, अमर्त्य सेन, गोपीनाथ बोरदोलोई, लता मंगेशकर, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां, पं.भीमसेन जोशी</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
फिर मैंने तलाशा कि यह सचिन तेंदुलकर कौन हैं? पता चला कि यह उस एक भारी-भरकम क्लब के कर्मचारी हैं जो Board of Control for Cricket In India (BCCI) कहलाता है। विशुद्ध व्यवसायिक नज़रिये सरीखे इस प्रतिष्ठान के दो मशहूर प्रोजेक्ट हैं जिन्हें नाम दिया गया है टीम इंडिया और आईपीएल। इन दोनों के अपने अपने ग्रुप मेंबर हैं जिन्हें निश्चित वेतन के अलावा अच्छा प्रदर्शन करने पर आम कारखाने जैसे बोनस भी दिया जाता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बात कुछ जमी नहीं! क्योंकि तभी ख्याल आया इन्कम टैक्स वाले उस झंझट का जिसमें इनकम टैक्स अफसर द्वारा सवाल ज़वाब किए जाने पर सचिन (जी) ने कहा था कि he is a non-professional cricketer और playing cricket is not his profession इसलिए फॉर्म में लिखा गया कि Income from playing cricket is reflected as &#8216;income from other sources&#8217;! यह सब Sachin R. Tendulkar vs. Assistant Commissioner of Income-tax, Range 193/ IT APPEAL NOS. 428 TO 430 AND 6862 (MUM.) OF 2008 के आधिकारिक दस्तावेज़ में दर्ज़ है। तो इन भाई सा&#8217;ब को खेल के लिए कोई सम्मान कैसे दे सकती है सरकार? जब वह खुद कह रहे हों कि he is a popular model who acts in various commercials for endorsing products of various companies&#8230; A major part of the income derived by him during the year is from the exercise of his profession as an &#8216;actor&#8217; in these commercials&#8230; the income derived by him from &#8216;acting&#8217; has been reflected as income from &#8220;business &amp; profession&#8221;!! मतलब यह हुआ कि मुख्य कमाई तो विज्ञापनों की शूटिंग, मॉडलिंग से है क्रिकेट तो बस यूँ ही कभी कभी खेल लेते हैं ज़नाब!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इन सब बातों के बीच भारत सरकार के इन्कम टैक्स अफ़सर ने इसी दस्तावेज़ के अनुसार कह डाला कि He is engaged in the activity of playing cricket as a paid job rather than as an amateur.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
अब मेरा मन किया कि कुछ और बातें टटोली जाए इनके रोजगार दाता के बारे में। खोजने निकला तो निजी चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में तमिलनाडु से रजिस्टर्ड लेकिन विशुद्ध रूप से एक मुनाफा कमानेवाले व्यावसायिक संगठन बीसीसीआई को दी गई भारत सरकार की धमकी (<a href="http://indiatoday.intoday.in/site/story/ministry-may-take-india-out-of-bcci/1/123079.html">http://indiatoday.intoday.in/site/story/ministry-may-take-india-out-of-bcci/1/123079.html</a>) दिखी कि अपने आप को खेल मंत्रालय की नीतिओं के अधीन लाओ वरना India शब्द का प्रयोग बंद कर दो! मैं भी सोचता रहा कि क्रिकेट मैच का आयोजन करना, इसके लिए पैसे लेकर प्रायोजक ढूंढना, विज्ञापन से धन अर्जित करना, टेलीविजन पर प्रसार का अधिकार देकर मुनाफा कमाना, खेल मैदान के अंदर भी विज्ञापन प्रदर्शित कर धन लेना और यहां तक कि खिलाडिय़ों की पोशाक को भी विज्ञापन का माध्यम बनाकर धन अर्जित करना, धर्मार्थ अर्थात &#8216;चैरिटी&#8217; का काम कैसे हो गया? इस पर अभी भी खींचतान चल ही रही है। इस लेख (<a href="http://www.cricketcountry.com/cricket-articles/BCCI-treating-the-Indian-cricketers-like-slaves/3062">http://www.cricketcountry.com/cricket-articles/BCCI-treating-the-Indian-cricketers-like-slaves/3062</a>) से पता चला कि बीसीसीआई तो अपने कर्मचारिओं से गुलामों जैसा बर्ताव करती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि शपथपत्र देकर खुद खिलाड़ी और यह बोर्ड अदालत में कह चुके हैं (<a href="http://www.thehindubusinessline.in/2004/10/01/stories/2004100103330400.htm">http://www.thehindubusinessline.in/2004/10/01/stories/2004100103330400.htm</a>) कि हम भारत देश के लिए नहीं खेलते, अपने बोर्ड को मुनाफा दिलवाने के लिए खेलते हैं और खिलाड़ी ठेके, कॉंट्रेक्ट पर रखे जाते हैं जिनका भुगतान किया जाता है उन्हें, मुनाफा लाने पर। साथ ही यह भी कह डाला कि ना तो हम भारत का तिरंगा फहराते हैं और ना ही किसी राजकीय चिन्ह का प्रयोग कहीं करते हैं!! तो फिर भारतीय टीम क्यों कहलाती है इन वेतनभोगी नौकरों की? इस पर (62 पृष्टों वाली) बहुत लंबी चली बहस पर मैंने भी हिस्सा लिया था। इस बहस में कहा गया था (<a href="http://indianwatchdogs.com/forums/showthread.php/1645-Team-India-or-Team-BCCI">http://indianwatchdogs.com/forums/showthread.php/1645-Team-India-or-Team-BCCI</a>) कि जब टाटा, विप्रो, इंफ़ोसिस जैसी कम्पनियाँ अरबों, खरबों का मुनाफा कमाते हुए दुनिया में बहादुरी के साथ अपने झंडे गाड़ती है तो क्यों नहीं उन्हें टीम इंडिया कहा जाता। ख्याल यही आता है कि इनके कर्मचारिओं को क्यों नहीं कोई सम्मान दिया जाता भारत सरकार की ओर से?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
ऐसे ही एक मौके पर सुपरिचित हिंदी ब्लॉगर जीतू चौधरी ने अपनी पोस्ट में लिखा था कि जहाँ भी क्रिकेट से कमाई की बात आती है तो ये अपने आपको भारत के प्रतिनिधि कहते, सारा माल कमाते, बटोरते और हजम कर जाते हैं। लेकिन जहाँ भी सरकार इनसे कुछ फ्री में मांगना चाहती तो ये लोग फ़टाक से एक प्राइवेट क्लब मे बदल जाते। और तो और, न्यायालय मे दिए शपथपत्र (जो अब इनकी नाक की नकेल बन जाएगा) मे ये लोग चीख चीख कर कहते कि हम तो भारत का प्रतिनिधित्व ही नही करते, ना ही हम सरकार से जुड़े है, हम तो सिर्फ़ एक क्लब है जहाँ कुछ खिलाड़ी हमारे कर्मचारी है, और अपने कर्मचारियों को खेलने के लिए हम विदेशों मे भेजते है। ना तो हम भारत मे क्रिकेट के सरोकार से जुड़े है और ना ही हम खेल मंत्रालय के अधीन है। पूरा शपथ पत्र अगर आप पढे तो आप इनकी महानता के गुण गाने लग पड़ो।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
गज़ब है भई! अब कौन इससे अधिक जानकारियाँ देख कर भ्रमित होता रहे। अपने राम फिर भारत रत्न की ओर मुड़ लिए और पढ़ डाले कि यह किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व और देश के प्रति उसकी अत्यन्त समर्पण भावना के लिए यदा-कदा दिया जाने वाला अलंकरण है। यह उन आदर्श महान पुरुषों को ही दिया जाता है जिनकी जीवन गाथा पुण्य-भागीरथी के समान है, जिसे जानकर एक साधारण मनुष्य अपने आप को पाप मुक्त और निर्मल पाता है। (दिए जा चुके) ‘भारत-रत्न’ में ऐसी विभूतियों के दिव्य चरित्र हैं जिन्होंने जीवन को इतनी ऊँचाइयों तक पहुँचाया जहाँ की कोई कल्पना नहीं कर सकता। ‘भारत-रत्न’ अनेक महान व्यक्तियों की जीवन-गाथा के साथ भारत के उस काल का इतिहास भी है, जिस काल से इन आदर्श पुरुषों का संबंध रहा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> लो जी, यह प्रश्न तो अब भी सामने खड़ा कि तनख्वाह ले कर अपने मालिक को मुनाफ़ा दिलवाने वाल़े कर्मचारी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए क्या?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अब आप ही सहायता करो!</span></h3>
