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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; लोकमंच</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>देवी व्रत में कुमारी पूजन परम आवश्यक माना गया है</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Mar 2012 06:46:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[लोकमंच]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[धर्म-संस्कृति श्री दुर्गा सप्तशती पुस्तक का विधिपूर्वक पूजन कर इस मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए।... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/03/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">धर्म-संस्कृति</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://static.webdunia.com/mwdimages/thumbnail/image/izizi//mywebdunia/UserData/DataB/bhavishyawani/images/durgaaarti.jpg" alt="" width="265" height="393" />श्री दुर्गा सप्तशती पुस्तक का विधिपूर्वक पूजन कर इस मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।<br />
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्‌।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें। देवी व्रत में कुमारी पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो नवरात्रि भर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन नौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवी रूप मानकर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारुचि मिष्ठान भोजन कराना चाहिए एवं वस्त्रादि से सत्कार करना चाहिए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कुमारी पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का अर्चन विशेष महत्व रखता है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा स्वरूपा होती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दुर्गा पूजा में प्रतिदिन की पूजा का विशेष महत्व है जिसमें प्रथम शैलपुत्री से लेकर नवम्‌ सिद्धिदात्री तक नव दुर्गाओं की नव शक्तियों का और स्वरूपों का विशेष अर्चन होता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">दुर्गा सप्तशती</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दुर्गा अर्थात दुर्ग शब्द से दुर्गा बना है , दुर्ग =किला ,स्तंभ , शप्तशती अर्थात सात सौ | जिस ग्रन्थ को सात सौ श्लोकों में समाहित किया गया हो उसका नाम शप्तशती है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">महत्व -जो कोई भी इस ग्रन्थ का अवलोकन एवं पाठ करेगा “माँ जगदम्बा” की उसके ऊपर असीम कृपा होगी |</span></h3>
<h3><span style="text-align: justify; font-weight: normal;">कथा – “सुरथ और “समाधी ” नाम के राजा एवं वैश्य का मिलन किसी वन में होता है ,और वे दोनों अपने मन में विचार करते हैं, कि हमलोग राजा एवं सभी संपदाओं से युक्त होते हुए भी अपनों से विरक्त हैं ,किन्तु यहाँ वन में, ऋषि के आश्रम में, सभी जीव प्रसन्नता पूर्वक एकसाथ रहते हैं | यह आश्चर्य लगता है ,कि क्या कारण है ,जो गाय के साथ सिंह भी निवास करता है, और कोई भय नहीं है,जब हमें अपनों ने परित्याग कर दिए, तो फिर अपनों की याद क्यों आती है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वहाँ ऋषि के द्वारा यह ज्ञात होता है ,कि यह उसी ” महामाया ” की कृपा है ,सो पुनः ये दोनों ” दुर्गा” की आराधना करते हैं ,और “शप्तशती ” के बारहवे अध्याय में आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ,और अपने परिवार से युक्त भी हो जाते हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignright" src="http://static.webdunia.com/mwdimages/thumbnail/image/izizi//mywebdunia/UserData/DataB/bhavishyawani/images/durga_vandana.jpg" alt="" width="208" height="134" />1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।<br />
2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।<br />
3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।<br />
4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।<br />
5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।<br />
6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा हटाने के लिये।<br />
7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।<br />
8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।<br />
<img class="alignright" src="http://3.bp.blogspot.com/_bqaqLJewmGY/TKIU2SgJLPI/AAAAAAAAAEk/9IzU-s1Ru8g/S350/durga_stuti.jpg" alt="" width="208" height="86" />9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।<br />
10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।<br />
11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।<br />
12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।<br />
13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।<br />
वशीकरण के लिए आवश्यक साधना एकांत में ओर गुप्त होती है</span></h3>
<h2>प० राजेश कुमार शर्मा</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भृगु ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र<br />
सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट 09359109683</span></h3>
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		<title>भारतीय संस्कृति में होली के विभिन्न रंग</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Mar 2012 07:57:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। त्यौहार... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/03/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/03/holi.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7263" title="holi" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/03/holi-300x193.jpg" alt="" width="300" height="193" /></a>भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। त्यौहार जीवन के उत्सव हैं। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ हँसी-खुशी मनाते हैं। उत्सव जीवन की लय और निरंतरता बनाते हैं। उत्सव मनते रहें इसलिए त्योहार इनके बहाने हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। होली के रंग हमें प्रकृति से जोड़ते हैं। वसंत की फगुनाई के बीच घनी भूरी टहनियों पर हरे पत्तों के बीच चटक नांरगी रंग के टेसू के फूल इस उल्लास को और भी बढ़ा देते हैं। आखिर होली के रंग बनाने की शुरुआत तो इन्हीं टेसू के फूलों से ही हुई है। यह होली के समय कहाँ से और कैसे आते हैं, कोई नहीं जानता है? पर हर होली के समय आकर ये एक खुशी जरुर दे जाते हैं। जीवन के उत्सवों की भाँति इनका आना-जाना होली के रंग को और भी चटक बना जाता है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला होली पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे़ व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरणकश्यप को यह घमंड था कि उससे सर्वश्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अतः लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरणकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरणकश्यप ने प्रहलाद को प्रताडि़त करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षित बच निकला। अंततः हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक जादुई चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते जादुई चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियांे ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिकादहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सर्दी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंततः भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकडि़याँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है। परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारांे ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वंृदावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धूलैड़ी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">फागुन में जब रंगों की फुहारें भगवान श्री कृष्ण के बरसाने के होली उत्सव की याद दिलाती हैं तो रामलीला का आयोजन कुछ अजीब लगता है, लेकिन बरेली शहर में होली के रंगों में भगवान राम के आदर्श भी गूंजते हैं। 