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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; सरोजिनी साहू की दलित कहानियाँ</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>उडिया कहानी:अंधेरा</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Feb 2012 06:03:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेश कुमार माली</dc:creator>
				<category><![CDATA[सरोजिनी साहू की दलित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[story]]></category>

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		<description><![CDATA[दलित विमर्श पर आधारित सरोजनी साहू की उडिया कहानी अनुवाद : दिनेश कुमार माली ================================================================= मैंने अनेक बार कुसुना... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%89%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3>दलित विमर्श पर आधारित सरोजनी साहू की उडिया कहानी</h3>
<h3>अनुवाद : दिनेश कुमार माली</h3>
<h3>=================================================================</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/daroo.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7176" title="daroo" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/daroo-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>मैंने अनेक बार  कुसुना (चावल वाली देसी  दारु) पी है।<br />
भूजे हुए चनों के साथ  कुसुना ।<br />
सूखी  चिंगुडी मछलियों के साथ  कुसुना।<br />
बरसाती कीड़ों  के साथ कुसुना।<br />
हर  बार मैने उसको मना किया, तू कुसुना बनाना बंद कर। नशा केवल आदमी को नहीं, बल्कि पूरे समाज को खा जाता है। दारु बनाना छोड़कर  अनेक  ऐसे काम है जिसे तुम कर सकती हो। सिलाई कर सकती हो, चटाई बुनने का काम कर सकती हो, मिट्टी खोदने का काम कर सकती हो, मजदूरी का काम कर सकती हो, धान रोपने का काम कर सकती हो, पत्थर काटने का काम कर सकती हो, बीड़ी  बांधने का काम कर सकती हो, मगर कुसुना बनाना बंद कर दे।<br />
उसने  मेरी सारी बातें सुनी, मगर कुछ भी नहीं बोली।उसमे  जैसे दारु बनाना छोड़कर दूसरे अन्य काम करने का साहस ही नहीं था, उसकी आंखों से यह साफ-साफ झलकता था। फिर भी वह कहने लगी, वह सिलाई-बुनाई या पत्थर तोड़ने  का काम भले ही कर लेगी, मगर यह गंदा काम और कभी नहीं करेगी।<br />
मेरे  लिए क्या ? मैं तो उस गांव की रहने वाली नहीं थी, आज इस गांव तो कल उस गांव रिपोर्ट तैयार करना मेरा काम था। शिशु-मृत्यु अनुपात,अनाहार मृत्यु, बच्चें बेचना, गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का हिसाब , कितने मलेरिया-ग्रस्त तो कितने कुपोषण के शिकार। भूखे लोगों का मैं फोटो उठाती थी। झुर्री पड़े कपाल पर दुर्भाग्य की रेखा स्पष्ट दिखाई देने  वाले बुजुर्गों के फोटो खींचती थी। मेरे लिखने वाले खाते  में सभी का ठीक-ठीक हिसाब रहता था। इस गांव से उस गांव लौटकर आते समय मैं देखती, सुखनी को दिए हुए   सारे रंगीन धागे ज्यों के त्यों पड़े  रहते। बेग बुनने के लिए दिए   नए  कपड़ों  को वह कुसना हांडी को ओढ़ा देती थी। चटाई बुनने के लिए दिए  पैसों से वह चावल खरीदती, सूखी मछलियां और रानू (कुसुना तैयार करने के लिए उपयोगी द्रव्य) खरीदती।<br />
मैने  उसको खूब गाली दी। तुम  लोग अपने सात जन्मों में भी मनुष्य नहीं बन सकते हो। तुम लोगों को दूध  में नहला देने या शहद लगाकर साफ कर देने से भी अपनी आदतों से बाज नहीं आओगे। वह उत्तर दिए बिना ही  हीं- हीं कर हंसने लगी। उसकी उस हंसी से शरीर में मानो रोंगटे खड़े  हो जाते थे। हंसना भी इतना भयानक हो सकता है! जिसने  यह बात नहीं सुनी हो उसके लिए तो अंदाज लगाना भी नामुमकिन है। देखने  में उसका चेहरा अच्छा नहीं है, काले-कलूटे चेहरे पर दिखाई देते टूटे-फूटे, टेडे-मेड़े दांत। यदि मैं उसको पहले से नहीं जानती या देखा  नहीं होता  तो डर से मैं अपना रास्ता बदलकर भाग जाती।<br />
गांव  के अधिकांश लोगों के घर  मैं जाती थी। वे सभी मुझे प्यार करते थे। मेरा आदर सम्मान करते थे। वास्तव में मैने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है, तब मुझे  खराब गिनने  का कोई कारण ही नहीं था। जो भी हो, मेरा सुखनी के घर जाना कोई पसंद नहीं करता था। वह अकेली  औरत थी। उसके आगे-पीछे कोई भी नहीं, तब उसको पसंद नहीं करने के क्या कारण हो सकते है ? मुझे आश्चर्य होने लगा। सर्वे रिपोर्ट लेते समय मेरी उसके साथ की गई बात-चीत। मैने पूछा, “पति ?”<br />
“नहीं है।”<br />
“नहीं है मतलब मर गए हैं।”<br />
“वह काम ढूंढने गए हैं।”<br />
“काम खोजने ? मजदूरी करने ? बंधुआ मजदूर बनकर ? कहां ?”<br />
“मुझे नहीं मालूम।”<br />
“सास , ससूर,लड़के , लड़कियां   ?”<br />
“मर गए हैं।”<br />
“कौन- कौन मर गए हैं, सही- सही बताओ।”<br />
“सास मर गई है, ससुर मर गया है, बच्चें मर गए हैं।”<br />
“तुम्हारा  और कौन-कौन हैं ?”<br />
चुपचाप  बैठी रही सुखनी। मेरी बात  का जबाव नहीं दिया उसने ।  मैं उस दिन लौट आई थी ,एक किलोमीटर छोटी-छोटी झाडियोंवाले  जंगल को पार करके  मुख्य रास्ते पर दिन के तीन बजे आखिरी बस पकड़ने  के लिए और शहर लौटने पर उस सीधी-सादी औरत  के  चेहरे  और उसका  निर्विकार व्यवहार भूल नहीं पा रही थी। उसके भीतर का अकेलापन मानो एक बहुत बड़ा  रहस्य हो। या फिर उसके बात-चीत करने का ढंग ? किसी भी अकेली  औरत का गांव में गुजर-बसर करना बहुत ही कष्टकर था। फिर उम्र भी कितनी ? अधिक से अधिक पचीस से तीस के अंदर होगी भी या नहीं। शहर होने से कहीं न कहीं पेट भरने का काम मिल जाता। शायद गांव के खेतों में काम करती होगी मगर पूछने पर उत्तर नहीं मिला। पति बंधुआ मजदूर होकर कहीं गया है और लगता है फिर कभी नहीं लौटा। उसी समय अचानक मन में वह दृश्य सामने आ रहा था, अंधेरे घर के अंदर चूल्हे के अंदर धधकती आग कई लपटें दिखा  रही थी। घर के अंदर दम घोटने  वाला काला धुंआ, खपरैल की फांक से बाहर निकलता धुंआ और बरामदे में पांव पसार कर बैठी एक औरत निर्विकार भाव में। “सास मर गई, ससुर  मर गया, बच्चें मर गए।” मानो जैसे उसे कोई शोक नहीं, दुःख  नहीं। वह पत्थर की मूरत हो जैसे।<br />
मुझे  क्या ? मेरा तो घुमक्कड़ जीवन। केवल तथ्य इकट्ठा करने का  काम। तथ्य-संग्रह करके शहर के किराये के मकान में बैठकर केवल रिपोर्ट लिखने का काम। आज इस  जिले में तो छह  महीने बाद और किसी दूसरे जिले में। अभी मुझे पांच गांवों में घूमना पड़ता  है। हमारे मेस के क्रांति और सूरमा मेरे इस काम को बहुत पसंद करते हैं। कहते हैं कॉलेज पूरा  होने के बाद हम दोनो तुम्हारे साथ जाएंगे।<br />
सुखनी ने चार कटोरी कुसना पी लिया और अपने भीतर के निबुज  घर में नहीं रह सकती थी।  वह उल्टा-पुल्टा बकवास करना प्रारंभ कर देती थी। उस दिन लौटने से पहले कौतुहलवश मैं उसके घर गई। उसके घर मेरा जाना किसी को पसंद नहीं था, इस वजह से उन्होंने अपने- अपने रास्ते पकड़  लिए थे।  मैने उसके बरामदे में  खड़े  होकर आवाज लगाई, “सुखनी घर में हो ?”<br />
वह  अपने घर के भीतर से बाहर आई और मुझे देखकर हंसने लगी। उसकी हंसी आकर्षक नहीं थी, वरन  बहुत ही भयंकर थी। निशब्दता में उसकी हंसी इतनी भयंकर  होगी, इस बात का मुझे तब तक अंदाज न था।<br />
तुरंत भीतर जाकर उसने एक कटोरी कुसुना लाकर बरामदे में रख दिया ।<br />
“तेज धूप में आ रही हो, पी लो जरा। प्यास मिट जाएगी।” वह कहने लगी।<br />