<h2><strong><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/-I7bBNI4zdoQ/TiKzfGRJPBI/AAAAAAAANBI/AnIP3WlGgWU/s220/bb.jpg" alt="My Photo" width="116" height="154" /></strong></h2>
<h2><strong>बी एस पाबला</strong></h2>
<h3><span style="font-weight: normal;"><strong>भिलाई</strong><strong>, </strong><strong>छतीसगढ़</strong></span></h3>
<p><span style="font-weight: normal;"><strong>आज कौन सा ब्लॉगर साथी किस अखबार में छाया हुआ है आदि की जानकारी मुहैया करवाने वाली इस ब्लॉगर हस्ती को हम <a href="http://bspabla.blogspot.com/"><strong>जिन्दगी के मेले</strong></a>,<strong><a href="http://kalkiduniya.blogspot.com/">कल की दुनिया</a></strong>, <strong><a href="http://blogbukhar.blogspot.com/">बुखार ब्लॉग</a></strong>, <a href="http://adskamaii.blogspot.com/"><strong>इंटरनेट से आमदनी</strong></a>, <strong><a href="http://punjabdikhushbu.blogspot.com/">पंजाब दी खुशबू</a></strong> आदि ब्लॉगों पर भी अलग अलग रूप में हुए देखते हैं। युवा सोच युवा खयालात की ओर से मेहनती ब्लॉगर 2009 पुरस्कार हासिल करने वाले ब्लॉग <strong><a href="http://blogonprint.blogspot.com/">प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग</a></strong>चर्चा के संचालक <strong>है !</strong></strong></span></p>
<p><strong> </strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>चीन की भाषा मैन्डरीन को भी पीछे छोड़ चुकी है हिन्दी :डॉ. सुधा ओम ढींगरा</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Aug 2011 07:03:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविनाश वाचस्पति</dc:creator>
				<category><![CDATA[चर्चा-परिचर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[साक्षात्कार कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ad%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="text-decoration: underline;">साक्षात्कार</span></strong></p>
<h3 style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaOmDhingra/Sudha_Om_Dhingra.jpg" alt="" width="144" height="195" />कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही <span style="color: #800000;">डॉ. सुधा ओम ढींगरा</span> का जन्म ७ सितम्बर १९५९ को जालन्धर (पंजाब) के प्रतिष्ठित एवं साहित्यिक परिवार में हुआ। एम.ए., पी.एच.डी. करने के बाद 1982 में शादी कर सेंट लुईस (मिज़ूरी) आईं। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की चर्चित पत्रकार हैं। जालन्धर रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार रही हैं। 1985 में इंडिया आर्टस ग्रुप की स्थापना की एवं हिन्दी नाटकों का मंचन। वर्तमान में इसकी संरक्षक एवं कलाकार हैं। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से सेंट लुईस में रेडियो प्रोग्राम कई वर्षों तक चलाया। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी सेंट लुईस (मिज़ूरी) में हिन्दी पढ़ाई ।1988-89 में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का वार्षिक अधिवेशन सेंट लुईस (मिज़ूरी) में करवाया। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के अनेक पदों पर कार्य किया और कर रही हैं। हिन्दी विकास मंडल नार्थ कैरोलाईना की पूर्व अध्यक्ष। वर्तमान में हिन्दी विकास मंडल के न्यास मंडल की सदस्य। हिन्दू सोसाइटी, नार्थ कैरोलाईना की प्रोग्राम कमेटी की पूर्व &#8211; सभाध्यक्ष। &#8220;विभूति&#8221; उत्पीड़ित नारियों के सहायतार्थ संस्था की संस्थापक एवं संरक्षक। &#8220;इंडियन क्लासिकल एवं म्यूiज़क सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना की पूर्व निर्देशक। अनगिनत कवि सम्मेलन और संगीत कार्यक्रम करके भाषा, साहित्य और लोक-कथाओं, लोक-कलाओं को आगे बढ़ाया है। साथ ही साथ ऐसे महती काय… में बहुत सी संस्थाओं के लिए बार-बार लगातार धन भी जुटाया है।21 सितम्बर, 1996 अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक काय… के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एम्बैसेडर नरेश चन्द्र से सम्मानित।हिन्दी साहित्य की सेवाओं के लिए नार्थ कैरोलाईना में नागरिक अभिनंदन।’हैरिटेज सोसाइटी (नार्थ कैरोलाइना)’ द्वारा &#8220;प्रतिष्ठित कवियत्री, वर्ष 2005&#8243; से सम्मानित डॉ. सुधा ओम ढींगरा से परिकल्पना ब्लॉगोत्सव हेतु  <span style="color: #800000;">साहित्य और कुछ अनछुए पहलूओं पर परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के सलाहकार संपादक श्री अविनाश वाचस्पति की बातचीत </span>हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं :</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सुधा जी,आपका स्वागत है परिकल्पना ब्लॉगो त्सव द्वितीय में</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जी धन्यवाद आपका और परिकल्पना से जुडी पूरी टीम का !<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप हिन्दी साहित्य में कब आईं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> आई कहाँ हूँ, अभी तो कलम को माँज रही हूँ | अविनाश जी, साहित्य का समुद्र बहुत गहरा है, लगता है अब तक घोघे- सिप्पियाँ ही हाथ लगे हैं, न जाने कितनी डुबकियाँ और लगानी पड़ेंगी हीरे जवाहरात ढूँढने के लिए | और इस जन्म में ढूँढ भी पाऊँगी या नहीं, समय बताएगा | आप ने पूछा है तो यह ज़रूर बता देती हूँ कि लिखना बहुत छुटपन से शुरू हो गया था | जब बच्चे खेला करते थे तो मैं काग़ज़ कलम ले कर अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाया करती थी | मेरा बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था | मैं पोलियो सर्वाइवल हूँ | तीन माह की थी जब पोलिओ हुआ था | माँ -बाप डाक्टर थे, अपंग होने से तो मुझे बचा लिया पर दाईं टाँग कमज़ोर रह गई अतः अपने  हम उम्र के बच्चों के साथ खेल नहीं पाई | बरामदे में बैठी उन्हें खेलते देखती तो मेरी परिकल्पना की दुनिया सज जाती | उसी दुनिया से निकल कर कभी-कभी उनके साथ खेलने चली जाती और सम्भल न पाती तो गिर जाती&#8230;कुछ बच्चे उठाने को दौड़ते और कुछ लंगड़ी &#8211; लंगड़ी कह कर चिढ़ाते..बालमन चोट के दर्द से कहीं अधिक &#8216;लंगड़ी&#8217; शब्द से आहत होता | रोती हुई बरामदे में आ बैठती और लंगड़ी शब्द का दंश भीतर कचोटता रहता और तरह -तरह के विचारों के साथ बालमन की सोच घुलती- मिलती रहती और कलम से काग़ज़ पर उतर जाती.. घर का माहौल बहुत सकारात्मक था |  पापा हिम्मत बंधाते कि मुझे कुछ अलग करके दिखाना है | बस उसी अलग दिखने में लिखती रही | दैनिक समाचार पत्रों के बाल स्तम्भों और फिर युवा मंचों में छपती रही | युवावस्था में दैनिक पंजाब केसरी, वीर प्रताप, हिन्दी मिलाप के साहित्यिक संस्करणों में कहानियाँ, कविताएँ और फिर धारावाहिक उपन्यास छपा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">साहित्य से जुड़कर आपको कैसा महसूस हुआ ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य तो खाना -पीना, ओढ़ना- बिछौना है | इश्क करती हूँ इससे | इसके प्रेम ने ही बचपन में मुझे सम्भाला और बड़ी होने पर सकारात्मक सोच वाली आत्मविश्वासी, दृढ़निश्चयी, सुदृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला बनाया | जीवन में