150 से भी अधिक साल से यहाँ फागुन में वमनपुरी की रामलीला होती आ रही है। संभवतः देश में यह अकेला ऐसी रामलीला है जो होली के उपलक्ष्य में होती है। यहांँ चैत्र कृष्ण एकादशी पर रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और धुलंडी के दिन तक रोज विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। रामलीला का समापन नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा के साथ होता है। होली के दिन रामलीला से निकलने वाली राम बारात शहर में अनूठे रंग बिखेरती है। इसमें सौहार्द के फूल बरसते हैं। हिन्दू हो या मुस्लिम सभी पुष्पवर्षा कर राम बारात का स्वागत करते हैं। फागुनी फिजाओं में रामलीला का यह उत्सव वाकई अद्भुत है। इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आन्नद लेते हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत र्में अिग्न प्रज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कानपुर में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह गाँवों में पाँच दिन बाद होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में जंग आरम्भ हो गई। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली खेलेंगे, तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। इसी प्रकार वर्ष 1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ, जागेश्वर त्रिवेदी, पं0 मंुशीराम शर्मा ‘सोम’, रघुबर दयाल, बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफतार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरफ्तारी का कानपुर की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस समय ‘अनुराधा-नक्षत्र’ लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची, लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पग-पग पर बदले बोली, पग-पग पर बदले भेष, वाले भारतवर्ष में होली का त्यौहार धूम-धाम से विभिन्न रंगों में मनाया जाता है। भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माॅल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आॅफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैंैं पर अंततः इस पर्व का उद््देश्य मानव-कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। नए वó, नया श्रृंगार और लज़ीज़ पकवानों के बीच होली पर्व मनाने का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी गिनाया जाता है कि यह पर्व के बहाने समाज एवं व्यक्तियों के अन्दर से कुप्रवृत्तियों एवं गन्दगी को बाहर निकालने का माध्यम है। होली पर खेले गए रंग गन्दगी के नहीं बल्कि इस विचार के प्रतीक हंै कि इन रंगोें के धुलने के साथ-साथ व्यक्ति अपने राग-द्वेष भी धुल दे। होली पर रंग-पुते चेहरों की भी अपनी महत्ता है। एक तरफ ये हास्य की सृष्टि में सहायक होते हैं वहीँ दूसरों को रंगने या मूर्ख बनाने की चेष्टा में खुद को रँगा जाना या मूर्ख बन जाना, रंग लगाने के बहाने थोड़ी छूट लेने के प्रयास में पकड़े जाना और उपहास का पात्र बनना-ये सब क्रिया-कलाप करने वालों को और देखने वाले को भी गुदगुदाते हैं। सही रूप में देखें तो होली के माध्यम से जीवन में व्याप्त निराशाजनक विचारों से मुक्त होकर नए आशावादी विचारों के साथ उल्लासपूर्वक जीवन का आरंभ संभव है। यही कारण है कि रंगों को धुलने के बाद लोग मस्ती में फगुआ गाते हंै और एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर भाईचारे का प्रदर्शन करते हैं। आज जब चारों तरफ आतंक और खून की होली खेली जा रही है, वहां रंगों का यह त्योहार यह सन्देश भी देता है कि इंसानियत का रंग एक ही है। हंसी खुशी, उल्लास का रंग एक है।</span></h3>
<h2><img class="alignleft" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG" alt="My Photo" width="176" height="142" /></h2>
<h2>कृष्ण कुमार यादव</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भारतीय डाक सेवा<br />
निदेशक डाक सेवाएंइलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001<br />
<a href="http://kkyadav.y@rediffmail.com"> kkyadav.y@rediffmail.com</a>, <a href="www.kkyadav.blogspot.in/">www.kkyadav.blogspot.in/</a></span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>एक पत्र दयनीय आदमी के नाम&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 07 Sep 2011 05:12:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Abhishek Prasad</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दयनीय आम आदमी, सादर प्रणाम. आशा करता हूँ आप हमेशा की तरह दयनीय ही होंगे.... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/09/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/common-man.jpg" alt="common man" width="140" height="100" />दयनीय आम आदमी,<br />
सादर प्रणाम.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
आशा करता हूँ आप हमेशा की तरह दयनीय ही होंगे. मैं भी सकुशल दयनीय हूँ. मैंने आप लोगों को न ही प्रिय लिखा और न ही आदरणीय क्योंकि न ही आप लोग मुझे प्रिय है और न ही आदरणीय. मैंने नया शब्द दिया है &#8220;दयनीय&#8221; क्योंकि आप और हम सब दयनीय ही है.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
मैं सबको पत्र लिखता हूँ, सोंचा एक पत्र आप लोगों को भी लिखूं&#8230; पर ये नहीं सोंचा कि क्या लिखूं. क्योंकि आप लोगों को लिखने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है&#8230; और अगर लिख भी दिया तो फायदा क्या होगा? कुछ भी नहीं. कि हम सब आम आदमी है, हमें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
सैकड़ों की भीड़ में कोई ख़ास आदमी किसी की इज्जत उतार देता है, हम देखते रहते है. फर्क ही नहीं पड़ता. हम करोड़ों लोगों पर कुछ ख़ास सैकड़े लोग शासन करते है और हमारा शोषण करते है, हम चुपचाप ख़ामोशी से सहते रहते है. फर्क ही नहीं पड़ता. कुछ हजार नेता मिलकर हमसे झूठे वाडे करते है, हमारा शोषण करते है, हमें ही बेच कर खाते है. हम कुछ नहीं करते, चुपचाप चादर तान कर  जाते है है. फर्क ही नहीं पड़ता.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
कुछ हजार भ्रष्ट लोग हमारे ही काम के लिए हमसे ही घुस लेते है, हमारा दोहन करते है और हम ख़ामोशी रहते है, आवाज नहीं उठाते. क्या करें फर्क ही नहीं पड़ता. देश का तीसरा स्तम्भ रोज ख़बरों और भविष्यवाणी के नाम पर हमें डराता है. हम सिर्फ डरते है करते कुछ नहीं. कुछ गुंडे रोज हमें धमकाते है, हम चुपचाप सहते है. फर्क ही नहीं पड़ता.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हम करोड़ों लोगों के सामने किसी अबला की इज्जत उतार दी जाती है और हम गांधी के बन्दर बन जाते है. कुछ आतंकवादी, नक्सलवादी रोज हमें मारते है. हम चुपचाप मरते है करते कुछ नहीं. फर्क ही नहीं पड़ता. हम घर के अन्दर बैठ कर प्रशासन को, व्यवस्था को, सरकार को दोष दे सकते है कर कुछ नहीं सकते.   हम आम आदमी जन्म लेते है, करोड़ों-अरबों की भीड़ में धक्का-मुक्की करते हुए जीवन भर चलते है और एक दिन गुमनाम मौत मर जाते है पर करते कुछ नहीं. फर्क ही नहीं पड़ता.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हम आम आदमी की भीड़ में से अगर कोई ख़ास बनने की कोशिश भी करता है तो हम आम आदमी उसके पैर पकड़ कर उसे गिरा देते है. हम आम आदमी है और अपने बीच से किसी को ख़ास बनते देखना हमें गवारा नहीं है. हम आम आदमी ही बने रहना चाहते है. एक दयनीय आम आदमी क्योंकि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
आम आदमी से मैं बस एक नम्र निवेदन करना चाहूँगा कि वे आम आदमी ही बने रहे, दयनीय ही बने रहे. आदरणीय न बने. बेकार में दुसरे आम आदमियों को कष्ट होगा.<br />
आप ही की तरह एक दयनीय<br />
अभिषेक प्रसाद &#8216;अवि&#8217;</span></h3>
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		<title>एक पत्र राष्ट्रपति के नाम&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Sep 2011 06:37:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Abhishek Prasad</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आदरणीय महामहिम राष्ट्रपति महोदया, कई दिनों से सोंच रहा था आपको एक पत्र लिखूं, पर... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/09/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/09/160px-PratibhaIndia.jpg" alt="160px-PratibhaIndia" width="160" height="275" />आदरणीय महामहिम राष्ट्रपति महोदया,</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
कई दिनों से सोंच रहा था आपको एक पत्र लिखूं, पर शायद हिम्मत साथ नहीं दे रही थी. आज बहुत हिम्मत जुटा कर आया हूँ आपको ये पत्र लिखने&#8230; बातें बहुत सी है जो आपसे कहना चाहता हूँ. पर एक ही पत्र में इतनी सारी अगर बातें लिख दी तो आप बोर हो जाएँगी&#8230;. इसलिए सिर्फ एक मुद्दे को उठा रहा हूँ. शायद मेरी बात आपको बुरी न लगे.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