“धत्! क्या कह रही हो मैं दारु-वारु नहीं पीती हूं। उठा, उसको उठा यहां से।”<br />
“यह दारु नहीं है, कुसुना है। पीकर देखो। तुम्हारे शरीर की थकान उतर जाएगी।” सुखनी ने कहा- “मेरे घर में चाय नहीं है, पखाल भी नहीं है, साग-सब्जी नहीं है। मेरे घर आकर इस तरह बिना खाए जाओगी ?”<br />
“मुझे नशा नहीं होगा ?” मैने डरकर उससे पूछा। वह ऐसे हीं हीं कर हंसने लगी, जैसे सर- सर करते सांप पास में से चला गया हो।<br />
“तुम नहीं पीओगी  तो मैं पी लूंगी, हो गया ?” कहते-कहते एक ही घूंट में एक कटोरी कुसुना सुखनी पी गई। पहले की तरह यह औरत इतनी गंभीर नहीं थी, बल्कि वाचाल की तरह जो-तो मुंह में आ रहा था, बोल रही थी, “तुम्हारा नाम किसने सुखनी दिया था” मैने पूछा था।<br />
“मेरा नाम किसने सुखनी सोचा था? नाम था गंधर्वी। बचपन में मां-बाप मर गए थे। हम तीन छोटी-छोटी बहिनें थी। मेरी एक बहिन मेरे से तीन साल बड़ी। मुझसे छोटी एक बहन। बड़ी बहिन ने बहुत कष्ट  से मजदूरी कर हमारा पालन-पोषण किया। लोगों ने उसे कहा दुखनी। मैं किसी के भी घर मजदूरी करने नहीं गई। घर पर रहकर घर का काम करती। लोगों ने मुझे कहा सुखनी। और मेरी छोटी बहिन राऊरकेला जाकर एक बाबू के घर काम करने लगी। वह उनके घर में बेटी बनकर रह गई। लोगों ने उसका नाम दिया बुधनी।<br />
मेरी  दीदी ने शादी-ब्याह नहीं किया और बूढ़ी हो गई। बुधनी की कब शादी हुई, पता नहीं। और मेरा नाम जिसने सुखनी  दिया- ‘देख रहे हो मैं कितनी सुखी हूं ?’  कहते-कहते खिखियाकर हंसने लगी सुखनी।<br />
“तुझे आज बहुत नशा हो गया है, मैं जा रही हूं कहकर उसके  बरामदे से मैं उठ गई, वह मेरा हाथ  पकडकर कहने लगी, बैठो जरा , इतनी क्या जल्दी है ?”<br />
उसके मुंह  से भयंकर बदबू आ रही थी। मुझे उबकाइयां आने लगी। मैने उसे कहा, “नहाती-धोती नहीं हो। साफ-सुथरे कपड़े  भी नहीं पहनती हो। छिः। कितनी बदबू आ रही है तुम्हारे शरीर से। दूसरी बार जब आऊंगी तब तुम मुझे साफ-सुथरी दिखाई देनी  चाहिए।”<br />
“दूसरी बार जब आओगी तो मेरे लिए माचिस की डिबिया  लेते आना” सुखनी ने कहा।<br />
“क्यों ? तुम्हारे यहां अखंड धूनि जल रही है।” उसके चूल्हे की तरफ हाथ  दिखाकर मैने कहा।<br />
“माचिस की तीलियां नहीं है तभी तो आग रखनी पड़ती है।” सुखनी ने कहा। यहां की औरतें बहुती कपटी है। मुझे थोड़े -से अंगारे भी लेने नहीं देती है।<br />
सुखनी के घर से कुछ ही कदम आगे निकली ही थी कि पूतना बूढ़ी और परी ने आवाज लगाई। ये दोनों ही आदिवासी गाव की अनुभवी औरतें थी। मुझे जो कोई खबर या तथ्य चाहिए होता इन दोनों से प्राप्त होते थे। गांव में सवर्ण जातियों के कई घर थे, मगर उनका अलग साम्राज्य और इनका अलग।<br />
“उस गंदी के घर से कुसुना पीकर  आ रही हो बहिन जी ?” पूतना बूढ़ी ने पूछा।<br />
“नहीं, नहीं किसने कहा ?”<br />
“मुझे नहीं पता है क्या? तुम उसके बरामदे में नहीं बैठी हुई थी ? कुसुना कटोरी पड़ी हुई  नहीं थी  ?”<br />
“तो ?”<br />
“देखकर चलो, ओ, बहिनजी। फिर मत कहना पूतना ने नहीं कहा था।”<br />
“क्यों नहीं जाऊंगी उसके घर को, पूतना ?” मैने पूछा।<br />
परी ने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया, “देख नहीं रही हो, ठूंठ की अकेली औरत कैसे बैठी हुई है। गांव से औरत-आदमी मिलाकर पचीस, तीस गए, रास्ता बनाने की  हैसियत से। वह नहीं गई क्यों ? न उसके आगे न उसके पीछे, गोद में लेने के लिए बच्चे तक नहीं, मजदूरी करके दो पैसा नहीं कमा सकती ? घर के भीतर अकेली बैठी रहती है, तब उसे पैसा-कोड़ी  कहां से मिलता है जो अपना घर चलाती है ? तुम तब भी नहीं समझोगी तो क्या बताऊं ?”<br />
तुम्हें भी पता चल जाएगा, बहिन जी। और कुछ दिनों के बाद बता चलेगा।” पूतना ने कहा था। उस गांव में मैं कभी रात नहीं रुकी। यू.पी. स्कूल की मास्टरणी पवित्रा पटेल और मैं साथ- साथ लौटती थे बस पकड़ने  के लिए। हल्का-हल्का जंगल पार करके आते समय सारे रास्ते पवित्रा पटेल मेरे  काम, मेरे घर , पिता ,भाभी  इत्यादि की बात पूछते-पूछते चलती  थी। वह नहीं समझ पाई थी कि मेरे घर में आर्थिक असुविधा नहीं होने पर भी मैं सीधे इस फालतू काम के लिए इतने दूर क्यों आती हूं। वह कहती थी, यह अच्छा गांव नहीं है। हर समय सवर्ण हरिजनों का न होने से आदिवासी और सवर्णों के बीच लड़ाई -झगड़ा  चलता रहता था।जिसके  अलावा इस अंचल में नक्सलवादी भी घुस आए हैं।<br />
“वास्तव में ?”<br />
“तुम जो खबरें इकट्ठा करती हो, क्या करोगी ? तुम क्या अखबार वाली हो ?”<br />
उसके  पास उसने मेरे हाथ  देखकर  कहा, इस हाथ  पर दाग कैसा ? डायन के हाथ  पर खोखला तिनका लगाकर खून पी जाने  जैसा।<br />
मैं हंसने लगी थी। बस आने  पर हम उसमें चढ़ गए थे। उसे सीट मिल गई थी, मुझे नहीं। वह अपने हिस्से की जगह में से मुझे आधी जगह दे रही थी। मैने मना कर दिया। हम दोनो मुश्किल परिस्थिति में होने की वजह से और बात नहीं कर पाए।<br />
बचपन  से ही मुझे एडवेंचर अच्छा  लगता था। कुछ कर दिखाने का जज्बा हर समय  मन में लगा रहता था। अगर मैं यह काम नहीं करती तो हिमालय चढ़ जाती। अगर हिमालय पर नहीं चढ़ती तो इंगलिश चैनल  पार कर लेती। पैराशूट  से नीचे उतरती अथवा  बिना पानी पीए जिंदा रहती। अगर कुछ भी नहीं होती तो एक बहादुर लेखिका तो जरुर बनती। ये सारी बातें मैं सोच रही थी, मगर मैं पवित्रा पटेल को कह न सकी।<br />
शिक्षिका  के रुप में इसी बीजापाली उच्च प्राथमिक स्कूल में पढ़ाती  थी पवित्रा। सुंदरगढ़ से आना-जाना करती थी। उसका आदमी बाजार  में व्यापारियों को बैंगण, मूली, गोभी, बेचता था। वे किसी एक जगह बैठकर नहीं रह सकते थे। पवित्रा पटेल ने कहा था। किसी भी काम को करने में शर्म-लाज नहीं आती थी। लड़कियों  को पढ़ाना  हो, पुलिस हो या नर्स, शिक्षिका  हो या आंगनवाडी सुपरवाइजर, जो नौकरी ,काम मिलता, वे लोग करते। पवित्रा ने कहा था कि सरकार और उसकी नौकरी को स्थायी नहीं करेगा। फिर भी लाभ है। शिक्षिका  होने के  नाते ट्यूशन  से पांच हजार रुपयों की कमाई हो जाती है।<br />
सुखनी ने मगर इसके विरपीत कहा  था। तुम मुझे रास्ता बनाने  के काम में जाने के लिए  कह रही हो, रुपयों से मेरा क्या होगा ? कितने पेट पालने हैं ? एक पेट तो है ? दो पत्ते बीनने से तो पेट भर जाता है। इतना ऊपर नीचे करने से क्या फायदा ? तुम नहीं जानती हो कि वहां जो ठेकेदार है, उनका  मुंशी है, रोलर-ड्राइवर है, हेल्पर है, इंजिनियर है, ये लोग इस गांव के भेड़िए हैं। एलेनी (एलएंटी) रोड होने पर गांव की  सारी जवान लड़कियों  के पेट में किस-किस का बच्चा आया, किसी को  पता नहीं चला। कैसे कहेंगे, स्वयं तक नहीं जानते थे कि कौन उसके बच्चे का बाप है।<br />
“ तुझे  भी ? क्या कह रही है तू”- हंसते-हंसते मैने कहा था।<br />
“मैं देखने में सुंदर नहीं हूं, कह रही हो, बहिन जी ? इन मर्द लोगों का क्या है ? मुंह पर गमछा बांध देने से चेहरा फिर दिखता है क्या ? मेरा घरवाला और क्या करता था ?”<br />
सुखनी से बातचीत करने के लिए उसे  कुसुना पीना पड़ता है। उससे बात करने के लिए यह अपराध  भी मैने किया। जबकि उसका आदमी कहीं मजदूरी करने गया और उसके बाद उसके देवर की भी कोई खबर नहीं। कुसुना से उसका लगाव। उसकी प्यास बुझती है। उसकी भूख मिटती है। मैने उसको चार कटोरी के  बदले में छह कटोरी पीने के लिए उकसाया, फिर भी उस रहस्यमयी औरत को जान नहीं पाई। वास्तव में वह रहस्यमयी थी या लोगों ने उसे रहस्यमयी बना दिया था, पता नहीं था।<br />
