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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; समीक्षा</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>तरह तरह की अनुभूतियों से सजी ओड़िया-भाषा की प्रतिनिधि कविताएं</title>
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		<pubDate>Thu, 19 Apr 2012 10:28:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<description><![CDATA[पुस्तक समीक्षा : हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक ओड़िया-गद्य साहित्य के साथ-साथ आधुनिक... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">पुस्तक समीक्षा :</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक ओड़िया-गद्य साहित्य के साथ-साथ आधुनिक ओड़िया कविताओं की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के अंत में हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासन ने सन 1903 में ओड़िशा को अपने अधिकार में लिया तथा उसे बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन रखा । मगर यहाँ ब्रिटिश शासन का प्रभाव दिखने में काफी समय लगा । खासकर 1966 में भयंकर अकाल के बाद, जिसमें लाखों लोग मौत के शिकार हुए, ओड़िशा की रक्षणशील मानसिकता में नई-नई अनुभूतियों और विचारधाराओं का विकास हुआ । सामाजिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के उस दौर में आधुनिक ओड़िया साहित्य और आधुनिक ओड़िया कविताओं का प्रादुर्भाव  हुआ। </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सबसे पहले प्रमुख आधुनिक ओड़िया कवि हैं राधानाथ राय (1848-1901)। वे ओड़िशा के शिक्षा विभाग के प्रमुख थे, अपने सहयोगी मित्र मधुसूदन राव (1853-1912) के साथ मिलकर ओड़िया पाठ्य-पुस्तकें लिखने के उद्देश्य से कई कविताएँ लिखीं, जो आगे जाकर नूतन ओड़िया कविताओं की नींव की ईंट बनी । राधानाथ राय ने अधिकतर लम्बे-लम्बे वर्णनात्मक काव्य लिखे। ये सारे काव्य पहले लिखे हुए काव्य-कविताओं की  शैली, सरंचना , दृष्टिकोण  तथा भाव की दृष्टि से  पूरी तरह भिन्न थे और समकालीन पाठकीय अभिरुचि से मेल खाने की वजह से ज्यादा लोकप्रिय साबित हुए । सन 1886 से लेकर 1897 के भीतर-भीतर उनके तीन मुख्य काव्य-खंडों ‘पांडवों की महायात्रा’ , ‘ओड़िशा का इतिहास’,‘भूगोल तथा स्थानीय परिवेश की विस्तृत जानकारी’ का प्रकाशन हुआ । तत्कालीन भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोहात्मक महाकाव्य ‘ महायात्रा’(1896), पूर्वी तट की प्रसिद्ध झील चिलिका के अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णनात्मक काव्य ‘ चिलिका’(1892) और बंगाल, बिहार और ओड़िशा के ब्रिटिश शासकों को कटक के बड़े-बड़े राजाओं द्वारा सम्मानित करने पर उनके द्वारा लिखे गए व्यंग्यात्मक आलेख ‘दरबार’(1897) प्रकाशित हुए। राधानाथ जी के ये काव्य-ग्रंथ न केवल अपने समय में अत्यंत लोकप्रिय थे वरन सौ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद आज भी उतने ही लोकप्रिय एवं प्रासंगिक हैं । इस तरह वे ओड़िशा के अन्यतम श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राधानाथ जी की  इस धारा को उस जमाने के जिन तीन कवियों ने आगे बढाया, उनके नाम हैं मधुसूदन राव , गंगाधर मेहेर ( 1862-1924) एवं नन्द किशोर बल (1885-1928) । मधुसूदन राव और नन्द किशोर बल दोनों ओड़िशा के शिक्षा विभाग में उच्च पद पर आसीन थे और दोनों ही राधानाथ जी की तरह ही कटक और ओड़िशा के तटीय अंचल के निवासी थे, मगर गंगाधर मेहेर  पश्चिम ओड़िशा के संबलपुर जिले के बरपाली गाँव के रहने वाले थे । </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_7303" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px;">
<dt class="wp-caption-dt" style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/Odiya-bhasha-ki-kavita.jpg"><img class="size-medium wp-image-7303" title="Odiya bhasha ki kavita" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/Odiya-bhasha-ki-kavita-300x215.jpg" alt="TRANSLATED BY DINESH KUMAR MALI / ISBN 978-93-81945-20-9 / Price 495/-" width="300" height="215" /></a></dt>
<h3><span style="font-weight: normal;">TRANSLATED BY DINESH KUMAR MALI / ISBN 978-93-81945-20-9 / Price 495/-</span></h3>
</dl>
</div>
<p><span style="font-weight: normal;">मधुसूदन ने किसी काव्य की रचना नहीं की । उन्होंने छोटी लिरिक (गीतात्मक) कविताएँ लिखीं,जिनके छह संकलन सन 1875 से लेकर 1908 के भीतर प्रकाशित हुए ।  मधुसूदन जी की कविताओं में तीन विशिष्ट काव्यानुभव देखें जा सकतें हैं, पहला, अनन्य भक्तिभाव और आध्यात्मिक संवेदना, जिनकी वजह से पाठक मण्डली में वे भक्त-कवि के रूप में विख्यात हैं, दूसरा, प्रकृति प्रेम और प्राकृतिक सौन्दर्य की उपासना और तीसरा, अपने देश के प्रति प्रगाढ़ प्रेम और गौरव-बोध की भावना । राधानाथ जी के समय में लम्बे काव्य लिखने की एक परम्परा थी,मगर उन्होंने नए तरीके से नए दृष्टिकोण तथा नए विषय-वस्तु को लेकर काव्य रचना प्रारंभ की, जबकि मधुसूदन ने ओड़िया में पहली बार छोटी लिरिक कविताएं लिखने की परम्परा का प्रतिपादन किया, जो आगे चलकर आधुनिक ओड़िया कविताओं की एक विशेष विशिष्ट धारा के रूप में रूपांतरित हुई.।  ‘बसंत गाथा’(1902), ‘उत्कल गाथा’(1903) एवं ‘कुसुमांजलि’ (1903) आदि उनके कविता संकलन हैं। उसके अतिरिक्त 158 पंक्तियों की लम्बी कविता &#8216; हिमाचले उदय उत्सव’(1911) एवं ‘ऋषिप्राणे देवावतरण’  में  कवि ने  अपने सौंदर्य प्रेम एवं आध्यात्मिक चेतना को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है ।उदाहरण के तौर पर &#8216; हिमाचले उदय उत्सव’ के ‘कंचनजंगा में सूर्योदय’ की ये पंक्तियाँ ली जा सकती है :- </span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“सहसा रहस्यमय महामहोल्लास से<br />
वह ज्योति जल उठी प्राची आकाश में<br />
पश्चिम के दूरतम अतल पाताल में<br />
मिटाते रात के घनघोर तमोजाल<br />
गिरि की स्फटिक-गौर यज्ञवेदी में<br />
जल उठी जैसे अग्नि नभ-मण्डल में &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसी प्रकार ‘ऋषिप्राणे देवावतरण’ में अचानक उनकी आध्यात्मिक चेतना का स्फुरण हुआ :-<br />
“सहसा सहस्र सूर्यों की ज्योति को कर पराभूत<br />
हुई ऋषि-अंतर में स्फुरित छवि महामृत<br />
अमूर्त मूर्त आहा रूप निरूपम<br />
अनंत अनल व्याप्त स्थावर जंगम<br />
देश कालातीत दृश्य कल्पनातीत<br />
फिर भी ज्योतिर्मय चक्षु अग्र-स्फित&#8230; “</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">गंगाधर मेहेर ने राधानाथ जी की तरह काव्य लिखने के साथ-साथ छोटी-छोटी लिरिक कविताओं की भी रचना की।विशेषकर ऋषि वाल्मिकी के आश्रम में सीता की अवस्थिति को आधार बनाकर लिखा गया उनका काव्य &#8221; तपस्विनी &#8221; (1914 ) आधुनिक युग के अन्यतम श्रेष्ठ काव्यों में गिना जाता है । उनके दूसरे लोकप्रिय काव्य थे ‘कीचक-वध’(1903) तथा दुष्यंत शकुन्तला के प्रणय पर आधारित काव्य ‘प्रणय-वल्लरी’(1915)। गंगाधर जी की लेखनी सरल, सुबोध तथा संगीतमय थी । प्रकृति एवं प्राकृतिक-सौन्दर्य के प्रति गहरी संवेदनशीलता ही उनकी कविताओं का विशिष्ट गुण है। वाल्मिकी के आश्रम में प्रभात-बेला में सीताजी की वंदना करने के लिए प्रकृति के आयोजन का एक सुन्दर वर्णन ( हिन्दी अनुवाद:- डॉ॰ हरे कृष्ण मेहेर ) स्तुतय है:- </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ समंगल आई सुन्दरी<br />
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,<br />
हृदय में ले गहरी<br />
जानकी-दर्शन की तृषा ।<br />
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में,<br />
सती-कुटीर के बाहर<br />
आंगन में खड़ी होकर<br />
बोली कोकिल-स्वर में :<br />
‘दर्शन दो, सती अरी !<br />
बीती विभावरी ॥’ (1)<br />
अरुणिमा कषाय परिधान,<br />
सुमनों की चमकीली मुस्कान<br />
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :<br />
आकर कोई योगेश्वरी<br />
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी<br />
सारा दुःख मिटाने पास<br />
कर रही हैं आह्वान ।<br />
मानो स्वर्ग से उतर<br />
पधारी हैं धरती पर<br />
करने नया जीवन प्रदान ॥ (२)<br />
गाने लगी बयार<br />
संगीत तैयार ।<br />
वीणा बजाई भ्रमर ने,<br />
सौरभ लगा नृत्य करने<br />
उषा का निदेश मान ।<br />
कुम्भाट [1]भाट हो करने लगा स्तुति गान ।<br />
कलिंग[2]आया पट्टमागध बन,<br />
बोला बिखरा ललित मधुर स्वन :<br />
‘उठो सती-राज्याधीश्वरि !<br />
बीती विभावरी ॥’ (3)&#8230;”<br />
पादटीका :<br />
[1] कुम्भाट = पक्षीविशेष ।<br />
[2] कलिंग = पक्षीविशेष ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रकृति की तरह ही भक्ति भाव भी कवि की कविताओं का एक विशिष्ट गुण है । उनकी एक छोटी–सी कविता “भक्ति” इस तरह का उदाहरण है.-<br />
“ विश्वजीवन, हे , तुमको करुणा-सिंधु<br />
पुकारने को  मन चाहता नहीं<br />
सिंधु , तुम्हारी कृपा-बिन्दु मात्र<br />
तुम्हारे भजने में होंगे नहीं, नाथ<br />
माला जपने को बाध्य<br />
कोटि-कोटि ग्रह कंठी जिस माला की<br />
किसके जपने से भला होगी साध्य ?<br />
लेने को तुम्हारी चरण-धूल<br />
मेरे सिर पर दिया नहीं बल<br />
कोटि-कोटि रवि धूल की तरह<br />
तुम्हारे चरणों में विराजमान&#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नन्द किशोर बल गंगाधर जी की तरह छोटी-छोटी कविताओं के अलावा  काव्य लिखते थे,मगर उनकी ख्याति छोटी लिरिक कविताओं से हुई , जो सन 1900 से 1916 के अन्दर प्रकाशित और संकलित हुई।.नन्द किशोर जी की कविताओं में तरह-तरह के अनुभवों के पुट हैं,जैसे  सामाजिक, राजनैतिक और  आध्यात्मिक । मगर उन्होंने विशेषकर पल्ली-प्रकृति एवं ग्राम्य-जीवन के बारे में लिखा ।शिक्षा विभाग के उच्च पदाधिकारी होने के कारण उन्होंने कई जगहों का भ्रमण किया, इसलिए उनकी कविताओं में ओड़िशा के ग्राम्य-जीवन का चित्रण सजीवता से प्रस्तुत हुआ है। यही वजह है कि उन्हें ओड़िशा के  ‘पल्ली-कवि’ के रूप में जाना जाता है। उनके प्रसिद्ध कविता-संग्रह हैं –‘पल्ली-चित्र’,‘निर्झरिणी’, ‘बसंत-कोकिल’,‘प्रभात-संगीत’,‘संध्या-संगीत’, ‘नाना वाया गीत’ इत्यादि । गाँव की एक सुबह का उनका सुंदर वर्णन प्रस्तुत है :-<br />
“इस समय तज निद्राशय<br />
शून्यप्राण में छोडा निलय<br />
सोचा भ्रमण से होगा शांत मन<br />
देखा गगन-पथ में सुर-वधू उषा<br />
पहने खड़ी चारु शुक्लभूषा  &#8230;&#8230; (पल्ली-पथ)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">या तेज-बारिश की अनुभूति की एक झलक इस प्रकार हैं :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“देखते देखते होने लगी घनघोर वर्षा<br />
खेती का काम पूरा कर चले गए चषा<br />
घनघोर गरजता गगन<br />
तेज बहती पवन<br />
वज्रपात  से टूट रहा भरोसा<br />
देखते देखते होने लगी घनघोर वर्षा &#8230;(एकुटिया चषा गीत )”<br />
( नोट :- चषा=किसान )</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">या अन्य तरीके से गाँव में प्रेम : प्रेम-प्रतीक्षा का एक अद्भुत दृश्य :-<br />
“भाव भरे हृदय से जलाकर प्रदीप<br />
रख हवन नारियल शैय्या समीप<br />
ऐसे समय कौन चलेगा बाट<br />
छम-छम पदचाप खोलते कबाट &#8230;(मधुशय्या)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस तरह उन्नीसवीं सदी के अंतिम दो दशक तथा बीसवीं सदी  के प्रारम्भिक दो दशकों की समयावधि में नई-नई अनुभूतियों,विचारधाराओं ,अभिरुचियों एवं भाषाओं से आधुनिक ओड़िया कविता प्रारम्भ होते हुए राधानाथ , मधुसूदन ,गंगाधर और नंदकिशोर जी की काव्य-कविताओं में जीवंत रूप से मुखरित  हुई । .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह समय था आधुनिक ओडिया कविताओं के शुभारम्भ का । फिर इन्ही कविताओं के ओजस्वी  स्रोत अलग-अलग रूप में फैलने लगे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम तथा बीसवीं सदी का प्रारम्भिक समय भारत वर्ष में राष्ट्रीय आंदोलन का समय था । राधानाथ जैसे कवियों की काव्य &#8211; कविताओं में इसी राष्ट्रीय भावना का प्रभाव जगह-जगह पर देखने को मिलता है, मगर यह राष्ट्र-प्रेम ओड़िशा में विशेषकर ओड़िया साहित्य एवं कविताओं में सन 1909 से स्पष्ट रूप से झलकता है,जब पुरी  के निकटवर्ती सत्यवादी नामक जगह पर कुछ इच्छुक व्यक्तियों के प्रयास  से एक आवासीय विद्यालय की स्थापना हुई तो वह जगह राष्ट्रीय आंदोलन का प्राणकेंद्र बन गया। इस गोष्ठी का मुखपत्र &#8221; सत्यवादी &#8221; सन 1915 में प्रकाशित हुआ तथा सन 1921 तक चला, जब तक यह आवासीय विद्यालय बंद हो गया । इस संस्था के संपर्क में आए व्यक्ति  देशभक्ति से ओत- प्रोत ओड़िया साहित्य लिखने में पारंगत होकर अपनी कविताओं में देशभक्ति की धारा को एक शक्तिशाली स्रोत के रूप में प्रवाहित करना प्रारम्भ किया । बीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में ओड़िया कविताओं में राष्ट्र-प्रेम के सशक्त स्वर उभर कर सामने आए।इसके साथ अनेक लेखक जुड़े हुए थे । जिन लेखकों के नाम विशेष रूप से उल्लेख किए जा  सकते हैं,  वे हैं गोपबंधु दास (1877-1928) , नीलकंठ दास (1884-1967) और गोदावरीश मिश्र (1886-1956)। ये सभी राष्ट्रीय  कांग्रेस में विभिन्न पदों पर रहते हुए सक्रियता से जुड़े हुए थे और गोपबंधु दास भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस में ओड़िशा की ओर से प्रमुख व्यक्ति थे ।  उनके प्रसिद्ध कविता-संग्रह में   गोपबंधु की ‘बंदीर आत्मकथा’(1923) और ‘कारा-कविता’ (1928)&#8217; ,नीलकंठ की “’कोणार्के’(1919) , गोदावरीश की ‘कलिका’(1921), ‘किशलय’(1922), ‘आलेखिका’(1923) थी। उनकी कविताओं में पहले की तरह  प्रकृति-प्रेम , भगवत-विश्वास , अथवा व्यक्तिगत आशाओं-निराशाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय चेतना के स्वर प्रमुख रूप से मुखर थे। गोपबंधु की कविताओं में विदेशी हुकूमत के खिलाफ घोर विरोध था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ भारत प्रशासन पर व्यवस्था स्वतंत्र<br />
यहाँ अमात्य संस्था राजनैतिक यंत्र<br />
कहाँ यहाँ राजा ?,यह तो  नौकरशाही<br />
प्रजा-सुख शांति के नाम पर  धर्म की झूठी दुहाई<br />
प्रजाहित प्रजामत छलावा केवल<br />
पोष्य गोष्ठी इच्छाधीन से शासन कल<br />
जो नीति नहीं प्रजामत अनुकूल<br />
शोषण से प्रजा विवृत व्याकुल<br />
जिसके व्यूह में एक देश में अन्य अधिगत<br />
एक जाति दूसरी जाति से चिर पदानत<br />
जिसके चक्र में तीस करोड़ भारत संतान<br />
निजवास में परवासी ,निज देश में श्वान<br />
अपराध नहीं निश्चय नीति उल्लंघन<br />
भारत का धर्म जिसका उच्छेद साधन &#8230;. (पितृपक्ष तर्पण)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">ऐसे ही नीलकंठ की कविता में देश की गुलामी पर तीव्र आक्रोश था :-<br />
“विजयी या पराजयी , मैं और क्या कहूँ<br />
तस्कर तो इस घर का पुत्रवत<br />
विदेशी तस्कर हड़पते प्रजाधन<br />
कहलाते जगत में तुंग क्षत्रिय<br />
भगवान ,हाय ! तूने ये क्या किया<br />
घर कहने को भी नहीं फूटते स्वर<br />
इस नीले विपिन श्यामल केदार में<br />
कितने गाँव बस्तियाँ गई उजड़<br />
अनाहार से मरे चुपचाप किसान<br />
कौन जानता है उनकी व्यथा अरमान<br />
राजजन कहकर ये दुष्ट तस्कर<br />
खुले घूमते गाँव जंगल अक्सर ॰ &#8230; (मायादेवी)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस प्रकार सत्यवादी गोष्ठी के कवियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में उनकी  कविताओं में राष्ट्रीय आन्दोलन की चेतना, अस्थिरता और क्रोध के स्वर प्रमुख थे । यह तत्कालीन पाठकों की अभिरुचि का परिणाम ही नहीं था, बल्कि उनकी सोच को भी काफी प्रभावित किया था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तीसरे दशक के मध्य से छठे दशक के मध्य तक लगभग तीस साल तक अनवरत ओड़िया कविताओं की प्रगति मुख्यतया  दो दिशाओं में हुई । ये दोनों दिशाएँ परस्पर एक दूसरे से अलग थीं, ऐसी बात नहीं है ।काफी समय तक दोनों दिशाएँ एक होकर तत्कालीन कवियों की सम्पूर्ण  विचारधारा में समाहित हो जाती थी । पहली दिशा के बारे में कहा जा सकता है, जीवन के प्रति रोमांटिक अनुभवों जैसे प्रकृति-प्रेम , सौन्दर्य की उपासना तथा आध्यात्मिक और रहस्यवादी अनुभवों के सम्मिश्रण ने सारे काव्य-संगठनों  और काव्य-शैली को सुदृढ़ बना समकालीन कविताओं में नवीनता और सजीवता भर दी । दूसरी दिशा को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं -, पूर्ववर्ती सत्यवादी गोष्ठी और साहित्य के प्रभाव से रचित सामाजिक, राजनैतिक चेतना जगाने वाली कविताएँ समकालीन चौथे और पाँचवें दशक में तेजी से बदल रहे सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों से सरोकार रखने लगीं ।  उनकी काव्य-संरचना में खासकर व्यंग्यात्मक तथा काव्य स्वर में विरक्ति और क्रोध के भाव थे । इन्हीं  विभिन्न विशिष्टताओं  वाले प्रमुख कवि थे,  पहली कोटि के पदम् चरण पटनायक (1885-1956) , कुंतला कुमारी सावत ( 1900-1938) , कालंदी चरण पाणिग्रही (1901-1994),बैंकुंठ  पटनायक ( 1904-1978) ,मायाधर मानसिंह (1905-1973 ) ,राधामोहन गडनायक (1911-2000) तथा दूसरी कोटि के लक्ष्मीकांत महापात्र (1889-1953) , गोदावरीश महापात्र (1897-1966) ,अनंत पटनायक (1912-1987) , और सच्चिदानंद राउतराय   (1913-2004) । </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">स्वाधीनता से पहले की ओड़िया कविताओं की ये दोनों मुख्य धाराएं विभिन्न कवियों के काव्य कविताओं से बार-बार मेल खाती थीं अर्थात पहली गोष्ठी के उदाहरण स्वरुप कवि बैंकुंठ नाथ और मानसिंह की इस तरह की अनेक कविताएँ हैं, मगर उन्हें दूसरी गोष्ठी में लिया जा सकता है ।ठीक इसी तरह दूसरी गोष्ठी के अन्यतम कवि अनंत पटनायक को पहली गोष्ठी के कवियों में भी शामिल किया जा सकता है।  इन कवियों के कई विशिष्ट कविता संकलन हैं :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पदमचरण के ‘पदमपाखुड़ा’, (1928), ‘गोलापी- गुच्छ’ , (1932) और ‘सूर्यमुखी’ ( 1945) , कुंतला कुमारी के ‘उच्छ्वास’(1924),’अर्चना’(1927) , और ‘प्रेम चिंतामणि’ (1930) , कालंदी चरण के ‘छुरीटिए लोड़ा,(939) , ‘मनेनाहि’ (1947) और’महाद्वीप’ (1948) , बैंकुंठ नाथ के ‘ काव्य संचयन’ (1943,1953) , और ‘उत्तरायण’ (1963) , मानसिंह के ‘धूप’ (1931) , ‘हेमशस्य’ ( 1933), ‘हेमपुष्प’ (1935) , और ’कमलायन’ (1946) , गड़नायक के ‘काव्य-नायिका’ (1943)  , ‘स्मरणिका’   (1950) और ‘मौसमी’ (1951), लक्ष्मीकांत महापात्र के ‘जातीय संगीत’,’जीवन संगीत’ ,और ‘लालिका’ , गोदावरीश  के ‘हे मोर कलम’ (1951),’कंटा और फूल’ (1958), और ‘बंका ओ सिधा’ (1964) , अनंत पटनायक के ‘किंचित’(1959), ‘अलोड़ा लोडा’ (1964), और ‘छाईर छिंटा’(1966) , सच्चिदानंद के ‘पल्ली श्री’(1941),’पांडुलिपि’ (1947), और’स्वगत’(1958)।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जैसे पदमचरण की ’धौली-पहाड़’ में ओड़िशा के अतीत गौरव के अवसान पर दुःख प्रकट करना –<br />