बहुत उतार -चढ़ाव देखे, उदास क्षणों को अपने दोस्तों की वजह से ख़ुशी -ख़ुशी संभलती रही | अविनाश जी आप ज़रूर जानना चाहेंगे कि मेरे दोस्त कौन हैं .. जी.. काग़ज़ -कलम और पुस्तकें | साहित्य साँस है मेरी, इससे अलग मैं कुछ भी नहीं | अब आप समझ गए होंगें कि मैं कैसा महसूस करती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://hindi.webdunia.com/articles/1105/25/images/img1110525072_1_2.jpg" alt="लेखिका सुधा ओम ढींगरा कहानी वाचन करते हुए" width="190" height="454" />जब आपने साहित्य सृजन शुरू किया तो उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थीं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> यादों के गलियारों में घुमा दिया इस प्रश्न ने.. जब मैंने लिखना शुरू किया, जीवन शैली बड़ी सरल और सादा थी | बाज़ारवाद और भौतिकवादी जैसी सोच ने अभी पैर नहीं पसारे थे | कम्प्यूटर, अंतरजाल और दूरदर्शन आस -पास नहीं थे | हाँ युवावस्था तक जाते -जाते दूरदर्शन से पहचान हो गई थी और उसका हिस्सा भी मैं बन गई थी, आकाशवाणी और रंगमंच से मैं पहले से ही जुड़ी हुई थी पर कम्प्यूटर से तो अमेरिका आकर ही मिली हूँ&#8230;. कहने का भाव है कि मनोरंजन के लिए रेडियो या फ़िल्में थीं और कोई साधन नहीं था | पुस्तकें पढ़ने का खूब चलन था | एक से एक बढ़िया लेखक को पढ़ने की प्रतिस्पर्धा रहती थी | पढ़ने की रूचि और क्रम आज तक जारी है, चाहे वरिष्ठ कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा का साहित्य हों या युवा लेखक पंकज सुबीर का, एक विद्यार्थी की तरह पढ़ती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> काफ़ी हॉउस में साहित्यिक चर्चा के लिए बुद्धिजीवी इकट्ठे होते थे | आकाशवाणी और भाषा विभाग के खुले प्रांगणों में बहुत सारे साहित्यिक कवि सम्मेलन हुआ करते थे | धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका पत्रिकाएँ साहित्यिक रूचि वालों में खूब पढ़ी जाती थीं | दैनिक समाचार पत्रों में साहित्य के अलग संस्करण होते थे और साहित्य के लिए अलग पृष्ट भी रखे जाते थे | समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्टों पर छपना भी उपलब्धि मानी जाती थी | समाचार पत्रों के साहित्यिक संपादक भी बड़े सुन्दर पत्र लिख कर रचनाएँ लौटाया करते थे |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की एक स्तंभ हैं, कृपया यह बताएं कि आपकी नज़रों में साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्तमान स्वरुप क्या है?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, आप का बड़प्पन है जो आप ऐसा कह रहे हैं, मुझे तो अभी बहुत कुछ करना है | इस विषय पर अभी ठोस और स्पष्ट कुछ नहीं कहा जा सकता | भारत इस समय परिवर्ती दौर से निकल रहा है, उसी दौर से </span><span style="font-weight: normal;">जा रहा है जिसमें अमेरिका सिक्सटीज़ में गया था | अब अमेरिका पूरब की ओर मुड़ रहा है | मैंने स्वयं १९८३ से अब तक अमेरिका में ज़मीन असमान का अन्तर देखा है | अब विवाह, पारिवारिक मूल्य, बच्चों के लिए सरोकार उनकी प्राथमिक अपेक्षा हो गई है | मेरे विचार से  साहित्य-संस्कृति और समाज तीनों आपस में जुड़े हुए हैं | आर्थिक कारण हो या पश्चिम का प्रभाव, जब समाज में छाए उपभोक्तावाद से बाज़ारवादी सोच बढ़ रही हो, पश्चिम का भौतिकवाद और मल्टी नैशनल कल्चर समाज पर हावी हो रहा हो, वहाँ साहित्य पर उसका असर तो होगा ही | पिछले दिनों लिव-इन-रिलेशनशिप पर मैंने भारत के ही एक लेखक की कहानी पढ़ी और फिर सुना कि लिव-इन-रिलेशनशिप का कानून भी पास हो गया है | हैरानी हुई कि भूमंडलीकरण से जिन देशों के प्रभाव से भारत में यह संस्कृति तेज़ी से फैल रही है वहाँ लिव-इन-रिलेशनशिप के उद्भव और विकास के कारण और थे | भारतीय तो शादी की संस्था में विश्वास करते हैं उसे सुदृढ़ता से निभाते हैं | हमारे समाज में सांस्‍कृतिक मूल्‍य, नैतिकताएं और मान्यताओं की वजह से वैश्विक संस्‍कृतियों में हमारी विशिष्ट पहचान है | दूर देशों में अपनी</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> पारिवारिक सुदृढ़ता और सुरक्षा के बल पर प्रवासी भारतीयों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा को विश्व के कोने -कोने में पहुँचाया है | मैं बहुत सकारात्मक सोच की हूँ, परिवर्ती दौर के संघर्ष और चुनौतियों से जो </span><span style="font-weight: normal;">साहित्य लिखा जाएगा वह हिन्दी साहित्य को समृद्ध ही करेगा जैसे कि हर युग में होता आया है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">हिंदी साहित्य की दिशा दशा पर आपकी क्या राय है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> बहुत अच्छी है&#8230;विदेशों में रह रहे भारतीय रचनाकारों के पास अंग्रेज़ी भाषा का विकल्प होते हुए भी वे हिन्दी में लिख कर साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं और देश में तो रोज़ ही नए रचनाकार साहित्य के हवन में सामग्री डाल रहे हैं | वैश्वीकरण ने जहाँ भारतीयों को कोने -कोने में पहुँचा दिया है वहीं अंतर्जाल ने हिन्दी साहित्य को घर -घर पहुँचा दिया है | तकनीकी युग में जहाँ आज नए साधनों से हिन्दी का प्रसार हो रहा है वहीं अनेक नए</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> लेखक, कवि, आलोचक, कहानीकार, व्यंग्यकार, समीक्षक हिन्दी साहित्य से जुड़े हैं और अपने लिए भूमि तलाश रहे हैं | ये सब कैसा लिख रहे हैं समय की दृष्टि ही देखेगी और हिंदी साहित्य की दिशा को भी निर्धारित करेगी |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आपकी नज़रों में हिंदी साहित्य का भविष्य कैसा है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> चीन की भाषा मैन्डरीन को भी पीछे छोड़ चुकी हिन्दी, विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली -समझी जाने वाली भाषा बन चुकी है और संख्या में लगभग एक अरब के करीब आती है | पर दुःख की बात है कि अभी तक यूएन में हम इसे नहीं पहुँचा सके जबकि छह भाषाएँ अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, चीनी, रूसी, स्पैनिश तथा अरबी अपने -आप को वहाँ मान्यता दिलवा चुकी है | पर मैं बहुत आशावान हूँ &#8230;अंतरजाल पर हिन्दी भाषा और उसका साहित्य राष्ट्रीय संस्कृति को व्याख्यायित कर रहा है | निस्संदेह हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">हिन्दी के विकास में अंतरजाल कितना कारगर सिद्ध हो रहा है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, अंतरजाल से साहित्य और पत्र-पत्रिकाओं को बृहत् पाठक वर्ग मिला है | साहित्यकारों का पाठकों से सीधा संवाद हो रहा है और प्रकाशकों को बाज़ार मिल रहा है | यह एक सशक्त माध्यम है, अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने इसी माध्यम का प्रयोग करके चुनाव जीता | हिन्दी और साहित्य को इस माध्यम से बहुत आगे ले जाया जा सकता है | वैसे काम हो भी रहा है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">न्यू मीडिया के सन्दर्भ में आपकी व्यक्तिगत राय क्या है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अभिव्यक्ति का यह बहुत ही समर्थ माध्यम है, अगर इसका सही प्रयोग किया जाए |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप तो स्वयं साहित्यकार हैं, एक साहित्यकार जो गंभीर लेखन करता है उसे चिट्ठालेखन यानी ब्लॉगिंग करना चाहिए या नहीं?