मैं आज बात करना चाहता हूँ हमारे पुलिस डिपार्टमेंट की&#8230; मैम अगर आप देखे तो बहुत सी कमियाँ आपको नजर आएँगी हमारी पुलिस में. उनके काम करने का ढंग (जो वो कभी करते ही नहीं है), उनकी छवि, उनके व्यक्तित्व में बहुत सी कमियाँ है. पुलिस का काम होता है लोगों की रक्षा करना, एक भय-मुक्त समाज देना. पर आज सबसे ज्यादा भय आम आदमी को पुलिस से ही है. लोगों को अपनी रक्षा उनसे ही करनी है. हर चौराहे को पार करते वक़्त आम आदमी के मन में एक भय रहता है कि उसका सामना किसी पुलिस से न हो जाये. आज पुलिस गुंडों के ज्यादा विश्वासी नजर आते है.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
सेना में सैनिकों की रिटायर्मेंट आयु शायद ३५ साल होती है, उन्हें कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है, उन्हें चुस्त-दुरुस्त रखा जाता है देश के बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए&#8230; फिर यही सब पुलिस के साथ क्यों नहीं होता क्योंकि पुलिस का काम भी तो दुश्मनों से लड़ने का ही है. मैं आज तक जहाँ भी गया हूँ कहीं के पुलिस को देखकर मेरे मन में श्रधा के भाव उत्तपन नहीं हुए है. गोल-मटोल, थुलथुले शरीर को देखकर अनायास ही मन में एक भय उत्तपन हो जाता है कि ये पुलिस हमारी रक्षा कैसे करेंगे&#8230; उम्र के हिसाब से उनका शरीर कमजोर पड़ता जाता है. क्यों नहीं पुलिस डिपार्टमेंट में भी रिटायर्मेंट आयु ३५ साल कर दी जाये&#8230; इससे दो फायदे होंगे एक तो चुस्त-दुरुस्त पुलिस हमें मिलेगी, जो हर परिस्थिति में दुश्मनों से लड़ने के लिए सक्षम रहेगी और कई नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. नौजवान और युवा लोग डिपार्टमेंट में रहेंगे तो भ्रष्टाचार भी कम होगा और भयमुक्त समाज बनाने में उनकी उपयोगिता भी ज्यादा रहेगी&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हर नाके पर दो हवालदार आराम से देखे जा सकते है जो आने जाने वाले वाहनों से टोकन यानी १०-२० रुपये लेते हुए आसानी से इस देश में देखे जा सकते है. चाहे ट्रैफिक पुलिस हो या आम हवालदार ५० रुपये देकर आसानी से काम चलाया जा सकता है. मैं मानता हूँ कि घुस लेना उनकी मजबूरी है क्योंकि उन्हें भी ऊपर से दबाव रहता है. पर ये दबाव कम क्यों नहीं किया जाता? हमारी पुलिस को आधुनिक क्यों नहीं बनाया जाता?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
महामहिम आपसे नम्र निवेदन कि ज़रा सा सोंचिये&#8230; आखिर भ्रष्टाचार का क्या कारण है? कैसे इस भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जा सकता है? कैसे आम आदमी का भय मिटाया जा सकता है उनके ही रक्षकों से?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
मैं आशा करता हूँ कि आप मेरी बातों पर जरूर गौर करेंगी. कोई बात अगर मैंने गलत लिखी हो तो माफ़ी की आशा करूँगा.<br />
एक भारतीय,<br />
अभिषेक प्रसाद &#8216;अवि&#8217;</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>देवेन्द्र ओझा के कार्टून्स: संसद का मॉनसून सत्र</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Aug 2011 07:41:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[cartoons]]></category>
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		<description><![CDATA[]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_5851" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/1-augest-20111.jpg"><img class="size-medium wp-image-5851 " title="1 augest 2011" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/1-augest-20111-300x211.jpg" alt="" width="300" height="211" /></a><p class="wp-caption-text">संसद का मॉनसून सत्र ....०१ अगस्त २०११ </p></div>
<div id="attachment_5849" class="wp-caption alignnone" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/2-augest-2011-11.jpg"><img class="size-medium wp-image-5849" title="2 augest 2011 (1)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/2-augest-2011-11-300x218.jpg" alt="" width="300" height="218" /></a><p class="wp-caption-text">संसद का मॉनसून सत्र ....०२ अगस्त २०११ </p></div>
<div id="attachment_5852" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/3-augest-2011-copy-12.jpg"><img class="size-medium wp-image-5852 " title="3 augest 2011 copy (1)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/3-augest-2011-copy-12-300x213.jpg" alt="" width="300" height="213" /></a><p class="wp-caption-text">संसद का मॉनसून सत्र ....०३ अगस्त २०११ </p></div>
<div id="attachment_5847" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/4-augest-2011-copy1.jpg"><img class="size-medium wp-image-5847 " title="4 augest 2011 copy" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/4-augest-2011-copy1-300x218.jpg" alt="" width="300" height="218" /></a><p class="wp-caption-text">संसद का मॉनसून सत्र ....०४ अगस्त २०११ </p></div>
<div id="attachment_5846" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/5-aug-20111.jpg"><img class="size-medium wp-image-5846 " title="5 aug 2011" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/5-aug-20111-300x212.jpg" alt="" width="300" height="212" /></a><p class="wp-caption-text">संसद का मॉनसून सत्र ....०५ अगस्त २०११ </p></div>
<p><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/4-augest-2011-copy.jpg"></a><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/3-augest-2011-copy-1.jpg"></a><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/3-augest-2011-copy-11.jpg"><br />
</a></p>
<div id="attachment_5854" class="wp-caption alignleft" style="width: 175px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/DSCN6259.jpg"><img class="size-full wp-image-5854 " title="DSCN6259" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/DSCN6259.jpg" alt="" width="165" height="220" /></a><p class="wp-caption-text">Devendra ojhacartoonist and comics artist. Comics Trainer WORLD COMICS INDIA. click hair my blog...address... http://devendra-ojha.blogspot.com/ town-Khatima , village- bhurai Udham singh nagar Uttarakhand.  </p></div>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>लोक संस्कृति की लय है कजरी</title>
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		<pubDate>Mon, 18 Jul 2011 08:26:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[लोकमंच]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[भारतीय परम्परा का प्रमुख आधार तत्व उसकी लोक संस्कृति है। यहाँ लोक कोई एकाकी धारणा... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%af-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%95%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/23254-300x245.jpg" alt="23254" width="300" height="245" />भारतीय परम्परा का प्रमुख आधार तत्व उसकी लोक संस्कृति है। यहाँ लोक कोई एकाकी धारणा नहीं है बल्कि इसमें सामान्य-जन से लेकर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, ऋतुएं, पर्यावरण, हमारा परिवेश और हर्ष-विषाद की सामूहिक भावना से लेकर श्रृंगारिक दशाएं तक शामिल हैं। ‘ग्राम-गीत‘ की भारत में प्राचीन परंपरा रही है। लोकमानस के कंठ में, श्रुतियों में और कई बार लिखित-रूप में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते रहते हैं। पं. रामनरेश त्रिपाठी के शब्दों में-‘ग्राम गीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं, केवल रस है। छन्द नहीं, केवल लय है। लालित्य नहीं, केवल माधुर्य है। ग्रामीण मनुष्यों के स्त्री-पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति मानो गान करती है। प्रकृति का यह गान ही ग्राम गीत है&#8230;.।’ इस लोक संस्कृति का ही एक पहलू है- कजरी। ग्रामीण अंचलों में अभी भी प्रकृति की अनुपम छटा के बीच कजरी की धारायें समवेत फूट पड़ती हैं। यहाँ तक कि जो अपनी मिटटी छोड़कर विदेशों में बस गए, उन्हें भी यह कजरी अपनी ओर खींचती है। तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन इत्यादि देशों में भी अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी है। सावन के मतवाले मौसम में कजरी के बोलों की गूंज वैसे  भी दूर-दूर तक सुनाई देती है -</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>रिमझिम बरसेले बदरिया,<br />
गुईयां गावेले कजरिया<br />
मोर सवरिया भीजै न<br />
वो ही धानियां की कियरिया<br />