“तुम कहां जा रही हो, बहिनजी ? बैठो, मेरी कहानी तो सुन लो। मेरा आदमी भी ऐसा ही था। मेरा चेहरा उसे खराब लगता था इसलिए मेरे मुंह को गमछे से ढक लेता था। बिसिन और बलराम के साथ कहां गया कि और फिर नहीं लौटा। बूढ़ा &#8211; बूढ़ी, देवर, पेट के बच्चों &#8211; सभी का भार मेरे कंधों पर आ गया। मैने भगवान से प्रार्थना कि मुझे संसार से उठा ले। मेरे बच्चे भूख से तड़प -तड़पकर मर गए।<br />
बूढ़ा- बूढ़ी   दोनो का उदास मुंह देखा नहीं जाता था। उस दिन चौदह-पन्द्रह  वर्ष का  नौजवान लड़का  अगरिया घर की बकरी चराने गया था।  लोगों के खेतों में मैं  मजदूरी करने जाती थी। भूख से तड़पते  बूढ़ा-बूढी दोनो जंगली कुकरमुता खाते थे। दिनभर वमन करके मेरे आने समय मर गए थे। मुहल्ले  वाले घर  में घुस गए थे। कहने लगे, मैने बूढ़ा-बूढी को खा लिया है। पेट में आग लगी थी, कहकर बूढ़ा-बूढ़ी ढूंढ करके मेरी सिंदुरी मुंह वाली  देवी को  भी तितर बितर कर दिया था। पोटली में दो मुट्ठी चावल थे कुसना बनाऊंगी सोचकर हाट से एक नई हांडी लाई थी। सब कुछ इधर-उधर बिखेर दिया था।”<br />
“बहिन जी, कहिए तो मैं क्यों तंत्र करूंगी ?”<br />
“हे भगवान !” मैने कहा था। मनुष्य कैसे शैतान बनता है और कैसे भगवान, उसे मैं समझ गई थी। पूतना बूढ़ी  का मंतव्य अब मेरे सामने स्पष्ट होने लगा था। सुखनी  का एकाकीपन और विवशता अब मुझे स्पर्श कर रही थी । उसके एकाकीपन के  अखंड धुनि का प्रतीक जैसे उसके चुल्हे में धधक रहा हो, थोड़ी -सी आग बनकर। राख से ढकी हुई आग की कई लपटें अभी भी उसके जिंदा रहने की सूचना दे रही हो जैसे। समय- असमय  जिंदगी जिस प्रकार कुरुपता भर देती है जीने के रास्ते में, जिसको हटाने की शक्ति मानो किसी में न हो। वह जैसी हालत करके आई थी या नशे के कारण उसके पास  बैठना संभव नहीं था, वह दीवार के सहारे बैठे-बैठे ढुलक गई थी। मैने उसे दस रुपए दिए और कहा, “कुसना नहीं पीना। भात- भूजा खाना।” उसने पैसे लेकर कमर में खोंस लिए।<br />
मैं जानती थी सुखनी के घर मेरा आना-जाना गांव के अधिकांश  लोगों को पसंद नहीं था. मानो मेरा जैसे किसी अपराधी के साथ  संपर्क हो, उसी प्रकार संदेह और अविश्वास  की आंखों से वे लोग मुझे देखते थे। गांव में कुछ संपन्न परिवार  भी थे, उन्हें छोड़कर मैं इस मूर्ख अशिक्षित  औरत के पास क्या करती हूं ?, जो हफ्ता, दस  दिन में उसके पास आ जाती हूं।<br />
अपनी  तरफ से आत्मीयता दिखाते हुए  एकाध आदमी मुझे उपदेश देने नहीं आएँ  हो, ऐसी बात नहीं थी।<br />
“आप नहीं जानती हो, सुखनी का देवर क्यों नक्लववादियों के साथ मिल गया ?”<br />
“तो ?” मेरे दृढ़ स्वर ने उसी क्षण उनको संकुचित कर दिया। मेरे मन में आया कि वे लोग झूठी कहानी बना रहे हैं। उन्हें आश्चर्य होने लगा कि मैं नक्सलवादियों के  नाम से डर क्यों नहीं रही हूं।<br />
वह  अगरिया घर की बकरी चराता था।  कलकत्ता से बकरी लाकर अनलोड होने से  छह दिन पहले राजगांगपुर के पठान  आकर बकरी खरीदते समय इस बाबू ने छुपकर एक बकरी पार कर ली थी। अगरिया ने उसे रस्सी से बांधकर पीटा था।  मार खाते समय उसने पत्थर का एक टुकड़ा उठाकर फेंका था, जिससे गांव के मुखिया का सिर फूट गया था और वह बेहोश हो गया था। लोगों ने उसे दौड़ाया । दौड़ते -दौड़ते  वह जंगल की तरफ किधर भागा पहाड़ , पर्वत कूदते-फांदते फिर दिखाई नहीं पड़ा ।<br />
वर्णन करते युवक के चुप होने पर दूसरा अधेड़ उम्र का आदमी उस बात को आगे बढाने लगा। उस दिन से गांव का मुखिया लकवाग्रस्त होकर पड़ा  हुआ   हैं। एक तरफ से उठ नहीं पा रहा  है ।<br />
जंगल  के उन पहाड़ों  में खो जाने से क्या कोई नक्सलवादी  बन जाता है ? हाथी के पैरों से रौंदा न गया हो, कोई कह सकता है ? जंगली जानवरों का शिकार भी तो हो सकता है।<br />
“आप क्या कटक की रहने वाली हो ? इतनी  दूर से यहाँ  क्या करने आई हो ?” अधेड उम्र वाले आदमी ने पूछा।<br />
“काम करने” मैंने बहुत ही छोटा उत्तर दिया था।<br />
“हमारे गांव में क्या काम ?”<br />
“सभी गांवों में काम, सभी शहरों में काम, सभी नगरों में काम।” मैं उसको धुंए में छोड़ते हुए  चली आई थी।<br />
दूसरी बार बिजापाली पहुंचकर मैने पूतना को उसका फोटो दे दिया। उस फोटो को देखकर वह बहुत खुश हो गई। बरामदे में बैठकर सेके हुए मूंगफली के दाने और पीने के लिए कुसना दी।<br />
“तुम उस गंदी के घर कुसना पीती हो न ? तुम हमारे घर पीओगी क्या ?”<br />
पूतना और सुखनी के घर आस-पास सटे  हुए थे। शायद दोनो में  बनती  नहीं है इसलिए उसे  पसंद नहीं था कि मैं सुखनी के बरामदे में बैठूं।<br />
पूतना बूढ़ी बहुत चालाक थी। कहने लगी, “उसके देवर टिकापाली के लोगों ने देखा है। आधी रात में बंदूक चलाने आया था। मैं तुम्हारे अच्छे के लिए कह रही हूं, बहिन जी। पता नहीं किस देश से तुम आई हो। बताओ तो बहिनजी, तुम किस काम के लिए आई हो हमारे गांव में। चंदरा कह रहा था, तुम पुलिस वाली हो। तुम सुखनी के देवर को पकड़ने  के लिए आई हो। लोइरू  कह रहा था,तुम अखबार वाली हो। खच्चरी कह रहा था, तुम गरीब लोगों के लिए उपकार का काम करने आई हो।”<br />
मैं जानती थी, मैं इस गांव में और ज्यादा दिन नहीं रह पाऊंगी। मेरा काम लगभग खत्म होने वाला था। मैने जितने तथ्यों और फोटों को इकट्ठा किया था, वे यथेष्ट थे। इनमें ऐसी-ऐसी खबर भी इकट्ठी की थी जो सरकारी रिकार्ड में भी नहीं थी। मुझे जाने के बाद और कहां जाना पड़ेगा , पता नहीं ? आंध्र की सीमा पर किसी गांव में या केंदुझर , करंजिया या मनोहरपुर ?<br />
उस  दिन सुखनी को उसके बरामदे में नहीं देखा। बंद दरवाजे में से उसके अंधेरे घर में  झांकने के लिए मुझे डर  लग रहा था। मैने घर के अंदर झांककर देखा। बहुत ही खतरनाक दुर्गंध बाहर आ रही थी।  मैं देख रही थी अंधेरे के भीतर दीवार के सहारे  बैठी हुई थी सुखनी। बाल बिखरकर कंधे के नीचे तक झूल रहे थे। यह औरत कुछ भी नहीं बोल रही थी ? मर गई अथवा नशे में धुत्त होकर सो गई है। मेरा अंदर जाने का साहस नहीं हुआ। मैं अकेले- अकेले लौट आई थी। हल्का-फुल्का जंगल पार करते हुए मैं पिच रोड पर चली गई थी। मुझे आगे से पता था कि हमारी आखिरी मुलाकात अत्यधिक भयावह होगी। जो दृश्य मैने देखा, मेरा शरीर कांप उठा। मैं पूरी तरह से घटना के विरोध में होने के बाद भी किसी तरह का प्रतिरोध नहीं कर सकी थी।<br />
शहर में बसे हुए घर में आ गई  थी। स्नान करके, फ्रेश होने के बाद चाय का कप लेकर बैठी थी, कांता कहने लगी, “देखो, देखो, तुम्हारे  हाथ के पास क्या हुआ है ? देखने पर पता चला, सिक्के के साइज का निशान पड़  गया था। कांता कहने लगी, डायन जब खून पीती है तो ऐसा निशान बनता है। वहाँ तिनका लगाकर डायन शरीर  से खून निचोड़ लेती है। ”<br />
“  तिनका लगाकर, मैं समझी नहीं ?<br />
“जानोगी कैसे ? रात में डायन  आती है चुपचाप। तिनका लगाकर खून खींच लेती है। ”<br />
मैं हंसने लगी थी- “तू भी  न कांता। तुम्हारा इतना पढ़ा  लिखा होना सब बेकार।” और हंसते- हंसते  याद आ गई सुखनी की कहानी। उसका अंधेरा घर। उसकी वह वीभस्त भयानक हंसी। उसका अंधेरे के भीतर दीवार से सहारा  लेकर बैठने वाला दृश्य। कांता  ने कहा था, डायन क्या हमारे  ओडिशा में ही होती है ? अभी-अभी पेपर में पढ़ा था कि लंदन में  एक विच फेस्टिवल  हुआ था।<br />
इस   बार जाते समय गांव के भीतर होहल्ला हो रहा था। सभी भाग  रहे थे। कोई घर के भीतर जाकर लेकर आया था भुजाली।  कोई डंडा। सभी के दौड़ने  में एक हिंसकपन। कहां भगा  रहे थे वे लोग ? क्या गांव में नक्सलवादी घुस आए हैं ? वो भी दिन के समय ? छोटे बच्चे को पूछा था, क्या हो रहा है, रे ?<br />