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> हमारे कई साहित्यकार इसकी महत्ता को समझ नहीं पा रहे हैं और वे चिट्ठालेखन को समय की बर्बादी समझते हैं | इसलिए इससे दूर रहते हैं | पर इससे लेखन को बृहद फलक मिलता है, पाठकों से सीधा संवाद होता है और रचनात्मक ऊर्जा का विकास ही होता है, निकास नहीं | अविनाश जी, बात फिर वहीं आती है कि आप इसका प्रयोग कैसे करते हैं | हर तकनीक का गणित होता है आप जमा करना जानते हैं तो घटाव से बच सकते हैं | हाँ आप को अपनी सोच और प्राथमिकताएँ सही रखनी पड़ती हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में आज के साहित्यकार सफल हैं या नहीं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करना साहित्यिक संस्थाओं और संघठनों का सामूहिक  प्रयास है | व्यक्तिगत तौर पर धारा, विचार, वाद का नहीं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आज की कविता की आधुनिकता अपनी देसी ज़मीन के स्पर्श से वंचित क्यों है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> भारत में भाषा और देसी संस्कार भी तो समाप्त हो रहे हैं | अंग्रेज़ी का वर्चस्व दिन व दिन बढ़ रहा है और पश्चिमी की सोच, भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर हावी हो रही है | भाषा और संस्कृति का तो चोली दामन का सम्बन्ध होता है | विदेशों में तो किशोरावस्था तक मातृ-भाषा में शिक्षा दी जाती है और बच्चों में संस्कार डालने की हर सम्भव कोशिश की जाती है | अब भारत में तो अपनी भाषा के संस्कार बचपन में ही समाप्त कर दिए जाते हैं | माँ -बाप भी बड़ी शान से कहते हैं कि हमारा बच्चा अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ता है | अविनाश जी मैं मानती हूँ कि रोटी- रोज़ी अंग्रेज़ी के साथ जुड़ी हुई है, हिन्दी के साथ नहीं इसलिए अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा बहुत ज़रूरी है |  पर अपनी भाषा के संस्कारों की नींव बचपन ही में डाल दी जाए तो कोई भी भाषा सीख कर रोटी कमाना मुश्किल नहीं | यूके और अमेरिका में आई प्रवासियों की पहली पीढ़ी जो इन देशों में अपने -अपने कार्य क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाई है उनमें से अधिकतर सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए हैं | अगर आप के पास अपनी भाषा के संस्कार हैं, तो आप किसी भी भाषा के मूल को पकड़ सकते हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> विदेशों में पैदा हुई दूसरी पीढ़ी को कंफ्यूज्ड देसी कहा जाता था पर वह पीढ़ी अपनी सोच, व्यवहार और जीवन -शैली में बहुत स्पष्ट है | विदेश के सही -ग़लत को समझते हुए वह भारतीय है और भारतीय होने में गर्व महसूस करती है और विदेशों में प्रवासी भारतीयों ने भी अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति , अपनी भाषा को संभाल कर रखा हुआ है | यह उनकी पहचान है, अस्मिता है | पर आज भारत की युवा पीढ़ी कंफ्यूज्ड देसी बन चुकी है | परम्परावादी और संस्कारी देश में पैदा होकर वे पश्चिम का जिस तरह से अनुकरण कर रहे हैं और उन जीवन मूल्यों को भी अपनाते जा रहे हैं, जिन्हें पश्चिम बहुत पहले छोड़ चुका है | ऐसे समय और वातावरण में कविता हो या कहानी देसी ज़मीन का स्पर्श कहाँ से लाएगी |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> शिक्षा प्रणाली, शिक्षा संस्थाओं के साथ -साथ साहित्य के कुछ कर्णधार भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं | जब वे ऐसी रचनाओं को प्रोत्साहित करेंगे तो बाकि भी वैसी ही लिखेंगे |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">क्या हिंदी चिट्ठाकारिता में नया सृजनात्मक आघात देने की ताक़त छिपी हुई है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> हर नया मिडिया नई ऊर्जा लेकर आता है और अपने भिन्न स्वरूप से, नई अपेक्षाओं और नई संभावनाओं से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है | चिट्ठाकारिता हिन्दी, साहित्य और संस्कृति के फैलाव- प्रसार में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा|</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">कुछ व्यक्तिगत जीवन से जुड़े सुखद पहलू हों तो बताएं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> जीवन को उत्सव की तरह मानती हूँ | हर पल को भरपूर जीती हूँ | C.Wintercle Olson का कथन हमेशा मेरे सामने रहता है&#8211;</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> Every new day is a gift that&#8217;s why we call it the present.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> और इसे भी याद रखती हूँ &#8230;..</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The time to be happy is now.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The place to be happy is here.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The way to be happy is to make others so.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, मेरे मम्मी -पापा और भैया तीनों डाक्टर थे | अब तीनों इस दुनिया में नहीं हैं | भैया तो कम उम्र में चले गए और मुझ से वे दस साल बड़े थे | बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बिता पाई थी इसलिए माँ -पा ने बहुत लाड़ प्यार से पाला था | बहुत संस्कारित परिवार था | जीवन को सुखद पूर्वक जीने के लिए तीन P उनसे लिए | हैरान हो गए न कि ये तीन P क्या है..? जी..Prem, Patience और Preyer. स्वभाव में गिलास को आधा भरा ही देखने की  आदत बन चुकी है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगी आप ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपको इस बात का शायद अंदाजा नहीं होगा कि विदेश में परिकल्पना ब्लॉगोत्सव की कितनी धूम है, हर कोई जो हिंदी और हिन्दुस्तान से जुडा है वह आत्मीय रूप से परिकल्पना ब्लॉगोत्सव से भी जुडा है . रवीन्द्र प्रभात जी और आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं हिंदी के विकास में , और क्या कहूँआप स्वयं बहुत अनुभवी हैं | हाँ, शुभकामनाएँ ज़रूर देती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">नए चिट्ठाकारों के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> समाज और साहित्य के प्रति सचेत रहते हुए सृजनात्मक, उद्देश्यपूर्ण और उपयोगी लिखा जाए जो सीधा पाठक के हृदय और मस्तिष्क पर छा जाए ताकि इस माध्यम की ताकत सार्थक हो जाए |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आज के रचनात्मक परिदृश्य में अपनी जड़ों के प्रति काव्यात्मक विकलता क्यों नहीं दिखाई देती ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> जड़ों से ही छूटते जा रहे हैं तो विकलता कहाँ नज़र आयेगी | जब जड़ों की तलाश शुरू होगी तब इसकी तरफ मुड़ा जायेगा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आपकी नज़रों में साहित्यिक संवेदना का मुख्य आधार क्या होना चाहिए ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> संवेदना कहीं भी किसी के प्रति भी उभर सकती है, निर्भर करता है, आप ने उन पलों को कितना और कैसे जिया है | जितनी गहराई से आप जीते हैं, उतना ही डूब कर आप लिख सकते हैं | डूब कर तो अपने इर्द -गिर्द के वातावरण और जीवन को ही लिखा जा सकता है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">कुछ अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से जुड़े कोई सुखद संस्मरण बताएं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> काम को बेहद आन्नद और प्रेम से करती हूँ | परेशानी को अधिक स्थान नहीं देती, बड़ी जल्दी उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाती हूँ | मस्त रहती हूँ | लेखन और हिन्दी चेतना ने विश्व में कई भाई- बहन दिए हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अपनी पुस्तकों के साथ -साथ हिन्दी चेतना मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है | यह उत्तरी अमेरिका की पहली ऐसी प्रकाशित हिन्दी पत्रिका है, जो लोकप्रिय हो रही है और स्तरीय पत्रिका मानी जाती है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य जगत से एक ही निवेदन है कि विदेशों के शब्द शिल्पियों के लेखन को प्रवासी लेखन कह कर हाशिये में न डालें |</span></h3>