मोर सविरया भीजै न।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/jhule021-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />वस्तुतः ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है बल्कि यह सावन मौसम की सुन्दरता  और  उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है। चरक संहिता में तो यौवन की संरक्षा व सुरक्षा हेतु बसन्त के बाद सावन महीने को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। सावन में नयी ब्याही बेटियाँ अपने पीहर वापस आती हैं और बगीचों में भाभी और  बचपन की सहेलियों संग कजरी गाते हुए झूला झूलती हैं-<br />
<strong> घरवा में से निकले ननद-भउजईया<br />
जुलम दोनों जोड़ी साँवरिया।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">छेड़छाड़ भरे इस माहौल में जिन महिलाओं के पति बाहर गये होते हैं, वे भी विरह में तड़पकर गुनगुना उठती हैं ताकि कजरी की गूँज उनके प्रीतम तक पहुँचे और शायद वे लौट आयें-<br />
<strong> सावन बीत गयो मेरो रामा<br />
नाहीं आयो सजनवा ना।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
भादों मास पिया मोर नहीं आये<br />
रतिया देखी सवनवा ना।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यही नहीं जिसके पति सेना में या बाहर परदेश में नौकरी करते हैं, घर लौटने पर उनके सांवले पड़े चेहरे को देखकर पत्नियाँ कजरी के बोलों में गाती हैं -<br />
<strong> गौर-गौर गइले पिया<br />
आयो हुईका करिया<br />
नौकरिया पिया छोड़ दे ना।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एक मान्यता के अनुसार पति विरह में पत्नियाँ देवि ‘कजमल’ के चरणों में रोते हुए गाती हैं, वही गान कजरी के रूप में प्रसिद्ध है-<br />
<strong> सावन हे सखी सगरो सुहावन<br />
रिमझिम बरसेला मेघ हे<br />
सबके बलमउवा घर अइलन<br />
हमरो बलम परदेस रे।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/30-dancing-women200-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />नगरीय सभ्यता में पले-बसे लोग भले ही अपनी सुरीली धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी अभी भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की खास लोक संगीत विधा है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है-<br />
<strong> बीरन भइया अइले अनवइया<br />
सवनवा में ना जइबे ननदी।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
रिमझिम पड़ेला फुहार<br />
बदरिया आई गइले ननदी।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विंध्य क्षेत्र में गायी जाने वाली मिर्जापुरी कजरी की अपनी अलग पहचान है। अपनी अनूठी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसन्द करते हैं। इसमें सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया<br />
रंग रहे कपूरी पिया ना<br />
जबसे साड़ी ना लिअईबा<br />
तबसे जेवना ना बनईबे<br />
तोरे जेवना पे लगिहेैं मजूरी पिया<br />
रंग रहे कपूरी पिया ना।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/kajli_teej_310_011_f-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />विंध्य क्षेत्र में पारम्परिक कजरी धुनों में झूला झूलती और सावन भादो मास में रात में चौपालों में जाकर स्त्रियाँ उत्सव मनाती हैं। इस कजरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं और इसकी धुनों व पद्धति को नहीं बदला जाता। कजरी गीतों की ही तरह विंध्य क्षेत्र में कजरी अखाड़ों की भी अनूठी परम्परा रही है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू पूजन के बाद इन अखाड़ों से कजरी का विधिवत गायन आरम्भ होता है। स्वस्थ परम्परा के तहत इन कजरी अखाड़ों में प्रतिद्वन्दता भी होती है। कजरी लेखक गुरु अपनी कजरी को एक रजिस्टर पर नोट कर देता है, जिसे किसी भी हालत में न तो सार्वजनिक किया जाता है और न ही किसी को लिखित रूप में दिया जाता है। केवल अखाड़े का गायक ही इसे याद करके या पढ़कर गा सकता है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> कइसे खेलन जइबू<br />
सावन मंे कजरिया<br />
बदरिया घिर आईल ननदी<br />
संग में सखी न सहेली<br />
कईसे जइबू तू अकेली<br />
गुंडा घेर लीहें तोहरी डगरिया।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बनारसी और मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी की अपनी अलग ही टेक है और यह ‘हरे रामा‘ और ‘ऐ हारी‘ के कारण अन्य कजरी से अलग पहचानी जाती है-<br />
<strong> हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी<br />
पहिर के सारी, ऐ हारी।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सावन की अनुभूति के बीच भला किसका मन प्रिय मिलन हेतु न तड़पेगा, फिर वह चाहे चन्द्रमा ही क्यों न हो-<br />
<strong> चन्दा छिपे चाहे बदरी मा<br />
जब से लगा सवनवा ना।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है। फिर यही तो समय होता है  इतराने का, फरमाइशें पूरी करवाने का-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से<br />
जायके साइकील से ना<br />
पिया मेंहदी लिअहिया<br />
छोटकी ननदी से पिसईहा<br />
अपने हाथ से लगाय दा<br />
कांटा-कील से<br />
जायके साइकील से।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
धोतिया लइदे बलम कलकतिया<br />
जिसमें हरी- हरी पतियां।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि कजरी सिर्फ बनारस, मिर्जापुर और गोरखपुर के अंचलों तक ही सीमित है बल्कि इलाहाबाद और अवध अंचल भी इसकी सुमधुरता से अछूते नहीं हैं। कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती बल्कि खेली भी जाती है। एक तरफ जहाँ मंच पर लोक गायक इसकी अद्भुत प्रस्तुति करते हैं वहीं दूसरी ओर इसकी सर्वाधिक विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ है, जिसमें महिलायें झुक कर एक दूसरे से जुड़ी हुयी अर्धवृत्त में नृत्य करती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ अंचलों में तो रक्षाबन्धन पर्व को ‘कजरी पूर्णिमा’ के तौर पर भी मनाया जाता है। मानसून की समाप्ति को दर्शाता यह पर्व श्रावण अमावस्या के नवें दिन से आरम्भ होता है, जिसे ‘कजरी नवमी’ के नाम से जाना जाता है। कजरी नवमी से लेकर कजरी पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव में नवमी के दिन महिलायें खेतों से मिट्टी सहित फसल के अंश लाकर घरों में रखती हैं एवं उसकी साथ सात दिनों तक माँ भगवती के साथ कजमल देवी की पूजा करती हैं। घर को खूब साफ-सुथरा कर रंगोली बनायी जाती है और पूर्णिमा की शाम को महिलायें समूह बनाकर पूजी जाने वाली फसल को लेकर नजदीक के तालाब या नदी पर जाती हैं और उस फसल के बर्तन से एक दूसरे पर पानी उलचाती हुई कजरी गाती हैं। इस उत्सवधर्मिता के माहौल में कजरी के गीत सातों दिन अनवरत् गाये जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कजरी लोक संस्कृति की जड़ है और यदि हमें लोक जीवन की ऊर्जा और रंगत बनाये रखना है तो इन तत्वों को सहेज कर रखना होगा। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गायी जाती हो पर लोक रंजन के साथ ही इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। कजरी सिर्फ राग-विराग या श्रृंगार और विरह के लोक गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चर्चित समसामयिक विषयों की भी गूँज सुनायी देती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। आजादी की लड़ाई के दौर में एक कजरी के बोलों की रंगत देखें-<br />
<strong> केतने गोली खाइके मरिगै<br />
केतने दामन फांसी चढ़िगै<br />
केतने पीसत होइहें जेल मां चकरिया<br />
बदरिया घेरि आई ननदी।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">1857 की क्रान्ति पश्चात जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें कालापानी की सजा दे दी गई। अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला ‘कजरी‘ के बोलों में गाती है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी<br />
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा<br />
नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी<br />
घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियां रामा<br />
से जिया पैरोवे बारी धनिया रे हरी।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्वतंत्रता की लड़ाई में हर कोई चाहता था कि उसके घर के लोग भी इस संग्राम में अपनी आहुति दें। कजरी के माध्यम से महिलाओं ने अन्याय के विरूद्ध लोगों को जगाया और दुश्मन का सामना करने को प्रेरित किया। ऐसे में उन नौजवानों को जो घर में बैठे थे, महिलाओं ने कजरी के माध्यम से व्यंग्य कसते हुए प्रेरित किया-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु<br />
मरद से बनिके लुगइया आए हरि<br />
पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुंहवा छिपाई लेहु<br />
राखि लेई तोहरी पगरइया आए हरि।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सुभाष चन्द्र बोस ने जंग-ए-आजादी में नारा दिया कि- ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हंे आजादी दूंगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठीं। तभी तो कजरी के शब्द फूट पड़े-<br />
<strong> हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी</strong><br />
<strong> कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा<br />
हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी। </strong></p>
<p style="text-align: justify;">महात्मा गाँधी आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातने द्वारा उन्होेंने स्वावलम्बन और स्वदेशी का<br />
रूझान जगाया। नवयुवतियाँ अपनी-अपनी धुन में गाँधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानतीं और एक स्वर में कजरी के बोलांे में गातीं-<br />
<strong> अपने हाथे चरखा चलउबै<br />
हमार कोऊ का करिहैं<br />
गाँधी बाबा से लगन लगउबै<br />
हमार कोई का करिहैं।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कजरी में ’चुनरी’ शब्द के बहाने बहुत कुछ कहा गया है। आजादी की तरंगंे भी कजरी से अछूती नहीं रही हैं-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>एक ही चुनरी मंगाए दे बूटेदार पिया<br />
माना कही हमार पिया ना<br />
चद्रशेखर की बनाना, लक्ष्मीबाई को दर्शाना<br />
लड़की हो गोरों से घोड़ांे पर सवार पिया।<br />
जो हम ऐसी चुनरी पइबै, अपनी छाती से लगइबे<br />
मुसुरिया दीन लूटै सावन में बहार पिया<br />
माना कही हमार पिया ना।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
पिया अपने संग हमका लिआये चला<br />
मेलवा घुमाये चला ना<br />
लेबई खादी चुनर धानी, पहिन के होइ जाबै रानी<br />
चुनरी लेबई लहरेदार, रहैं बापू औ सरदार<br />
चाचा नेहरू के बगले बइठाये चला<br />
मेलवा घुमाये चला ना<br />
रहइं नेताजी सुभाष, और भगत सिंह खास<br />
अपने शिवाजी के ओहमा छपाये चला<br />
जगह-जगह नाम भारत लिखाये चला<br />
मेलवा घुमाये चला ना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपभोक्तावादी बाजार के ग्लैमरस दौर में कजरी भले ही कुछ क्षेत्रों तक सिमट गई हो पर यह प्रकृति से तादातम्य का  गीत है और इसमें कहीं न कहीं पर्यावरण चेतना भी मौजूद है। इसमें कोई शक नहीं कि सावन प्रतीक है सुख का, सुन्दरता का, प्रेम का, उल्लास का और इन सब के बीच  कजरी जीवन के अनुपम क्षणों को अपने में समेटे यूं ही रिश्तोें को खनकाती रहेगी और झूले की पींगों के बीच छेड़-छाड़ व मनुहार यूँ ही लुटाती रहेगी। कजरी हमारी जनचेतना की परिचायक है और जब तक धरती पर हरियाली रहेगी कजरी जीवित रहेगी। अपनी वाच्य परम्परा से जन-जन तक पहुँचने वाले कजरी जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन में तेजी से मिटते मूल्यों को भी बचाया जा सकता है।</p>
<h2><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/KKY_001-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></span><strong> </strong></h2>
<h2></h2>
<h2><strong>कृष्ण कुमार यादव</strong></h2>
<p><strong> </strong></p>
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<p><a href="mailto:kkyadav.y@rediffmail.com"></a> <a href="http://kkyadav.blogspot.com/">http://kkyadav.blogspot.com/</a></p>
<p><strong> </strong><strong></strong></p>
<p style="text-align: justify;">सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक.प्रशासन के साथ हिंदी साहित्य में भी दखलंदाजी. जवाहर नवोदय विद्यालय-आज़मगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1999 में राजनीति-शास्त्र में परास्नातक. समकालीन हिंदी साहित्य में नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, आजकल, वर्तमान साहित्य, उत्तर प्रदेश, अकार, लोकायत, गोलकोण्डा दर्पण, उन्नयन, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, आज, द सण्डे इण्डियन, इण्डिया न्यूज,शुक्रवार, अक्षर पर्व, युग तेवर, मधुमती, गोलकोंडा दर्पण, इन्द्रप्रस्थ भारती, शेष, अक्सर, आधारशिला इत्यादि सहित 250 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं व सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, लिटरेचर इंडिया, हिंदीनेस्ट, कलायन इत्यादि वेब-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन. आकाशवाणी पर कविताओं के प्रसारण के साथ तीन दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में कवितायेँ प्रकाशित. एक काव्यसंकलन &#8220;अभिलाषा&#8221; सहित दो निबंध-संकलन &#8220;अभिव्यक्तियों के बहाने&#8221; तथा &#8220;अनुभूतियाँ और विमर्श&#8221; एवं संपादित कृति &#8220;क्रांति-यज्ञ&#8221; का प्रकाशन. व्यक्तित्व-कृतित्व पर &#8220;बाल साहित्य समीक्षा(कानपुर)&#8221; व &#8220;गुफ्तगू(इलाहाबाद)&#8221; पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी.शोधार्थियों हेतु व्यक्तित्व-कृतित्व पर इलाहाबाद से &#8220;बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव&#8221; (सं0- दुर्गाचरण मिश्र) प्रकाशित.</p>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>बस्‍तर के पर्याय : गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’</title>
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		<pubDate>Sat, 16 Jul 2011 05:05:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लेखन की दुनियां में बस्‍तर सदैव लोगों के आर्कषण का केन्‍द्र रहा है। अंग्रेजी और... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%85/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://1.bp.blogspot.com/_Xux8yOdGE_M/S-vhI-odlDI/AAAAAAAADK8/BO1Wo48inZA/s1600/Kala%20Jal.jpg" alt="" width="280" height="442" />लेखन की दुनियां में बस्‍तर सदैव लोगों के आर्कषण का केन्‍द्र रहा है। अंग्रेजी और हिन्‍दी में उपलब्‍ध बस्‍तर साहित्‍य के द्वारा संपूर्ण विश्‍व नें बस्‍तर की प्राकृतिक छटा और निच्‍छल आदिवासियों को समझने-बूझने का प्रयास किया है। साठ के दसक में छत्‍तीसगढ़ के इस भूगोल को हिन्‍दी साहित्‍य के क्षितिज पर चर्चित करने वाले अप्रतिम शब्‍द शिल्‍पी गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’ भी ऐसे ही साहित्‍यकार थे। शानी नें तत्‍कालीन बस्‍तर के उपेक्षित यथार्थ को कथा रचनाओं की शक्‍ल दी थी। जवानी की दहलीज में ही शानी के चार उपन्‍यास आठ कथा संग्रह और एक संस्‍मरण का नेशनल बुक ट्रस्‍ट व राजकमल जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशन हुआ था, जिससे शानी की देशव्‍यापी प्रशंसा हुई थी। साहित्‍य के तीनों विधाओं क्रमश: कथा, उपन्‍यास व संस्‍मरण में बस्‍तर का चित्र प्रस्‍तुत करते हुए जो कृतियां उन्‍होंनें लिखीं वे सदैव याद की जायेंगी।</p>
<p style="text-align: justify;">शानी की चर्चित कालजयी कृति काला जल शानी के जिन्‍दगी के प्रारंभिक दिनों के और चढ़ती वय के वैयक्तिक दुख दर्द और पारिवारिक गौरव गाथाओं व फजीहतों का किस्‍सा है। शानी का बचपन बहुत तंगी और बेइंतहा अभावो में बीता था। जगदलपुर में राजमहल के पास ही उनका पुश्‍तैनी मकान था उनकी पारिवारिक पृष्‍टभूमि से ही काला जल उभर कर सामने आया। उस समय वे काफी मानसिक पीड़ा और मनोवैज्ञानिक दबाव में थे, अपनी रचना प्रक्रिया में शायद उपन्‍यास का प्‍लाट तैयार करते हुए वे ई.एम.फास्‍टर की कृति &#8216;ए पैसेज टू इंडिया&#8217; को कई बार पढ़ चुके थे जो छतरपुर नगर पर केन्द्रित है। इसी का प्रभाव रहा कि शानी बस्‍तर के जीवन और अपनी पारिवारिक जीवन को दलपत सागर में गूंथ पाये।</p>