“कई जातियाँ मिलकर आगे बढ़ीं<br />
आगे बढ़कर रखा अपना नाम<br />
सत्य-साहस की इस जन्मभूमि के लिए<br />
सचमुच विधि हो गई बाम !&#8221;<br />
राजघरानें खत्म हो गए<br />
बह गए सारे दयानदी में<br />
परछाई तक नजर नहीं आई<br />
विलीन हो गए सारे महाशून्य में<br />
धवलचूल में !”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कुंतला कुमारी के  ‘नीरव-निशीथ’ में प्रेम और भक्ति का मिश्रण इस प्रकार है –<br />
“नीरव निशीथ में सुनाई पड़ी कानों में<br />
किसकी मधुर वाणी ?<br />
सहसा चमक उठा प्राण<br />
बहा आँखों से पानी।<br />
कौन-सी दिव्य मूर्ति देखी सपने में<br />
अपूर्व अद्भुत अचल<br />
पहचानने से पहले, कौनसे मंत्र से<br />
उसने पैदा की मेरे हृदय में हलचल।“</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कालंदी चरण पाणिग्रही  की कविता ‘मने नाहिं’ में जीवन  का स्पर्श और कवि के आनंद की अनुभूति :-<br />
“ रास्ते-घाट में देखी  मधुर मुस्कानें याद नहीं<br />
मन में जगी सब कुंठित कहानियाँ  मगर याद रही<br />
मेरी मौत पर बरसा अमृत बनकर शत-धार<br />
पुलकित हुआ यह देह उत्सव में बार-बार”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बैकुंठनाथ की  कविता ‘ यात्रा-संगीत’ में रहस्यवादी संवेदना का प्रकाश मिलता है :-<br />
“मानस-हंस मैं, मानसरोवर जाऊंगा उड़<br />
अपने दोषों से भटककर घूमता अविरत<br />
मेरी अल्प भूख-प्यास तुम्हारी सुधा<br />
तृप्त हूँ फिर भी कामना मर्त्य की<br />
जिंदगी में लेना-देना सारी सर्जना उसकी<br />
देखा नहीं, दिल खोलकर हँसते उस महादानी को<br />
पौष के पतझड़ का पेड़ जब पाता उसका स्पर्श<br />
होता पल्लवित, आहा, तब सोचने की बात क्या ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मायाधर मानसिंह की ‘ दक्षिणा प्रति ’ कविता में सुदूर सपनें तथा प्रेम परिपूर्ण  रोमांटिक मनोभावों की एक झलक देखने को मिलती है :-<br />
“ फैलाकर छाती ले जाओ मुझे, हे चंचला ! हे शीतलदेही !<br />
जहां तुम्हारे उस देश की नीले-सागर की स्वर्णिम वेला<br />
विरहिणी की तरह कबरी का फेन-पुष्प खोलकर<br />
रोते, माथा पीटते अहर्निश कांपती है ।<br />
जलपरी का अट्टहास तोड़ती महानीरवता<br />
अप्सरा-पदों से मथती वह वेला<br />
ले जाओ मुझे उस देश में, बांह फैलाए पकड़ो मुझे<br />
सनातन, जहां संसार के इस स्वपनरूपी-जंजाल को तज पाऊँगा।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दूसरी तरफ अनंत पटनायक और गोदवारीश महापात्र की सामाजिक और राजनैतिक चेतना से भरी कविताएं थीं । अनंत पटनायक की कविता ‘चइति चिट्ठी आजि’  कविता में प्यार और रिश्तों के संवेदनाओं से जुड़ी सामाजिक बदहाली की सूचना दी गई है :-<br />
“ हे प्रियतमा ! तुमने यह नई चिट्ठी लिखी है<br />
जिसमे नहीं कहीं पूर्ण विराम या कोमा<br />
मिला नहीं वेतन,अगहन से पाना है अभी बाकी<br />
भूखी-प्यासी तड़पते समझ सकी वह दुखी&#8230;&#8230;.<br />
होते ही कल सुबह आएगी बच्चों की टोली<br />
बुखार से तड़पते,भूख से बिलखते आएंगे हमजोली<br />
चैत चला गया तो क्या हुआ फिर लौट न आएगा<br />
आग लगे चिट्ठी को, मेरे प्रीति फरमासी का क्या होगा ?”<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दवारीश महापात्र की कविता ‘पेचा’में उल्लू को प्रतीक बनाकर विरल प्रजातियों की विलुप्ति एवं असहायता पर प्रकाश डाला गया है :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ विशाल वे दोनों आँखें, तीक्ष्ण चोंच नुकीले नाखून<br />
पंख झाड़कर उड़ते ही मन में होता डर प्रखर<br />
हे दिवान्ध ! चकाडोला भीरु जैसे छिपकर रहते हो कहाँ<br />
अंधेरे में शिकार करते, किसे पता चलता नहीं यहाँ &#8230;..<br />
मानव बन गया उल्लू आज, उल्लूमय यह समाज<br />
अंधकार  चारों ओर, केवल बनावटी सज-धज<br />
चलती है ‘अंधारि बिजें’ तुम्हारी नजर और चोंच की<br />
चलती है पैशाचिक लीला भत्ता ले राजकोष से दौर की”<br />
इसी प्रकार गोदवारीश की कविता ‘तुमे ओ आमे’ में राजनेताओं की असाधुता के प्रति सीधे सीधे तीव्र कटाक्ष किया गया है :-<br />
“ तुम किस तरह की बातें किया करते हो<br />
हरदम केवल मिलता नहीं, मिलता नहीं<br />
हमारे दरवाजे पर हरदम गोलमाल<br />
कोई कहे घी , कोई कहे ले जाओ तेल।<br />
तुम कहते हो मिलता नहीं कुछ भी धान<br />
लूट लिए मारवाड़ी सारा सामान<br />
हम तो देख रहे हैं वे रहते आपके साथ<br />
दिन हो या रात , दे जाते वे आपके हाथ॥”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">ये सब अधिकतर स्वतंत्रता से पहले के काव्य-आभिमुख्य  हैं । छठे दशक की शुरुआत से विभिन्न सामाजिक , राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में बदलाव के साथ- साथ पाठकों की रुचि में भी परिवर्तन आया और पहले का बहुत सारा काव्य-आभिमुख्य अनावश्यक अथवा गौण हो गया । उदाहरण के तौर पर देशभक्ति अथवा राष्ट्रीय चेतना , भक्ति-भावना और रहस्यवादी मनोभाव , प्रेम और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता , तरल मधुर रोमांटिक कल्पनाएँ , वामपंथी प्रगतिवादी विचारधाराएँ और पृथ्वी को नए सिरे से बदलने की इच्छाएँ इत्यादि काव्य-आभिमुख्य सन 1950 के बाद ओड़िया कविताओं में और ज्यादा महत्वपूर्ण  नहीं रहा और इसके बदले  कविगण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी स्थिति के बारे में विशेष जागरूक हो गए और उनकी कविताओं में बदलती परिस्थितियों के विभिन्न आयाम जैसे अंतरंगता,असहायता, अस्थिरता आदि एकत्रित होकर एक नए रूप का विकास हुआ। सच्चिदानंद राउतराय की कविताओं की सरंचना- शैली में पहले से ही यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से नजर आने लगा था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सच्चिदानंद की कविताएं बीसवीं सदी के तीसरे दशक के उनकी तरुण अवस्था से प्रकाशित हुई थी और 1950 तक स्वाभाविक रूप से उनकी काव्य-कविताओं में समकालीन काव्य-धाराओं का प्रभाव दिखने लगा था जैसे &#8216; पाथेय ( 1931 ),  &#8216; पूर्णिमा&#8217; ( 1933)    में रोमांटिक कल्पनाएँ  , ‘पल्ली श्री’ (1941) में पल्ली-प्रकृति , ‘बाजि राउत &#8216; ( 1943) में शहीदों तथा स्वतंत्रता सेनानियों के साहस , सपने और शहादत का महत्व और &#8216; भानुमतीर देश &#8216; (1949 ) में प्रकृति और प्रेम , &#8216; पांडुलिपि &#8216; ( 1947 )  संकलन में कवि के विभिन्न आभिमुख्यों की कविताएँ सम्मिलित  रूप से प्रकाशित हुई थीं । जहाँ एक तरफ रोमांटिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और सपनें जुड़े हुए हैं , वहीँ दूसरी तरफ सामाजिक, राजनैतिक परिवर्तन की सूचना और रूस विप्लव से प्रभावित प्रगतिवादी विचारधाराओं में विश्वास जो कवि की उस समय की कविताओं में बारम्बार प्रकट हुआ है। इसके बावजूद , ‘पांडुलिपि &#8216; में कुछ नई अनुभूतियों  की कविताएँ थी जो मनुष्य की  निराश्रय परिस्थितियों,परिचय और अकेलेपन को दर्शाती हैं । इस संकलन की &#8216; प्रतिमा-नायक &#8216; एक ऐसी कविता है जिसमें कवि ने अपनी एक परिचित नारी का चित्र प्रस्तुत किया है :-<br />
“चेहरे पर मुहाँसे और हाथ में चमड़े का बैग<br />
पिचके गालों पर फूटे व्यर्थ अकपटी दाग<br />
बीमार तन, मुहांसों से मलिन सारा मुख<br />
श्लथ, रुग्ण देह पर ढकी खाकी पोशाक<br />
&#8230;&#8230;.<br />
प्रतिमा नायक के मुस्कराते होठों पर स्वप्निल आभास<br />
चेहरे पर खाकी हंसी और आँखों में रात का इशारा<br />
दोनों तरफ द्रुत वन  ,गतिशील नक्षत्रों की धारा&#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसी तरह &#8216; पांडुलिपि &#8216; संकलन की एक और कविता &#8216; ज्यामिति &#8216; को देखा जा सकता है। इस कविता में प्रेम, प्रकृति और प्रेम की अभिलाषा और परिणाम  को आपस में काव्य-अनुभूति के दर्द, संदेह, दुविधा और एक प्रकार की मानसिक शून्यता को आधिभौतिक इकाई के साथ जोड़कर देखा गया है । सच्चिदानंद जी के काव्य-मंडल के  &#8216; पांडुलिपि &#8216; संकलन में पहली बार मनुष्य की स्थिति और अस्तित्व को लेकर प्रकाशित काव्यनुभव ने उन्हें स्वतंत्रता पूर्व ओडिया कविताओं की नई धारा और काव्यनुभव से अलग कर दिया और वे स्वतंत्रता पश्चात कविता की नई धारा और जीवन की  नए अनुभूतियों का अनुसंधान करने वाले कवि के रूप में स्वीकृत हुए। उसके बाद उनके प्रकाशित नए कविता संकलनों में जैसे &#8216;स्वगत&#8217; ( 1958)   &#8216;कविता-1962 &#8216; (1962)   कविता-1969’, (1970) &#8216; कविता-1971’, (1972) इत्यादि में नए अनुभवों का प्रसार और समावेश हुआ है.। इस दिशा में उनकी  कुछ विशिष्ट कविताओं का उल्लेख किया जा सकता है, जैसेकि &#8216;स्वगत&#8217; से  ‘एक बांधबीर जन्मदिन &#8216; और &#8216; उत्तर तिरिश &#8216; &#8216;कविता-1962 &#8216; से &#8216; स्मृति लेखा &#8216; &#8216; आश्विन &#8216; ( 1958 ) ,&#8217;अंतराल&#8217; और ‘खरा कविता-1969’   से ‘ नदीकु एक दर्जा’ ‘ कविता- 1971से  &#8216; हेयरपिन&#8217;, &#8216; लाल स्कूटर&#8217; और ‘मेघ &#8216; तथा &#8216; कविता- 1974’   से ‘शबरी &#8216;,और  &#8216; हंसपुर &#8216; इत्यादि । एक ओर  रोमांटिक कविताएँ और दूसरी ओर  प्रगतिवादी कविताओं की पृष्ठभूमि में काव्य-पुरुष सच्चिदानंद राउतराय का उद्भव हुआ । परन्तु बाद में उनकी परिणत आयु में लिखी गई कविताओं में गहरे  आधिभौतिकवाद,स्थिति सचेतन काव्य स्वर और काव्य संरचना का समावेश हुआ , आजादी के बाद वाली नई ओड़िया कविताओं में उनका  महत्वपूर्ण योगदान है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">स्वतंत्रता के बाद की नई ओड़िया कविताओं  में मुख्य रूप से उभरकर सामने आए- कवि गुरु प्रसाद मोहंती ( 1924- 2004)। उनकी कविताएँ छठे दशक में प्रकाशित हुई। मगर उनका पहला कविता संकलन &#8216; समुद्र- स्नान&#8217; कुछ देरी से सन 1970 में प्रकाशित हुआ। बाद में एक और संकलन      &#8216; आश्चर्य-अभिसार&#8217; 1988  में और उनके द्वारा लिखी गई लगभग 80 कविताओं का सम्पूर्ण संकलन &#8216; कविता-समग्र &#8216; 1995 में प्रकाशित हुआ। भले ही, गुरु प्रसाद के द्वारा लिखी गई कविताएँ गिनती में कम हैं, मगर उनकी कविताओं के सशक्त काव्य-स्वर ने आजादी के पश्चात की ओड़िया कविताओं में नई विचारधारा और शैली का प्रवर्तन किया ।यही कारण था कि समसामयिक तरुण कवियों ने उन्हें अपने आदर्श के रूप में ग्रहण किया । गुरुप्रसाद जी की ज्यादातर कविताएँ आत्म-कथन की तरह है। उनकी कविताओं में नायक,समय के अवक्षय और जीवन की उद्देश्यहीनता, निसंगता और अनिश्चितताओं से दुखी मानव आत्मा है जो समझ में न आने वाली इस धरती पर जीवित रहने की लगातार कोशिशें करने के बाद असफल होती है  और उनके जीवन मूल्य-बोध अस्थिर होने के साथ साथ कोई भी अनुभूति जीवन में जीने देना  नजर नहीं आता है , गुरुप्रसाद जी की कविताएँ छठे दशक में प्रकाशित होने से मानो रक्षणशीलता  का   बांध टूट गया और उसके बहाव में छठे दशक और उसके परवर्ती समय में ओड़िया कविताओं की शैली और सरंचना पूरी तरह से बदल गई ।  गुरुप्रसाद जी की उस समय की प्रसिद्ध कविता है,&#8217;काल-पुरुष &#8216; ,जो कवि के काव्य-प्रतिभा का अन्यतम श्रेष्ठ नमूना है । इस लम्बी कविता ( लगभग 170 पंक्तियाँ ) को पाँच भागों में बांटा गया है और मूल विषय-वस्तु जीवन में मृत्यु-बोध और समस्त प्रयासों के बाद भी नायक की जीवन-यात्रा असफल और अमीमांसित नजर आती है । &#8216;काल-पुरुष&#8217; के मूल अनुभव स्वतंत्रता के बाद ओड़िशा के शहरी-जीवन और संस्कृति से जुड़ा है  और कथित मौलिक ओड़िया भाषा की सहज शक्ति से संजीवित हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">छठे दशक की  नई ओड़िया कविताओं के अन्य प्रमुख कवि थे गुरुप्रसाद जी के सहयोगी भानुजी राव (1926-2001) ,जो भक्त-कवि मधुसूदन राव के पड़पोते हैं ।  उनका पहला कविता-संग्रह ‘विषाद एक ऋतु’ गुरुप्रसाद जी के ‘समुद्र-स्नान’ के प्रकाशित होने के बाद सन 1973 में प्रकाशित हुआ  , जिसमें साठ और सत्तर के दशक में लिखी गई लगभग 80 से ज्यादा कविताओं का संकलन हैं । मगर भानुजी की कविताएँ गुरुप्रसाद जी से ज्यादा हैं और उनके मृत्यु-पर्यंत लगातार बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक प्रकाशित होती रही । उनके कुछ विशिष्ट कविता-संकलन इस तरह हैं &#8211; &#8216; नई आरपारि&#8217; (1986), &#8216;चंदन वनरे एका&#8217;(1994), ‘दर्पण आगरे’ (1995),’ एका एवं एका एका’(1996), और ‘हल्दी पत्रर वास्ना’(1997) इत्यादि । गुरुप्रसाद के काव्य-आभिमुख्य की तरह ही भानुजी के काव्य-आभिमुख्य में जीवन के विचार विशेषकर जीवन की प्रतिकूलताओं और उससे संघर्ष करते अकेले होने के दर्द को झेलती कवि की आत्मा की अनुभूतियाँ सन्निहित हैं ।  यद्यपि भानुजी ने लम्बी कविताएँ नहीं लिखी थीं ,परन्तु उनकी अनेक छोटी-छोटी कविताएँ बार बार प्रकाशित होती रहीं ।  उनमें परिव्याप्त था जीवन के विभिन्न खण्डों के साथ-साथ प्रेम , प्रकृति,व्यक्तिगत-आवेगों तथा जीवन का निरानंद-बोध । मगर एक गंभीर अस्थिरता, अनिश्चितता और उद्देश्यहीनता से कवि की दुखी आत्मा समय के बदलते प्रवाह में और ज्यादा  संकुचित हो जाती है ।  उदाहरणस्वरुप उनकी ‘म्याग्नोलिया’ कविता में प्रेम निरूपण में दुःख , कष्ट और शून्यता की मर्मांतक संवेदना उभरकर सामने आई ।<br />
“चिड़िया, हाय ! कहाँ गई उड़<br />
किस पेड़ पर बनाया नीड़<br />
उलझी डाल के सपनों में ड़ुबी<br />
अकेली रह गई शून्यता चारों ओर से”<br />
और ‘नदी,नारी और नक्षत्र’ में इसी तरह ,<br />
“ तुम तो खो गई हो समय के अतल-गव्हर में<br />
मैं यहाँ अकेला पड़ा हूँ अविन्यस्त विभक्त आकाश<br />
मैंने सहा भयंकर धूप ,वर्षा और सर्दी का स्पर्श<br />
रंग मेरा नहीं आया रह गया जला ठूंठ घास &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">छठे दशक में दोनों भानुजी और गुरुप्रसाद जी की अपनी अनुभूतियों से जो नई कविताओं की शुरुआत हुई ,उसका प्रभाव हम तरुण कवियों में भी देख सकते हैं । इसी तरह के नए अनुभवों को आत्मसात करने वाले दो तरुण कवि हैं रमाकांत रथ (1934) और सीताकांत महापात्र (1936 )।  उनकी कविताएँ सातवें दशक से प्रकाशित होना शुरू हुई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रमाकांत जी का पहला कविता संग्रह &#8221; केते दिनर &#8221; सन 1962  में प्रकाशित हुआ, जिसमें  1962 से पहले की लिखी गई कविताओं को संकलित किया गया था। मगर उनका पहला महत्वपूर्ण नए अनुभवों का संकलन था उनका द्वितीय संकलन &#8216; अनेक कोठरी &#8216; (1967)।  इसमें उनकी ज्यादातर नए अनुभवों की कविताएँ प्रकाशित होकर रमाकांत जी को नई काव्य-प्रणाली में विशिष्ट कवि के रूप में स्थापित किया ।उनके अन्य विशिष्ट ग्रन्थ थे &#8211; &#8216; संदिग्ध मृगया’(1971), &#8216; सप्तम  ऋतु’ (1977), ‘सचित्र अंधार&#8217; ( 1982 ) और &#8216; श्रीराधा&#8217; (1985) इत्यादि । जबकि सीताकांत जी का पहला कविता-संग्रह &#8216; दीप्ति और द्युति &#8216; रमाकांत जी के &#8216; केते दिनर&#8217; प्रकाशित होने के एक साल बाद अर्थात 1963 में प्रकाशित हुआ था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तत्पश्चात सीताकांत जी के विशिष्ट कविता –संकलनों &#8216; अष्टपदी &#8216; ( 1967) &#8216; शब्दर आकाश &#8216; ( 1971), ‘समुद्र &#8216; (1977), &#8216; चित्रनदी&#8217; ( 1979 ) &#8216; आरदृश्य &#8216; (1981 ) &#8216; समयर  शेषनाम &#8216; (1984 ) और &#8216; फेरी असिवार वेल &#8216; (1991) इत्यादि का सिलसिला प्रारम्भ हो गया । शुरू से ही दोनों रमाकांत जी और सीताकांत जी की कविताओं में सुस्पष्ट काव्य-शैली , काव्य-सरंचना में बोलचाल की भाषा और आंतरिक मनोभावों को भाषा में प्रकाशित करने का प्रभावी सामर्थ्य आदि कई काव्य-गुण भरपूर थे । इसके अतिरिक्त, काव्य-आभिमुख्य को प्रकाशित करने के विभिन्न स्तर और व्यंग्य की सहायता से इन स्तरों का पारस्परिक मेलजोल भी था । यही नहीं , उनकी अनुभूतियों  का सूक्ष्म-विश्लेषण करने पर पाठकों के मनोभावों तथा बुद्धि को आत्म-संतुष्टि के समान धरातल पर पहुंचा देना उनके काव्य शैली की ख़ास विशिष्टता थी । सामान्यतया दोनों की कविताओं में यही विचार यथार्थ होने के बावजूद तरह-तरह के नई अनुभूतियों जुड़ती गई । उदाहरण के तौर पर रमाकांत जी के दूसरे संकलन  ‘अनेक कोठरी’  में एक विशेष अनुभूति निर्जनता, शुष्कता , निर्जीवता , और मृत्यु के इर्द-गिर्द थी ।  इस  संकलन की एक लम्बी कविता &#8216; बाघ-शिकार &#8216; की कथा-वस्तु में नायक की  जीवन यंत्रणा का मार्मिक वर्णन है ।  किस प्रकार से नायक  अपने अपूर्ण तथा असफल चक्र से मुक्त होकर नए जीवन और नई शक्ति को प्राप्त करने का प्रयास करता है &#8211; केवल उसकी प्रबल इच्छा-शक्ति का वर्णन है ।  रमाकांत जी के बाद वाले संकलनों में भी इन्ही अनुभूतियों का विशेष विस्तार हुआ है। और खासकर उनकी शुरूआती कविताओं में रेटरिक अर्थात वाग्मिता की  धारा कम होकर काव्य सरंचना मुक्त और स्वच्छंद हो गई है।  यही उनके काव्य-सरंचना के सशक्त  कथा-वस्तु की .निविड़ता के साथ सहज व स्वच्छंद काव्य-प्रवाह था। उनके  &#8216;सप्तम-ऋतु &#8216; संकलन की &#8216; ‘आमर विमर्ष भाग्य &#8216; कविता एक अच्छा उदाहरण है,   जहाँ नायक जीवन के अनेक जंजालों में फंसे हुए भी जागरूक है , मगर अंत में नए जीवन और नए सुख के लिए वह सपना देखता है:-<br />
“कितनी रातों में नींद टूट जाती है, जब और नींद नहीं आती<br />
उस समय आकाश बहुत बड़ा दिखता<br />
उस समय कानाफूसी करते पेड़<br />
सूर्यास्त के विषय में जिसके जादुई स्पर्श से<br />
इंतजार के गीत सुनाई पड़ते तारों के मुक्त अंतपुर में”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रमाकांत जी के सुगठित सर्वोत्तम काव्य-शैली में प्रकाशित एक कविता-गुच्छ &#8216; श्री राधा &#8216; है ।  जिसमे पुराण पृष्ठ-भूमि,  माध्यम और दृष्टिकोण  का स्पष्ट प्रतिपादन है। नायिका के रूप में राधा वर्तमान युग की वह त्रस्त आत्मा है जो जीवन और मृत्यु के कष्ट के अन्दर सदा आंदोलित रहती है ।  वियोग की संवेदना का जिक्र इस प्रकार है  :-<br />
“ मैं जानती हूँ श्यामवर्ण मेरे प्रियतम, जानती हूँ<br />
शनै–शनै तुम काले रंग के हो जाओगे<br />
उसके बाद अदृश्य हो जाओगे ,निराकार हो जाओगे<br />