बच्चे ने दौड़ते-दौड़ते हुए कहा  था- “डायन पकड़  में आ गई है।  आदमी को कच्चा खाने वाली डायन।  कल शुकुरा के बेटे को खा गई   थी।”<br />
डायन  ? मैं चमक गई। कौन है डायन ?  मेरे हाथ पर मेरी नजर गई। सुखनी के घर के पास पहुंचते समय भीड़ में मैने देखा कि  भीड़ के अंदर खून से लथपथ, सिकुड़ी हुई डरी हुई और जीवन की भीख मांगती व्याकुल सुखनी नीचे गिरी हुई थी। उसके ऊपर भुजाली, कुल्हाड़ी, डंडे  लेकर टूट पडे थे गांव के लोग। अपने आप का बचाव करने के लिए सुखनी ने जब अपने दुर्बल हाथ उठाए, तो भुजाली की एक मार ने उसे खून से लथपथ कर दिया। मेरी तरफ सुखनी की नजर पड़ी । खून से लथपथ हाथ मेरी तरफ बढ़ाने लगी। “बहिनजी, ओ बहिनजी। मैने कुछ भी नहीं किया। मुझे बचाओ।”<br />
मेरे  पांव कांप रहे थे। मैं  किंकर्तव्यविमूढ़  हो गई थी।  क्या मेरा आगे बढ़ना उचित नहीं था ? इतनी उत्तेजित भीड़ का सामना करने का मुझमें साहस नहीं था ? मेरे पास कैमरा था, जिससे मैने कई फोटो उठाये थे मेरे कैरियर के लिए। मैं जानती थी इस समय का फोटो सबसे ज्यादा कीमती होगा। यहां तक कि फोटो खींचने तक का साहस और मानसिकता मेरी नहीं थी। मैं सोचने लगी कि अगर पुलिस  आ गई  तो एक और झमेला बढ़ जाएगा। हो सकता है मुझे साक्षी भी देनी पड़े । कोर्ट जाना पड़े ।<br />
मैं दौड़ -दौड़ कर उस जगह से चली  आई। अभी भी मेरे पांव कांप रहे थे, शरीर से पसीना छूट रहा था। मैं खचाखच भरे ट्रैक्टर  के हेल्पर की बात भी अनसुनी कर आधी झूलती हुई  अवस्था में उसमें चढ़ गई। शहर  आकर मैं अपने घर के बिछौने पर लेट गई। उसकी पुकार मेरा पीछा कर रही थी- “बहिनजी, मुझे बचाओ।” खून से भरा एक  लथपथ हाथ मेरी तरफ बढ़ रहा था।<br />
मैं और कभी उस गांव को नहीं जाऊंगी।  और मैं सुखनी के सामने  नहीं हो पाऊंगी। उतना साहस अब मुझमें नहीं था। उसकी भयानक हंसी के भीतर एक अकेलापन था। उसके खून से लथपथ बढ़ते आ रहे व्याकुल हाथ के पीछे छुपी थी मेरी स्वार्थपरता।जो कि बनी रहेगी काल से चिरकाल तक । </span></h3>
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		<title>लज्जा</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Feb 2012 05:50:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेश कुमार माली</dc:creator>
				<category><![CDATA[सरोजिनी साहू की दलित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[उडिया भाषा की चर्चित कथा लेखिका सरोजिनी साहू की दलित विमर्श पर आधारित कहानी अनुवाद :... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%b2%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%be-checked/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><span style="color: #993300;">उडिया भाषा की चर्चित कथा लेखिका </span></h3>
<h3><span style="color: #993300;">सरोजिनी साहू की दलित विमर्श पर आधारित कहानी </span></h3>
<h3><span style="color: #000080;">अनुवाद : दिनेश कुमार माली </span></p>
<p><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #993366;">=================================================================</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/lajja.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-7133" title="lajja" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/02/lajja.jpg" alt="" width="137" height="163" /></a>उसने  कहा था कान को दांतों से काट, चैती ने कान को दांतों से भींचकर पकड़ा था। कान के भीतर से एक अजब-सी दुर्गंध आ रही थी, बकरे की दुर्गंध की तरह। उसको उबकाइयां  आने लगी, मगर उसने अपने आप को संभाल लिया था। इस तरह घृणित भाव से खाते हुए उसने पहले कभी देखा न था। कितना लोभी और स्वार्थी आदमी है वह, उसने सोचा था। भले ही पहले से कितने लोगों को उसने देखा था, नवघन बीच- बीच में लोभी की तरह व्यवहार करता था, किंतु अपना आदमी समझकर आदत पड़ गई थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह  आदमी खाने के बाद मरे हुए  जानवर की तरह बिस्तर पर सो गया था। स्नान घर में  जाकर हाथ-मुंह धोते समय, नहीं चाहते हुए भी उल्टी करने की उसकी इच्छा हुई। पास के कमरे में सुनाई पड़ेगा  सोचकर कुल्ला करके उसने  मुंह धोया, बाल बनाए, मांग में फैला हुआ सिंदूर ठीक कर लिया था। चैती भीतर ही भीतर इतने जोर से रो रही थी कि उसे लगने लगा उसका शरीर फटकर टुकडे-टुकडे हो जाएगा। उसे समझ में नहीं रहा था कि वह अपनी किस्मत को कोसे या भगवान को गाली दे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">शायद  उस आदमी को नींद नहीं आई थी, उसके आने की आवाज सुनकर   झटपट उठकर बैठ गया और पेंट-शर्ट पहनकर पूछने लगा, जाओगी ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  ने सिर हिलाया। बाहर  उसका बारह साल का लड़का चित्र  साइकल के चक्के को घुमा &#8211; घुमाकर  खेल रहा था। मां को बाहर आता देख, साइकिल के चक्के को तेजी से भगाते-भगाते आगे दौड़ने लगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  के मुंह से गंदी-गंदी बास  आ रही थी। आंखों से साफ-साफ  नहीं दिख रहा था। शाम  के समय गांव के अंतिम छोर   पर पोखरी के पास किधर जाएंगी वह ? बात कहने से पता नहीं चल जाएगी ? उसके सांस छोडने से हवा में शराब की गंध फैल गई थी। नाक की सीध में दौड़ी थी चैती उस दिन। शरीर टूट रहा था, कितनी बार उसने कुसना पी थी, मगर विदेशी दारु भी कांच के गिलास में इस तरह पहले कभी  नहीं पी थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बाबू  ने पूछा था, “कुसना पीओगी ?”<br />
चैती  ने सिर हिलाया था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“इसे पीकर देख” कहकर कांच का गिलास उसने उसकी तरफ बढ़ाया था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वह  आई थी काम को लेकर डर के मारे विनती करने। बाबू उसका इतना आदर-सत्कार करेगा, उसे पता न था। वह बाबू को मना नहीं कर पाई। गिलास से एक घूंट, दो घूंट वह पी गई। कुसना कभी भी चैती को दारू नहीं लगी । बाबू ने उसे अंग्रेजी दारु दी थी । चैती सोच रही थी, बाबू अकेले रहते हैं, उसके घर में झाडू पोंछा कर देगी और अपना दुख बताकर आ जाएगी,मगर हो गया उलटा, बाबू ने बैठने के लिए कुर्सी दी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पोखरी के किनारे तांती गांव की पुलिया को देखकर बहुत दूर से उसने आवाज लगाई, “बड़ी माँ, गुडाखू रखी हो क्या ? थोड़ी-सी दो ना ? आंचल को मुंह में बांधकर आधी अंगुली गुडाखू ले ली थी चैती ने। जल्दी से पानी के भीतर जाकर कमर तक पानी में जाकर खड़ी हो गई। पीछे से पुनिमा चिल्लाई, “तुम बुद्धू हो, इतनी अच्छी  साड़ी  पहनकर पानी के अंदर घुस गई हो ? कहां गई थी ?”