<p style="text-align: justify;">शानी नें जगदलपुर में ही मैट्रिक तक की पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए घर की परिस्थिति के कारण रायपुर नहीं जा पाए। अपने परिवार के भरण-पोषण के लिये उन्‍हें किशोरावस्‍था में ही नगर पालिका में क्‍लर्की करनी पड़ी। अपने इसी मुफलिसी के दिनों में शानी नें लिखना आरंभ किया। सृजनशील मानस के धनी शानी नें जगदलपुर में साहित्‍य प्रेमियों से सतत संपर्क बनाते हुए, जगदलपुर में महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के जमाने के बाद पुन: साहित्तिक वातावरण निर्मित किया। उनके समय में अनुभवी साहित्‍यकार लाला जगदलपुरी का आर्शिवाद उन्‍हें प्राप्‍त हुआ वहीं बाद में डॉ.धनंजय वर्मा के जगदलपुर महाविद्यालय में बतौर हिन्‍दी प्राध्‍यापक बनकर आने से बालसखा का साथ मिला। उन्‍हीं दिनों नई पौध के रूप में मेहरून्निशा परवेज नें जगदलपुर से अपनी लेखनी का झंडा गाड़ना आरंभ कर दिया था। जगदलपुर महाविद्यालय में आने वाले हिन्‍दी साहित्‍य के व्‍याख्‍याताओं से भी शानी का निरंतर संपर्क बना रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">उनके मित्र बतलाते हैं कि यारबाज और साहित्तिक बतरस के प्रेमी शानी जगदलपुर जैसे दूरदराज और सारी दुनिया से कटा-छंटा शालवनो के इस द्वीप में रहते हुए भी अपने घर में तत्‍कालीन हिन्‍दी की लगभग सभी पत्रिकाओं को मंगाते थे। उन पत्रिकाओं को तल्‍लीनता से पढ़ते थे एवं मित्रों से साहित्तिक विमर्श करते थे। उनके पास ढेरों पत्र भी आते रहते थे जिसमें उनके मित्र तदसमय के ख्‍यात साहित्‍यकार अश्‍क, अमृतराय, कमलेश्‍वर, मोहन साकेश और राजेन्‍द्र यादव के पत्र होते थे। अपनी इसी अद्यतन बने रहने की चाहत के कारण वे साहित्तिक हलचलों और तत्‍कालीन साहित्‍य से परिचित बने रहते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्‍त शानी बस्‍तर जैसे आदिवासी इलाके में रहने के बावजूद अंग्रेजी, उर्दू, हिन्‍दी और हल्‍बी के अच्‍छे ज्ञाता थे। उन्‍होंनें एक विदेशी समाजविज्ञानी के आदिवासियों पर किए जा रहे शोध पर भरपूर सहयोग किया और शोध अवधि तक उनके साथ सूदूर बस्‍तर के अंदरूनी इलाकों में घूमते रहे। कहा जाता है कि उनकी दूसरी कृति &#8216;सालवनो का द्वीप&#8217; इसी यात्रा के संस्‍मरण के अनुभवों में पिरोई गई है। उनकी इस कृति की प्रस्‍तावना उसी विदेशी नें लिखी और शानी नें इस कृति को प्रसिद्ध साहित्‍यकार प्रोफेसर कांतिकुमार जैन जो उस समय जगदलपुर महाविद्यालय में ही पदस्‍थ थे, को समर्पित किया है। शालवनों के द्वीप एक औपन्‍यासिक यात्रा वृत है मान्‍यता हैं कि बस्‍तर का जैसा अंतरंग चित्र इस कृति में है वैसा हिन्‍दी अन्‍यत्र नहीं है। इस कृति के प्रकाशन के बाद तो बस्‍तर और शानी एक दूसरे के पर्याय हो गए जैसे साहित्‍यजगत लमही को प्रेमचंद के नाम से जानते हैं वैसे ही बस्‍तर को शानी के नाम से जाना जाने लगा।</p>
<p style="text-align: justify;">16 मई 1933 को जगदलपुर में जन्‍में शानी नें अपनी लेखनी का सफर जगदलपुर से आरंभ कर ग्‍वालियर फिर भोपाल और दिल्‍ली तक तय किया। वे मध्‍य प्रदेश साहित्‍य परिषद भोपाल के सचिव और परिषद की साहित्तिक पत्रिका साक्षातकार के संस्‍थापक संपादक रहे। दिल्‍ली में वे नवभारत टाईम्‍स के सहायक संपादक भी रहे और साहित्‍य अकादमी से संबद्ध हो गए। साहित्‍य अकादमी की पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्‍य के भी वे संस्‍थापक संपादक रहे। इस संपूर्ण यात्रा में शानी साहित्‍य और प्रशासनिक पदों की उंचाईयों को निरंतर छूते रहे। शानी नें साँप और सीढ़ी, फूल तोड़ना मना है, एक लड़की की डायरी और काला जल जैसे उपन्‍यास लिखे। लगातार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में छपते हुए बंबूल की छॉंव, डाली नहीं फूलती, छोटे घेरे का विद्रोह, एक से मकानों का नगर, युद्ध, शर्त क्‍या हुआ ?, बिरादरी और सड़क पार करते हुए नाम से कहानी संग्रह व प्रसिद्ध संस्‍मरण शालवनो का द्वीप लिखा। शानी नें अपनी यह समस्‍त लेखनी जगदलपुर में रहते हुए ही लगभग छ:-सात वर्षों में ही की। जगदलपुर से निकलने के बाद उन्‍होंनें अपनी उल्‍लेखनीय लेखनी को विराम दे दिया। बस्‍तर के बैलाडीला खदान कर्मियों के जीवन पर तत्‍कालीन परिस्थितियों पर उपन्‍यास लिखनें की उनकी कामना मन में ही रही और 10 फरवरी 1995 को वे इस दुनिया से रूखसत हो गए ।</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://4.bp.blogspot.com/-RS-za219CX0/TgQ5gImT48I/AAAAAAAAFsE/bDkwWL7QVYg/s200/Sanjeeva_Tiwari.jpg" alt="" width="160" height="200" /></p>
<p style="text-align: justify;">
<h2>संजीव तिवारी</h2>
<p style="text-align: justify;"><strong>देश भाषा-लोक भाषा <a href="http://www.gurturgoth.com/">www.gurturgoth.com</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ब्‍लॉग तकनीक : मेरे प्रयोग<a href="http://sanjeevatiwari.blogspot.com.com/"> http://sanjeevatiwari.blogspot.com.com</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जगमग छत्‍तीसगढ़ <a href="http://aarambha.blogspot.com/">http://aarambha.blogspot.com</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मेरा पेशा <a href="http://jrcounsel4u.blogspot.com/">http://jrcounsel4u.blogspot.com</a></strong></p>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>अरुन्धति को पुन: पढ़ते हुए</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jul 2011 05:18:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[चर्चा-परिचर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[लोकमंच]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[अरुन्धति राय का गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स एक ऐसा उपन्यास है जिसे बार-बार पढ़ा जाना... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%9d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%8f/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="main" style="text-align: justify;">
<div id="Blog1">
<div>
<div style="text-align: justify;"><a href="http://1.bp.blogspot.com/-NYhXZcCDIQw/Tb1G22AqpPI/AAAAAAAAAB4/Dg9e2Aq1J8Y/s1600/arundhati%2Broy.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5601711419543954674" class="alignleft" style="border: 0px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-NYhXZcCDIQw/Tb1G22AqpPI/AAAAAAAAAB4/Dg9e2Aq1J8Y/s400/arundhati%2Broy.jpg" border="0" alt="" width="190" height="265" /></a></div>
<p>अरुन्धति राय का गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स एक ऐसा उपन्यास है जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए. मैं खुद तीसरी बार पढ़ रही हूँ. बहुत ही संवेदनशील उपन्यास. यह कहानी है जीवन की. प्रेम, घृणा, द्वैष, जलन, स्वार्थ, बिट्रेयल की और बार-बार घर वापस आने की. यह कहानी है बचपन की मासूमियत की तथा उस मासूमियत के लूटे जाने और चकनाचूर होने की. बचपन के कुचले जाने के रिसते, मूक नासूर की. यह सवर्ण और अवर्ण की भी कथा कहता है. भले ही ईसाई समुदाय में जात पाँत न हो मगर सामाजिक छूआछात तो ज्यों का त्यों बरकरार है. धनी-गरीब का भेदभाव तो बना ही हुआ है. छद्म मार्क्सवाद कितना घिनौना, कितना गलीच हो सकता यह भी उपन्यास बड़े खूबसूरत तरीके से बुनता है.</p>
</div>
<div style="text-align: justify;">उपन्यास रैखिक गति से नहीं चलता है. समय खूब आगे पीछे आता जाता है. वैसे पूरी कहानी १९६९ से प्रारंभ होकर १९९३ तक यानि २४ साल को समेटती है. बीच के समय का बहुत विस्तार से वर्णन नहीं मिलता है. पूरा उपन्यास राहेल की दृष्टि से लिख गया है मगर यह भी पता चलता रहता है कि और लोग क्या सोच रहे हैं उनके मन में क्या चल रहा है.</div>
<div style="text-align: justify;">एक से एक चरित्र उभारे हैं अरुन्धति ने. उनका सूक्ष्म और गहन अवलोकन काबिले तारीफ़ है. इस उपन्यास में पापाची जैसा ईर्ष्यालू और क्रूर पिता और पति है जो बेटी राहेल के गमबूट्स को कैंची से दस मिनट तक कतर कर नष्ट करता है, पत्नी को रोज रात को पीतल के फ़ूलदान से मारता है. दूसरी ओर वेलुता है जिसकी संवेदनशीलता उसे ले डूबती है. बिना किसी अपराध के बेबी कोच्च्मा के कहे पर पुलिस उसे पीट-पीट कर मार डालती है. मरते वक्त भी उसकी आँखों में एस्था के लिए प्रेम और करुणा है. एस्था बचपन के अनुभवों से इतना आहत हो गया है, इतना हिल गया है कि उसने बोलना बन्द कर दिया है. राहेल और एस्था की माँ अम्मू अपने पिता-पति के हाथों अपमानित होती है. भाई चाको जब चाहे उसे घर से निकाल बाहर कर सकता है. बेबी कोच्च्मा जैसा श्याम चरित्र रचना बड़े कौशल की माँग करता है. लेखिका इसमें पूरी तरह सफ़ल रही है.</div>
<div style="text-align: justify;">सारा घटनाचक्र चाको की बेटी सोफ़ी मोल की मृत्यु इर्दगिर्द घूमता है. सोफ़ी की मौत दुर्घटना है जिसे अपराध में परिवर्तित कर दिया जाता है. सब कुछ राहेल के जीवन से जुड़ा हुआ है. कल्पना और यथार्थ ऐसा घुला-मिला है जैसे दूध-पानी. इंग्लिश भाषा पर लेखिका की गजब की पकड़ है और वे भाषा से खूब खेलती हैं. अनुवाद में खोल रह जाता है आत्मा नष्ट हो जाती है. फ़ूल रह जाता है खुशबू उड़ जाती है. मूल भाषा में ही इसका सही आस्वादन किया जा सकता है. वैसे मैंने अभी तक अनुवाद नहीं देखा-पढ़ा है. सुना है नीलाभ ने बहुत अच्छा अनुवाद किया है.</div>
<div style="text-align: justify;">उपन्यास पढ़ कर मन में कसक होती है कि ऐसा क्यों होता है. काश ऐसा न होता. पात्र और घटनाएँ बहुत लम्बे समय तक साथ बनी रहती हैं, मेरे अनुसार रचना की सफ़लता की एक कसौटी. एक और अफ़सोस होता है इतनी संवेदनशील लेखिका ने एक उपन्यास के पश्चात रचनात्मक साहित्य से क्यों मुँह मोड़ लिया. क्या वे पाठकों की अपेक्षाओं से डर गईं?<br />