निरखूंगी मैं पर तुम्हारी तिरछी निगाहें<br />
और मुस्कान दिखाई नहीं देगी ”<br />
स्थान ,काल से परे जीवन-मृत्यु के संधिवेला में पूरी तरह से एकीभूत हो जाने की संवेदना :-<br />
“जब मैं तुम्हें अपने सीने से चिपकाऊंगा<br />
जब मेरे सारे अंगों पर<br />
तुम्हारा हाथ घुम रहा होगा<br />
जब मर नहीं पा रही होगी अथवा<br />
जिंदा रहना भी पूरी तरह असंभव हो रहा होगा । ”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सीताकांत जी की कविताओं के दो विशिष्ट गुण उनकी प्रारम्भिक कविताओं में  देखे जा सकते हैं। पहला,पौराणिक परिस्थितियों अथवा मिथकों का व्यवहार , दूसरा, आधुनिक युग के  बिगड़ते वातावरण में अपने परिचय की तलाश ।  उनकी काव्य-सरंचना में इन दोनों का आपसी मेल है। खासकर उनकी कविताओं में मिथक प्रतिरूप और प्रतीक दोनों रूप में होने के साथ साथ  काव्य-उपलब्धि के  अंश और समकालीन जीवन के प्रति कवि की  नैतिक प्रतिक्रिया  बनकर उभरकर सामने आता हैं । कवि का दूसरा संकलन &#8216; अष्टपदी &#8216; इसी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण  है ,जिसमें  आठ लम्बी कविताओं को एक व्यापक रूपक के रूप में दर्शाया गया है जबकि पृष्ठभूमि में महाभारत और श्री कृष्ण जी के जीवन की पौराणिक घटनाओं में वर्तमान समय की वेदना और कष्ट प्राप्ति के साथ- साथ मृत्यु का अतिक्रम करने के आनंद , सौंदर्य और पूर्णता की अनुभूति दर्शाई गई है।  बाद वाले संकलन &#8216; समुद्र &#8216; में यह स्पष्टता अधिक  दृष्टिगोचर होती है ।  संकलन के तीन भाग &#8216; परिचय&#8217;, &#8216;प्रतिवेशी&#8217; और &#8216; परिणाम &#8216; जीवन यात्रा और परम्पराओं का एक साथ हो जाने का सन्देश देते हैं ।  कहा जा सकता है कि जीवन और मृत्यु या  जीवन और जीवनहीनता अथवा अन्य रूप से जीवनहीनता के परिसर में जीवन की संभावना के पुट सीताकांत जी की कविताओं में विभिन्न रूप में  रूपकों तथा प्रतीकों के माध्यम से सामने आते हैं, जिसने कवि के दृष्टिकोण को एक अलग तरीके से प्रभावित किया।  उनके &#8216; चित्रनदी &#8216; संकलन में &#8216; आत्मरक्षा &#8216; कविता का एक सुन्दर उदाहरण है ।  जिसमें  बाहर से आए शत्रु द्वारा दुर्ग पर आक्रमण तथा दुर्ग के अंतपुर वासियों द्वारा अपनी आत्मरक्षा के प्रयास का चित्रण प्रस्तुत किया गया है ।  मगर यह चित्रण एक अन्य अर्थ का प्रतीक भी है । कारण शत्रु है ऋतुराज बसंत, जो कि एक नए जीवन का वाहक है और इस नए जीवन के लिए दुर्गवासियों का अनाग्रह और भय , इसलिए अपनी आत्मरक्षा के उद्यम की  प्रस्तुति की गई जिसकी झलक इस प्रकार है  :-<br />
“ अंधड़ अचानक आया<br />
राजधानी की अंतिम छोर पर ऋतुराज बसंत की छावनी<br />
फूलों और सपनों के अनेक रंगीन तम्बू<br />
अनेक अग्निशिखा,गुंजन और बहुत मधुमक्खियाँ”<br />
इसी तरह बसंत के आगमन पर नगरवासियों का भय :-<br />
“वे सब कांपने लगे<br />
नगरवासी भय से कातर<br />
व्याकुल हुए सभी<br />
बुलाई गई सभा<br />
सही में, आज सब टूटकर चूरचूर हो जाएंगे<br />
दुर्ग शृंखला के सारे बंधन ”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सीताकांत जी और रमाकांत जी की  कविताओं में हम जीवन की अभिज्ञता और जीवन की स्थिति के बारे में उस चेतना के स्वरूप को देखते है ,  जो क्लेश और यंत्रणा से धीरे-धीरे आनंद और परमशांति की ओर अग्रसर होती है। कह सकते हैं कि रमाकांत जी और सीताकांत जी दोनों की कविताओं ने स्वतंत्रता के बाद विकसित हुई ओड़िया कविताओं में समग्र रूप से महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किया है , जो कि गुरुप्रसाद और भानुजी के बाद नई अनुभूतियों, नई विचारधाराओं , नए स्वरुपों और नई सरंचनाओं के रूप में ओड़िया कविताओं के लिए मजबूत नींव का पत्थर साबित हुई ।  बाद में लगभग  बीसवीं सदी के अंत तक ज्यादातर  नए कवियों ने  स्वतंत्रता परवर्ती नए अनुभवों और शैली में कविताओं की धाराओं से अनुप्राणित होकर  ज्यादा उच्च कोटि की  कविताओं की रचना की ।  ये केवल गुरुप्रसाद इत्यादि का प्रभाव नहीं., वरन उस समय में यह स्वाभाविक ही था ।  द्वितीय महायुद्ध के परवर्ती जीवन और परिवर्तित विश्व मानविकता के साथ ये जडित है और सम्मलित रूप से अपने व्यक्ति , स्थिति का विश्लेषण ही उनका प्रमुख आभिमुख्य बना ।  विशेष रूप से बुद्धि , विद्रूप , द्वैतार्थ , विरोधाभास यहाँ तक कि मिथकों के द्वारा ये रचे गए ।  छठे दशक से ये धाराएं क्रमश: विभिन्न रूप से प्रसारित होती आ रही हैं और विगत प्राय: 50  सालों से  स्वतंत्रता परवर्ती ओड़िया  कविताओं की ये प्रधान धाराएं हैं ।  इस प्रसंग में कुछ विशिष्ट कवियों का नाम उल्लेख किया जा सकता है, जैसेकि सौभाग्य कुमार मिश्र (1943 ) , राजेन्द्र किशोर पंडा (1944) , जगन्नाथ प्रसाद दास (1935 ) , दीपक मिश्र (1939), सौरीन्द्र बारीक (1938 ) , हरिहर मिश्र (1944 ) ,फनी मोहंती (1944 ) , वंशीधर षडंगी (1940 ), प्रतिभा शतपथी (1945 ), हर प्रसाद दास (1945 ), मनोरमा विश्वाल महापात्र (1947),प्रमोद मोहंती (1942 ), और हर प्रसाद परिछा पटनायक (1953 ), इत्यादि । .उनके कुछ महत्वपूर्ण कविता संकलन इस प्रकार हैं जैसे  सौभाग्य जी के  &#8221; अंध महुमाछि &#8221; (1977 ), और  “द्वा सुपर्णा” (1984 ), राजेन्द्र जी के &#8220;शैलकल्प&#8221; (1982 ), और &#8220;आद्या” (1988 ), जगन्नाथ जी के &#8220;प्रथम पुरुष&#8221; (1971) , और &#8220;जे जाहार निर्जनता &#8221; (1979 ), सौरीद्र जी के &#8221; आकाश परि निविड़&#8221; ( 1985 )और  &#8221; अनुभारत &#8221; (1990 ), दीपक जी के &#8221; निर्जन नक्षत्र&#8221;    (1971), और &#8220;शून्यतार शोष&#8221; (1981), प्रतिभा  जी  के  &#8221; नियत वसुधा &#8221; ( 1980 ), और &#8221; शबरी &#8221; ( 1991 ), फनी जी के &#8221; माया दर्पण &#8221; ( 1990 ), और &#8220;अहल्या  &#8220;(1996 ), वंशीधर जी के &#8221; स्थविर अश्वारोही &#8221; (1988 ),और “ शबरी  चर्या &#8221; (1989 ), हरिहर जी के &#8221; चाहाणी मंडप &#8221; ( 1987 ), और &#8221; ,भित्तिरि चंदन &#8220;( 1994 ), हरप्रसाद जी के &#8221; मंत्रपाठ &#8221; ( 1991 ), &#8221; गर्भगृह&#8221;  (1993 ), प्रमोद जी के &#8221; देवी पाद &#8221; ( 1981 )  और “अकात कात”(1995), मनोरमा जी के “एकला नईर गीत”(1990),’थरे खालि डाकि देले &#8216;( 1992 ) , परिछा पटनायक जी के &#8216; अथय सूर्य&#8217; ( 1990 ), और &#8216; सबु अंधार आजि राति रे &#8216; ( 1992 ), इत्यादि ।. उदाहरण के तौर पर सौभाग्य जी की &#8216; कुआलालम्पुर&#8217; कविता में,जहां विनाश की मानसिकता और अनिश्चितता के मनोभाव स्पष्ट है ।  कुआलालम्पुर शहर बनकर नहीं रहा , बल्कि जीवन के अपरिचित गंतव्य स्थान का प्रतीक बन गया।  जिसके जरिए जीवन के सीमित सर्तक परिवेश से मुक्ति मिल सकती है , मगर ऐसा होना ज्यादा विश्वास योग्य नहीं है:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“कल की विचित्र जादुई शाम<br />
रसिकलाल नहीं ,कोई नहीं , मै भी नहीं<br />
किसी ने देखा नहीं कुआलालम्पुर<br />
प्लेटफार्म एक से प्लेटफार्म दो   तक<br />
सीधे चलते जाना हमारा साहस<br />
प्लेटफार्म दो से प्लेटफार्म  एक तक<br />
सीधे बाहर आना हमारी सजगता<br />
कहीं बीच में अचानक ट्रेन आ जाए<br />
कौनसी ट्रेन ? कहाँ जाए ? कहाँ जाएँ ?<br />
कुआलालम्पुर , कुआलालम्पुर । &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जगन्नाथ जी की &#8216; संध्या ठीक छअटा &#8216; कविता में दोनों प्रेम और मृत्यु की संवेदना और सामाजिक धरातल पर अशुभ और अमंगल का जिक्र है:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; शहर की सीमा में आज असंभव भीड़<br />
दोपहर की सारी घड़ियाँ एकदम बंद<br />
सिर्फ तुम और मैं<br />
शाम को ठीक छह बजे<br />
और शहर की भौचक जनता &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अथवा सौरीन्द्र जी की &#8221; महायात्रा &#8221; कविता में हिमालय  के विपुल विस्तार में युधिष्ठिर की चिंताएं , अपने लम्बे जीवन की धुंधली स्मृतियाँ तथा आकाश की विराट शून्यता की संवेदनाओं के स्वर प्रस्फुटित होते हैं:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; उसके बाद कोई शिखर नहीं , यात्री नहीं , यात्रा नहीं<br />
कुंज्झटिका नहीं , झड़ नहीं<br />
नीलिमा भी नहीं<br />
अँधेरा उजाला नहीं<br />
आदि अंत कुछ भी नहीं<br />
ये जैसे अंत का अंत , शून्य की शून्यता .&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अथवा राजेन्द्र जी के &#8216; शैलकल्प &#8216; कविता में जीवन के विभिन्न स्तरों  के विस्तृत अनुभवों का उल्लेख है , उस आस्था के साथ जिसे मृत्यु अथवा अमरत्व प्राप्त हो , उस प्रत्येक व्यक्ति को दोनों शिखर तथा अपनी अंतिम स्थिति को प्राप्त करना होता है :- .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8216;देखो  देखो<br />
ईश्वर के उठे हाथ की<br />
अंगुली के ऊपर में<br />
गोवर्धन की तरह तुम<br />
और गोवर्धन पर्वत के उच्चतम बिन्दु  पर<br />
कोमल किसलय शाखा की तरह मैं<br />
स्थिर खड़ा हूँ<br />
हाँ<br />
उतनी निर्दिष्ट ऊँचाई पर मैं<br />
स्थिर हो गया हूँ<br />
अवश्य  बिजली गिरने  के  इन्तजार में  ? &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दूसरी प्रकार से राजनैतिक और सामजिक दुरावस्था  का वर्णन.फनी जी की कविता &#8216; आस जिबा एरसमा&#8221; .कविता जिसकी पृष्ठभूमि है 1999 का चक्रवात और पूरी तरह विध्वस्त एरसमा अंचल । उसके उद्धार में लगे स्वार्थी व्यक्तियों की इस कविता में तीव्र भर्त्सना की गई है :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; एरसमा के ध्वंस स्तूप में आइए<br />
फादर आइए<br />
आइए,अन्डरवर्ल्ड  के बादशाह<br />
चम्पकलाल<br />
आइए  महागठबंधन के  खलनायक<br />
जनाब सल्लाउद्दीन एक के बाद एक आइए ,<br />
प्रतिद्वंद्वी जैसे महेंद्र लग्न में<br />
संभ्रांत शैली  में आइए<br />
ठीक समय मगरमच्छी आंसू बहा<br />
पहाड़ से ऊंचे आश्वासन दीजिए, एरसमा को<br />
रोम जैसे बनाने का सपना दिखाइए.&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राधानाथ जी से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक एक लंबा मार्ग तय करती हुई  तरह तरह की अनुभूतियों से ओत-प्रोत,व्यक्तिगत संबंधों की अस्थिरता , प्रवाहमान समय की क्षणभंगुरता , स्थिति और अस्थिति का अनुभव और इन सब के उत्तरण  में स्थिरता और  प्राज्ञ अनुभूति लिए सौ वर्ष से ज्यादा समय की अवधि में ओड़िया कविताओं की निरंतर परिवर्तनशील परिसर  में चेतना और संवेदनशीलता से रचित साहित्य जितना महत्वपूर्ण है  उतना आनंददायक भी । आशा करता हूँ कि दिनेश कुमार माली द्वारा अनूदित कविताओं की इस पुस्तक का हिन्दी जगत में भरपूर स्वागत होगा ।<br />
</span></h3>
<h2>यतीन्द्र मोहन मोहंती</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">1573,भक्त मधु नगर<br />
भुवनेश्वर 751030<br />
मोबाइल :- 9438731580<br />
दूरभाष :- 0674-2350284 </span></h3>
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		<title>राजस्थान की ग्राम्य-पृष्ठभूमि का जीवंत चित्रण  &#8220;आगे खुलता रास्ता&#8221;</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Dec 2011 04:50:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[नन्द भारद्वाज राजस्थानी और हिंदी भाषा के बहुचर्चित कवि , कथाकार , समीक्षक और संस्कृति... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/12/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/aage-khulata-marg.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6999" title="aage khulata marg" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/aage-khulata-marg.jpg" alt="" width="206" height="246" /></a>नन्द भारद्वाज राजस्थानी और हिंदी भाषा के  बहुचर्चित कवि , कथाकार , समीक्षक और संस्कृति कर्मी के रूप में एक जाना पहचाना नाम है। पत्रकारिता , दूरदर्शन और आकाशवाणी में सम्पादन , लेखन , कार्यक्रम-निर्माण और प्रशासन के क्षेत्र में सैंतीस वर्षों के सक्रिय कार्य-अनुभव ने आपकी संवेदनशीलता को वह पैनी धार प्रदान की है, जो आधुनिक सामाजिक व्यवस्था की मूल्य-हीनता पर सीधा कुठाराघात करती है तथा जीवन के अनेक झंझावातों को अपनी जिजीविषा के बल पर जूझने के लिए एक नए मार्ग का प्रतिपादन करती है, इस दर्शन की स्पष्ट झलक आपके साहित्य-सृजन में मिलती है । .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपने राजस्थान की जीवन-शैली , देश-काल एवं परिस्थितियों को आत्मसात कर अपनी जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए वहाँ की सामुदायिक-विचारधारा और मानवीय-संवेदनाओं से ओत-प्रोत अपने अनुभवॉ का एक नया संसार &#8221; साम्है खुलतौ मारग &#8221; राजस्थानी भाषा में उपन्यास के माध्यम से रचा ।. यह उपन्यास सन 2003 में मारवाड़ी सम्मेलन ,मुंबई द्वारा घनश्याम दास सरार्फ सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार तथा 2004 में केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा  पुरस्कृत हुआ ।  इसी कृति को हिंदी पाठकों के सम्मुख पहुंचाने के लिए आपने स्वयं इसका अनुवाद और पुनः सृजन &#8221; आगे खुलता रास्ता &#8221; (आईएसबीएन 978-81-89228-64-4) के रूप में किया । जिसका प्रकाशन &#8221; रचना प्रकाशन &#8221; जयपुर ने सन 2009  में प्रकाशित किया । हार्ड कवर ,सुन्दर छपाई ,और वाजिब दाम ( 200 रुपये ) के लिए प्रकाशक भी बधाई के पात्र हैं । इस उपन्यास का युवा रचनाकार अतुल कनक द्वारा अँग्रेजी में भी अनुवाद हो चुका है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">लेखक ने अपने अनुभव विवेक से यह सिद्ध किया है कि जीवन में कुछ भी पूर्व निर्धारित या प्रारब्ध-वश घटित नहीं होता। जो कुछ होता है उसका निश्चित कार्यकरण संबन्ध दृश्य में मौजूद होता है।अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले हर व्यक्ति को एक बेहतर मानव जीवन के लिए अपना रास्ता स्वयं खोजना या बनाना पड़ता है, जो भोगा हुआ दारुण यथार्थ भी होता है और अनुभूत किया हुआ दारुण यथार्थ के प्रति करुणा का भाव भी अर्थात लेखक उपन्यास में कहानी गढ़ता नहीं है प्रत्युत सामाजिक संकल्पनाओं में व्याप्त एक विराट कथा से गुजरता हुआ दिखाई पड़ता है वह भी पूरी तटस्थता के साथ । किन्तु विवेक की थाती और सहृदयता की समूची धारा इस पथ पर लेखक के पूर्ण पाथेय के रूप में साथ साथ चलती है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राजस्थान की ग्राम्य- पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण उपन्यास के पात्रों का जीवंत चित्रण आँखों के सामने इस तरह  गुजरता हुआ नजर आता है मानो पाठक स्वयं रामबाबू, उनकी धर्म पत्नी गीता, बेटियाँ सत्तो (सरस्वती) ,दुर्गा तथा बेटा वीरू को साक्षी- भाव से देखते हुए इस परिवार के उतार- चढ़ाव तथा जिन्दगी के थपेड़ों  को बड़े ही नजदीक से अनुभव करता है ।  कहीं- कहीं तो ऐसा लगता है राजस्थान के विभिन्न अंचल जैसे जोधपुर, पचपदरा ,कवास , बाड़मेर, पीलीबंगा इत्यादि जगहों पर खोजने लगता है कि किस- किस जगह पर रह कर उस परिवार ने संघर्ष किया होगा ।.इसके अतिरिक्त, सत्यवती और दुर्गा की जीवनगाथा  मानो आसपास के लोगों के साथ गुजरने वाली एक यथार्थ कहानी प्रतीत हो रही हो । निश्चित तौर पर राजस्थानी पाठकों को मूल उपन्यास राजस्थानी में और ज्यादा  प्रभावित  करता होगा ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह उपन्यास परत दर परत जिस तरह जिन्दगी के विभिन्न पहलुओं को आगे नए रास्ते में  जिस प्रभावशाली ढंग से दिखाता जाता है , मानो सिनेमा घर में बैठे दर्शक की आँखों के आगे कोई सामाजिक चलचित्र गुजर रहा हो और पात्रों के सुख-दुख की स्वानुभूति करता हुआ दयाद्र होता जा रहा हो।   यह उपन्यास सामाजिक जीवन के सत्य की पड़ताल ही नहीं करता,अपितु उन सत्यों की विद्रूपताओं के शमन के प्रति भी अपरोक्ष रूप से समुत्सुक दिखाई पड़ता है । इसलिए गहरे और गहरे उतरता विद्रूपताओं के मूल तक पहुँचने की कोशिश भी करता है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जहाँ सत्तो (सत्यवती) बचपन से अपने घर की परिस्थितयों को भांपते हुए माँ का मौन रहकर अपने पिता की अवहेलना को स्वीकार करना और साथ ही साथ पिता से उसे उचित प्यार न मिलने पर भी  अपने प्रतिभाशाली व्यक्तित्व और  पढ़ाई में तेज होने की वजह से वह अपने पाँवों पर खड़ा होकर अपने जीवन का रास्ता तत्कालीन सामजिक संकीर्णता को दर-किनार करते हुए स्वयं प्रेम विवाह करके तय करती है । यही नहीं, अपनी बहन दुर्गा के लिए भी अपने पैरों पर खड़ा होने का एक प्रेरक आदर्श बन जाती है । शादी के बाद भी उसे घर में यथोचित आदर न मिलने पर भी अपने माता पिता के प्रति कोई शिकवा-शिकायत का भाव मन में नहीं रखती है । इतना ही नहीं, जुझारू प्रवृति की होने के कारण शिक्षिका बन कर शिक्षक संघ के नेतृत्व की कमान संभाल लेती है और संघ के सोये हुए संघर्षशील नेताओं में एक नई जान फूक देती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">केंद्रीय  साहित्य अकादमी से पुरस्कृत  इस राजस्थानी उपन्यास पर वास्तव में अगर  फिल्मांकन  होता तो  समाज में एक आम आदमी के जिन्दगी की समस्याओं और उसके परिवार की गुंफित भावनाओं को समझने के साथ-साथ सत्यवती जैसी सहनशील लड़की को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढकर अपने जीवन का रास्ता खुद तय करना अपने आप में एक अनुकरणीय उदाहरण होता । इस उपन्यास में मेरे लिए सबसे बड़ी सम्मोहित करने वाली बात यह थी कि इसके पृष्ठभूमि में जिप्सम खदान के परिवेश का जितना यथार्थ चित्रण हुआ है जिस परिवेश को हरपल मै यहाँ कोयले की खानों में पाता हूँ । आफिसरों में व्याप्त  भ्रष्टाचार को लेकर ईमानदार कर्मचारियों को किस तरह जगह-जगह पर स्थानान्तरित होकर भटकना पड़ता है और असंख्य मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, एकदम सटीक प्रतीत होता है । किस तरह ठेकेदार अपना काम निकलवाने के लिए रिश्वत देकर  ईमानदार  कर्मचारियों को अपने साथ मिलाने का प्रयास करते हैं और शराब जैसी बुरी आदतों की लत गिराते हैं । </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सत्यवती की माँ और उसके खुद के संघर्ष को दर्शाता हुआ यह उपन्यास स्त्री-विमर्श से जुड़े  अनेक सुप्त पहलुओं को उजागर करता हुआ दो पीढ़ियों में आए वैचारिक-अंतराल को पाटते हुए नई दिशा प्रदान करता है । बचपन में जहाँ वह अपनी माँ के वात्सल्य और ममता के आँचल का स्पर्श पाती है, वहीँ शराबी पिता से दूर होती जाती है ।जब पिताजी घर में उसकी सगाई की बात करते हैं तो वह तुरंत विरोध कर देती है।. पीलीबंगा , गंगानगर और जैसलमेर में  बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाले पंजाबी शब्दों जैसे चंगा, थंगा प्राहजी ,पुत्तर ,काके इत्यादि  के प्रयोग ने इस उपन्यास में चमत्कारिक ढंग से वहाँ की आंचलिकता और परिवेश को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। इस क्षेत्र में रहने वाला राजस्थानी पाठक तो बरबस ही मंत्र-मुग्ध हो जाएगा।   कहीं कहीं संवेदनशील पाठक सत्यवती और उसकी माँ की पीड़ा को अनुभव करते हुए स्वयं  ही अपनी आँखों को नम पायेगा तथा कहीं कहीं तो उसे फूट फूटकर रोने की इच्छा पैदा भी होगी ।.इस उपन्यास की एक और ख़ास विशेषता यह भी है कि मुख्य पात्र रामबाबू , गीता , सत्यवती ,किसी को भी किसी भी कारण से किसी भी परिस्थिति में गलत नहीं ठहराया जा सकता । राम बाबू भी ईमानदार कर्मचारी हैं ।हालात-वश वह नशे का शिकार हो जाते हैं । गीता पति की हर आज्ञा  का इस तरह पालन करती है मानो उसका स्वयं का कोई अस्तित्व ही न हो । लाड़ली बेटी सत्यवती दोनों के संस्कारों को पोषती हुई “सार-सार को गहि रहे ,थोथा देई उड़ाए” कहावत को चरितार्थ करती हुई न केवल एक आदर्श शिक्षिका के रूप में स्वयं को स्थापित करती है वरन एक सुशील पुत्री का दायित्व पूरा करते हुए सामजिक बन्धनों के परवाह किए बगैर अपने माता पिता का नाम रोशन करती है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अनंतोगत्वा, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि यह उपन्यास न  सिर्फ राजस्थानी पाठकों के बल्कि हिंदी के सुधी पाठकों के दिलों को भी गहराई तक छु जाएगा । इतना ही नहीं अपने आप में एक कालजयी कृति का स्थान प्राप्त भी करेगा ।. गागर में सागर भरने वाले इस उपन्यास को सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए नन्द भारद्वाज साहब के प्रति कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त करने के लिए भावतिरेक की वजह से सही शब्द नहीं मिल पा रहे है ।</span></h3>