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  का बेटा माँ के लिए न रुककर  गांव के अंदर चला गया। चैती को  गुडाखू करने का अभ्यास नहीं था। गुडाखू की तेज गंध  से उसका सिर चकराने लगा। वह तो चूल्हे की राख से अपने दांत मांजती थी, मगर गुडाखू नहीं करती थी। यह जिस्म तो बर्बाद हो गया, यह बात वह किसको कहेगी  ? सना परिड़ा की  बेटी कम बेइज्जत हुई थी इसके लिए ? लोकहंसी हुई अलग से, ससुराल से  निकाल दिया था। आखिर भाई-भाभी के गले में चिपक  गई थीं। औरत का सहारा क्या ? और नवघन को कहने लगी, वह क्या समझेगा उसकी दुर्दशा ? उलटा पीठ पर दो मुक्के मारेगा । जिसके लिए उसने चोरी की, वही उसको चोर कहेगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कनेर  के बीज पीसकर खाने का मन हो रहा था उसका और क्या इज्जत  आबरू रह गई उसकी ? अगर वह कनेर के बीज पीसकर खा लेती तो उसके तीन बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाती। यह शराबी क्या उन्हें संभालता ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">घर  आकर आंगन में जोर-जोर  से उलटियां करने लगी चैती। पेट दर्द करने लगा है , सिर चकराने लगा है , कहकर वह सो गई। बेटे ने खाने को मांगा, छोटी बेटी चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी। वह उठकर किसी के लिए कुछ नहीं कर पाई। बेटे को कहा, छींके में उबले हुए आलू रखे हैं, तीनों मिलकर पखाल निकालकर खा लो।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उल्टी में दारू की गंध आ रही थी। नवघन  दीवार के सहारे बैठकर चिलम पीते हुए कहने लगा,  कहां से पेट भर कुसना पीकर आई हो जो उल्टी कर मरी पड़ी हो। मुलाकात हुई थी बाबू से या आधे  रास्ते से लौट आई हो ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">क्या  कहती चैती ? बाबू ने तो कुछ नहीं कहा था। उसकी आंखों में आंसू भर आए थे। पकड़  में आ जाएगी सोचकर आंचल से आंसू पोंछ ली थी। कितनी बार पूछेगा ?, मेरा पेट दर्द हो रहा है, पता नहीं क्यों।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“मैं कहां बार- बार पूछता हूँ ? बाबू के पास डर कर नहीं गई हो। गांव के अंतिम छोर  पर कुसना पेट भर पीकर आकर सोई पड़ी हो, क्या कहना है ?”<br />
चित्र बरामदे में बैठकर पखाल खा रहा था। कहने लगा, “माँ गई थी बाबू के घर को, उससे  झूठे झगडा क्यों कर रहे हो।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“गई थी तो बाबू ने क्या कहा बता क्यों नहीं रही है ?”<br />
“कह रहे थे कल तुम जाकर मिलो।” चैती  झूठ कहकर मुंह मोड़कर  सो गई थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जिसकी आत्मा दुःख से हिल  हो गई हो, उसकी आंखों में क्या नींद आएगी। सारी रात करवटें बदलती रही। नवघन  दूसरे दिन जैसे-तैसे ऑफिस गया था। बाबू ने उसे फिर काम पर आने को कहा था। और अगर बीच में गांजा और शराब पीकर अनुपस्थित रहता है, तो उसकी बात नहीं सुनी जाएगी, कहकर धमकाया था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नवघन  ने बी.डी.ओ. बाबू की प्रशंसा  उनके सामने ही नहीं बल्कि घूम- घूमकर सभी के सामने की थी। अरखपुर के सभी आदमी बी.डी.ओ. बाबू की तारीफ करते थे, उन्हें अपनी प्रशंसा सुनना  अच्छा लगता था। कौन किस तरीके से उपकृत होता है, जानकर वही कहता था जिससे दूसरों को सुख मिलता था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">एक  बार बाबू की जीप  के आगे गिर पड़े  एक आदमी को बाबू ने अपनी जीप  में बैठाकर डॉक्टरखाने लेकर गए थे । किसी ने कहा था, बाबू सच्चा आदमी है। पूरी दुनिया जानती थी, बाबू किसी के पास पैसे-वैसे नहीं खाते हैं। आजकल के जमाने में ऐसे लोग कहां मिलेंगे। नेता से लेकर जनता तक सभी उनको प्यार करते थे। ठेकेदार लोगों को वह फूटी कौड़ी नहीं सुहाते थे । एक बूढ़ा कहता था, अगर ऐसे दो- चार बाबू होने से देश में रामराज्य आ जाता। कोई- कोई कहता था, बाबू हमारे यहां का बेटा है, उसमें मिट्टी की ममता जैसी कोई चीज नहीं है क्या ? बाबू की औरत तो और भी अच्छी है। साक्षात माँ लक्ष्मी। इतना  मधुर व्यवहार, बड़े  लोग  होने पर भी घमंड बिलकुल नहीं है।<br />
वही लक्ष्मी मां यदि अपने पिता के घर नहीं जाती, तब क्या इतनी दुर्दशा होती चैती की ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस बात को बीते पन्द्रह साल हो गए थे।  बहुत कुछ देश और गांव में  बदल चुका था। मगर नवघन  की  वही पुरानी आदत बदली नहीं थी। शराब और गांजा पीकर उसने अपने शरीर की  हालत खराब कर दी थी। अक्सर ऑफिस आता-जाता नहीं था। तनख्वाह  बहुत कुछ कटकर घर आती थी। पहले की तरह  चैती अभी भी सामान गिरवी रखकर खाती थी। चैती के नाम से गांव में दारु की दूकान से खुले आम दारु पीता था और लोगों के साथ गप लड़ाता था। नवघन  केवल ब्लॉक ऑफिसर का पियोन ही नहीं, वरन वह गांव के  सरपंच का आदमी भी था। गांव में सड़कें बनेगी, खाने के लिए काम होगा, इंदिरा आवास योजना में कितने लोगों को रोजगार मिलेगा ,तरह तरह के सपनें दिखाए थे  उसने।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  ये सारी बातें नहीं समझती  थी। गांव पोखरी के किनारे बैठकर इधर-उधर की बातें करने  जैसी  बात है देश चलाना, गांव चलाना। बीच-बीच में सभाएं होती थी। सभा में बैठने से कितनी जानकारियां मिलती थी। प्रधान सभी बातों में उसकी सहायता करते थे जरुर। नहीं तो उसे क्या पता चलता राजनीति ? किसी  हाथी को  सोना के कलश से जलाभिषेक करने की तरह वह गांव की मुखिया बन गई , कम से कम  पांचवी कक्षा तक पढ़ाई  की थी उसने, वह नहीं तो और कौन बनता  सरपंच ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस  बार सरकार ने घोषणा की थी उसके गांव से आदिवासी महिला  सरपंच का  चुनाव लड़ेगी । चैती का पुत्र चित्रभानू  उस समय सत्ताइश वर्ष का जवान लड़का  था। कॉलेज में  दो साल तक पढ़ाई  की थी । बार-बार फेल होने की वजह से पढ़ाई छोडकर इधर-उधर घूम रहा था। कह रहा था, “मेरी माँ सरपंच के लिए लड़ेगी । मेरे पिताजी ब्लॉक ऑफिसर के पुराने आदमी है। मैं माँ को पढ़ने में मदद करूंगा।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">किसान जाति में और कौन था चैती जैसा ? चैती पहली बार राजी नहीं हुई। गांव में किसान, खडिया, कुलता, ब्राह्मण  जैसी कई जातियों के लोग रहते हैं। सभी के सुख- दुख ,फरियाद वह सुनेगी ? किसान मुखिया बनकर कुलताओं के ऊपर राज करेंगे ? वह भी औरत जात। उसका शरीर कांप रहा था, होने पर भी हाथी को सोने के  कलश से जलाभिषेक करने जैसा उसके  चेहरे पर सरपंच के  पद का भार आ गया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अच्छे थे पुराने दिन, पोखरी से लौटकर, सजना-साग-पखाल, कांसे के कटोरे में जो शांति थी, वह और नहीं।  लोगों के हानि-लाभ की बात समझने के विषय को लेकर पुत्र और शशि  प्रधान के भीतर रात-दिन झगडा झंझट। शशि  प्रधान पुराना सरपंच, मेम्बर होकर रहता था। उसके ऊपर भरोसा कर पाती चैती। वह जैसा चाहता, वैसा काम करवाता। बेटे से सहन नहीं हुआ। शशि  प्रधान के ऊपर गुर्राने लगा। कहने लगा, वह तुम्हें डुबायेगा । लोग  राजनीति  करके महल बना रहे हैं , गाड़ी  भरके धन कमा रहे  है और तुम्हारा तो अपने बेटे से ज्यादा उसके ऊपर विश्वास  है, एक दिन देखना उसके  लिए तुम जेल जाओगी।