<h3>आपने हमें अपना कीमती समय दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद सुधा जी !</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">जी, धन्यवाद आपका भी !</span></h3>
<p><span style="font-weight: normal;">() () ()</span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>तबादलों की पावन-सरिता</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Aug 2011 05:20:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>GIRISHBILLORE</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रशासनिक व्यवस्था में तबादलों की पावन-सरिता बहती है जो नीति से कभी कभार ही बहा... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%a4%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://1.bp.blogspot.com/-HKn9oGGBvmw/TfUj5ksFccI/AAAAAAAAGh0/ZbPRhgPPyM4/s320/pb_6n0d1295335227.jpg" alt="" width="230" height="320" />प्रशासनिक व्यवस्था में तबादलों की पावन-सरिता बहती है जो नीति से कभी कभार ही बहा करती है बल्कि ”रीति”से अक्सर बहा करती है.  तबादलों की बहती इस नदिया में कौन कितने हाथ धोता है ये तो  भगवान, तबादलाकांक्षी, और तबादलाकर्ता ही जानता है. यदाकदा जानता है तो वो जो  तबादलाकांक्षी, और तबादलाकर्ता के बीच का सूत्र हो. इस देश में तबादला कर्ता एक समस्या ग्रस्त सरकारी प्राणी होता है. उसकी मुख्य समस्या होती हैं ..बच्चे छोटे हैं, बाप बीमार है, मां की तबीयत ठीक नहीं रहती, यानी वो सब जो घोषित तबादला नीति की राहत वाली सूची में वार्षिक रूप से घोषित होता है. अगर ये सब बे नतीज़ा हो तो तो अपने वक़ील साहबान हैं न जो स्टे नामक संयंत्र से उसे लम्बी राहत का हरा भरा बगीचा दिखा लाते हैं.  तबादले पहले भी होते थे अब भी होते हैं  क्योंकि यह तो एक सरकारी प्रक्रिया है. होना भी चाहिये अब घर में ही लीजिये कभी हम ड्राईंग रूम में सो जाते हैं कभी बेड-रूम में खाना खाते हैं. यानी परिवर्तन हमेशा ज़रूरी तत्व है. गिरी  जी का तबादला हुआ, उनके जगह पधारीं देवी जी ने आफ़िस में ताला जड़ दिया ताक़ि गिरी जी उनकी कुर्सी पर न बैठे रह जाएं. देवी जी सिखाई पुत्री थीं सो वही किया जो गिरी के दुश्मन सिखा रए थे. अब इस बार हुआ ये कि उनका तबादला हुआ तो वे गायब और इस डर से उनने कुर्सी-टेबल हटवा दिये कि कार्यालयीन टाईंम पर कहीं रिलीवर नामक दस्यु आ धमका और उनकी कुर्सी पर टोटका कर दिया तो ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इस तो भय से मोहतर्मा नें कुर्सी-टेबल हटवा दिये. बहुत अच्छा हुआ वरना दो तलवारें एक म्यान में..?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
<img class="alignright" src="http://khabarindiya.com/uploads/articles_media/2011/03/dont_talk.jpg" alt="" width="139" height="140" />तबादलों का एक और  पक्ष होता है जिसका तबादला कर दिया जाता है उसे लगता है जैसे वो बेचारा या बेचारी अंधेरी गली से हनुमान चालीसा बांचता   या ताबीज़ के सहारे निकल रहा/रही था  और कोई उसे लप्पड़  मार के निकल गया. अकबकाया सा ऐसा सरकारी जीव फौरी राहत की व्यवस्था में लग जाता है.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
तबादलों को निश्तेज़ करने वाले संयंत्र का निर्माण भारत की अदालतों में क़ानून नामक रसायन से वक़ील नामक वैज्ञानिक किया करते हैं. इस संयंत्र को स्टे कहा जाता है. जिस पर सारे सरकारी जीवों की गहन आस्था है. वकील नामक  वैज्ञानिक कोर्ट कचैरी के रुख से भली प्रकार वाकिफ  होते हैं. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इन सब में केवल सामर्थ्य हीन ही मारा जाता है. समर्थ तो कदापि नहीं. इसके आगे मैं कुछ भी न लिखूंगा वरना &#8230;.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
भरे पेट वाले मेरे जैसे सरकारी जंतु क्या जानें कि देश की ग़रीब जनता खुद अपना तबादला कर लेती है दो जून की रोटी के जुगाड़ में.बिच्छू की तरह पीठ पे डेरा लेकर निकल पड़ता है. यू पी बिहार का मजूरा निकल पड़ता है आजीविका के लिये महानगरीयों में. उधर वीर सिपाही   बर्फ़ के ग्लेशियर पर सीमित साधनों के साथ तबादला आदेश का पालन करता  देश के हम जैसे सुविधा भोगियों को बेफ़िक्री की नींद सुलाता है रात-दिन जाग जाग के.भूखा भी रहता ही होगा कभी कभार कौन जाने. </span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>सौ में निन्यानवे बईमान फिर भी हो रहा भारत निर्माण !</title>
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		<pubDate>Mon, 25 Jul 2011 05:39:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रवीन्द्र प्रभात</dc:creator>
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		<description><![CDATA[व्यंग्य : चौबे जी की चौपाल से आज चौपाल मा चुहुल खुबै है, रामभरोसे का बेटा... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a5%8c-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%88%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ab%e0%a4%bf/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">व्यंग्य : चौबे जी की चौपाल से</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
<img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/chaupal-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />आज चौपाल मा चुहुल खुबै है, रामभरोसे का बेटा जबसे लौटा है मुम्बई से,ओकरे मुंह से बम विष्फोट कs चर्चा सुनि के रामभरोसे एकदम से सेंटिमेंटल हो गईले आ मुड़ि पीटत सनकाह अस चौबे जी के चौपाल आ गइले. चौबे जी से कहलें कि  – मुंबई में हुए आतंकी हमला के बाद राजनीति गरमा गई है महाराज ।कॉंग्रेसी बबुआ राहुल कs बयान पर शिवसेना वाले बाबा जी कह रहें हैं कि बबुआ को ममहर भेज दिया जाए, बहुते अनाप शनाप बकने लगा है अब ।बबुआ के सम्हारे देखभाल के जिम्मेदारी जवन दिग्गी राजा के दिहल गइल बा ओह डिक्की के कहना बा कि गनीमत है कि हम सब हिन्दुस्तान में हैं ना त पाकिस्तान में त रोजे या हफ्ता में दुई-चार दिन अइसन हमला होत रहेला. पुरनका गृह रा्ज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के बयान आइल हs कि इस  सरकार की उपलब्धि मानिए कि अतना दिन बाद कवनो आतंकी हमला हुआ है हमरे देश में ।अब आगे ई बयानवाजी कs कवन स्वरूप होई ई तs भगवान जाने। एतना कहि के राम भरोसे मुँह में सुर्ती दबा लिहले ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