<h2>दिनेश कुमार माली</h2>
<h3><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/_5MH5bkvC_qs/SifzRjHe66I/AAAAAAAAABM/j0GlmvL62lA/S220/mali.jpg" alt="My Photo" width="109" height="154" /></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पेशे से खनन-अभियंता पर नशा लेखन का. राजस्थान के सिरोही में जन्मे, पले, बढे और एम.बी.एम. अभियांत्रिकी महाविद्यालय, जोधपुर से खनन अभियांत्रिकी में स्नातक डिग्री ,भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान, नई दिल्ली से पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा इन इकॉलोजी एंड एन्वैरोमेंट तथा इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से एम.बी.ए. की डिग्री प्राप्त की और सम्प्रति ओडिशा में कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी महानदी कोल-फील्ड्स लिमिटेड की खुली खदान सम्ब्लेश्वरी, ईब-घाटी क्षेत्र में खान-अधीक्षक के रूप में कार्यरत हैं.हिंदी अनुवाद तथा हिंदी में शोध-पत्र के लिए कोल इंडिया तथा महानदी कोल फील्ड्स लिमिटेड द्वारा समय समय पर राजभाषा सम्मान से सम्मानित. प्रकाशित पुस्तक : न हन्यते….</span></h3>
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		<title>अंधेरे में रोशनी की सेंध लगाने को बेचैन कविताएँ</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Dec 2011 05:52:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[चर्चा-परिचर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
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		<description><![CDATA[मूल्यांकन :अरविन्द श्रीवास्तव &#8220;यह कविता है तो इसमें मेरी आत्मा होनी चाहिए&#8221; - लीलाधर मंडलोई... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/12/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a7-%e0%a4%b2/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: left;" dir="ltr">
<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">मूल्यांकन :अरविन्द श्रीवास्तव</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/modern_art_paintings_21st.-merello._the_last_smoker_73x54cm_table-tablex1.jpg1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6844" title="modern_art_paintings_21st.-merello._the_last_smoker_(73x54cm)_table-tablex.jpg" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/modern_art_paintings_21st.-merello._the_last_smoker_73x54cm_table-tablex1.jpg1-223x300.jpg" alt="" width="156" height="210" /></a>&#8220;यह कविता है<br />
तो इसमें<br />
मेरी आत्मा होनी चाहिए&#8221;<br />
- लीलाधर मंडलोई की इन पंक्तियों अथवा विचारों के साथ जब हम नेट और ब्लॉग पर कविताओं की पड़ताल करने निकलते हैं तो यह सुखद अहसास के साथ कहना पड़ता है कि इन दिनों कवि और कविताओं की आत्मा नेट व ब्लॉग पर और नेट व ब्लॉग की आत्मा कवि और कविताओं में बसती है! एक साथ कविताओं की भरी-पुरी दुनिया  हमारा स्वागत तो करती ही है, साथ ही वह बेचैन भी दिखती है अंधेरे में रोशनी की सेंध लगाने को। सुप्रसिद्ध आलोचक एवं जनसंस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो मैनेजर पांडेय का मानना है कि कोई भी कविता तब जनतांत्रिक होती है जब वह संवेदना, संरचना व भाषा के स्तर पर जनता के लिए, जनता के बारे में और जनता की भाषा में बात करे। बडी कविता वह है जो संकट के समय लोगांे के काम आए।  दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गोपेश्वर सिंह के विचार है कि कविता मुक्ति का स्वप्न देखने का नायाब जरिया है। मुक्ति यानी मोक्ष का आदिम स्वप्न है, जो तमाम रुढ़ियों से मुक्त होने का स्वप्न देखते हैं. उन में कवि पहले होते हैं।  इंटरनेट पर मनोज पटेल का ब्लॉग ‘पढ़ते-पढ़ते<a href="http://padhte-padhte.blogspot.com/">’http://padhte-padhte.blogspot.com </a>है जहाँ धरती की तमाम बेचैन आत्माएँ जनता तक पहुँचने को बेताव दिखती हैं। यहाँ एक साथ येहूदा आमिखाई, नाजिम हिकमत, निजार कब्बानी, फदील अल-अज्जवी, निकानोर पार्रा, महमूद दरवेश, माइआ अंजालो, वेरा पावलोवा, इतालो काल्विनो, नाओमी शिहाब न्ये,गाब्रिएल गार्सिया मार्केज, ओरहान पामुक,गिओर्गि गस्पदीनव, जोसे सारामागो, फराज बयरकदार और लैंग्स्टन ह्यूज को पढ़ा जा सकता है। यहाँ है दून्या मिखाइल और  अफजाल अहमद सैयद की कविताएँ जिसे हम बार-बार पढ़ सकते हैं। यहीं हैं नाजिम हिकमत की ढ़ेर सारी कविताएं भी जिन्हें बेशक आप पसंद करेंगे &#8211; &#8230;मैनें तुमसे कुछ कहना चाहा, और कह न सका./दुनिया अल्सुबह के सिगरेट सी लगने लगी है  /मौत ने मेरे पास अपना अकेलापन पहले ही भेज दिया है./जलन होती है मुझे ऐसे लोगों से जिन्हें पता ही नहीं/कि वे बूढ़े हो रहे हैं,/इतना डूबे हैं वे अपने काम में. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> 1963 की इस कविता में नाजिम हिकमत की आत्मा आज भी दिखती है। तुर्की के इस महान कवि  (1902 &#8211; 1963) की कविताएँ खुद उनके ही देश में तकरीबन तीस सालों तक प्रतिबंधित रहीं। वे बीसवीं सदी के सबसे प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनकी कविताओं का दुनिया की पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्होंने अपनी जिंदगी के तेरह साल राजनीतिक बंदी के रूप में जेलों में बिताए और अपने आखिरी तेरह साल निर्वासन में। जेल में उन्होंने अद्भुत कविताएँ लिखीं. इनकी कविताओं की एक और बानगी देखें- सबसे अच्छे समुद्र को अभी पार किया जाना बाकी है./सबसे अच्छे बच्चे को अभी जन्म लेना है./हमारे सबसे अच्छे दिनों को अभी जिया जाना है,/और वह सबसे अच्छा शब्द जो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ/अभी तक कहा नहीं है मैनें.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यहाँ मनोज पटेल द्वारा अनुदित वेरा पावलोवा  की आठ कविताओं की श्रृंखला में ‘एक वायस मेल है कविता’ को देखें- एक वायस मेल है कविता /कहीं बाहर चला गया है कवि/बहुत मुमकिन है न आए कभी लौटकर/कृपया अपना सन्देश छोड़ें/गोली की आवाज के बाद.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मनोज पटेल ने अपने ब्लॉग को अनुवाद केन्द्रित बनाया है। जहाँ विश्व साहित्य के चर्चित व अल्पचर्चित श्रेष्ठ कवियों की कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं। उनके चयन व अनुवाद कार्य को साधुवाद है। साहित्य जगत के लिए ‘जानकी पुल’<a href="http://www.jankipul.com/">http://www.jankipul.com</a>चर्चित और महत्वपूर्ण साइट है। प्रभात रंजन इसके मॉडरेटर और गिरिराज किराडू इसके सलाहकार हैं। अभी यहाँ मोहन राणा की कविताएँ. पढ़ने को मिली है -देशाटन पर हैं देशांतर/ये दुनिया कभी कोई मोर्चा/कभी जन्नत की हूर/अलग अलग रंगों के हरावल दस्तों की बिगुल धुन,/लोग पूछते हैं और आजकल क्या कर रहे हैं!/मैं मील के पत्थर उखाड़ने में लगा हूँ/ये रास्ते दिन के अंधेरों में भटकाते हैं,/देशाटन पर हैं देशांतर/उन बादलों से कहें वे ना बरसें/सूख नहीं पाए हैं पिछली सदी के आँसू अभी भी</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> मोहन राणा की कविता में गजब की बेचैनी और पीड़ा है। वहीं ‘जानकी पुल’ पर ही अशोक कुमार पांडे की कविता हमारे सोये हुए अहसासों को झकझोर कर जगाने का काम करती है। देखें एक बानगी &#8211; ये युद्ध के ठीक पहले केसमारोह थे/समझौतों की आखिरी उम्मीद जैसी कोई चीज नहीं बची थी वहां/फिर भी समकालीनता का कोई आखिरी प्रोटोकाल/कि उन महफिलों में हम भी हुए आमन्त्रित/जहां बननी थी योजनायें हमारी हत्याओं की!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> हरकीरत ‘हीर’ <a href="http://harkirathaqeer.blogspot.com/">http://harkirathaqeer.blogspot.com </a>की नज्में ब्लॉग पर सर्वाधिक लोकप्रिय रही है। इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि इनकी नज्मों पर सर्वाधिक प्रतिक्रिया एवं टिप्पणियाँ देखने को मिलती है। समय और यर्थाथ पर गहरी चोट करती हुई इनकी एक सशक्त एवं भावपुर्ण रचना- तवायफ की इक रात &#8230;. शीर्षक से इधर आयी है। पूरी कविता प्रस्तुत है- मैं फिर &#8230;..अनुवाद हो गई थी/उसी तरह , जिस तरह/तुम उतार कर फेंक गए थे मुझे/अन्दर बहुत कुछ तिड़का था/गुम गए थे सारे हर्फ &#8230;/रात मुट्ठी में/राज लिए बैठी रही &#8230;/जो तुम मेरी देह की/समीक्षा करते वक़्त/एक-एक कर खोलते रहे थे/हवा दर्द की आवाजें निगलती &#8230;/जर्द, स्याह, सफे़द रंग आग चाटते/कई गुनाह मेरी आहों में/चुपचाप दफ़्न होते रहे &#8230;&#8230;/बस ये &#8230;../बिस्तर पर पड़ा जनेऊ/खिलखिला कर हँसता रहा/जो तुमने/मुझे छूने से पहले/उतार कर रख दिया था/सिरहाने तले &#8230;&#8230;!!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> युग के कड़वे सच से साक्षात्कार कराती इस कविता पर पाठकों के पूरे 143 पत्र/प्रतिक्रियाएँ फिलवक्त पढ़ी जा सकती  हैं। इधर ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताएँ सर चढ़ कर बोल रही है। विमलेश त्रिपाठी का ब्लॅाग ‘अनहद’ <a href="http://bimleshtripathi.blogspot.com/">http://bimleshtripathi.blogspot.com</a>पर बिल्कुल ताजा-टटका कवि संजय राय, जलपाईगुडी की कविताओं की अत्मा व तेवर दृष्टव्य है, किसी ब्लॉग पर उनकी यह पहली कविता है, देखें ‘एक टुकड़ा शहर’ का मिजाज- वह जब भी/जाती है बाजार/एक टुकड़ा शहर ले आती है/अपने/पर्स में/मेरे भीतर टूटता है/एक गांव/हर बार</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> ये कविताएं समय की आहट को पहचानने का प्रयास है। नए चित्र व नई भाषा के साथ कविताओं का बहुरंगी फलक अंतर्जाल पर मौजूद है सच कहें तो ये कविताएं समय के कुंद कपाल में सूराख करने की कूबत रखती । समकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान, 2011 का भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार श्री अनुज लुगुन को उनकी कविता ‘अघोषित उलगुलान’ के लिए दिया जाएगा. इस वर्ष के निर्णायक  श्री उदय प्रकाश ने इसका चयन किया है. यह कविता ‘प्रगतिशील वसुधा’ के अप्रैल -जून 2010 के अंक में प्रकाशित हुई थी। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता को दिया जाता है। निर्णायक  मंडल में अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका, और पुरषोत्तम अग्रवाल हैं. बारी-बारी से हर वर्ष एक निर्णायक  पुरस्कार के लिए कविता का चुनाव करता है। इस बार के निर्णायक &#8211; उदय प्रकाश के शब्दों में ‘अनुज लुगुन की कविता ‘अघोषित उलगुलान’ को वर्ष 2011 का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देते हुए मुझे गर्व और सार्थकता दोनों की अनुभूति हो रही है’।<a href="http://bhadas4media.com/">http://bhadas4media.com</a> तथा अन्य पर अनुज लुगुन की कुछ कविताएं आयीं। </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> इधर इंटरनेट पर प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह की चर्चा भी जम कर हुई। प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह कविता कोश (<a href="http://www.blogger.com/www.kavitakosh.org">www.kavitakosh.org</a>)  के पाँचवे जन्मदिवस के अवसर पर 07 अगस्त 2011 को जयपुर में जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में संपन्न हुआ। इसमें दो वरिष्ठ कवियों (बल्ली सिंह चीमा और नरेश सक्सेना) एवं पाँच युवा कवियों (दुष्यन्त, अवनीश सिंह चौहान, श्रद्धा जैन, पूनम तुषामड़ और सिराज फैसल खान) को सम्मानित किया गया। इस आयोजन में वरिष्ठ कवि श्री विजेन्द्र, श्री ऋतुराज, श्री नंद भारद्वाज एवं वरिष्ठ आलोचक प्रो. मोहन श्रोत्रिय भी उपस्थित थे। समारोह में बल्ली सिंह चीमा एवं नरेश सक्सेना का कविता पाठ मुख्य आकर्षण रहे। कविता कोश के प्रमुख योगदानकर्ताओं को भी कविता कोश पदक एवं सम्मानपत्र देकर सम्मानित किया गया।<br />
जिसके पास चली गई मेरी जमीन<br />
उसके पास मेरी बारिश भी चली गई<br />
- कविता को</span><span style="font-weight: normal;">श </span><span style="font-weight: normal;">समारोह में नरेश सक्सेना की कविता।</span></h3>
<h3><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B5-2.bmp"><img class="alignleft size-full wp-image-6843" title="अरविन्द श्रीवास्तव (2)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/अरविन्द-श्रीवास्तव-2.bmp" alt="" width="128" height="134" /></a></h3>
<h3></h3>
<h3></h3>
<h3>अरविन्द श्रीवास्तव<br />
<span style="font-weight: normal;"> कला कुटीर, अशेष मार्ग,<br />
मधेपुरा-852113 बिहार<br />
e.mail: <a href="http://www.blogger.com/arvindsrivastava39@gmail.com">arvindsrivastava39@gmail.com</a></span></h3>
</div>
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		<title>अभिव्यक्ति की नई क्रांति यानी हिन्दी ब्लॉगिंग का वैश्विक हस्तक्षेप</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Nov 2011 06:12:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पुस्तकः हिंदी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति/ संपादकः अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात /प्रकाशकः हिन्दी... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/11/%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%88-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_6719" class="wp-caption alignleft" style="width: 251px;">
<dt class="wp-caption-dt"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/hindi-bloging.jpg"><img class="size-full wp-image-6719" title="hindi bloging" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/hindi-bloging.jpg" alt="पुस्तकः हिंदी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति संपादकः अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात प्रकाशकः हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर (उ.प्र) मूल्य- 495/(चार सौ पिचानवे ) रुपए प्रथम संस्करणः 2011." width="241" height="320" /></a></dt>
<h3>पुस्तकः हिंदी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति/ संपादकः अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात /प्रकाशकः हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर (उ.प्र)/ मूल्य- 495/(चार सौ पिचानवे ) रुपए /प्रथम संस्करणः 2011.</h3>
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</div>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वर्तमान समय में मीडिया को पांच भागों में विभक्त किया जा सकता है। सर्वप्रथम प्रिंट, दूसरा रेडियो, तीसरा दूरदर्शन, आकाशवाणी और सरकारी पत्र-पत्रिकाएं चौथा इलेक्ट्रानिक यानि टीवी चौनल, और अब पांचवा सोशल मीडिया। मुख्य रूप से वेबसाइट, न्यूज पोर्टल, सिटीजन जर्नलिज्म आधारित वेबसाईट, ईमेल, सोशलनेटवर्किंग वेबसाइटस, फेसबुक, माइक्रो ब्लागिंग साइट टिवटर, ब्लागस, फॉरम, चैट सोशल मीडिया का हिस्सा है। यही मीडिया अभी ‘न्यू मीडिया’ की शक्ल में कई मठाधीशों की नींद चुरा ली है।कथित प्रगतिशील और पाषाणी सोच रखने वाले लेखक, रचनाकार भन्नाए-भन्नाए से दिख रहे हैं।उनकी आँखों की सूरमा में ‘न्यू मीडिया’ ने सेंध मार दिया है। वे इस नई पद्धति के खिलाफ खुल कर आग तो नहीं उगलते लेकिन आग वबूला अवश्य दिखते है। बहरहाल इस मीडिया की ताकत को वीकिलीक्स के रूप में अमरीका और अफ्रीका व मध्यपूर्व के देशों में ‘फेसबुकिया क्रांति’ के रूप में भी देखा जा  सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी का नया उद्धोष भी इसी नई मीडिया में देखी जा रही है। मात्र एक दशक में विश्व फलक पर नई सोच और जिम्मेवारी के साथ स्थापित हो रहे न्यू मीडिया पर केन्द्रित वृहत पुस्तक- ‘हिन्दी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रांति’ (पृष्ठ-376, मूल्य- 495/रू0 मात्र) हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर से आयी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
न्यू मीडिया और विशेषकर ब्लॉगिंग जगत की तमाम अन्तर्वस्तुओं को स्पर्श करती इस पुस्तक में न्यू मीडिया और ब्लॉगिंग के शीर्षस्थ तकनीशियनों, लेखक व समीक्षकों के शोधात्मक आलेख हैं। संभवतः  न्यू मीडिया और विशेषकर हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में यह इस तरह का अकेला ग्रंथ अथवा दस्तावेज है जो हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा को समग्रता के साथ प्रस्तुत करती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