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  को डर लगने लगा। इस विषय में  वह किसको पूछेगी, शशि प्रधान अच्छा काम कर रहा है या खराब ? कभी-कभी बेटे की बात मान लेती था। जहां बेटा कहता,वहां वह दस्तखत कर देती। घर अखाड़े  की तरह लगने लगा, कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। घर छोडकर कहीं जाने की इच्छा हो रही थी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">टाउन  से सविता दीदी, अपर्णा दीदी आदि आई थी, मद विरोधी आन्दोलन  को तेज करने के लिए। चैती महिला पंचों को इकट्ठा करके बस्ती-बस्ती घूमी थी। एक-एक लकडी लेकर शराब की हांडियों को तोड़ा  था उन्होंने। इस शराब के लिए ही घर-घर में नौटंकी। खेतों के बीच छोटी-छोटी झाड़ियों  में शराब की हांडिया फूटी थी। खड़िया  किसानों की हांडीशाला में डेगची-डेगची भर कुसना पड़ा हुआ था। ये तो उनका प्रतिदिन का भोजन था। लकड़ी की  लाठी से हांडियों को तोड़ते समय चैती  को बहुत दया आ रही थी। दुख से छाती  पिघलने लगती थी। रोने की इच्छा हो रही थी। उसके जीवन में और क्या बचा था ? भगवान ने तो कुछ भी नहीं दिया। सरकार उनके लिए सब कुछ करेगी, मगर सरकार ने भी कुछ नहीं किया। वे लोग चौदह पीढ़ियों से गरीब है, और अब भी। केवल थोड़ा  बहुत नशे का पानी पीते हैं, इस दुख और अभाव से छुटकारा पाने के लिए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  की  उस दिन खूब इच्छा हो रही थी कि वह ‘रानू’ का जुगाड़  करती ? कुसना बनाकर खुद पीती, बुला- बुलाकर सभी को पिलाती। नहीं, और वह लौटा  नहीं पाएगी अपने उन पुराने दिनों को ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">शराब  को बंद कर पाएगी वह, लोगों को रोक सकेगी ? फिर घर-घर में दारु बनने लगी थी । फिर हरेक शाम को गाली-गलौज, लडाई-झगडा। शोर सुनाई पड़ने  लगा था घर-घर में। चित्र ने कहीं से अखबार लाकर देखा था, उसका नाम अखबार में निकला था। जिसने मद निवारण अभियान चलाया था। उसी  चित्र ने फिर से मद पीकर आकर उसे पीटा था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  सिर पर पट्टी बांधकर डॉक्टरखाने  से लौटी थी। जगा ड्रेसर ने पूछा था, “काकी, बताओ तो तुम्हें तुम्हारे  गंजेडी आदमी ने पीटा है। सरपंच हो या नेता, घर वाला अगर अयोग्य है तो अपने आपको खत्म समझो।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“कौन क्यों पीटेगा?, दरवाजा बंद करते समय लंगडी खाकर गिर गई, इसलिए चोट लगी है।” चैती मन ही मन सोच रही थी कि ड्रेसर बहुत सयाना बन रहा है। “तुम्हारे बेटे ने तो अपने पिता का रास्ता पकड़  लिया है। तुम उसको समझाती क्यों नहीं है ? पढ़ा  लिखा है, चाहने से गुप्ता स्टील में काम मिल जाएगा।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">किसी  ने जैसे चैती के कच्चे घावों  पर नमक डाल दिया हो। “कौन वह गुप्ता, जिसके लिए उसके बेटे की  इतनी  जिद्द। जिसकी वजह से उसकी इतनी दुर्दशा ? किस प्रांत से आया है वह ? उसने ऐसा क्या कर लिया है?, जो सारे नौजवान उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ रहे हैं।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  ने सुना था कि दिल्ली का एक सेठ  वहां एक कारखाना खोलेगा।  जिसके लिए जमीन घेरने  का काम पूरा हो गया है। गांव के लोग उसी नशे में पड़े  हैं। अभी घर बन रहे हैं। उसके बाद मशीनें बैठेगी। बाबू लोगों के लिए क्वार्टर बनेंगे। लोगों की जंगल काटने के लिए जरुरत पडेगी। लोगों की  दीवार तैयार करने  और कारखाना बनाने के लिए जरूरत पड़ेगी ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चित्रभानू ट्रेक्टर में लोगों को ढोता था, दोनो समय। भात-दाल और पचीस रुपए मजदूरी। खड़िया  किसान बस्ती के चौदह साल से लेकर अधेड़  उम्र के लोग चित्रभानू के पास भीड़  लगाते थे। फिर सोमवार सुबह से घर के आगे भीड़  लगती थी। चित्र देख-देखकर आदमी बुलाता था। सब्जी के जैसे आदमियों को छांट-छांटकर अलग करता था। न तो बूढ़े आदमी को लेता था और न ही बच्चों को। लेता था तो जवान हट्टे-कट्टे आदमियों को। धुतूरा कितना जरुरतमंद हो गया था उस दिन होने पर भी सुना नहीं था,&#8221; तुम  काका, वह सामान ढोने को काम नहीं कर पाओगे। तुम्हारे शरीर पर तो केवल हड्डियां ही दिख रही हैं। तुम अगर पत्थर तोड़ने  का काम करोगे तो बेहोश हो जाओगे। व्यर्थ में, मैं परेशान हूंगा। मुझे वह दिल्ली वाला बाबू परेशान करेगा।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">धुतूरा  के घर में हफ्ते  में चार  दिन चूल्हा नहीं जलता था।  उसके बच्चें बहुत कष्ट पा रहे  थे। धुतूरा ने कहा, “क्या चित्र , तूं  मुझे मूर्ख समझ रहा है ? तू सोच रहा है यह बूढ़ा काम नहीं कर पाएगा ? उस नेशनल हाइवे वाले ढाबे में किसने  दीवार बनाई थी, कहो तो ?”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चित्र ने नहीं सुना, छांट- छांटकर तगडे लड़कों को अपने साथ ले जाता था। कंपनी के ठेकेदारों को देकर दो पैसे कमाता था। ठेकेदार देता था एक आदमी के पीछे पचास रूपए। अपने पास  चित्र पचीस रुपए रखता था, लोगों को नाश्ता कराने तथा अपने  ट्रेक्टर का खर्च निकालने के लिए। बीच-बीच में ट्रेक्टर खर्च भी लेता था उन लड़को से। शशि प्रधान ने एक बार कहा भी था, यह अच्छा काम नहीं है। अवैध काम है। चैती ने भी बेटे को समझाया, मगर चित्र ने नहीं माना। तुम औरत जात क्या  जानती हो ? आज सरपंच क्या बन गई अपने आपको तीस मार खां समझती हो ? तुझे किसी साले ने भडकाया है, मैं उसके हाथ-पांव तोड़ दूंगा। मेरे हाथ में पैसा आ रहा है, देखकर बरदाश्त नहीं हो रहा है ? चैती  सोच रही थी, इस संसार में  तो इसी तरह चलता है । साग खाने वाले को माड़ खाने वाला देखकर सहन नहीं कर पाता है। वह सरपंच बन गई और उसके बेटे ने  अगर दो पैसे  कमा लिए , तो लोगों की आंखों को नहीं सुहाया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चित्र ने बहुत छानबीन करने के बाद  कहा, “अगर तुम्हें ये सब काम अवैध लगते हैं तो मेरे लिए कोई नौकरी क्यों नहीं खोज लेती ?”<br />
चैती  ने तपाक   से जबाव दिया, “मैं कहां से नौकरी लाऊंगी जो मुझे कह रहा है ?”<br />
“तुम्हारे कहने पर मेरी नौकरी लग जाएगी।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“यह आजकल की बात नहीं है, एक महीने से ज्यादा हो गया चित्र को उसके सामने गुहार लगाते, “तुम्हारे कहने से नौकरी लग जाएगी। नेता बनकर लोग कोठियों  की कोठियां खड़ी  कर देते हैं। बड़ी -बड़ी  गाडियां खरीद लेते हैं। तुमने मेरे लिए क्या रखा है ? कल तू पावर से हट जाएगी तो आम आदमी बनकर रहोगी।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चित्र की नाराजगी भरी  बातें  सुनकर चैती समझ नहीं पाई कि उसे क्या करना है ? सारी बातें तो मीटिंग  में मेम्बर लोग तय करते हैं। शशि प्रधान जो कहता है, वही काम होता है। किस पैसों की बात कहता है चित्र ? किन पैसों से वह जमीन खरीदेगी ? कोठी बनाएगी ? चैती को कुछ भी समझ में नहीं आया। मगर बेटे का चाल-चलन, पता नहीं क्यों, उसे अच्छा नहीं लग रहा था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तोते  की तरह एक ही बात की रट,&#8221; तुम्हारे कहने से मुझे नौकरी मिल जाएगी। बी.डी.ओ. बाबू अभी हमारे जिले के कलेक्टर हो गए हैं। तुम्हारे  कहने से क्या वे तुम्हारी बात नहीं मानेंगे ? वे अगर गुप्ता को कहेंगे, तो मेरी नौकरी लग जाएगी। गुप्ता उनकी बात को नहीं काट पाएगा। तुम कलेक्टर से बात तो करो&#8221; ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मेरे  कहने पर वह मेरी बात सुनेंगे  ? चैती सोचने लगी। “ बेटा क्या कह रहा है तू ?  मेरी ऐसी क्या औकात है जो मैं तुम्हारे लिए फरियाद करूंगी ? औरत जात हूं मैं और ऑफिस में तरह-तरह के लोग होते हैं। मेरे मुंह से कुछ बोल नहीं फूटेंगे, क्या कह पाउंगी  ? तूं  मुझे यह बात मत कह, मेरा शरीर कांप उठता है। तुझे क्या दिक्कत हो रही है, सप्लाई का काम कर रहा है, दो पैसा कहीं से भी मिल रहा   है।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“नौकरी परमानेंट काम है। बाकी काम तो आज है, कल नहीं, तुम्हारे  इतना कहने से क्या हो जाएगा ? तुम कलेक्टर से बात करोगी या नहीं, साफ-साफ मुझे बता दो ।”<br />