बात ई हs राम भरोसे कि मुँह चुप्पा प्रधानमंत्री मुँह तs खोल दिहले बाड़न आ कहले बाड़न कि दोषियन के जल्दिये गिरफ्तार कर लिहल जाई. शायद ओही तरह जवना तरह ऊ कई साल से महँगाई पर काबु पावे के बात करत आइल बाड़न । ऊ बहुत बड़हन अर्थशास्त्री हऊहन, उनका से एकबार एगो पत्रकार पूछलें, कि ई बताईये  दुई और दुई केतना होला तs ऊ कहलें   दो और दो होता तो है चार हीं, मगर एकबार मैडम से भी पूछ लेते हैं, आखिर पूछने में क्या हर्ज है ? पत्रकार फेर पूछलें कि ई बताईये मनमोहन जी अन्ना के अनशन से अन्न निकाल के आप सबको सन्न कर दिए और बाबा को लंगोट की जगह सलबार पहना दिए , इसको आप अपने सरकार की उपलब्धि कहेंगे या गुस्ताखी ? इतना सुनि के मुस्की मार के हंसलें आऊर कहलें  कि मैडम इसको भारत निर्माण कहती हैं &#8230;अब जो मैडम कहती हैं वही हम कहेंगे नs ? &#8230;&#8230;चौबे जी बोले ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
<img class="alignright" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/ravindra.bmp" alt="" width="146" height="230" />भारत निर्माण की बात सुनि के गुलटेनवा के हंसी ना रुकल, ठहाका मारी के हंसले आऊर कहलें कि ये चौबे बाबा, ई कवन भारत निर्माण कs बात कर रहल बाड़े हमरे मनमोहन सिंह ? जहां सौ में निन्यानवे बेईमान उहाँ  ई कईसन भारत निर्माण ? अब अपना गाँव में अइसहीं जीवन सत्याग्रही भइल जाता. बिजली रहत नइखे। गैस मिलत नइखे. जरावन खतम हो गइल बा। माल-गोरू हइये नइखन सँ कि गोईंठा होखो. महँगाई अतना बढ़ गइल बा कि साबुन तेल कीने में पसीना छूटि जात बा । मंहगाई कs राज हो गईल,सच्चाई कs खुजली-खाज हो गईल, केतने घर मा अब फाका कट रहल बाटे, राशन खाली कागजे पर बँट रहल बाटे, दल-रोटी पर भी आफत-बिपत्त, कुर्सी पर बैठ गईल बाटे एक से एक चिक्कट &#8230;सूना हो गईल बा खेत खरिहान ,सगरो रो रहल बा मजदूर-किसान &#8230;.का यही कs नाम हs भारत निर्माण ? बोला गुलटेनवा ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इतना सुनि के तिरजुगिया की माई पगला गईली आ सनकाह अस चिल्ला के कहली कि जब दुनिया सोवत हए तs हमनी के जागत हईं जा। जब हर तरफ खुशियाँ होत है तs हमनी के रोवत हईं जा।हमनी के अन्नदाता हईं फिर भी भूख से बेहाल रहत हईं जा। १२ महीना ऊपर वाला भी हमनी परीक्षा लेत रहत हएं। कभी हमनी के पानी से मारत हईं जा तs कभी बिना पानी के। तनिको भईल मौसम नाराज हमरी मेहनत मटियामेट होई जात है।आखिर हम किसानन खातिर का बा भारत निर्माण के मायने ? बोली तिरजुगिया की माई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
चौपाल  का माहौल गंभीर देखिके अपनी लंबी दाढ़ी सहलाया और रमजानी मियाँ फरमाया कि इसी विषय पर दुष्यंत साहब का एक शेर अर्ज है कि हालते जिस्म, सूरते जां और भी खराब।चारो तरफ खराब, यहाँ और भी खराब ।।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
का बात है मियाँ, गज़ब शेर पटके हो ,बिल्कुल मौजू । वैसे जहां तक हमार सोच बा ओकरा मुताबिक़ सरकार के जेनरल नॉलेज मीडिया तक जाके ख़त्म हो जाला। उनकर पहचान मूंछ की ऐंठन में समा जाला और उनकर सेंटिमेंट अपने और अपनों में खो जाला। यदि हमरे देश कs नेता लोग ठीक होते तो देश कs हालात बदतर से बदतर  नाही होत रमजानी मियाँ ! जब बाजेला चुनावी बाजा, हर केहु कहेला आजा मेरी गाडी में आजा, वे भी जेकरा गाडी मा टायर ना होला, चाहे गाडी पंचर होला या फिर जेकर गाडी हौले-हौले चलेली या फिर जेकर सरपट दौड़ेली।सत्ता पावे के गरज में गिरगिटान नियन रंग बदले में देरी ना होत। लोगन के उलुल-जुलूल कमेन्टवो के पचाई लेत हएं । पैसा-वैसा लुटावे खातिर अभाव में हवाला के जरीय मंगाई लेत हैं । इलेक्सन के चक्कर मा दुबराईयो  जात हैं, लेकिन चुनाव जीतला कs बाद सारा कसर निकाल लेत हैं एक झटके मा,ई सोच के कि पता नाही फिर राजभोग कs गुलगुला मिलिहें कि ना ? कहलें गजोधर ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एकदम्म ठीक कहत हौ गजोधर, हम तोहरी बात कs समर्थन करत हईं । अब हमनी के एगो संकल्प लेबे के पडी कि जईसे चुनाव जीतला कs बाद सरकार निरंकुश हो जाला,वैसहीं निरंकुश हो जायब सs हमनी के भी चुनाव के बखत, ईंट कs जबाब पत्थर से देबे खातिर । सबकी सहमति के साथ इतना कहके चौबे जी ने चौपाल अगले शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया ।</span></h3>
<p><span style="font-weight: normal;"><strong><span style="font-size: medium;">रवीन्द्र प्रभात</span></strong><span style="font-size: small;"> </span></span></p>
<p><span style="font-weight: normal;"><span style="font-size: small;">(जनसन्देश टाइम्स / २४ जुलाई २०११ )</span></span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jul 2011 05:09:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>loksangharsha</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[अन्तराष्ट्रीय शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री गौहर रजा से समसामयिक विषय... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ad%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://loksangharsha.blogspot.com/2011/06/blog-post_5668.html"><br />
</a></h3>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://2.bp.blogspot.com/-46yqadtcGfc/Til8_uHkpkI/AAAAAAAABwk/IPQkAxuMHxg/s1600/Gauhar%2BRaza.jpg"><img src="http://2.bp.blogspot.com/-46yqadtcGfc/Til8_uHkpkI/AAAAAAAABwk/IPQkAxuMHxg/s320/Gauhar%2BRaza.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<h3 style="text-align: justify;">अन्तराष्ट्रीय  शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री  गौहर रजा से समसामयिक विषय पर लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर  सिंह सुमन ने जंहगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट में जाकर विशेष साक्षात्कार  लिया</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न : पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से आप क्या सोचते हैं ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर : ब्रेख्त ने लिखा था और  चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया।  उन्होंने जनवाद के खिलाफ मत दिया क्योंकि वह जनवादी थे  बंगाल के सन्दर्भ में यह लाईनें मुझे याद आयीं इस रियलिटी से मुंह नहीं  मोड़ा जा सकता है कि बंगाल की जनता सरकार से नाराज थी। उसकी वजह वामपंथ की  गलतियाँ थी। जिसका सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक  था। इससे जो कुछ हुआ है भयंकर है।  भयंकर इसलिए है कि  चुनाव के बाद एक महीने के अन्दर ही पेट्रोलियम  पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> बिना लगाम के बाजार के हाथों  मुल्क बेचने की प्रक्रिया इतनी तेज व भयंकर है कि इससे पहले इस मुल्क को यह  गति देखने को नहीं मिली। जब वामपंथ कमजोर होता है तब वह अपने अन्दर कमजोर  ही नहीं होता है बल्कि बुर्जुवा पार्टियों के अन्दर जो वामपंथी असर होता है  वह भी कमजोर हो जाता है और हमारे सामने सैकड़ों हजारो उदहारण है बी.टी डंकल  से लेकर मोंसंटो वहां से लेकर परमाणु   डील तक या छोटे दफ्तर से लेकर  कैबिनेट  मिनिस्टर तक एक लूट की स्तिथि पैदा हो गयी है और इसमें आम आदमी की  आवाज जो वामपंथी विचारधारा के गले से निकलती थी वह पूरी तरह से दब गयी यह  है हमारी गलतियों का नतीजा है बंगाल में।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न: क्या मार्क्सवाद प्रासंगिक है ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर  : जहाँ तक मार्क्सवाद को मैं एक वैज्ञानिक विचारधारा मानता हूँ वैज्ञानिक  विचारधारा कहने का मतलब यह है बदलाव। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ धर्म  एक ऐसी चीज है जो नहीं बदलता है। जितना पुराना हो उतना ही बेहतर यह सिर्फ  ससियेंस है जो जितनी नयी हो उतनी बेहतर।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