प्रस्तुत पुस्तक में &#8211; ब्लॉगिंग क्या है, ब्लॉगिंग का इतिहास, कैसे जुड़े ब्लॉगिंग से, मसहूर ब्लॉग, ब्लॉगिंग से कमाई आदि विषयों पर समग्रता से प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के संपादक व लेखक- अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात स्वंय भी चर्चित ब्लॉगर हैं। इनके अनेकाने पोस्ट एग्रीगेटरों पर प्रत्येक दिन दिखते हैं। ब्लॉग जगत के इन चर्चित खटरागियों ने हिन्दी ब्लॉगिंग को जन-जन तक पहूँचाने का मुहिम चलाया है। इसी कड़ी में यह पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति  की नई क्रांति’ के माध्यम से सर्वप्रथम इन्होंने विश्व भर में फैले हिन्दी ब्लोगरों को एकजुट किया तथा शीर्षस्थ ब्लॉगरों यथा- रवि रतलामी, बालेंदु शर्मा दधीच, शैलेश भारतवासी, पूर्णिमा वर्मन, ज्ञानदत्त पाण्डेय, बी एस पावला, शास्त्री जे सी फिलीप, अनुप शुक्ल, रूपचंद्र शास्त्री, रणधीर सिंह ‘सुमन’, चंडीदत्त शुक्ल, प्रेम जनविजय, समीरलाल समीर आदि को इस पुस्तक में शामिल कर पुस्तक की सार्थकता को पुष्ट किया। पुस्तक को कई खंडों में विभक्त किया गया है। तकनीकी खंड में तेरह लेखक शामिल हैं। इसमें हिन्दी ब्लॉगिंग की तकनीकी पहलू मसलन् यूनिकोड टाइपिंग, वॉयस ब्लॉगिंग जैसे महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा है। शैलश भारतवासी हिन्दी ब्लॉगिंग के तकनीकी पहलू से अवगत कराते हुए लिखतें कि ‘इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग का यह अविष्कार मनुष्य का सबसे बढ़िया दोस्त बनकर आया है’। पुस्तक में ‘ब्लॉग प्रसंग’ के अन्तर्गत सिद्धेश्वर सिंह, सुरेश यादव, पवन चंदन और केवल राम के आलेख सम्मलित हैं। केवल राम ने अपने आलेख ‘हिन्दी ब्लॉगिंग रचनात्मक अभिव्यक्ति के विविध आयाम’ में लिखा हैं कि ‘हिन्दी ब्लॉगिंग आज व्यक्तिगत बातों के दौर से गुजरकर विमर्श के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहाँ पर रचनात्मक विविधता के इतने आयाम मिल जाते हैं जो साहित्य और रचनात्मकता के लिए सुखद है’। सुरेश यादव ब्लॉग और नेट पर उपलब्ध गंभीर साहित्यिक पन्नों की चर्चा करते हैं &#8211; अनुभूति, अभिव्यक्ति, कविता कोश, हिन्दी समय, हिन्द युग्म सहित काव्यम्, वाटिका, लघुकथा डॉट काम, भाषा-सेतु, जनशब्द, आखर कलश और अपनी माटी सदृश्य साहित्यिक हब हिन्दी ब्लॉगिंग में चार चांद लगाते हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
पुस्तक में संचार खंड में छः महत्वपूर्ण आलेख सम्मलित हैं । खुशदीप सहगल सक्रिय व चौकन्ने ब्लॉगरों में शामिल हैं उन्होंने ‘ब्लॉगिंग की ताकत’ को रेखांकित किया है, उनका कहना है- ब्लॉग के माध्यम से दुनिया में जहाँ कहीं भी भारतवंशी हैं, एक बडे़ परिवार की तरह जुड़ गए हैं।&#8230; वे न सिर्फ अपने शहर, अपने राज्य, अपने देश से हर वक्त संपर्क में रहते हैं, बल्कि हिन्दी का पूरी दुनिया में जोर-शोर से प्रसार भी कर रहे हैं’। पुस्तक में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी लिखते हैं कि ‘ब्लॉगों की लोकप्रियता और अंतर्जाल से जुड़े प्रवुद्धवर्ग के लिए इसकी सहजता और सरलता ने प्रिंट माध्यम में इसकी चर्चा को अपरिहार्य बना दिया है। प्रायः सभी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रकाशित होने वाली रोचक और ज्ञानवर्द्धक जानकारी को अपने पृष्ठों पर प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं&#8230;. साहित्य के क्षेत्र में भी तकनीक और साधन ने युगांतकारी परिवर्तन किए हैं लेखनी के प्रयोग से पहले स्त्रुति-परंपरा, फिर हस्तलेखन हेतु भोजपत्र, कागज, पांडुलिपि फिर छपाई-मशीन, पुस्तकों और अखबारों का प्रकाशन, कंप्युटर और इंटरनेट के क्रमिक विकास ने साहित्य के सृजन, अध्ययन-अध्यापन व आस्वादन की रीति को लगातार बदला है।’</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
पुस्तक के विमर्श खंड में अजित राय, शिखा वार्ष्णेय, ललित शर्मा, प्रतीक पांडे, अखिलेख शुक्ल, रश्मि प्रभा, पद्म सिंह, फौजिया रियाज और सुभाष राय जैसे तीस ब्लागरों की भागीदारी है। यहाँ प्रमोद तांबट के महत्वपूर्ण विचार दृष्टव्य है- ‘बाजारवाद के इस निर्मम दौर में जब लोकतंत्र का चौथा खंभा कही जाने वाली पत्रकारिता और मीडियामंडी बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के हाथों की कठपुतली बनी, दंभपूर्ण बुद्धिजीविता के शिकार पत्रकार-मीडिया पुरुषों से घिरी हुई है, ब्लॉग जगत मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच एक किस्म के लोकतांत्रिक स्तंभ के रूप में सामने आने की कोशीश कर रहा है। इसे निस्संदेह पाँचवा खंभे की उपमा दी जा सकती है।’ इसे  वैकल्पिक मीडिया का नया अवतार मानते हुए अजित राय ने लिखा है कि- सुप्रसिद्ध विचारक नोन चाम्सकी ने एक बार कहा था कि पूँजी और सत्ता के जनविरोधी दौर में प्रौद्योगिकी आम आदमी के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। मिशेल फुकोयामा ने जब ‘इतिहास के अंत’ घोषित किया और दुनिया-भर में जबरस्त बहस छिड़ी, ठीक उसी दौर में अखबार, रेडियो और दूरदर्शन जैसे पारंपरिक जनसंचार माध्यमों के बरक्स वैकल्पिक मीडिया के रूप में इंटरनेट का अवतार  हुआ। आज हम विकीलिक्स का प्रभाव देख चुके हैं, जिसने अमरिका की समर्थ सत्ता को हिलाकर रख दिया। मोबाइल की प्रौद्योगिकी ने भारतीय समाज में अभिव्यक्ति की आजादी का जो नया उद्घोष किया था, उसका विस्तार हमें इंटरनेट के साइबर स्पेश में दिखाई देता है। हमारे देखते-ही-देखते संपादकों और जनसंचार-माध्यमों के मालिकों का एकाधिकार खत्म हो गया और हममें से हर कोई अपनी-अपनी पत्रिका निकालने की आजादी का खेल खेलने लगा।’ लंदन में रहने वाली शिखा वार्ष्णेय कहती है कि ‘आज घर में बैठी गृहणी दिनचर्या से ऊबकर कुढ़ती नहीं, बल्कि अपनी भावनओं और विचारों को सुंदर शब्दों में ढालकर ब्लॉग पर लिखती है। फिलहाल एफएम रेनबो से जुड़ी रेडियो जौकी फौजिया रियाज का मानना है कि &#8211; दरअसल, ब्लॉगिंग की ओर आपका रूझान बढ़ाने में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह होता है कि आपको कितने लोग पढ़ रहे हैं। फॉलोअरों की संख्या, कमेंट्स की शैली आपका हौसला बढ़ाते हैं। आपको विश्वास दिलाते हैं कि आपका लिखा महत्वपूर्ण है। दैनिक अमर उजाला के नोएडा कार्यालय मे संपादकीय विभाग में कार्यरत उमाशंकर मिश्र लॉगिंग पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि हिन्दी, अंग्रजी समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों में ब्लॉगिंग पर आधारित नियमित स्तंभ छप रहे हैं, इलाहाबाद विश्वविधालय और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविधालय, वर्धा जैसे ख्यातिप्राप्त अकादमिक स्थान अब ब्लॉगिंग जैसे विषय पर ब्लॉगरों को बुलाकर परिचर्चाएँ आयोजित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मीडिया के शोधार्थी भी अब ब्लॉगिंग की उपयोगिता और प्रभाव को ध्यान में रख कर शोध करने में जुटे हुए हैं। ब्लॉग की नित नई खिड़कियाँ खुल रही है। देश-विदेश में बैठे ब्लॉगर साहित्यिक , सांस्कृतिक, सामाजिक, पारंपरिक, कला, मनोविज्ञान, आयुर्वेद, शिक्षा, रोजगार, वैश्विकरण और पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपने-अपने ब्लॉग के माध्यम से परस्पर संवाद कर रहे हैं। यहाँ सेंसर की कैंची नहीं है&#8230;। सी. वी . न्यूज नेटवर्क में हिन्दी सेक्सन के प्रभारी उमेश चतुर्वेदी का मानना है कि हिन्दी में ज्यादातर ब्लॉगर अपनी वैचारिक भूख और कसक को अभिव्यक्त करने आये तो हैं, लेकिन ज्यादातर की भाषाई संस्कार बेहद कमजोर है। इसने ब्लॉगिंग के स्वाद को बेहद कड़वा बनाया है। लखनऊ प्रकाशित दैनिक जनसंदेश टाइम्स के मुख्य संपादक डा. सुभाष राय का मानना है कि ‘अगर ब्लॉग-लेखन की अर्थपूर्ण स्वाधीनता अपनी पूरी ताकत के साथ सामने आती है तो वह लोकतंत्र के पाँचवे स्तंभ की तरह खड़ी हो सकती है। जिम्मेदारियाँ बड़ी है, इसलिए हमसब को मनोरंजन, सतही लेखन और शब्दिक नंगपन से मुक्त होकर वक्त के सरोकार और मनुष्यता के प्रति प्रतिवद्धता के साथ आगे आकर अग्रिम मोर्चे में खुली जगह ले लेनी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इस पुस्तक के विश्लेषण खंड में चार महत्वपूर्ण आलेख यथा रवीन्द्र प्रभात का &#8211; हिन्दी ब्लॉगिंग में महिलाओं की स्थिति। बालेंदु शर्मा दाधीच का- ब्लॉगिंगः ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति । आकांक्षा यादव का हिंदी -ब्लॉगिंग का तेजी से बढ़ता सृजनात्मक दायरा एवं चंडीदंत्त शुक्ल का &#8211; नेट से पहचान और भी है। माइक्रोसॉफ्ट की ओर से ‘मोंस्ट  वेल्युएबल प्रोफेशनल’ करार दिए गये बालेन्दु शर्मा दाधीच ने अपने आलेख में लिखा है कि ‘ ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम , जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, राजनीतिक -सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वंतंत्र है। जहाँ अभिव्यक्ति न कायदों में बँधने को मजबूर है, न अलकायदा से डरने को।  इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी  प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गयी है। आकांक्षा यादव अपने आलेख में लिखती हैं कि ब्लॉगिंग का क्रेज पूरे विश्व में छाया हुआ है। अमेरिका में सवा तीन कारोड़ से ज्यादा लोग नियमित ब्लॉगिंग से जुड़े हुए हैं, जो वहाँ के मतदाताओं का 20 फीसदी है। इसकी महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में सम्पन्न अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान इस हेतु 1494 नए ब्लॉग आरंभ किए गए। जापान में हर दूसरे व्यक्ति का अपना ब्लॉग है&#8230;फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी और उनकी पत्नी कार्ला ब्रूनी से लेकर ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद तक शामिल हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
संस्मरण खंड पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय है यहाँ ज्ञानदत्त पांडेय, अनूप शुक्ल, जाकिर अली ‘रजनीश’ और रचना त्रिपाठी इस खंड में सम्मलित हैं यहाँ ब्लॉगिंग से जुडी महत्वपूर्ण प्रसंगों को रखा गया है। पुस्तक के साक्षात्कार खंड में प्रिंट और ब्लागिंग जगत के कई चर्चित चेहरे शामिल किये गये हैं जैसे दिविक रमेश, प्रेम जनमेजय, समीरलाल समीर, रवि रतलामी, जी के अवधिया, अलबेला खत्री, अविनाश वाचस्पति, अमरजीत कौर, गौहर राजा, कुष्णबिहारी मिश्र, अंबरीश अंबर, शकील सिद्दीकी और सुषमा सिंह के साक्षात्कार इस ग्रंथ पठनीय के साथ-साथ संग्रहणीय भी बना दिया है। पुस्तक में हिन्दी ब्लॉगिंग को पहचान देने वाले यशवंत सिंह (भड़ास) और अविनाश (मुहल्ला) सदृश्य कुछ शख्सियातों की अनुपस्थिति खलती अवश्य है बावजूद इसके संपदकीय में इस बात का खुलासा दृष्टव्य है कि मात्र एक महीने की सीमित अवधि में पुस्तक का संपादन और मुद्रण आदि सभी कार्य किये गये हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
प्रकाशक डा. गिरिराजशरण अग्रवाल के यह विचार भी दीगर हैं कि‘परिवर्तन सृष्टि का नियम है। पिछले कुछ वर्षों से छपी सामग्री पर संकट की बात बहुत जोर से की गयी है, लेकिन मैं  इससे कभी विचलित नहीं हुआ हूँ&#8230; मेरे मन में यह सहज जिज्ञासा पनप रही थी कि अभिव्यक्ति के नए और तेजी से सशक्त हो रहे माध्यम ‘हिंदी ब्लॉगिंग’ पर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाए, जो हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा को पूरी समग्रता के साथ आयामित कर सके।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span><br />
<span style="font-weight: normal;"> संपादक अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात के भगीरथ प्रयास का यह फल है कि हिन्दी में ब्लॉगिंग विषयक यह मानक ग्रंथ सामने आया। संपादक द्वय को साधुवाद है।</span></p>
<p>समीक्षक : अरविन्द श्रीवास्तव<br />
<span style="font-weight: normal;"> कला कुटीर, अशेष मार्ग</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> मधेपुरा- 852113. बिहार</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> मोबाइल- 09431080862.</span></p>
<p></span></h3>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">e.mail- <a href="arvindsrivastava39@gmail.com">arvindsrivastava39@gmail.com</a></p>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Nov 2011 08:04:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[review]]></category>

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		<description><![CDATA[‘भीगे पंख एक समीक्षा ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं जमीं तो कहीं... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/11/%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b2-%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span><span style="text-decoration: underline;">‘भीगे पंख एक समीक्षा</span><br />
<a style="font-weight: normal;" href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/Bhige-pankh-001.bmp"><img class="size-full wp-image-6698 alignleft" title="Bhige pankh 001" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/11/Bhige-pankh-001.bmp" alt="" width="154" height="212" /></a><br />
<span style="font-weight: normal;"> ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता मशहूर शायर निंदा फाजली की इन दो पंक्तियों में जीवन का बहुत बड़ा सार समाया हुआ है और ये दो पंक्तियां ही आधार हैं रचनाकार महेशचंद्र द्विवेदी के नये उपन्यास भीगे पंख  की।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अतीत के पन्ने पलटना हमेशा सुखद नहीं होता है, कभी-कभी यह दुखद भी होता है । क्योंकि एक तरफ तो अतीत के पन्ने जुल्म-सितम और शोषण के खूनी दास्तानों से रंगे होते है तो दूसरी तरफ इनमें बंधनों को तोड़  मुक्ति के अनंत आकाष में उड़ान भरने वाले महापुरूशों की यषोगाथायें भी संजोयी होती है । हमारा यह अतीत सुख-दुख, उंच-नीच, पाप-पुण्य, अच्छाई-बुराई, विडंबनाओं-विर्सजनाओं और संभावनाओं का एक ऐसा संसार है जिसमें एक तरफ तो अंतरिक्ष की उंचाईयां हैं तो दूसरी तरफ पाताल की गहराईयां । हमारा यह समाज कभी अपने अतीत की गलतियों से सबक सीख कर नव-निर्माण और सर्जन की षिक्षा लेता है तो कभी सब कुछ देख-सुन कर भी अतीत की गलतियों को दोहराता रहता है । ऐसे में एक साहित्यकार की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण  हो जाती है । उसका यह दायित्व हो जाता है कि वह अतीत की काली कोठरी को मथकर उजाले की किरण ढूंढ कर सामने लाये और समाज को एक नयी दिषा दे ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> मुझे ख़ुशी है कि श्री महेशचन्द्र द्विवेदी अपनी इस भूमिका को निभाने में सफल रहे हैं । ‘भीगे-पंख महज एक उपन्यास नहीं बल्कि एक आईना है जिसमें समाज को उसका असली चेहरा दिखाया गया है । 200 पन्नों की यह कृति गांव की तंग गलियों से लेकर राजधानी दिल्ली तक चेहरे पर मुखौटे लगा कर घूमने वाले भेड़ियों के चेहरे को बेनकाब करती है । आजादी के बाद से आज तक प्रगति तो बहुत हुयी है किन्तु यह प्रगति भौतिकतावाद के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गयी है । यह उपन्यास खंड-दर-खंड इस प्रगति, उसकी सीमाओं, उसके बंधनों और उसकी कड़ुयी सच्चाईयों से रूबरू करवाता चलता है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> उपन्यास के कथानक की षुरूआत होती है 1940 से जब आजादी का संघर्श अपने चरमोत्कर्श पर था । हालांकि इस पुस्तक का विशय-वस्तु अलग हट कर है लेकिन उस युग में कोई भी घटनाक्रम ऐसा नहीं रहा होगा जिस पर इस संघर्श की छाप न पड़ी हो । इसलिये लेखक मुख्य कथानक के साथ-साथ बहुत खुबसूरती के साथ यथास्थान आजादी के पवित्र आंदोलन की झलक दिखलाता चलता है । इस उपन्यास का केन्द्रबिंदु है ‘मानिकपुर’ नाम का एक छोटा सा गांव जिसे उच्चकुलीन ब्राह्मणों ने बसाया है । उन्होंने सभी जाति और वर्ग के लोगों को गांव में रहने की जगह दी है लेकिन वास्तविकता में उनकी असली जगह क्या है इसे लेखक ने षुरूआती पन्नों में ही दर्षा दिया है । इस संबध में मैं उपन्यास के पृश्ठ 14 की कुछ लाईनें पढ़ना चाहूंगा-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> ‘‘..रात्रि के आगमन पर गपषप के लिये गांव के लोग यहीं चबूतरे पर छप्पर के नीचे बैठते थे, लाल जी षर्मा तख्त पर अन्य ब्राह्म्ण तथा उच्च जाति वाले कुर्सी अथवा चारपाई पर कुम्हार, काछी, बढ़ई लोहार भुर्जी नाई जैसी बीच की जातियों के लोग कुएं की मिड़गारी अथवा चबूतरे पर पड़ी मूंज की आसनी पर और चमार, कोरी, धानुक, बेड़िया आदि ‘अछूत मानी जाने वाली जातियों के लोग उनसे दूर एक साथ चबूतरे के किसी खाली स्थान पर तथा भंगी, जो ‘अछूतों के लिये भी ‘अछूत थे सबसे दूर किसी कोने में दूबक कर बैठते थे ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> भंगी जो अछूतों के लिये भी अछूत थे ऊफ कितनी बड़ी विडम्बना लेखक ने बिल्कुल सटीक और जीवंत चित्रण किया है चंद दषक पूर्व के गांवो की वर्ण-वादी व्यवस्था का । सब गपषप के लिये मिल कर एक साथ बैठते हैं लेकिन उनकी इस एकजुटता में भी भेद-भाव का राक्षस पूरी ठसक के साथ मौजूद रहता है । पृष्ठ  दर पृष्ठ लेखक ने बहुत ईमानदार तल्खी के साथ इस कटु सत्य को उजागर किया है । ऐसे-ऐसे दारूण दृष्य की रोंगटें खड़े हो जाते हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
इस उपन्यास के 3 मुख्य पात्र हैं और तीनों समाज के अलग-अलग वर्ग का प्रतिनिधत्व करते हैं । नायक ‘मोहित ब्राह्म्ण है नायिका ‘सतिया अछूतों में कथित तौर पर अछूत माने जाने वाली ‘मेहतर जाति की प्रतिनिध है तो सह-नायिका ‘रजिया अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की नुमांईदगी करती है । उपन्यास का ताना-बाना इन्हीं तीन पात्रों के ईर्द-गिर्द बुना गया है । लेखक ने इन तीनों का पाठकों से परिचय बहुत ही रोचक और नितान्त नवीन षैली में करवाया है । तीनों के जन्म को लेकर ‘मोहित का जन्म ‘सतिया का जन्म और ‘रजिया का जन्म’ नाम से अलग-अलग अध्याय लिखे गये हैं । इन प्रारंभिक अध्यायों में इन तीनों पात्रों के जन्म की कहानी के साथ-साथ उनके अपने-अपने समाज के परिवेष उनके रीति-रिवाज  और वहां व्यापत कुरीतियों और वर्ण-व्यवस्था के विशैले नाग से भी परिचय करवाया जाता है । सब कुछ इतने स्वाभाविक और सषक्त ढंग से कि आंखो के सामने उय युग के दृष्य जीवन्त हो जाते हैं । इस संबध में मैं पहले अध्याय जो ब्राह्म्ण ‘मोहित के जन्म पर आधारित है उसके पृश्ठ 20 की चंद पंक्तियां मैं पढ़ना चाहूंगा</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘‘मानिक पुर के सभी बा्रह्मण भी एक स्तर के नहीं थे और उनके ब्राह्म्णत्व के स्तर के अनुसार ही गांव वाले उन्हें सम्मान देते थे । राम प्रसाद तिवारी के अपढ़ व गरीब होने के कारण उनका विवाह नहीं हुआ था और उन्होंने एक नाई की लड़की को भगाकर घर में रख लिया था । इसलिये उनका ब्राह्म्णत्व समाप्तप्राय हो गया था । भागीरथ पाठक की पत्नी गांव के आर्कशक व्यक्तित्व वाले काछी जाति के युवक के साथ भाग गयी थी और दोनों के वापस आने पर गांव के ब्राह्म्णों ने काछी युवक को तो जूतों से मार-मार कर भगा दिया था, परंतु भागीरथ ने अपनी पत्नी को फिर घर पर रख लिया था । इससे उनका ब्राह्म्णत्व भी हेय हो गया था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