कैसे  दिख रहे होंगे बी.डी.ओ. बाबू कलेक्टर बनकर। यही दो- तीन महीने बीते होंगे, उनको यहां बदली होकर आए हुए। क्या पंद्रह वर्ष के बाद भी उन्होंने  उसे याद रखा होगा  ? वह बहुत पुरानी बात है। उस समय नवघन ने जिद्द की थी , “जा बी.डी.ओ. बाबू को कहो, उनके चाहने से मेरा सस्पेंशन आर्डर हटा लेंगे । मैं काम छोड़कर अगर बैठ गया तो तुम सालों को खाना-पीना नहीं मिलेगा , मर जाओगे। जो बात आदमी के कहने से नहीं होती है, उसकी औरत के गिड़गिडाने   से हो जाती है।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अब  बेटे ने जिद्द पकड ली थी।क्या  करेगी वह ? क्या कहेगी ? गुमसुम बैठ गई थी चैती।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उसकी  चुप्पी ने चित्र को हिला दिया था। क्या ? मुंह की मर्यादा तोड़ते हुए  जो मुंह में आए गाली देना आरंभ कर दिया चित्र  ने। ऐसे तो दारु का नशा पहले से ही चढ़ चुका था। और साथ ही साथ, उसका पारा गरम हो गया। ठेकेदार  साला, चूतिया साला, मेरी मां साली, तीनो चूतियें। शशि प्रधान को आज खत्म करूंगा। जो मन में आया, बकता गया चित्र। “दारु पीकर क्या- क्या बक रहा है,कलमुंहे। तू मर क्यों  नहीं गया। सारा गांव सुन रहा है ?”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“क्या कह रही हो, रांड ? अपने को सती-सावित्री समझ रही हो ? मुझे क्या कुछ पता नहीं है ? तू क्या सोच रही है मैं अभी भी बच्चा हूँ ? वही तुम्हारे  कृष्ण नागर फिर एक बार बदली होकर आए हैं?” कहते-कहते कांसे के बर्तन कंसा को उठाकर चैती के सिर पर दे मारा चित्र ने।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">चैती  के सिर से खून की धारा बहने लगी। वह पहले से उसको समझ  नहीं पाई थी। कहीं से हवा  का एक झोंका आया जिससे  वह निर्वस्त्र हो गई और कुछ  छुपा हुआ नहीं था। उसे  बहुत असहाय लगने लगा। वहीं पर झुककर वह बैठ गई। पन्द्रह वर्ष पहले की बात को छुपाकर रखा था लड़के ने। उसका और साहस नहीं हुआ पूछने को क्या बात करनी है, किसकी बात ? वह सिर को दबाकर रखने की जगह, आंखों को आंचल से दबाकर बैठी थी।</span></h3>
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		<title>रास्ते से उठाकर लाए कुछ कागज</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Dec 2011 04:54:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेश कुमार माली</dc:creator>
				<category><![CDATA[सरोजिनी साहू की दलित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[उडिया भाषा की चर्चित कथा लेखिका सरोजिनी साहू की दलित कहानियों की श्रृंखला के अंतर्गत... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/12/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%95%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #993300;">उडिया भाषा की चर्चित कथा लेखिका सरोजिनी साहू की दलित कहानियों की श्रृंखला के अंतर्गत आज दलित विमर्श पर आधारित उनकी एक वहुचर्चित कहानी को हम प्रस्तुत कर रहे हैं,जिसका अनुवाद किया है दिनेश कुमार माली ने ..!<br />
मुख्य संपादक</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> ====================================================================</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_7027" class="wp-caption alignright" style="width: 150px;">
<dt class="wp-caption-dt"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/sarojani-sahoo.jpg"><img class="size-full wp-image-7027 " title="sarojani sahoo" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/sarojani-sahoo.jpg" alt="सरोजिनी साहू ओडिया साहित्य के साम्प्रतिक प्रमुख साहित्यकारों मे मानी जाती है.साहित्य साधना मे अपने योगदान हेतु उन्हें ओडिसा साहित्य अकादेमी पुरस्कार, झंकार पुरस्कार, प्रजातंत्र पुरस्कार, भुबनेश्वर पुस्तक मेला पुरस्करोंसे सम्मानित किया गया है। ओडिया साहित्य मे नारीवाद के प्रमुख प्रबकता यह साहित्यकार का जन्म १९५६ मे ओडिसा के धेंकनाल मे हुआ था। ओडिया साहित्य मे स्नातकोत्तर तथा पीएचडी तथा कानून मे स्नातक की उपाधि से सम्मानित यह लेखिका सम्प्रति बेलपहाड़ कॉलेज मे कार्यरत हैं। श्री इश्वर चन्द्र साहू तथा श्रीमती नलिनी देवी की कन्या तथा ओडिया साहित्य के प्रमुख लेखक जगदीश मोहंती की धर्मपत्नी और दो संतानों की माता सरोजिनी की अबतक पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे आठ कहानी संग्रह और सात उपन्यास शामिल है." width="140" height="168" /></a></dt>
<h3><span style="color: #993300;">सरोजिनी साहू ओडिया साहित्य के साम्प्रतिक प्रमुख साहित्यकारों मे मानी जाती है.साहित्य साधना मे अपने योगदान हेतु उन्हें ओडिसा साहित्य अकादेमी पुरस्कार, झंकार पुरस्कार, प्रजातंत्र पुरस्कार, भुबनेश्वर पुस्तक मेला पुरस्करोंसे सम्मानित किया गया है। ओडिया साहित्य मे नारीवाद के प्रमुख प्रबकता यह साहित्यकार का जन्म १९५६ मे ओडिसा के धेंकनाल मे हुआ था। ओडिया साहित्य मे स्नातकोत्तर तथा पीएचडी तथा कानून मे स्नातक की उपाधि से सम्मानित यह लेखिका सम्प्रति बेलपहाड़ कॉलेज मे कार्यरत हैं। श्री इश्वर चन्द्र साहू तथा श्रीमती नलिनी देवी की कन्या तथा ओडिया साहित्य के प्रमुख लेखक जगदीश मोहंती की धर्मपत्नी और दो संतानों की माता सरोजिनी की अबतक पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे आठ कहानी संग्रह और सात उपन्यास शामिल है</span>.</h3>
</dl>
</div>
<p></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/Scan0025.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7028" title="Scan0025" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/12/Scan0025-272x300.jpg" alt="" width="272" height="300" /></a><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तुम कल आई क्यों नहीं ?” बडे ही असंतोष  लहजे  में  पूछा था रूबी ने।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दीपा  आंगन में कपड़े सुखाते हुए  कहने लगी, “मेरे ससुराल वाले आए थे कल।” रूबी ने जितना ज्यादा गुस्से का  इजहार किया था, दीपा के उत्तर से उतनी  ही जल्दी शांत हो गई। मन ही मन  सोच रही थी कि इसलिए ही दीपा को रखने से पहले मन गवाही नहीं दे रहा था। शादी होने के बाद लड़की के  कितने दिन तक अपने पति और ससुराल वालों को छोडकर पिता के घर आकर काम-धंधा करने से चलेगा ? एक वर्ष पहले मिसेज राव ने जुगाड़  किया था दीपा का। पहले दिन  से ही जान-पहचान वालों की तरह आकर हंस-हंसकर नमस्कार किया था दीपा ने। “दीदी मुझे पहचानती हो ? मैं मूर्तिबाबू के घर काम करती थी। बचपन में। आपके घर तब अहिल्या काम करती थी।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रूबी   को पहले पहल याद नहीं आया। फिर उसे याद आने लगा, दस वर्ष पहले अहिल्या नाम की एक लड़की उसके घर काम करती थी। अहिल्या और दीपा अपनी बस्ती से एक साथ आती थी। अचानक एक दिन अहिल्या  ने औरतों को कौतुहलता दिखाते हुए उसको कहा था, “जानती हो दीपा का बाप मरे एक महीना भी नहीं बीता होगा कि  उसकी मां ने करमा के बाप से शादी कर ली। ये लोग ऐसे हैं।” अहिल्या हंसने लगी थी। दीपा को मिलाकर तीन भाई बहिन थे और करमा के घर में चार। सभी मिलकर एक घर में रहते थे सात लोगों का परिवार।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">उस  घटना के घटने के कुछ दिन  बाद दीपा फिर  मूर्तिबाबू के घर काम करने नहीं आई। उस समय दीपा की उम्र कितनी  रही होगी ? यही दस वर्ष या ग्यारह। अब वह बीस  वर्ष की लड़की है।  