०००</div>
<div style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://bp2.blogger.com/_ijH_irKrWNA/R8Qy_3ydo4I/AAAAAAAAAAU/-9nxgKvO1TE/S220/Vijay.JPG" alt="My Photo" width="157" height="220" /></div>
</div>
<h2>वीथिका </h2>
<p><a href="http://veechika.blogspot.com/">http://veechika.blogspot.com/</a></p>
<p>Educationist with almost three decades of experience in human resources development.Reader, Loyola College of Education, Jamshedpur. President, Sahyog, a multi-lingual literary organisation committed to promoting literature in all Indian languages. First love: literature. Has been writing in Hindi for more than thirty years now. Articles on literature, films, education and so on, as well as translations from world literature, appear regularly in all leading Hindi magazines and literary journals. Writes a weekly column for Hindustan. Several stories broadcast by AIR and published on the Internet and in print magazines. Translation of Ferrum Hunters, a book of science fiction, published last year and Apni Dharti, Apna Akash, a book on the winners of the Nobel Prize for literature, just published.</p>
</div>
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		<title>छत्तीसगढ़ी साहित्य व जातीय सहिष्णुता के पित्र पुरूष : पं. सुन्दर लाल शर्मा</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Jun 2011 05:28:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[महानदी के तट पर विशाल भीड़ दम साधे खड़ी थी, उन्नत माथे पर त्रिपुण्ड लगाए... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/06/%e0%a4%9b%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: left;" dir="ltr">
<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><a style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;" href="http://3.bp.blogspot.com/-8IoirGX0xhY/TgQ5zga7MtI/AAAAAAAAFsI/Ugg-fZZneCk/s1600/Sundarlal_sharma.jpg"><img src="http://3.bp.blogspot.com/-8IoirGX0xhY/TgQ5zga7MtI/AAAAAAAAFsI/Ugg-fZZneCk/s320/Sundarlal_sharma.jpg" border="0" alt="" width="242" height="320" /></a></div>
<p style="text-align: justify;">महानदी के तट पर विशाल भीड़ दम साधे खड़ी थी, उन्नत माथे पर त्रिपुण्ड लगाए एक दर्जन पंडितो नें वेद व उपनिषदों के मंत्र व श्लोक की गांठ बांधे उस प्रखर युवा से प्रश्न पर प्रश्न कर रहे थे और वह अविकल भाव से संस्कृत धर्मग्रंथों से ही उनके प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। बौखलाए धर्मध्वजा धारी त्रिपुण्डी पंडितो नें ऋग्वेद के पुरूष सूक्त के चित परिचित मंत्र का सामूहिक स्वर में उल्ले‍ख किया &#8211; ब्राह्मणोsस्य् मुखमासीद्वाहू राजन्य: कृत: । उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्मच्य : शूद्रो अजायत:।। धवल वस्त्र धारी युवा नें कहा महात्मन इसका हिन्दी अनुवाद भी कह दें ताकि भीड़ इसे समझ सके। उनमें से एक नें अर्थ बतलाया &#8211; विराट पुरूष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। युवक तनिक मुस्कुराया और कहा हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, इस मंत्र का अर्थ आपने अपनी सुविधानुसार ऐसा कर लिया है, इसका अर्थ है उस विराट पुरूष अर्थात समाज के ब्राह्मण मुख सदृश हैं, क्षत्रिय उसकी भुजाए हैं, वैश्य जंघा है और शूद्र पैर, जिस प्रकार मनुष्य इन सभी अंगों में ही पूर्ण मनुष्य है उसी प्रकार समाज में इन वर्णों की भी आवश्यकता है। वर्ण और जाति जन्मंगत नहीं कर्मगत हैं इसीलिए तो यजुर्वेद कहता है – नमस्तवक्षभ्यो रथकारभ्यनश्चम वो नमो: कुलालेभ्य: कर्मरेभ्यश्च वो नमो । नमो निषादेभ्य: पुजिष्ठेभ्यश्च वो नमो नम: श्वनिभ्यों मृत्युभ्यश्च‍ वो नम: ।। बढ़ई को मेरा नमस्कार, रथ निर्माण करने वालों को मेरा नमस्कार, कुम्हारों को को मेरा नमस्कार, लोहारों को मेरा नमस्कार, मछुवारों को मेरा नमस्कार, व्याघ्रों को मेरा नमस्कार। आखिर हमारा वेद स्वयं इनको नमस्कार करता है तो हम आप कौन होते हैं इन्हें सामाजिक वर्ण व्यवस्था के आधार पर मंदिर में प्रवेश करने से रोकने वाले। पंडितों ने एक दूसरे के मुख को देखा, युवा पूर्ण आत्मविश्वास के साथ वैदिक उद्हरणों की अगली कड़ी खोलने को उद्धत खड़ा था। पंडितों नें देर तक चल रहे इस शास्त्रार्थ को यहीं विराम देना उचित समझा उन्हें भान हो गया था कि इस युवा के दलीलों का तोड़ उनके पास नहीं है। भीड़ हर्षोल्लास के साथ राजीव लोचन जी का जयघोष करते हुए उस युवा के साथ मंदिर में प्रवेश कर गई।</p>
<p style="text-align: justify;">23 नवम्बर 1925 को घटित इस घटना में जिस युवा के अकाट्य तर्कों से कट्टरपंथी पंडितों नें भीड़ को मंदिर प्रवेश की अनुमति दी वो युवा थे छत्तीसगढ़ के दैदीप्यमान नक्षत्र पं.सुन्द रलाल शर्मा। पं.सुन्दलरलाल शर्मा अपने बाल्याकाल से ही उंच-नीच, जाति-पाति, सामाजिक वर्ण व्यवस्था के आडंबरों के घोर विरोधी थे। तत्कालीन समाज में कतिपय उच्च वर्ग में जाति प्रथा कुछ इस प्रकार से घर कर गई थी कि दलितों को वे हेय दृष्टि से देखते थे, सुन्दर लाल जी को यह अटपटा लगता, वे कहते कि हमारे शरीर में टंगा यह यज्ञोपवीत ही हमें इनसे अलग करता है। सोलह संस्कारों में से यज्ञोपवीत के कारण ही यदि व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है तो क्यो न इन दलितों को भी यज्ञोपवीत धारण करवाया जाए और उन्हें संस्कारित किया जाए। मानवता के आदर्श सिद्धांतों के वाहक गुरू घासीदास जी के अनुयायियों को उन्‍होंनें सन् 1917 में एक वृहद आयोजन के साथ यज्ञोपवीत धारण करवाया। एक योनी प्रसूतश्चन एक सावेन जायते के मंत्र को मानने वाले पं.सुन्दरलाल शर्मा अक्सर महाभारत के शांति पर्व के एक श्लोक का उल्लेख किया करते जिसका अर्थ कुछ इस प्रकार है – मनुष्य जन्म से शूद्र (अबोध बालक) उत्पन्न होता है, जब वह बढ़ता है और उसे मानवता के संस्कार मिलते हैं तब वह द्विज होता है, इस प्रकार सभी मानव जिनमें मानवीय गुण है वे द्विज हैं। अपने इस विचार को पुष्ट करते हुए वे हरिजनों के हृदय में बसे हीन भावना को दूर कर नवीन चेतना का संचार करते रहे। पं.सुन्दरलाल शर्मा जी के इस प्रोत्साहन से जहां एक तरफ दलितों व हरिजनों का उत्साह बढ़ा वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी ब्राह्मणों नें पं.सुन्दसरलाल शर्मा की कटु आलोचना करनी शुरू कर दी, उन्हें सामाजिक बहिष्कार का दंश भी झेलना पड़ा। ‘सतनामी बाम्हन’ के ब्यंगोक्ति का सदैव सामना करना पड़ा किन्तु स्व़भाव से दृढ़निष्चयी पं.सुन्दरलाल शर्मा नें सामाजिक समरसता का डोर नहीं छोड़ा। कट्टरपंथियों के विरोध नें उनके विश्वास को और दृढ़ किया। गुरू घासीदास जी के मनखे मनखे ला जान भाई के समान को मानने वाले गुरूओं से उनका प्रगाढ संबंध हरिजनों से उन्हे और निकट लाता गया। वे मानते रहे कि समाज में द्विजेतर जातियों का सदैव शोषण होते आया है इसलिए उन्हें मुख्य धारा में लाने हेतु प्रभावी कार्य होने चाहिए, वे भी हमारे भाई हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">21 दिसम्बर, 1881 को राजिम के निकट महानदी के तट पर बसे ग्राम चंद्रसूर में कांकेर रियासत के सलाहकार और 18 गांव के मालगुजार पं.जयलाल तिवारी के घर में जन्में पं.सुन्दरलाल शर्मा को मानवीय संवेदना विरासत में मिली थी। पिता पं.जयलाल तिवारी अच्छें कवि एवं संगीतज्ञ थे, माता देवमति भी अध्ययनशील महिला थी। प्रगतिशील विचारों वाले इस परिवार में पले बढे पं.सुन्दरलाल शर्मा ने मिडिल तक की शिक्षा गांव के स्कूल में प्राप्त की, फिर उनके पिता नें उनकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था करते हुए कांकेर रियासत के शिक्षकों को घर में बुला कर पं.सुन्दरलाल शर्मा को पढ़ाया। उन्होंनें संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला, उडिया, मराठी भाषा सहित धर्म, दर्शन, संगीत, ज्योतिष, इतिहास व साहित्य का गहन अध्ययन किया। लेखन में उनकी रूचि रही और पहली बार उनकी कविता 1898 में रसिक मित्र में प्रकाशित हुई। साहित्य के क्षेत्र में पं.सुन्दरलाल शर्मा जी  छत्तीगढ़ी पद्य के प्रवर्तक माने जाते हैं। ‘दान लीला’ के प्रकाशन से यह सिद्ध हुआ कि छत्तीसगढ़ी जैसी ग्रामीण बोली पर भी साहित्य रचना हो सकती है और उस पर देशव्यापी साहित्तिक विमर्श भी हो सकता है। कहा जाता है कि &#8220;छत्तीसगढ़ी दानलीला&#8221; छत्तीसगढ़ी का प्रथम प्रबंध काव्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान लगभग 22 ग्रंथ के रुप में है जिनमें 4 नाटक, 2 उपन्यास और काव्य रचनाएँ हैं। काव्य में श्री राजीव क्षेत्र महात्म्य, करुणा पचीसी, प्रलाप पदावली, स्फूट पद्य संग्रह, ध्रुव चरित्र आख्यान, स्वीकृति भजन संग्रह, ब्रह्मण गीतावली, सतनामी भजनमाला, काव्य दिवाकर, सदगुरु वाणी। खण्ड काव्य में श्री राजीव क्षेत्र महात्म्य, करुणा पचीसी, प्रलाप पदावली, स्फूट पद्य संग्रह, ध्रुव चरित्र आख्यान, स्वीकृति भजन संग्रह, ब्रह्मण गीतावली, सतनामी भजनमाला, काव्य दिवाकर, सदगुरु वाणी। महाकाव्य में श्री राजीव क्षेत्र महात्म, करुणा पचीसी, प्रलाप पदावली, स्फूट पद्य संग्रह, ध्रुव चरित्र आख्यान, स्वीकृति भजन संग्रह, ब्रह्मण गीतावली, सतनामी भजनमाला, काव्य दिवाकर, सदगुरु वाणी। इसके अतिरिक्ती नाटक प्रहलाद नाटक, पार्वती परिणय, सीता परिणय, विक्रम शशिकला। जीवनी विश्वनाथ पाठक की काव्यमय जीवनी, रघुराज सिंह गुण कीर्तन, विक्टोरिया वियोग, दुलरुवा, श्री राजीम प्रेम पीयुष व उपन्यास उल्लू उदार, सच्चा सरदार है।</p>