चंद पंक्तियों में ही लेखक ने समाज के तथाकथित उच्च वर्ग की अंदरूनी सच्चाई को जिस तरह से बेनकाब किया है वह प्रसंषनीय है । ऐसा लगता है कि इन चंद पंक्तियों के माध्यम से ही गांव के जीवन का आखों देखा हाल सुना दिया गया हो ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
नारी ! उपन्यास के अधिकांष पात्र नारी ही हैं और नारी मन की संवेदनाओं, उनके द्वन्द और उनकी सामाजिक स्थित को लेखक ने अत्यन्त मार्मिक ढंग से उकेरा है । उपन्यास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘सतिया’ की है । सतिया, उसकी मां कमलिया और बाप परसराम उर्फ पस्सराम के माध्यम से लेखक ने जिस तरह से ‘मेहतर’ समाज की दारूण दषा का चित्रण किया है वर बरबस ही अमर कथाकार बाबू अमृत लाल नागर जी की कालजयी रचना ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ की याद दिला देता है । हालांकि ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ में नागर जी ने समाज के इस उपेक्षित वर्ग की जीवन-शैली उनकी मजबूरियों, उनके अभिषापों का बहुत विस्तार से चित्रण किया है और आलोच्य उपन्यास का कथाबिंबु कुछ और है फिर भी कहीं न कहीं वह उन उचांईयों को स्पर्श करने का प्रयास अवष्य करता है जिन्हें आ0 नागर जी ने स्थापित किया था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एक बात मैं और बताना चाहूंगा कि ‘भीगे पंख’ में सिर्फ जुल्म शोषण और अत्याचारों की कहानी नहीं है । इस सबके बीच लेखक ने बहुत खूबसूरती के साथ प्यार के दिये को जलाये रखा है । अबोध ‘सतिया’ के अर्न्तमन में प्रारम्भ से ही ‘मोहित’ के लिये आर्कशण था किन्तु उसके सामने ‘चांद को न छू पाने की असर्मथता  थी । नन्हें ‘मोहित के अर्न्तमन में भी प्रारम्भ से ही मासूम और निरीह सतिया के लिये स्नेह था लेकिन जात-पांत की जंजीरों में जकड़े होने के कारण वह चाह कर भी उसे व्यक्त नहीं कर पाता है । इन जंजीरों को वह तोड़ता है होली के अवसर पर यौवन की दहलीज पर कदम रख चुकी ‘सतिया’ के वक्षस्थल पर पिचकारी की धार मार कर । ‘सतिया’ की भीगी चोली, उसकी आंखों की भाशा, उसके अधरों पर छायी स्निग्ध मुस्कान षब्दों का सहारा लिये बिना अपने दिल की दास्तान बयां कर देते हैं । उपन्यास का यह भाग स्नेह और प्रीति की धारा में सराबोर हो रोम-रोम को पुलकित कर देता है ।<br />
उधर मौसी के गांव में रह रही ‘रजिया’ भी ‘मोहित से प्यार करती है ।  जात-पांत के बंधनों को तोड़ कर निश्छल प्यार । गांव की तलैया के किनारे जामुन के पेड़ों की छांव उसके प्यार के साक्षी है । वहीं वह हर छुट्टियों में मोहित की बाट जोहती है । इस प्रेम कहानी के कारण उपन्यास का यह भाग काफी मनमोहक बन गया है । मोहित की मौसी के मन में भी रजिया के लिये स्नेह का सोता फूटता रहता है लेकिन मोहित वह कभी सतिया की ओर आकृश्ट होता है तो कभी रजिया की ओर । वह निष्चय ही नहीं कर पाता कि उसकी मंजिल कौन है । एक बार तो लगता है कि यह उपन्यास भी साधारण प्रेम-त्रिकोण के भंवर जाल में उलझ कर रह जायेगा लेकिन लेखक किसी कुशल  मांझी की तरह नाव को इस भंवर में डूबने से बचा ले जाता है । इस उपन्यास की खास बात है कि दोनों प्रमुख नारी पात्र एक ही पुरुष से प्यार करते हैं लेकिन दोनों की न तो कभी एक-दूसरे से मुलाकात होती है और न ही एक दूसरे के असितत्व की जानकारी होती है । इसलिये न कोई द्वैश न कोई ईर्श्या और न कोई द्वन्द । दोनों का प्यार अपनी-अपनी जगह सच्चा और मीरा की तरह पवित्र ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
‘रजिया के माध्यम से लेखक ने मुस्लिम ताल्लुकेदारों की वासना-परस्ती उनकी यौन-कुंठायें उनकी ऊंची हवेलियों के उजालों के पीछे छुपे अंधकारों की दास्तान के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रयासों और निहित स्वार्थवष हिंदू-मुस्लिम दंगों को भड़काने वाले मौका-परस्तों, सभी पर अपनी लेखनी चलायी है और वह भी बहुत सषक्त और कारगर ढंग से ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
प्रेम स्नेह मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं और उसकी विशिष्टताओं का लेखक ने जिस तरह से सूक्ष्म विष्लेशण किया है उसने उपन्यास को एक नयी उंचाईयां प्रदान की है । इसके साथ ही शैली की प्रखरता भाषा की शुद्धता दृष्य को जीवंत बनाने में लेखक की दक्षता कथानक की विविधता और विषिश्टत पाठकों को कुछ इस तरह सम्मोहित करती है कि एक बार उपन्यास शुरू करने के बाद उसे पूरा पढ़े बिना चैन नहीं मिलता है और यही लेखक की सबसे बड़ी सफलता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एक श्रेष्ठ पुस्तक के प्रकाषन के लिये मैं लेखक और प्रकाषक दोनों को ही धन्यवाद देता हूं और यह मंगल कामना करता हूं कि श्री महेशचन्द्र द्विवेदी की समृद्ध लेखनी से इसी तरह निरन्तर श्रेष्ठ कृतियों का सृजन होता रहेगा और उनकी आभा से हिंदी साहित्य जगत का आकाश लंबे समय तक जगमगाता रहेगा ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span><br />
लेखक- महेशचंद्र द्विवेदी<br />
समीक्षक  -संजीव जायसवाल ‘संजय<br />
प्रकाशक- हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>&#8216;हिन्‍दी में पटकथा लेखन&#8217;</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Aug 2011 05:21:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[review]]></category>

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		<description><![CDATA[समीक्षा फ़िल्में भारतीय समाज से एक अलग तरह का जुड़ाव रखती हैं और फिल्मों के... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><span style="text-decoration: underline;"></p>
<div id="attachment_5740" class="wp-caption alignright" style="width: 136px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Pathkatha-Lekhan1.jpg"><img class="size-full wp-image-5740 " title="Pathkatha Lekhan" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Pathkatha-Lekhan1.jpg" alt="" width="126" height="200" /></a><p class="wp-caption-text">पुस्तक: हिंदी में पटकथा लेखन/ लेखक: जाकिर अली &#39;रजनीश&#39;/   प्रकाशक: उ0प्र0 हिंदी संस्थान, लखनऊ/मूल्य: 150.00</p></div>
<p><span style="text-decoration: underline;">समीक्षा</span></p>
<p></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">फ़िल्में भारतीय समाज से एक अलग तरह का जुड़ाव रखती हैं और फिल्मों के समाज से इस जुडाव के पीछे महतवपूर्ण भूमिका निबाहती है उनकी कथा और पटकथा. काल् क्रम से हम अगर फिल्मों के इतिहास पर नज़र डालें तो स्पष्ट पता चलता है कि जिन फिल्मों की पटकथा कसी हुई और मौलिक होती है दर्शकों से उसे भरपूर प्यार मिलता है इस लिहाज से पटकथा लेखन फिल्म निर्माण का सबसे मूलभूत और आवश्यक पहलु है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह भी सर्वविदित है कि हिंदी फिल्म उद्योग के पास योग्य लेखों की हमेशा से कमी रही है इसलिए जिस पैमाने पर यहाँ फिल्म निर्माण होता है उस लिहाज से हमारा सिनेमा समृद्ध नहीं है. आज भी भारतीय परिप्रेक्ष्य की समझ और नवीन विचारों के साथ पटकथा लिखने वालों में कुछ गिने चुने नाम हैं इसलिए पटकथा लेखन को एक व्यवसाय के रूप में लेने की कोशिश युवाओं को जरुर करनी चाहिए. इस क्षेत्र में मार्गदर्शन के लिए ज़ाकिर अली रजनीश डावर लिखित पुस्तक “हिंदी में पटकथा लेखन” काफी कारगर सिद्ध होती है.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">साहित्यिक लेखन और फिल्म लेखन दो अलग अलग विद्याएँ हैं साहित्य जगत के बड़े नाम फिल्म पटकथा लेखन में कभी जम नहीं पाए तो सिर्फ उसका यही कारण था कि वे भावों के प्रवाह को फिल्म माध्यम के अनुरूप ढाल नहीं पाए. फिल्म पटकथा लेखन के इसी प्रवाह के बारे में जाकिर जी की ये किताब जानकारी देती है. इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका हिंदी में होना है जिसका लाभ समाज के हर तबके को मिलेगा जो हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन के रहस्य को समझना चाहता है. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसकी दूसरी सबसे बड़ी खासियत लेखन में तरलता का होना है हर पंक्ति हर पैराग्राफ अपनी कहानी खुद कह रहा है अत्यधिक तकनीकी शब्दावली से बचते हुए लेखक ने इसे फ़िल्मी उद्वरणों के प्रयोग से मनोरंजक बना दिया है इसलिए इसको पढ़ना एक सुखद अनुभव देता है.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पुस्तक को दो भागों में बांटा गया है प्रथम भाग में आप भाषा (विशेष कर हिंदी) के उतार चढाव और उसके सामजिक प्रभावों के वर्णन के साथ ही पारम्परिक नाटकों से लेकर आधुनिकतम सिनेमा का परिचय प्राप्त कर सकते हैं जो बड़ी मेहनत से संकलित किया गया है. द्वितीय खंड में पटकथा लेखन की बारीकियों को उदहारण के साथ समझाया गया है. एक उत्तम पठनीय पुस्तक.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">पुस्तक: हिंदी में पटकथा लेखन/लेखक: जाकिर अली &#8216;रजनीश&#8217;/</span>प्रकाशक: उ0प्र0 हिंदी संस्थान, लखनऊ/मूल्य: 150.00</span></h3>
<h3>डॉ0 मुकुल श्रीवास्‍तव</h3>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>लघुकथा का इनसाइक्लोपीडिया : &#8216;सरस्वती सुमन&#8217; का लघुकथा विशेषांक</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Jul 2011 06:24:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[मूल्यांकन]]></category>
		<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[review]]></category>

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		<description><![CDATA[कभी ‘काला पानी‘ और अब ‘क्रांतिकारियों का तीर्थ स्थल‘ कहे जाने वाले भारत के सुदूर... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>कभी ‘का<span style="font-weight: normal;">ला पा</span><span style="font-weight: normal;">नी‘ और अब ‘क्रांतिकारियों का तीर्थ स्थल‘ कहे जाने वाले भारत के सुदूर दक्षिणतम अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से श्री कृष्ण कुमार यादव जी के अतिथि संपादन में जारी सरस्वती-सुमन का लघुकथा-विशेषांक हस्तगत हुआ। पहले तो इसे अन्य पत्र-पत्रिकाओं की भांति मात्र उल्टा-पल्टा, पर अगले ही पल छठी इंद्रिय ने इसे पूरा पढ़ने को मजबूर कर दिया। पढ़ते हुए यह लालसा जरूर जगी कि काश इसे पुस्तकाकार रूप में भी प्रकाशित किया जा सकता। पत्रिका के प्रधान संपादक डा. आनंद सुमन सिंह जी यदि इस अंक को पुस्तकाकार रूप देने का प्रयास करेंगे तो हिन्दी-साहित्य जग</span></strong><span style="font-weight: normal;">त उनका ऋणी रहेगा क्योंकि लघुकथाओं के स्तर पर इतना विशाल संग्रह निकालने का साहस अभी तक किसी संपादक ने नहीं दिखाया है। वास्तव में यह लघुकथा का इनसाइक्लोपीडिया बन पड़ा है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
कृष्ण कुमार यादव जी के अतिथि संपादन में लघुकथा का यह विशेषांक बेहद अनूठे रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपने संपादकीय में कृष्ण कुमार जी ने लघुकथा की ऐ</span><span style="font-weight: normal;">तिहासिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ इसकी समृद्धता को भी रेखांकित किया है- “हिन्दी लघुकथा का आरंभ भारतेंदु युग में सन् 1875 से माना जाता है और इस रुप में भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचना ‘अंगहीन धनी‘ को प्रथम लघुकथा के रुप में देखा जाता है। कई समालोचक माधव राव सप्रे की ‘एक टोकरीभर मिट्टी‘ (1901) को प्रथम लघुकथा मानते हैं। खैर, जो भी हो पर वर्तमान रुप में हिन्दी साहित्य में लघुकथा का आरंभ सत्तर के दशक में हुआ। तब से लेकर चार दशकों में लघुकथा ने एक लंबा पड़ाव पार किया है। अब तक लगभग 45 शोधार्थियों ने लघुकथा पर पी0एच0डी0 की है </span><span style="font-weight: normal;">और इसके अलावा तमाम लोगों ने एम0फिल0 किया है। मात्र पिछले एक दशक (2001-2010) की बात करें तो 170 व्यक्तिगत लघुकथा संग्रह और 50 लघुकथा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।“</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
विशेषांक के प्रथम खण्ड में जहाँ 125 लघुकथाकारों को एक-एक पृष्ठ दिया गया है, वहीं समीक्षात्मक खण्ड में लघुकथा-विधा के रचनाकर्म और भविष्य पर देश के 10 </span><span style="font-weight: normal;">विद्वानों के आलेख इसकी विशद् पड़ताल करते हैं। इसमें तमाम प्रतिष्ठित नाम हैं तो नवागंतुक भी शामिल हैं। डा. कमल किशोर गोयनका जी ने बेहद संतुलित रूप में लघुकथा-विधा के पक्ष-विपक्ष की पड़ताल की है। उनके लेख में प्रथम लघुकथा माने जाने वाली रचना ’एक टोकरी-भर मिट्टी’ (माधव राव सप्रे) का अंकन इसे महत्वपूर्ण बनाता है। डा. सतीश राज पुष्करणा ने लघुकथा को एक आंदोलन के रूप में चलाने के लिए काफी श्रम किया है। लघुकथा के रचना-कौशल पर उनका लेख नवागंतुकों हेतु प्रेरणास्पद है। डा. रमाकांत श्रीवास्तव जीवन के इस मोड़ पर भी उतने ही स</span><span style="font-weight: normal;">क्रिय हैं। प्रखर संवेदना की कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में लघुकथा की भूमिका को उन्होंने सजेदगी से लिखा है।</span></h3>
<h3>
<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: green; background-color: orange;" rowspan="2">
<p style="color: green; text-align: justify;"><span style="color: #800080;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/KK_Yadav-saraswathi_suman-Laghukatha_Visheshank-236x300.jpg" alt="KK_Yadav-saraswathi_suman-Laghukatha_Visheshank" width="236" height="300" /></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #800080;"><br />
</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000000;">पत्रिका: सरस्वती सुमन<br />
</span><span style="color: #000000;">(लघुकथा विशेषांक, जुलाई-सितम्बर 2011)<br />
</span><span style="color: #000000;">पृष्ठ: 180<br />
</span><span style="color: #000000;">अतिथि संपादक: कृष्ण कुमार यादव<br />
</span><span style="color: #000000;">प्रधान संपादक: डा. आनंद सुमन सिंह<br />
</span><span style="color: #000000;">पता: &#8216;सरस्वतम्&#8217;, 1-छिब्बर मार्ग, आर्य नगर, देहरादून, उत्तराखंड-248001<br />
</span><span style="color: #000000;"><a href="saraswatisuman@rediffmail.com"> saraswatisuman@rediffmail.com</a></span></h3>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसमें कोई शक नहीं कि लघुकथा कम शब्दों में समय का सच बेबाकी से प्रस्तुत करती है। माधव नागदा ने इसे अपने लेख में बखूबी सोदाहरण रेखाकिंत किया है। हिन्दी </span><span style="font-weight: normal;">लघुकथाओं में दलित विमर्श पर भगीरथ ने शानदार प्रस्तुति की है। वाकई अब इस पक्ष की उपेक्षा करना संभव नहीं रहा। डाॅ. राम निवास मानव हर विधा में खूब लिख रहे हैं। विगत तीन दशकों के लघुकथा साहित्य का उन्होंने सुंदर संग्रहण किया है, पर कई महत्वपूर्ण नाम इसमें छूट भी गए हैं। इंटरनेट के इस जमाने में लघुकथा भी खूब पल्लवित-पुष्पित हो रही है, रामेश्वर कांबोज ने इसकी व्यापकता को करीबी से उबेरा है और तमाम मह</span><span style="font-weight: normal;">त्वपूर्ण नाम व लिंक भी दिए हैं। लघुकथाओं पर कृष्णानंद कृष्ण, बलराम अग्रवाल, डाॅ. श्याम सुंदर दीप्ति के आलेख भी सराहनीय लगे। लघुकथाएं आज खूब लिखी-छपी जा रही है, पर स्तरीयता ज्यादा महत्वपूर्ण है। लघुकथाओं के नाम पर ऐसे-ऐसे चुटकुले व सपाट बयानी पेश की जा रही है, जिसकी कोई सार्थकता नहीं। कोई संपादक का खास होकर अपनी लघुकथाएं छपवा रहा है तो कोई पत्रिकाओं की सदस्यता लेकर अपने छपने पर जोर </span><span style="font-weight: normal;">दे रहा है तो संपादक भी फिलर के रूप में इसका इस्तेमाल खूब कर रहे हैं। सरकारी पत्र-पत्रिकाओं में भी तो अपनों को उपकृत करने की परंपरा पुरानी है। पर सरस्वती-सुमन के इस लघुकथा विशेषांक में कृष्ण कुमार जी ने जिस निष्पक्षता से खर-पतवार को काट-छांटकर देश-विदेश के अच्छे लघुकथाकारों को स्थान दिया है, यह उनकी साफगोई ही मानी जाएगी। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होते हुए इस पत्रिका के संपादन में उन्होंने अपनी सूक्ष्म अन्वेषण क्षमता का भरपूर इस्तेमाल किया है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
हिन्दी क्षेत्र के साथ-साथ अंडमान-निकोबार, असम, मेघालय के साथ-साथ उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, प. बंगाल जैसे राज्यों का प्रतिनिधित्व यह दर्शाता है कि लघुकथा देश के सभी भागों में लिखी-पढ़ी जा रही है। लगभग 25 महिला लघुकथाकारों का समावेश साहित्य में नारी शक्ति की बढ़ती भागीदारी की ओर संकेत करते हुए एक अच्छा संदेश दे जाता है। डा. अब्ज, आचार्य भगवत दुबे, आकांक्षा यादव, उषा महाजन, कमल कपूर, स्व. कालीचरण प्रेमी, डा. कुंअर बेचैन, डा. कौशलेंद्र पांडेय, कृष्ण कुमार यादव, कृष्णानंद कृष्ण, गोवर्धन यादव, जय बहादुर शर्मा, मु. तारिक असलम, प्रताप सिंह सोढ़ी, डाॅ. प्रभा दीक्षित, प्रभात दुबे, पुष्पलता शर्मा, बलराम अग्रवाल, माधव नागदा, रमेश नीलकमल, रश्मि बड़थ्वाल, शुभदा पांडेय, समीर लाल, डाॅ.सुरेश उजाला, सूर्यकांत नागर, संतोष श्रीवास्तव, सुकेश साहनी इत्यादि की लघुकथाएं काफी प्रभावी हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