विचारधारा का जहाँ तक ताल्लुक  है। विचारधारा में बदलाव ही उसे ससियेंस बनता है। दुनिया में अभी भी  पूँजीवाद  व सामंतवाद मौजूद है इसलिए मूल कानून है आज भी मार्क्सवाद पूरे  उतरते हैं लेकिन हर जगह की परिस्तिथियों के हिसाब से लागू किया जा सकता है।  इसका उदहारण हम टेक्नोलॉजी से लें हमारे देश में छोटे खेत हैं जब हम  ट्रक्टर की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते हैं तब हमें छोटे ट्रक्टर की जरूरत  होती है जिन मुल्कों में बड़े-बड़े खेत होते हैं वहां बड़े ट्रक्टर की  जरूरत होती है। बिलकुल यही बात मार्क्सवाद तक पूरी उतरती है मार्क्सवाद को  देश की परिस्तिथियों की हिसाब से अप्लाई किया जाना चाहिए जो बातें बंगाल पर  लागू होंगी, वह बातें शायद गुजरात व उत्तर प्रदेश पर सही न उतरें।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> मशीनी तरीके मर्क्सिजम अप्लाई  करने से हर चूक इन्कलाब को कई दशक पीछे धकेल देती है। यही हुआ है दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में जहाँ मार्क्सवाद धर्म की तरह इस्तेमाल किया गया वहां व्यक्ति या समूह धर्म की और मुड़ेगा मार्क्सवाद की तरफ नहीं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न: वामपंथ के नए मुद्दे क्या होने चाहिए ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर:   बदलाव की गुंजाइश हर वक्त है। बंगाल केरल की स्तिथि झकझोरने वाले हालात  हैं। हमें यह समझना होगा कि पुराने तरीके से काम नहीं चलेगा नए तरीके से  सोचना होगा और रचनात्मक होना होगा जो हम तीस चालीस दशक में थे रचनात्मक  आन्दोलन की जरूरत है। नया कम्युनिस्ट पैदा करना होगा और जिन सवालों से हमने  मुंह फेरा है। जिसमें प्रमुख सवाल है जाति का सवाल व साम्प्रदायिकता के  सवाल पर चिंतन करना बहुत जरूरी है। अगर इस देश में फासिस्ज्म आयेगा वह  साम्प्रदायिकता व जातिवाद के नाम से आएगा। इन दोनों मुद्दों को हमने नहीं  समझा तो हम पिछड़ जायेंगे। हमारे पिछड़े देश की जनता को और पिछड़ना होगा।  हमारे आस-पास के देशों में अमेरिका ने यह स्तिथि पैदा कर दी है कि लोकतंत्र  न बचे जो हमारे लिये बहुत बड़ा खतरा है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अगर इस देश में लोकतंत्र बचाना है तो उसकी भी जिम्मेदारी वामपंथ की है।<br />
सुमन</span><br />
<a href="http://loksangharsha.blogspot.com/">लो क सं घ र्ष !</a></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>साम्प्रदायिकता तर्क के बजाये जोर जबरदस्ती और सामाजिक हिंसा पर आधारित होती है:मुद्राराक्षस</title>
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		<pubDate>Wed, 20 Jul 2011 05:22:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: red; background-color: pink;" rowspan="2"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Mudra-Rakshas-Sanklit-Kahaniyan_m2-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /><span style="color: #993300;"> </span></p>
<p>सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है : मुद्राराक्षस</p>
<p><span style="color: #000080;">विगत दिनों मुम्बई में हुए सीरियल बम ब्लास्ट और उसपर विभिन्न राजनीतिज्ञों के साथ -साथ दिग्विजय सिंह की वयानवाजी ने आतंकवाद पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है ! किसी का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने कुछ भी गलत नहीं कहा तो कुछ लोगों का मानना है कि उनके बयान हास्यास्पद है &#8230;.कहा गया है कि चाहे हिन्दू आतंकवाद हो चाहे मुस्लिम आतंकवाद , आतंक तो आतंक ही होता है न ? इन्हीं विषयों पर<span style="color: #993300;"> डा. विनय दास</span> ने प्रख्यात साहित्यकार <span style="color: #993300;">श्री मुद्रा राक्षस </span>से बात की , प्रस्तुत है मुद्रा जी से हुयी बातचीत के प्रमुख अंश :</span></th>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनय दास:वर्तमान परिवेश में आप साम्प्रदायिकता को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:समाज में जब विचार प्रक्रिया में रोगाणु पैदा होते है तो वे साम्प्रदायिकता का रूप ले लेते है । जैसे मनुष्य बीमार होता है वैसे ही समाज में अस्वास्थ्य का लक्षण साम्प्रदायिकता होती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: समाज के लिए हिंदू साम्प्रदायिकता ज्यादा घातक है या मुस्लिम?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:किसी प्रकार की कोई भी साम्प्रदायिकता समाज के लिए घातक होती है । क्योंकि साम्प्रदायिकता तर्क के बजाय जोर जबरदस्ती और सामाजिक हिंसा पर आधारित होती है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : मुझे लगता है इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया दोनों ने मात्र मुस्लिम को ही आतंकवादी के तौर पर पेश किया है। क्या आप को नही लगता की इस सन्दर्भ में मीडिया वालो ने अपनी अति रंजित भूमिका निभाई है ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:यह बात तो सच है। समाज की तरह मीडिया में भी अर्धशिक्षित और अल्प शिक्षित लोगो की बहुतायत है। समाज को लेकर उनके विचार गंभीर नही होते । फूटपाथी विचारधारा ही उन पर हावी होती है। यही वजह है की वे विवेक से काम लेते नही दिखते। मीडिया के अधिकांश लोग चूंकि हिंदू है। इसलिए वे एक हिंदू की तरह ही सोचते है और ये नतीजे निकाल लेते है की जो हिंदू नही है वह ग़लत है । इसी आधार पर उन्होंने मुसलमानों को सांप्रदायिक मान लिया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास :आज यह आम धारणा बन कर रह गई है की हिन्दी पत्रकारिता करनी है तो हिंदू बनकर करना होगा,ठीकउसी तरह जिस तरह से उर्दू पत्रकारिता मुसलमान बनकर की जाती है । क्या आप को नही लगता की आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया अपनी अतिवादी भूमिका के कारण जनता की दृष्टि में अविश्वसनीय होते जा रहे है ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:अविश्वसनीयता की बात तो सही है आप की । लेकिन उनका महत्त्व इसलिए बना हुआ है की अर्ध्शिक्षा या कुशिक्षा बहुत प्रभावी भूमिका अदा करती है । गहरे विचार समाज में लोकप्रिय नही होते । यही स्तिथि मीडिया में काम करने वाले लोगो की भी होती है । यही वजह है की वे अधिकांशत: सतही रह जाते है। सामाजिक चेतना न तो उनमें होती है और नही वे सामाजिक चेतना दे पाते है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास:क्या आप को लगता है की समाज के शिक्षित होने के साथ समाज की यह तस्वीर बदल जायेगी?