<p style="text-align: justify;">पं. सुन्दपर लाल शर्मा जी अपने देश को पराधीन देखकर दुखी होते थे और चाहते थे कि स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी सहभागिता दूं। इसी उद्देश्य से वे सन् 1906 में सूरत कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गए वहां से लौटकर स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्वदेशी वस्त्रों की दुकानें राजिम, धमतरी और रायपुर में खोली किन्तु आर्थिक हानि के चलते उन्हें यह दुकान 1911 में बंद करनी पड़ी। राष्ट्र प्रेम का जजबा पं.सुन्द्रलाल शर्मा एवं उनके मित्रों में हिलोरे मारती रही और वे छत्तीसगढ़ में स्‍वतंत्रता आन्दोलन को हवा देते रहे। छत्तीसगढ़ में इस आन्दोलन को तीव्र करने के उदृश्य‍ से कण्डेल सत्याग्रह को समर्थन देने के लिए पं.सुन्दंरलाल शर्मा नें सन् 1920 में पहली बार महात्मा‍ गांधी को छत्तीसगढ़ की धरती पर लाया।</p>
<p style="text-align: justify;">बीच के वर्षों में उन्हें स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के लिए जेल भी जाना पड़ा किन्तु‍ वे अपने हरिजन उद्धार व स्वतंत्रता आन्दोंलन के कार्यो को निरंतर बढ़ाते रहे। 1933 में गांधी जी जब हरिजन उद्धार यात्रा पर निकले उसके पहले से ही पं.सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए प्रयास में जुटे रहे । छत्तीसगढ़ में आपने सामाजिक चेतना का स्वर घर-घर पहुंचाने में अविस्मरणीय कार्य किया ।</p>
<p style="text-align: justify;">जातिवाद के खिलाफ पं.सुन्दारलाल शर्मा जी का अभिमत गलत नहीं था, वे भारतीय समाज में जातिवाद को भयंकर खतरे के रूप में देखा करते थे, इसीलिए वे आजीवन जातिप्रथा के खिलाफ संघर्षरत रहे। वे जातिविहीन व शोषणविहीन समाज के हिमायती थे। भारत में दलित उत्थान एवं अछूतोद्धार के लिए महात्मा गांधी को याद किया जाता है किन्तु स्वयं महात्मा गांधी नें पं.सुन्दार लाल शर्मा को इसके लिये उन्हें अपना गुरू कहा और सार्वजनिक मंचों में स्वी‍कारा भी। स्वतंत्रता आन्दोलन एवं हरिजन उत्थान में पं. सुन्दरलाल शर्मा के योगदान के लिए उन्हें छत्तीसगढ़ का गांधी कहा गया।</p>
<div style="text-align: justify;">जातिविहीन समरस समाज की कल्पना का शंखनाद करते हुए उंच-नीच के जातिगत आधारों में बंटते प्रदेश के सभी जातियों को उन्‍होंनें अपना पुत्र तुल्य स्नेह दिया। विभिन्नो जाति वर्ग को एक पिता का संतान मानते हुए सभी भाईयों को समानता का दर्जा दिया उनके इस योगदान नें ही उन्हें संपूर्ण छत्तींसगढ़ का पिता बना दिया. एक पिता को अपने सभी बेटों से प्रेम होता है उसी प्रकार से पं.सुन्दरलाल शर्मा जी छत्तीसगढ़ के प्रत्येक जन से बेटों सा प्रेम करते थे। अपने पुत्र के असमय मौत नें उन्हें व्यथित किया किन्तु वे शीध्र ही सम्हल गए और छत्तीसगढ़ के अपने अनगिनत बेटों के उत्थान में लग गए। कहते हैं आरंभ से आदर्श मानव समाज की सतत परिकल्पना में मनुष्य नें अपने रक्त आधारित संबंधों के आदर्श रूप में माता और पिता को सर्वोच्च स्थान दिया है। किन्तु रक्त आधारित संबंधों से परे मनुष्यता में समाजिक संबंधों का मान रखना छत्तीसगढि़यों का आदर्श है, पं. सुन्दर लाल शर्मा इन्हीं अर्थों में हम सबके पिता हैं। उनका स्मरण छत्तीसगढ़ की आत्मा‍ का स्मरण है, प्रत्येक छत्तीसगढी शरीर में पंडित जी की आत्मा का वास है।</div>
<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><a style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;" href="http://4.bp.blogspot.com/-RS-za219CX0/TgQ5gImT48I/AAAAAAAAFsE/bDkwWL7QVYg/s1600/Sanjeeva_Tiwari.jpg"><img src="http://4.bp.blogspot.com/-RS-za219CX0/TgQ5gImT48I/AAAAAAAAFsE/bDkwWL7QVYg/s200/Sanjeeva_Tiwari.jpg" border="0" alt="" width="160" height="200" /></a></div>
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<div style="text-align: justify;"><strong>संजीव तिवारी</strong></div>
<div style="text-align: justify;">देश भाषा-लोक भाषा <a href="http://www.gurturgoth.com/">www.gurturgoth.com</a></div>
<div style="text-align: justify;">ब्‍लॉग तकनीक : मेरे प्रयोग<a href="http://sanjeevatiwari.blogspot.com.com/"> http://sanjeevatiwari.blogspot.com.com</a></div>
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		<title>नौटंकी का दुर्भाग्य या सरकार की उदासीनता</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Jun 2011 04:27:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नौटंकी उत्तरप्रदेश का लोक नृत्य होने के बावजूद पतन की और लगातार बढती जा रही... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/06/%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%b0/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3>
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<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><a style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;" href="http://1.bp.blogspot.com/-2PZU12Sw0ss/TgRyPwNJ7BI/AAAAAAAAFsY/NTwvdBQTtdE/s1600/DSC_0021.JPG"><img src="http://1.bp.blogspot.com/-2PZU12Sw0ss/TgRyPwNJ7BI/AAAAAAAAFsY/NTwvdBQTtdE/s1600/DSC_0021.JPG" border="0" alt="" /></a></div>
<h3 style="text-align: justify;">नौटंकी उत्तरप्रदेश का लोक नृत्य होने के बावजूद पतन की और लगातार बढती जा रही है, क्यूंकि सरकार नौटंकी और उसके कलाकारों के विकास के प्रति एकदम उदासीन सी है जिसके कारण नए कलाकारों का आना लगभग बंद ही हो गया  था | लेकिन कुछ ऐसे नौटंकी प्रेमी व्यक्ति हैं जो अभी भी नौटंकी के विकास के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं | उन्ही में से इलाहाबाद में कार्यरत एक ग्रुप है &#8216; विनोद रस्तोगी स्मृति संस्थान &#8216; जहाँ पर अभी भी कई नवयुवक,नवयुवतियां नौटंकी के माध्यम से अपना कैरियर आगे बढ़ा रहे हैं राजपाल यादव की तरह |इस ग्रुप का दुर्भाग्य यह है कि कई कलाकार पैसे के अभाव के कारण सीधे फिल्म इंडस्ट्री में चले जाते हैं | ऐसे ही सुनहरे भविष्य की आस में आज भी कई नवयुवक,नवयुवतियां नौटंकी में काम कर रहे हैं |</h3>
</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<h3 style="text-align: justify;">जिनमे से प्रियम्दा सिंह एक है जो बेहतरीन गायक और कलाकार है, वह अभी पढाई भी कर रही है और साथ में इस ग्रुप के माध्यम से से गायन व अभिनय भी सीख रही है | वह भी फिल्म इंडस्ट्री में जाना चाहती है और जिसकी वह हकदार भी है | पर इससे नौटंकी का क्या भला होगा उसका एक और कलाकार छिन जायेगा,इन सबका मुख्या कारण है सरकार की उदासीनता जिसके कारण कलाकारों को नौटंकी जैसी सशक्त विधा को छोड़कर जाना पड़ता है |</h3>
<div style="text-align: justify;"></div>
<h3>आप इस फिल्म को देखिये और बताईये कि हमारे द्वारा उठाये गए इस विमर्श पर आपकी क्या प्रतिक्रया है ?</h3>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>हरी ओम द्विवेदी </strong></div>
<div style="text-align: justify;">जहाँगीरावाद मीडिया इंस्टीट्युट</div>
<div style="text-align: justify;">बाराबंकी, लखनऊ</div>
</h3>
<p><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="640" height="390" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowScriptAccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/WH7ZHRkJyqA&amp;hl=en_US&amp;feature=player_embedded&amp;version=3" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="640" height="390" src="http://www.youtube.com/v/WH7ZHRkJyqA&amp;hl=en_US&amp;feature=player_embedded&amp;version=3" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></p>
</p>]]></content:encoded>
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