अपनी संपादकीय में कृष्ण कुमार यादव जी ने लघुकथा की भावभूमि को स्पर्श करते हुए सही ही लिखा है कि- “21वीं सदी ‘माइक्रो‘ व ‘नैनो‘ की है। आज हर वो चीज पसंद की जाने लगी है जो कम आकार में खूबसूरती से अपने मर्म को स्पष्ट कर सके। ऐसे में वक्त के साथ लघुकथाओं के तेवर में भी परिवर्तन आया है। भूमंडलीकरण के दौर में उत्पन्न तमाम द्वंद्व, टेक्नालाॅजी के आगोश में सिमटता मानवीय जीवन, संवेदनहीनता, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण, धार्मिक पाखंड, राजनैतिक विसंगतियाँ, पारिवारिक विघटन, आंतकवाद, अराजकता, अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार, मंहगाई, समाज में व्याप्त दोहरे मानदंड, सामाजिक-आर्थिक विषमताएं, विद्रूपताएं व विकृतियाँ, सेक्स एवं लिव-इन-रिलेशनशिप और इनके बीच पसरता एक समानांतर बाजार, धारावाहिको व फिल्मों का मायाजाल,नगरीय जीवन का संत्रास, पर्यावरण एवं प्रदूषण जैसे तमाम विषय लघुकथाओं में प्रमुखता से उभरे हैं। लघुकथाएं अब साहित्य में चल रहे विमर्शों से भी अप्रभावित नहीं हैं और यहाँ भी नारी विमर्श, दलित-जनजाति विमर्श, बाल-विमर्श इत्यादि दिखने लगा है।“ अपने संपादकीय में कृष्ण कुमार जी ने जिस तरह से स्व. कालीचरण प्रेमी व स्व. श्रीमती सरस्वती सिंह का स्मरण किया है, वह उनकी सहृदयता का परिचायक है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
साहित्यिक समाचारों के तहत अक्षिता को नन्हीं ब्लाॅगर अवार्ड, हिन्द-युग्म धूमिल सम्मान, अखिल भारतीय नागरी लिपि सम्मेलन, 75 वर्ष पूर्ण होने पर श्री कैलाश चंद्र पंत के अभिनन्दन इत्यादि की रिपोतार्ज पत्रिका को और भी व्यापक और रोचक बनाती है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एक अन्य बात जो मुझे कृष्ण कुमार जी के बारे में चौंकती है वह कोई प्रोफेशनल लेखक नहीं हैं पर उनका साहित्य काफी समृद्ध है। अभी साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य‘ में अंडमान के आदिवासियों पर उनकी दो कविताएं पढ़ रहा था तो यह ख्याल जरूर आया कि अंडमान में उनके रहते हुए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के अनछुए पहलुओं को सहेजते हुए पुस्तक आए तो अति उत्तम होगा। ’सरस्वती-सुमन’ जैसी सक्षम पत्रिका भी इन द्वीपों के साहित्य-संस्कृति-कला, आदिवासी, प्राकृतिक सौंदर्य, सेलुलर जेल एवं अन्य पहलुओं को समेटती हुई एक विशेषांक जारी कर सकती है। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रयास होगा क्योंकि इस पर किसी पत्रिका ने अभी तक ध्यान नहीं दिया है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एक बार पुनः इस अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक विशेषांक के लिए कृष्ण कुमार यादव, डाॅ. आनंद सुमन सिंह एवं सुंदर रेखाकंन के लिए संदीप राशिनकर व अशोक अंजुम को हार्दिक बधाई।</span></h3>
<h2><span style="font-weight: normal;">समीक्षक : रत्नेश कुमार मौर्य</span><span style="font-weight: normal;"><br />
</span></h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/5_ratensh_-5_7-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रत्नेश कुमार मौर्य. जन्म- 14 जुलाई, 1977 को. मूलत: उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के निवासी. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ और तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में परास्नातक. सम्प्रति उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन कौशाम्बी जनपद में अध्यापन पेशे में संलग्न. अध्ययन, लेखन का शौक. फ़िलहाल इलाहाबाद में निवास. दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी होने के चलते कई बार यह जीवन भी दर्शन ही लगने लगता है.अंतर्जाल पर &#8216;शब्द-साहित्य&#8217; (<a href="http://www.shabdasahitya.blogspot.com/">http://www.shabdasahitya.blogspot.com/</a>)ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता !!</span></h3>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>नया पथ, नया जीवन संदेश</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jul 2011 05:06:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>loksangharsha</dc:creator>
				<category><![CDATA[मूल्यांकन]]></category>
		<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
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		<description><![CDATA[आजकल चर्चा में है एक उपन्यास, नाम है ताकि बचा रहे लोकतंत्र रवीन्द्र प्रभात के... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%a5-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table style="text-align: justify;" border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="text-align: justify; background-color: pink;" rowspan="2"><span style="color: #000000;"><span style="color: #000080;">आजकल चर्चा में है एक उपन्यास, नाम है ताकि बचा रहे लोकतंत्र</span></span></p>
<h4><span style="color: #000000;"><span style="color: #000080;"> रवीन्द्र प्रभात के इस पहले उपन्यास से गुजरते हुए &#8230;..</span></span></h4>
<h4><span style="color: #000000;"><span style="color: #000080;"><span style="color: #993300;"><br />
</span><span style="color: #993300;">अबतक जिन व्यक्तियों ने अपनी टिपण्णी की है, उसमें <a href="http://www.parikalpna.com/?p=4135">जाकिर अली रजनीश</a> और वाणी शर्मा प्रमुख हैं । जाकिर अली रजनीश ने अपनी समीक्षा में कहा है कि&#8221;काव्‍यात्‍मक शैली और गंवई भाषा के सहारे लेखक ने उपन्‍यास में जीवंतता को भरने का सुंदर प्रयास किया है।&#8221; वहीँ <a href="http://www.parikalpna.com/?p=4983">वाणी शर्मा </a>ने कहा कि &#8220;इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उस दर्द को महसूस करता है जो सदियों से हाशिये पर रहे लोगों/समाज ने जिया है . नैतिकता और आदर्शवाद को आधार बना कर दलित संघर्ष की अनुशंसा करता यह उपन्यास जातिवाद , छुआछूत की समस्या और समाधान के प्रति गंभीर चिंतन है ।&#8221; आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठ उपन्यासकार और आलोचक <span style="color: #000080;">श्री मुद्राराक्षस, श्री शकील सिद्दीकी <span style="color: #000000;">और</span> विनय दास </span>के विचार उपन्यास के सन्दर्भ में&#8230;.ये समीक्षात्मक टिप्पणियाँ आगे भी जारी रहेंगी, यदि आप इस उपन्यास से गुजरें हैं तो आप भी अपनी वेवाक राय इस कॉलम के अंतर्गत दे सकते हैं।</span></span></span><span style="color: #000000;"><span style="color: #000080;"><span style="color: #993300;"></p>
<h4><span style="color: #000080;">रणधीर सिंह सुमन, प्रबंध संपादक </span></h4>
<p></span></span></span></h4>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;"><strong><img id="rg_hi" class="alignleft" src="http://t3.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSn3Z905vy3prohH6cPMxPb0ptFTvMcPaSluLbxFHAOWofM7lF-EQ" alt="" width="259" height="194" /></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वह कहता है, हिन्दू धर्मग्रन्थों से उस अध्याय को निकाल दिया जाए, जिसमें जाति की चर्चा है। &#8211; 1</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
ई कम्यूनिस्टवा जो न कराये। &#8211; 2</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अरे हम हरिजन हैं तो क्या हुआ, हैं तो इंसान ही न। लोकतंत्र में उन्हें मनमानी करने की छूट और हमें अपने ढंग से जीने का अधिकार भी नहीं, क्यों ? समाज से घृणा&#8230;&#8230;&#8230;.घृणा&#8230;&#8230;&#8230; कब होगा इस घृणा का अंत।</strong> &#8211; 3</p>
<div class="mceTemp" style="text-align: justify;">
<dl class="wp-caption alignright" style="width: 146px;">
<dt class="wp-caption-dt"><a href="http://www.parikalpna.com/?page_id=4116"><img class=" " title="ताकि बचा रहे लोकतंत्र " src="http://2.bp.blogspot.com/-H4bVVrrp-ig/TejFDbW1oFI/AAAAAAAAFnU/ECChO8AuGO0/s1600/upanyaas.jpg" alt="उपन्यासकार : रवीन्द्र प्रभात " width="136" height="190" /></a></dt>
<dd class="wp-caption-dd">ताकि बचा रहे लोकतंत्र,उपन्यासकार : रवीन्द्र प्रभात,प्रकाशक : हिंद युग्म प्रकाशन, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्‍ली-110016/मूल्य: रु. 250 /- </dd>
</dl>
</div>
<p style="text-align: justify;"><strong>उपर्युक्त उदाहरण श्री रवीन्द्र प्रभात के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘ताकि बचा रहे लोकतंत्र’ का है। यह उदाहरण जहां उपन्यास की जमीन, समय के सर्वाधिक चर्चित विषयवस्तु दलित विमर्श या दलित जीवन की व्यथा-कथा को दलित एजेंडे के दृष्टिकोण (मनुवादियों की आलोचना) से प्रस्तुत करने का बेहतर सृजनात्मक संकेत है, वहीं उससे कहीं अधिक बढ़कर इन उदाहरणों के गहरे निहितार्थ भी हैं।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>‘अरे हम हरिजन हैं, तो क्या हुआ, हैं तो इंसान ही न’। नायक झींगना का यह कथन उसकी व्यक्तिगत पीड़ा की अभिव्यक्ति नही बल्कि आजादी के 64 वर्षो बाद भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में उसे और उसके समाज के लोगों को सही जगह न मिल पाने का दारूण अहसास है, जो आज अपने देश और समाज से इसका जवाब मांग रहा है। यह कैसा लोकतंत्र है, जहां एक वर्ग मनमानी करें और दूसरा वर्ग आर्थिक आजादी और सामाजिक सम्मान से जीने के लिये दूसरे का मुंह ताकता रहे। सामाजिक सेवा के बदले उसे जातिय दंश की पीड़ा और घृणा का उपहार मिले। फिर उसके लिये यह कहने कि हिन्दू धर्म ग्रन्थों से उस अध्याय को निकाल दिया जाये, जिसमें जाति की चर्चा है। और बचता ही क्या है ? गनीमत यह है कि श्री रवीन्द्र प्रभात ने अम्बेडकरवादियों की तरह एक तरफा होते हुये उसे जलाने की बात नही कही। वे मध्य मार्ग के अनुगामी है। समाज के इस बदनुमा धब्बे को हमेशा-हमेशा के लिये खत्म करने का संकल्प ही झींगना को एक जुझारू संघर्षशील नायक का दर्जा दिलाता है। यह एक नायक प्रधान उपन्यास है। उसकी इस चेष्टा को मूर्त करने का कार्य ‘ई कम्यूनिस्टवा जो न कराये’। नेता जी के गले की हड्डी बन गये (झींगना) इस कथन में देखा जा सकता है। जिसमें नेताजी की व्यथा झलकती है। यद्यपि अंतिम दो पन्ने को छोड़कर पूरे उपन्यास में कहीं भी झींगना कम्यूनिस्ट बैनर तले नही दिखायी देता है। भारतीय समाज के लोकतंत्र की इसी बिडम्बना का आख्यान रचता है ‘ताकि बचा रहे लोकतंत्र’। यहीं पर श्री रवीन्द्र प्रभात अपने रचनाकार धर्म का निर्वाह करते हुये उसे एक नई दृष्टि, एक नई व्याख्या झींगना के जीवन सार के रूप में प्रकट करते हैं। ‘हम भी आन्दोलन से जुड़े है, मगर हिंसा को महत्व नही देते। हिंसा से कुछ भी हासिल नही होता है बलदेवा। हम विकास की लड़ाई लडें़गे। हम अपने समाज की सवर्णो की तरह स्वयं को भी मुख्यधारा में लायेंगे। हम सब अहिंसात्मक ढंग से स्वाभिमान की लड़ाई आपकी अगुवाई में लड़ेगे।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसे पूरे उपन्यास की फलश्रृति भी कहा जा सकता है और इस उपन्यास का दर्शन भी, जो माओवादी, रणवीर सेना आदि को एक नया रास्ता दिखाते हुये समाज की मुख्यधारा में लाने का आह्वान करता है। इसी जगह यह उपन्यास अपनी सार्थकता को प्रकट करते हुये समय की एक जरूरत बन जाता है। यह बात दीगर है कि यह विमर्श पूरे उपन्यास में हल्का है या गंभीर सृजनात्मक।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यहीं पर यदि हम झींगना की यह सोच जोड़ दें कि परंपरागत जीवन शैली में आमूल परिवर्तन करना होगा। उनकी आर्थिक स्थिति में समुचित सुधार करना होगा, उन्हें शिक्षित करके समाज की विकासशील धारा से जोड़ना होगा, तो यह उपन्यास दलितो द्वारा लिखे गये उपन्यासों की श्रेणी में बिना पैबन्द के शामिल हो जायेगा, जिनका नारा है शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो और बन्धुत्व। यह सूत्र अम्बेडकर चिन्तन का सार है, जो दलित उपन्यासकारों के लिये कंठी-माला सरीका है। झींगना की वैचारिक दुनिया और जीवन के संचालन का कमोबेश यही सूत्र है। यहीं पर आकर स्वानुभूत और सहानुभूति की बहस अपनी एक नई जमीन ढूंढ सकती है।</strong></p>
<table style="text-align: justify;" border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: red; background-color: pink;" rowspan="2">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/?attachment_id=5110" target="_blank"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Mudra-Rakshas-Sanklit-Kahaniyan_m2-150x150.jpg" alt="" /></a><span style="color: #000000;"><span style="color: #000080;">हिंदी में अघोर चिंतन को प्रतिष्ठापित करने वाले वहुचर्चित उपन्यासकार और प्रगतिशील विचारक मुद्राराक्षस जी <span style="color: #993366;">रवीन्द्र प्रभात</span> के उपन्यास से गुजरते हुए कहते हैं कि</span>&#8220;श्री रवीन्द्र प्रभात का उपन्यास &#8220;ताकि बचा रहे लोकतंत्र &#8221; अभी हाल में सामने आया है । दिलचस्प है कि उपन्यास में यह सूचना भी छपी है कि यह उपन्यास काल्पनिक है और किसी पात्र,स्थान आदि से साम्य आकस्मिक है इत्यादि ।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000000;">मुख्य पात्र के माध्यम से उपन्यासकार इस बात को स्वीकार करता है कि जबतक समाजवादी व्यवस्था नहीं आती तबतक दलितों में आर्थिक विषमता बनी रहेगी । यह सही भी है ।उपन्यास दलित प्रश्न को सामने लेकर चलता है । वेहतर होता कि उपन्यासकार नाहक दलित प्रश्न को न उठाता,वल्कि अपने आसपास के समाज का ही चित्रण करता । जो भी हो, इस लेखन में उद्देश्य की मासूमियत जरूर मिलेगी । कथाभूमि में रोचकता है और शिल्प की बनावट नहीं है । मेरी शुभकामनाएं ।&#8221;</span></p>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;"><strong>यहां पर यह कहना निरर्थक न होगा कि झींगना को श्री रवीन्द्र प्रभात उसके दैनन्दिन जीवन के कारोबारी दुनिया के प्रामाणिक जीवन के अभाव में डोमवाघरारी का झींगना डोम का परिचय हटते ही वह किसी भी जाति और समाज का चरित्र बन सकता है। रचनात्मक स्तर पर इस कमी को नजरअंदाज नही किया जा सकता। यह एक घटना प्रधान उपन्यास है। झींगना के चरित्र का विकास घटना पर निर्भर है, किन्तु चार घटनाएं प्रमुख है, जो झींगना को झींगना बना देती है। पहली घटना -‘कोटे के हो कभी नही सुधरोगे’। की डांट से नौकरी छोड़कर पुनः मैला ढोने के पारम्परिक कार्य को अपनाया है। दूसरी घटना &#8211; मुर्दाघर की नौकरी के दौरान नाटक मंडली के मालिक चमनलाल से भेंट और नौकरी छोड़कर कलाकार बनने की चेष्टा। तीसरी घटना &#8211; बिना टिकट यात्रा के दौरान ताहिरा से भेंट और रेडियो, दूरदर्शन और नाटक मंडली का कलाकर बनकर ख्याति और पैसा अर्जित करना। चौथी घटना &#8211; इन पैसों से एक सोसाइटी बनाकर गरीबो का उद्धार करते हुये माओवादियों को अहिंसात्मक आंदोलन के रास्ते पर लाने का प्रयत्न। इसी के मध्य झींगना और ताहिरा का झीने से आवरण में छुपा एक अनकहा आदर्शवादी प्लूटोनिक प्रेम-प्रसंग अपना प्रस्तार ग्रहण करता है और अन्त में ताहिरा सुरसतिया के मरणोपरान्त उसके बेटे मुन्ना को लेकर लखनऊ लौट आती है। एक मुन्ना में एक नया भविष्य देखती है। कुल मिलाकर इसे उपन्यास की कथावस्तु भी कही जा सकती है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कहना न होगा कि यह उपन्यास प्रारम्भ में तमाम लोकगीतों से सजी एक लोकगायक की बेहद खूबसूरत कहानी का आभास देती है। झींगना-भिखारी ठाकुर सा दिखता है, लेकिन कुछ कदम चलकर ही यह दलित कथा की डगर पकड़ लेता है। इसका बारहवां अध्याय ‘बे टिकट यात्रा’ जिसे भुक्तभोगी झींगना का बयान भी समझा जा सकता है। एक अत्यन्त रोचक कविता सा है, ड्रामेटिक अंदाज की, जो समाज और उसके वर्तमान ढंग-ढर्रे की निर्मम आलोचना प्रस्तुत कर अपने पाठकों की आंख खोल देता है। झींगना का मुख्य नारा और जीवन का ध्येय भारतीय संस्कृति की सर्वोत्कृष्ट परम्परा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को अपनाते हुये ‘सबको रोटी, सबको कपड़ा, सबको मिले मकान, तब हम खुलकर कह पायेंगे, ‘भारत मेरा महान’ में पर्यवसित होता है। इस तरह झींगना का संघर्ष पूरे समाज का संघर्ष बन जाता है। यह युग पुरूष का खिताब जीत लेता है। तभी उपन्यास की यह टिप्पणी ‘झींगना साहब कलाकार नही, युग प्रवर्तक पुरूष है।’ के रूप में उनके व्यक्तित्व को रूपायित करती है। भाषा के स्तर पर इसमें भोजपुरी, अवधी और खडी बोली तीनों की खिचडी है। यही कारण है कि इस उपन्यास में ‘अवधी भी भोजपुरी की बहन ही है।’ जैसी बहस तलब टिप्पणी है।</strong></p>
<table style="text-align: justify;" border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="text-align: justify; background-color: pink;" rowspan="2"><span style="color: #000000;"><img class="alignleft" src="http://3.bp.blogspot.com/_38AsqDQOkJQ/S7NKmEx9e5I/AAAAAAAABLk/c43VB9cu5Pk/s320/interviws-5.jpg" alt="" width="133" height="166" /><span style="color: #000080;">जबकि प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य और प्रमुख चिन्तक श्री शकील सिद्दीकी<span style="color: #ff0000;"> मुद्राराक्षस जी </span>की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते वे कहते हैं कि</span>&#8220;मुद्रा जी का यह कथन उचित प्रतीत नहीं होता कि दलितों को ही दलित विमर्श पर अपनी अभिव्यक्ति देनी चाहिए, क्योंकि गैर दलित के लेखन में सहानुभूति का भाव होता है,न कि स्वानुभूति का . ऐसा नहीं है सामाजिक यथार्थ सबका है, कोई भी अपने अनुभव को सामने ला सकता है, उन्हें लाना ही चाहिए . टोलसतोय संभ्रात परिवार के होते हुए भी दलितों की पीड़ा को उठाया है,यह तो लेखकीय क्षमता और सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि कौन क्या अभिव्यक्त कर सकता है. ये तो साझी परंपरा है, राशिद जहां, कृष्ण चंदर,राजेन्द्र सिंह बेदी,हयातुल्ला अंसारी आदि अनेक उदाहरण है जिन्होंने दलित विमर्श को अपना विषय बनाया है. रविन्द्र प्रभात के उपन्यास से गुजरते हुए कहीं भी आभास नहीं होता कि यह उपन्यास गैर दलित लेखक के द्वारा लिखी गयी होगी. रवीन्द्र  प्रभात को मेरी शुभकामनाएं ! &#8220;</span></th>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;">
<div style="text-align: justify;"><strong>श्री रवीन्द्र प्रभात के इस उपन्यास को ब्लॉग लेखकों की श्रेणी में रखकर पढ़ने से ज्यादा सुन्दर नतीजे हासिल किये जा सकते है। वहां पर यह एक ऐतिहासिक उपन्यास भी सिद्ध हो सकता है, लेकिन हिन्दी साहित्य की सुदीर्घ परम्परा में वह उच्च स्थान प्राप्त करना अभी मुश्किल लगता है। उपन्यास इन तमाम विचारणीय प्रश्नों के बाद भी पठनीय बन पड़ा है, जिसकी सराहना करनी ही होगी।</strong><strong> </strong></div>