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्रराक्षस:अर्ध शिक्षा किसी भी युग में समाप्त नही होती। इतिहास में किसी युग में समग्र शिक्षित समाज का उदाहरण नही मिलता है समाज अधिकांश:लोकप्रियता पर चलता है । अन्तर यही होता है की अगर समाज को चलने वाला महत्वपूर्ण विचारक है तो उसकी बात नीचे तक जाती है. आज समाज में जो लोग ऊपर है वे ख़ुद भी वैचारिक दृष्टि से अर्ध शिक्षित या कुशिक्षित है। इसलिए समाज में अर्धशिक्षित या कुशिक्षित ही लोकप्रिय है ,जिसकी आड़ में हमारे राजनेता और धर्म के ठेकेदार काजी पंडित अपना-अपना उल्लू सीधा करते है। समाज में आतंक पैदा करते है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास:इस वक़्त आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी कहा जा रहा है प्रकारांतर से अब मुस्लिम समाज कोऔर इसके पूर्व सिखों को आतंवादी कहकर प्रताडित किया जाता रहा है । क्या आपको नही लगता है की हमारी सरकार की सोच अंग्रेजो की दस्ता से आज भी मुक्त नही हो पाई है क्योंकि वे भी पहले तमाम जातियों औरइलाको को अपने स्वार्थवश अपराधी घोषित किया करते थे और आज हमारी सरकार और मीडिया मिलकर इसीदुष्प्रचार को हवा दे रहे है । इस पर आप कुछ कहें । </strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है । आज यह बात छुपी नही है की पंजाब का आतंकवाद ख़ुद तत्कालिन सरकार की देन या उस समय तक जिसे पंजाब के आतंकवाद का सबसे बड़ा करता धरता मन गया ,वह भिन्दर्वाला स्वयं कांग्रेस की देन था। दुनिया में अगर मुसलमानों को फिलिस्तीन से बेदखल करके इसराइल या यहूदी राज न बनाया गया होता तो मुसलमान युवा , हथियार न उठाते । सब जानते है की अमेरिका ने मध्य एशिया की इराक , बेरुत और अफ्गानिश्तान सहित इस्लामी देशो में भयानक अत्याचार न किए होते तो जिसे आज अमेरिका इस्लामी आतंकवाद कह रहा है उसके यह हालत न होती । जब पहल किए हो तो उसका दुष्परिणाम भोगना ही होगा । भारत में साथ के दशक से वामपंथी युवा ने हथियार उठाये । जिसे नक्सल वर्ग कहा जा रहा है। क्योंकि गावो में सामंती समाज ने जो भयानक अत्याचार किए उन्हें सरकार ने कभी नही रोका बल्कि अत्याचारी सामंतो किया साथ पुलिस प्रशाशन ने दिया । ऐसे हालत में जुल्म करने वालो ने हथियार उठाये। देश के सारे ही पूर्वोत्तर राज्यों में ख़ुद हमारी सरकार भयानक अत्याचार और आतंकवाद की जिम्मेदार है । ऐसे स्तिथि में आतंकवाद की आलोचना न्याय सांगत नही । इस प्रदेश में आज जो शाशन है वह पिचले लंबे अर्शे से हिंदुत्व की सहायता करता रहा है। आखिर मायावती ने नरेंद्र मोदी के साथ चुनाव प्रचार किया था और एक तरह से गुजरात के मुसलमानों के नरसंहार का समर्थन किया था । मायावती सरकार से यही उम्मीद की जा सकती है की वह हर ऐसे क्षेत्र को आतंवाद की नस्सेरी बता दे ,जहाँ लोग उससे सहमत नही है। अभी मायावती ने सिर्फ़ आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी बाते है वह समय दूर नही जब वह देवरिया से लेकर सारे ही पूर्वी उत्तर प्रदेश को आतंकवाद की नर्सरी बता दे ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: आज अन्तर्रष्ट्रीय <strong>स्तर </strong> पर आतंकवाद का जो कहर <strong>बरस </strong> रहा है उसके मूल में लोग I.S.I की भूमिका को लगातार चिन्हित करते है । इस सन्दर्भ में कुछ कहें । </strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस : यह सिर्फ़ हिंदू प्रचार है । I.S.I ने जो कुछ किया है उसे सिर्फ़ आरूप के रूप में ही बताया जा रहा है। प्रमाद आज तक कोई नही दिया गया। I.S.I से ज्यादा भयानक भूमिका इस्राइल के मोशाद की है । जिसने सीधा संपर्क विश्व हिंदू परिषद् से बनाया हुआ है, किंतु इस पर कभी कोई चर्चा नही करता ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: अभिनव भारत ,सरस्वती शिशु मन्दिर ,बजरंग दल अगर आज आतंकवादी संगठन है तो क्यासिमी,मकतब और मदसे आतंकवाद की जुंनानी नही है ?यदि दोनों की भूमिका एक सी है तो एक दूसरे से शिकायत क्यों ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्रराक्षस: वैसे तो यह सच ख़ुद एक ऐतेहासिक विद्रूप है । हिंदू आतंकवाद को लेकर मैं लगातार लिखता रहा हूँ और यह भी लिखा है की जिसे मुसलमानों का विस्फोट माना जा रहा है ,उनके पीछे हिंदू संगठन ही है । आज ख़ुद सरकार को भी यह अनुभव हो रहा है । सिमी से ज्यादा खतरनाक बजरंग दल है । उसकी कारगुजारिया उङीसा और कर्नाटक ही नही सारे देश में देखी जाती रही है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : इन दिनों हिंदू और उसके विभिन्न आनुषांगिक संगठनो को बिना प्रमाण के आतंकवादी घोषित किया जा रहा है । क्या आप को नही लगता की हमारी सरकार इस दृष्टि को अपना कर अल्पसंख्यको को मरहमलगा उनका वोट बैंक हथियाने की साजिश कर रही है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:यह बात पूरी तरह ग़लत है । आज से दो साल पहले नांदेड का उदाहरण देते हुए मैंने लिखा था की हिंदू संगठन खतरनाक हो चुके है आज सारे प्रमाण सामने है । नांदेड में बम बनाते वक़्त का विष्फोट हो या कानपूर का या फिर मालेगाव का,इन सभी में मौके पर हिंदू युवक ही मरे। उन स्थानों से भारी मात्र में बम बनने की सामग्री ,इस्लामी दाधिया,टोपिया और लुन्गीय बरामद हुई । यानी की हिंदू युवक मुस्लिम वेश बनाकर विष्फोट करते थे । मालेगाव विष्फोट में जो मोटरसाईकिल इस्तेमाल हुई थी ,वह किसी मुस्लमान की तो नही थी? और अब किस तरह का प्रमाण चाहिए ,हिंदू आतंकवाद को सिद्ध करने के लिए । इस देश के सारे विस्फोटो की जांच होनी चाहिए ।<br />
लेकिन होता यह है की ऐसे विस्फोटो की साड़ी जांच पड़ताल गड्ढे में दबा दी जाती है । ऐसी स्तिथि में आतंकवाद के सच को सामने लाना भी जटिल होता जा रहा है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : क्या कारण है की जब-जब चुनाव या राष्ट्रिय पर्व नजदीक आते है आतंकवादी गतिविधिया बढ़जाती है और मीडिया उनका डरौना दिखलाता है,आखिर क्यों ?उसके पहले या बाद में क्यों नही?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: ये सच नही है। पहले और बाद में भी यही होता रहा है । यह अलग बात है की जब चुनाव आते है तो लोग सब कुछ चुनाव से जोड़कर छुट्टी पा लेते है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास :इधर जितने भी विष्फोट या विभिन्न देशो के राष्ट्राध्यक्षों ,प्रधानमंत्रियो की जो हत्याएँ हुई हैउनमें अक्सर C.I.A को जोड़ा जाता रहा है । इस सन्दर्भ में कुछ कहें ।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: C.I.A का काम बहुत लंबे समय तक पूरी दुनिया में बहुत कहाराब रहा है। ख़ुद अमेरिका में भी C.I.A के विरूद्व काफी लिखा गया है। इधर C.I.A ख़ुद चर्चा में इसलिए नही है की उसकी भूमिका ख़ुद अमेरिकी सरकार अदा करती रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">() () ()</p>
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		<title>स्वामी अनंत बोध कितनी से सीधीबात</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jul 2011 06:10:53 +0000</pubDate>
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सनातन धारा फ़ाउंडेशनपू्ज्य महाराज श्रीश्री यंत्र मंदिरअनंत बोध</strong></p>
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