<p style="text-align: justify;">
<div><strong> </strong></div>
<div><strong> </strong></div>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<h2 style="text-align: justify;">डा0 विनय दास</h2>
<p style="text-align: justify;"><strong>दशहराबाग<br />
निकट पंचम दास कुटी<br />
बाराबंकी।</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
</p>]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>साहित्य और समाचार पत्रों को गंभीर खतरा,हिन्दी ब्लॉगिग से : विनय दास</title>
		<link>http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82/</link>
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		<pubDate>Sat, 09 Jul 2011 04:46:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[मूल्यांकन]]></category>
		<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[विरोध की तीव्रता ही नये विचार, नये माध्यम की स्थापना का सूचक है। विरोध जितना... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/_38AsqDQOkJQ/TNuIoe4Lx-I/AAAAAAAAEog/8z6lxRxI1xE/s400/Snake-Apples-Books-Still-Life-Painting-2.jpg" alt="" width="400" height="321" />विरोध की तीव्रता ही नये विचार, नये माध्यम की स्थापना का सूचक है। विरोध जितना तीव्र होगा, उसका फैलाव और स्थापना उतना ही आसान होगा। किसी विधा, माध्यम, विचार या साहित्य का विरोध ही परम्परावादियों के लिये खतरे की घंटी और नये की स्वीकृति का परिचायक है। इससे साहित्य पर और खतरा भले ही न हो लेकिन ब्लॉगिग का अनुदिन बढ़ रहा प्रसार उसकी चिंता की परिधि में अवश्य आ गया है। यद्यपि यह दो भिन्न माध्यम है। एक इलेक्ट्रानिक दूसरा प्रिंट। आवश्यकता, उपयोगिता, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दुनिया से सैकण्डों में अपनी बात के जरिए जुड़ने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुये ब्लॉगिंग, ट्यूटर, फेसबुक जैसे द्रतगामी संचार माध्यमों को पॉचवा स्तम्भ माना जाने लगा है। गति की तीव्रता को छोड़ दें तो प्रिंट मीडिया, अपनी विश्वसनीयता में ब्लॉगिंग से आगे ही है।</strong><strong> </strong></p>
<div><strong> </strong></div>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong></p>
<p style="text-align: justify;">सांचार की दुनिया में ब्लॉगिंग विचारों की अभिव्यक्ति का बेहद सशक्त माध्यम है। जिसने पढ़ने-लिखने, सोचने-विचारने वालों में एक नये उत्साह के साथ एक नयी क्रांति भी ला दी है। ब्लॉगिंग की दुनिया से जुड़े विचारों और उसके इतिहास को एक सिलसिलेवार प्रस्तुत करने का सराहनीय कार्य ‘हिन्दी ब्लागिंग’ अभिव्यक्ति की नयी क्रांति नामक हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर रू0 495 मूल्य की एक बेहद उपयोगी पुस्तक है। जिसका श्रेय इसके प्रकाशक श्री गिरिराज शरण अग्रवाल को भी थोड़ा बहुत जाता है। जिसके कुशल संपादक श्री अविनाश वाचस्पति एवं श्री रवीन्द्र प्रभात इस दुनिया की दो अत्यन्त चर्चित हस्ताक्षर है, जो ब्लॉग निर्माण सिखाने से लेकर उसका इतिहास-भूगोल बताने के साथ, वर्तमान समाज में इसकी उपादेयता, इससे जुड़े लोगों के नाम-पते तथा नये-पुराने दोनों तरह के लेखकों को इसमें समाविष्ट किया गया है। पाठको के समझ की सुविधा और विभिन्न विषयों को क्रमबद्ध ढंग से क्रमशः आठ अध्यायों तकनीकी खंड, ब्लॉग-प्रसंग, संचार खण्ड, विमर्श खंड, विश्लेषण खंड, परिचर्चा खंड, संस्मरण खंड और साक्षात्कार खंड नामक उपबंधों में इसे बांधा गया है। इसमें लगभग 68 लेखकों की रचनाओं को शमिल किया गया है, जिसमें एक ओर श्री रवीन्द्र प्रभात, श्री अविनाश वाचस्पति, ई-पंडित श्रीश शर्मा, श्री चिराग जैन, डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’, पूर्णिमा बर्मन, रश्मि प्रभा, श्री रणधीर सिंह ‘सुमन’ जैसे प्रतिष्ठित ब्लॉगर है, तो दूसरी ओर श्री प्रेमजन्मेजय, श्री दिविक रमेश, श्री शकील सिद्दीकी जैसे साहित्य के गणमान्य लेखकों मे साथ तमाम नये लेखक भी है, जो संपादक की दूर दृष्टि का परिणाम है, क्योंकि आज जो नये है, वे ही कल वरिष्ठ होंगे। संपादक की आधुनिक दृष्टि इनके शीर्षक और विधा चयन में भी मिलती है, जोकि विमर्श, तकनीक से लेकर परिचर्चा, संस्मरण, साक्षात्कार जैसे साहित्य की आधुनिक विधाओं के जरिये विषय की जानकारी प्रमाणिक, गंभीर और रोचक शैली में दिये गये है, जिसकी सराहना इन संपादकों के खातें में ही जाती है। यदि हम इस पुस्तक का गहन अध्ययन-विश्लेषण करें तो यह कहने में कोई संकोच नही होगा कि हिन्दी में जो कार्य आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा डा0 नागेन्द्र ने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखकर किया है ठीक वही कार्य यह पुस्तक ‘ब्लॉग’ के लिए कर रही है। ब्लॉग का इतिहास बताने का यह प्रमाणिक ग्रंथ बनेगा या नही यह तो समय तय करेगा लेकिन यह कहने में कोई संकोच भी नही कि ब्लॉग का नया इतिहास लिखने वालों को इस ग्रंथ से होकर गुजरना ही होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">इस पुस्तक के कुछ लेखों के जरिये यहां पर ब्लॉग को थोड़ा जानना भी हितकर होगा, जो किताब को पढ़ने की तरफ पाठकों को निश्चय ही प्रेरित करेगी कि और आगे की दुनिया में क्या-क्या है।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्लॉगिंग के सांस्कृतिक और साहित्यिक पक्ष को रखते हुये पूर्णिमा बर्मन ने ‘ब्लॉग’ का अर्थ ‘वेबलॉग’ से तय करती है। इसकी शुरूआत 1994 बेवली हिल के ‘जालघर’ बनाने की मुफ्त सेवाओं से मानती है। संपादक श्री रवीन्द्र प्रभात चिट्ठे का प्रारम्भ 2003 में यूनीकोड फॉड हिन्दी में आने के साथ ब्लॉगर का जन्म मानते है। इस दृष्टि से यह विधा अभी सात साल का शिशु है, किन्तु अद्भुत। अतः अभी इसे ब्लॉगरों को अपने स्नेह जल से सिंचित कर विकसित करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘वटवृक्ष’ की संपादक रश्मि प्रभा कविता की संभावनाओं पर विचार करते हुए बताया कि आज आवश्यकता इस बात की है कि ब्लॉग पर उपलब्ध कविताओं को भी गंभीर व विचार योग्य माना जाये। जाहिर है अभी गंभीर स्तरीय साहित्यिक रचनाओं का इस पर अभाव है। यद्यपि ब्लॉगर के कवियों और उनके रचना की भाषा प्रिंट मीडिया के लेखकों से काफी भिन्न है, जो एक ही झलक में पहचान मिल जाती है, किन्तु उन पर कोई भी टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी ही होगी। प्रिंट मीडिया में लिखने-पढ़ने का अलग आनन्द है। कोई किसी का सरलता से विकल्प नही हो सकता।</p>
<p></strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright" src="http://3.bp.blogspot.com/-5R11C4Qdp7s/TejFJdV_tII/AAAAAAAAFnY/F-AYRT7Z_OU/s200/hindi+bloging.jpg" alt="" width="151" height="200" />कहना न होगा कि हिन्दी ब्लॉग पर किसी प्रोग्राम के पहले आयोजक बनकर ‘लोकसंघर्ष’ पत्रिका और उसके संपादक एडवोकेट रणधीर सिंह ‘सुमन’ इस विधा में इतिहास पुरूष बनने की दिशा में अग्रसर है। वे प्रिंट मीडिया पर प्रहार करते हुए कहते है कि अखबार के अंतःकरण का स्वामी आज पैसे लेकर खबर छापता है, जो बाजारीकरण की पराकाष्ठा है, लेकिन ब्लॉग मूल्यों को बचाए रखने वाली पत्रकारिता है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘ब्लॉग’ को पॉचवा स्तम्भ मनवाने पर आमदा लोगों को इस चुनौती से आगाह करते हुये ‘जनसंदेश टाइम्स (हिन्दी दैनिक)’ के मुख्य सम्पादक डा0 सुभाष राय ने कहा है कि ब्लॉग लेखन की अर्थपूर्ण स्वाधीनता अपनी पूरी ताकत से सामने लाती है तभी वह लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ की तरह खड़ी हो सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिप्राय यह कि ब्लॉग के ब्लॉगर, लेखक, प्रकाशक और संपादक तीनों की जिम्मेदारी को एक साथ निर्वाह करना होता है। इसमें जहां विचारों के स्वतंत्र अभिव्यक्ति की बेलाग छूट है, जो इसे मनमाना करने की छूट देती है, जबकि इसे आवश्यकता है एक अनुशासन में बांधने की। अभी तक ब्लॉग पर साहित्य की कविता और हल्के-फुल्के व्यंग्य ही प्रमुखता पा सके है या फिर समाज की तात्कालिक घटनाओं-प्रसंगों पर स्फुट विचार और उस पर प्रतिक्रियायें। हां, अब पत्रकारों को मेहनत थोडी कम हो गयी दौड-भाग की। क्योंकि कई बार ताजे प्रसंगों की खबर प्रतिक्रियाएं वे ट्यूटर या ब्लॉग से उठाने लगे है, किन्तु ब्लॉग पर अभी गंभीर साहित्य और गंभीर किस्म के पाठक आने शेष है। वर्तमान सामाजिक परिदृश्य और इस पुस्तक के अध्यनोपरान्त यह कहना संगत होगा कि ब्लॉग का भविष्य उज्जवल है।</p>
<h2 style="text-align: justify;">विनय दास</h2>
<p style="text-align: justify;"><strong>दशहराबाग<br />
निकट पंचम दास कुटी<br />
बाराबंकी।</strong></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>ताकि बची रहे मानवता</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Jun 2011 05:46:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[analysis]]></category>

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		<description><![CDATA[  पुस्‍तक समीक्षा   ज़ाकिर अली ‘रजनीश’  आदिकाल से ही भारतीय समाज की बुनावट कुछ... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/06/%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: left;" dir="ltr">
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span class="Apple-style-span" style="clear: left; float: left; font-family: 'Times New Roman'; font-size: small; line-height: normal; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"><img src="http://4.bp.blogspot.com/-hwyeD1E6dnQ/TE6CuFYFC-I/AAAAAAAADEI/PWu4ecLV2tQ/s200/rajanish.jpg" border="0" alt="" width="75" height="100" /></span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"> </span></div>
<p class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><span style="font-family: Mangal, serif;" lang="HI"><strong><span style="text-decoration: underline;">पुस्‍तक समीक्षा</span></strong></span></span></p>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><span style="font-family: Mangal, serif;" lang="HI"><strong> </strong></span></span></div>
<div class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal, serif;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: #cc0000;"><span class="Apple-style-span" style="line-height: 18px;"><span style="font-family: Mangal, serif;" lang="HI">ज़ाकिर अली </span><span style="font-family: 'Times New Roman', serif;" lang="EN-US">‘</span><span style="font-family: Mangal, serif;" lang="HI">रजनीश</span><span style="font-family: 'Times New Roman', serif;" lang="EN-US">’</span></span> </span></strong></span></div>
<div class="MsoNormal" style="font-size: 9pt; line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36pt;"><span style="font-family: &amp;amp;amp; font-size: 9.0pt; line-height: 150%; mso-ansi-font-size: 11.0pt; mso-ascii-font-family: &amp;amp;amp; mso-hansi-font-family: &amp;amp;amp;" lang="HI"><br />
</span></div>
<p>आदिकाल से ही भारतीय समाज की बुनावट कुछ इस तरह से रही है कि यहाँ पर शुरू से ही दो विभाजन पाए जाते रहे हैं। एक शोषक वर्ग और दूसरा शोषित वर्ग। जिसके पास शक्ति रही, सामर्थ्‍य रही वह शोषक बन गया और जो कमजोर पड़ा, वह शोषित होता रहा। समय बदला, लोग बदले, इतिहास बदले, पर एक चीज जो नहीं बदली, वह थी समाज में शोषित लोगों की दशा। चाहे आजादी के 100 साल पहले का जीवन रहा हो अथवा आज का आधुनिक समाज, शोषितों की दशा में आज भी कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। वे शोषित पहले भी थे और आज भी हैं। हाँ आज उन्‍हें एक नाम अवश्‍य मिल गया है, दलित का। कानून में अधिकार भी उन्‍हें मिल गये हैं, आरक्षण भी प्रदान कर दिया गया है, पर कुछ प्रतिशत लोगों की बात अगर छोड़ दी जाए, तो वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे पहले हुआ करते थे।<span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></p>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">शोषित आज भी अपनी अलग दुनिया में रहते हैं, उनकी दुनिया, उनका समाज आज भी मुख्‍य धारा से कटा हुआ है। वे आज भी भूखे हैं, नंगे हैं, भूमिहीन हैं। कहने को भूदान के दौर में उनके नाम जमीनें लिख दी गयीं, पर जमीन पर अधिकार नहीं हो पाया, कहने को सरकार द्वारा उनके लिए तमाम सुविधाएँ शुरू की गयी, पर वे बीच रास्‍ते में ही रह गयीं, कहने को उनके लिए बेशुमान मकान बनाए गये, पर वे बिचौलियों के हत्‍थे ही चढ़ कर रह गये।</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><span style="mso-tab-count: 1;">        </span>इन तमाम स्थितियों की वजह क्‍या है, इन तमाम हालातों से निकलने का रास्‍ता क्‍या है। यह एक गम्‍भीर सवाल है, जो विमर्श की मांग करता है। ऐसा ही विमर्श लेकर आया है रवीन्‍द्र प्रभात का नया उपन्‍यास </span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">‘</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">ताकि बचा रहे लोकतंत्र</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">’</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">। रवीन्‍द्र प्रभात एक गजलकार के रूप में जाने जाते रहे हैं। उन्‍होंने हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में </span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">‘</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">ब्‍लॉग विश्‍लेषक</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">’</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"> के रूप में एक विशिष्‍ट पहचान बनाई है। इसके साथ ही वे </span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">‘</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">परिकल्‍पना समूह</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">’</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"> के मॉडरेटर के रूप में भी चर्चित हैं। </span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">बिहार की पृष्‍ठभूमि पर रचा गया यह उपन्‍यास यूँ तो झींगना के दारूण जीवन की दास्‍तान है, पर इस दास्‍तान में लेखक ने दलितों के जीवन के समस्‍त सवालों को बड़ी कुशलता से गूंथ दिया है। पुस्‍तक का यह अंश उसकी प्रासंगिकता को समझने के नजरिए से महत्‍वपूर्ण है: </span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">‘</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">हम दलितों का अपना अलग संसार है ताहिरा जी। हम उस संसार को ही सब कुछ समझते हैं, शिक्षा की कमी के कारण। ..आवश्‍यकताएँ अतिन्‍यून। देशकाल, परिस्थिति, राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं। वस्‍त्र के नाम पर विहीटी और आश्रय के नाम पर चार हाथ जमीन। स्‍वतंत्रता के इतने वर्षों के बीत जाने के बाद भी हम नंगे, भूखे, भूमिहीन।</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US">’</span><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"> (पृष्‍ठ:134)<span style="mso-tab-count: 1;"> </span></span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><span style="mso-tab-count: 1;"><br />
</span></span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><span style="mso-tab-count: 1;">  </span></span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI">दलित साहित्‍य के लेखन के समय से ही अक्‍सर यह आवाज भी उठाई जाती रही है कि दलित साहित्‍य वही व्‍यक्ति लिख सकता है, जो स्‍वयं दलित हो। क्‍योंकि गैरदलित व्‍यक्ति उनकी संवेदनाओं को उतनी सहजता, उतनी कुशलता से न तो समझ पाता है और न ही उन्‍हें अभिव्‍यक्‍त ही कर पाता है। पर आलोच्‍य उपन्‍यास को पढ़ने के बाद यह धारणा टूटती सी दीखती है। कारण इस उपन्‍यास में लेखक ने जिस कुशलता से दलित समाज के दारूण और भयावह रूप को चित्रित किया है, उसे देखकर आश्‍चर्यमिश्रित प्रसन्‍नता होना स्‍वाभाविक है।</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif; line-height: 18px;"><br />
</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"> </span><span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif; line-height: 18px;">काव्‍यात्‍मक शैली और गंवई भाषा के सहारे लेखक ने उपन्‍यास में जीवंतता को भरने का सुंदर प्रयास किया है। आशा है अपनी सार्थक प्रस्‍तुति और सराहनीय कलेवर के कारण यह उपन्‍यास दलित साहित्‍य में चर्चा का विषय बनेगा और दलित साहित्‍यलोक में एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान हासिल करेगा।</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify; text-indent: 36.0pt;"><span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif; line-height: 18px;"><br />
</span></div>
<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><a style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;" href="http://3.bp.blogspot.com/-fL8uf-dGdzk/Te8MDiZ5PdI/AAAAAAAAFnw/mwjK5o2-ozc/s1600/upanyaas.jpg"><img src="http://3.bp.blogspot.com/-fL8uf-dGdzk/Te8MDiZ5PdI/AAAAAAAAFnw/mwjK5o2-ozc/s1600/upanyaas.jpg" border="0" alt="" /></a></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">पुस्‍तक -</span></strong> ताकि बचा रहे लोकतंत्र (उपन्‍यास)</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">लेखक -</span></strong> रवीन्‍द्र प्रभात</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">प्रकाशक -</span></strong> हिन्‍द युग्‍म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्‍ली-110016</span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">पृष्‍ठ -</span></strong> 136</span><span style="line-height: 150%;" lang="EN-US"> </span></div>
<div class="MsoNormal" style="line-height: 150%; text-align: justify;"><span style="font-family: Mangal, serif; line-height: 150%;" lang="HI"><strong><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">मूल्‍य -</span></strong> 250 रू0</span><span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif; line-height: 19px;"> </span></div>
</div>
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