उस वर्ष जब वह मेरे पास काम खोजने आई थी मैं उसको पहचान नहीं पाई। मगर दीपा कह रही थी, “यहां से मैं और नहीं जाऊंगी। यहां ही रहूंगी हमेशा के लिए। बचपन में मूर्तिबाबू के घर से  काम छोड़कर चली गई थी क्योंकि  मेरी दादी ने उस समय गांव से बुलाकर मेरी शादी कर दी थी । दस साल की उम्र में क्या बुद्धि थी ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी  को  काम करने वाली की  निहायत जरुरत थी इसलिए “इस बार और कहीं नहीं जाओगी , क्या हुआ ?” इत्यादि सवाल जीभ पर नहीं आए थे। फिर भी मन में एक संदेह बना हुआ था कि विवाहिता लड़की कितने दिनों तक अपने पति का घर छोड़कर  रहेगी।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">दीपा  अविवाहित लडकियों की तरह  सलवार कमीज पहन कर आई थी काम करने के लिए। झटपट मन मुताबिक काम कर देती थी हर दिन। न रूबी  ने उसके व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करना चाहा और न ही दीपा ने रूबी  के.  अचानक एक वर्ष के बाद दीपा के  अपने ससुराल का प्रसंग छेड़ने पर , रूबी  विचलित हो गई थी कि फिर से एक नकरानी खोजनी पडेगी काम के लिए। अति शांत स्वर में उसने पूछा था, “तुम्हारे ससुराल वाले क्या तुम्हें लेने आ रहे हैं ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“नहीं, तलाक देने  के लिए आए थे वे। आज सुबह गाड़ी में चले गए।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तलाक ?” आकाश से गिरने जैसे चौंककर रूबी  ने पूछा था “किसको तलाक देंगे, तुझे ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">बड़े  ही  स्वाभाविक लहजे  में कहा था दीपा ने, “हाँ, मेरे पति की  किसी दूसरी जगह शादी करवाएंगे, सोचकर लडकी देखी है, तलाक नहीं होने पर शायद मैं बाद में झमेला करूंगी, इसलिए बातचीत कर सब कुछ निपटाने आए हैं वे लोग।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी   की चेतना में बार-बार  तलाक शब्द गूंज रहा था।  तलाक पत्र कहने से इतना जोर से धक्का लगता है, किसको पता नहीं ? मगर तलाक शब्द से डर लग रहा था। तीन बार केवल तीन बार “तलाक- तलाक- तलाक” कहने से पेड़ से डालियां काट दी  हो। पहने हुए कपड़े  या पहने हुए फटे जूते को फेंकने की तरह। संबंध क्या जूता या कपड़े  होते हैं ? जूता या कपड़े  फेंकने पर भी कितना मोह हो जाता है जो फेंकने की इच्छा नहीं होती है और यह आदमियों का संबंध है जिसमें इतनी निबिडता, कुछ गोपनीयता कुछ भरोसे की बालू सीमेंट, ईट में तैयार।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">एक  वर्ष के अंदर एक मोह सा हो गया  था अथवा  दीपा के मुंह से तलाक शब्द सुनकर, अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु खुश होने के जगह रूबी  विचलित हो गई थी। मगर दीपा का आश्वस्त मुंह देखकर उसके अंदर दीपा की पिछली जिंदगी में  झांकने की उत्सुकता बढ़ गई थी। यह बात पूछने के लिए अभी   उपयुक्त समय नहीं है सोचकर वह चुपचाप रही। उस घटना के महीने , दो महीने बाद, सुबह- शाम पहुंचते ही दीपा कहती थी, कल सारी रात मैं सो नहीं पाई।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“क्यों क्या हुआ ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “सारी रात मेरी मां मेरे  साथ झगड़ती  रही।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “झगड़ा  ? किस चीज के लिए झगड़ा ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “क्या कहूं, मेरा भाग्य ही खराब।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “कहो न क्या हुआ ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“देखो न दीदी, मैं तुम्हारे घर एक साल से काम कर रही हूँ, मेरा व्यवहार हाव -भाव कभी खराब देखा है  ? जो दो मुट्ठी कमा नहीं सकती हैं , ये जो लड़कियाँ कॉलोनी में काम करने आती  हैं, उनकी तरह मैं प्रेम करती रहूंगी, कहो तो ? तुम तो देखती हो मैं सीधा घर से आती हूँ ,सीधा अपने घर जाती हूँ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम्हारी मां किसलिए कह रही है ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“हाँ ! एक लड़का  कई दिनों से मेरे पीछे पड़ा  है। मेरे पीछे- पीछे मगरी पार करते कॉलोनी के मेन गेट तक आता है। काम को आते समय मगरी के पास बैठा रहता है।  मेरी मां कुछ भी समझती नहीं है, व्यर्थ में संदेह कर मुझे गाली देती है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“संदेह क्यों करती है तुम उसे सारी सही- सही बात बता दो।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“मैंने क्या बताया नहीं ? वह कहती है अगर तुम्हारी कोई गलती नहीं है तो वह तुम्हारे पीछे- पीछे क्यों जाता है। उस पागल लड़के  को भी क्या पड़ी  है, देखो न, मुझे कितना परेशान करता है। मेरी मां अब कहती है तुम काम पर मत जाओ ।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी  मन ही मन सोच रही थी, जवान लड़की काम पर रखने से यही समस्या है। कुछ न कुछ होता रहता है उसके साथ। आजकल कॉलोनी के पार्क में, कलवर् पर, यही कामवाली लड़कियां उनके लड़के दोस्तों के साथ बैठकर गप लगाने के दृश्य कई बार उसे भी  नजर आए हैं। मगर दीपा को उसने कभी भी वहां नहीं देखा। रूबी  ने कहा था, तुम उस लडके को सीधे-सीधे पूछ लो, उसका मतलब क्या है ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम क्या सोच रही हो, मैने उसे पूछा नहीं ? एक बार उसे खूब गाली दी थी। पत्थर फेंककर उसका सिर फोड़  दिया था । लडके में इतना पागलपन सवार है कि वह फिर भी आता है। एक दिन मैने उसे पूछा था, तुम्हारा मतलब क्या है, कहो। मुझे क्यों परेशान कर रहे हो ? क्या कहा, जानती हो ? कहने लगा मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“अपनी  माँ को कही थी यह बात।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “पर मेरी मां मुझे मारकर फेंक देगी ? एक दिन मेरी मां ने जरूर उसको  बहुत डांटा था, मगर दो दिन के बाद फिर जहाँ का  तहाँ।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “वह तो उस लड़के का दोष है, फिर तुम्हारे साथ सारी रात झगड़ा करने का क्या कारण है ?” एक गुप्तचर पुलिस की तरह पूछा था रूबी ने।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “मेरी माँ और मेरे नए बाप की एक बेटी है। वह कहती है मेरे लिए उसकी बेटी बदनाम हो रही है।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तुम्हारी बहिन भी है ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “दस वर्ष की है ,स्कूल में पढ़ती है। मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूँ।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तुम उस लड़के  को पहचानती हो ? तुम्हारी जाति का है ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “हाँ, हमारी बस्ती का। उसके पिता नाई है। छोटा केबिन खोला है थाने  के पास में। हमारी जाति तो दूसरी है। वह हमारे छत्तीसगढ़ का रहने वाला जरूर है मगर हमारी जाति का नहीं है।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तुम्हे  बड़ी चिंता में डाल  दिया है उस लड़के ने ।” रूबी ने कहा।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “नहीं, नहीं, उस लड़के को लेकर मुझे कोई डर नहीं है। वह मेरा कुछ भी बिगाड नहीं सकता है। दीपा ने कहा था, मेरी परेशानी है मेरी माँ। इस घटना के बाद वह मुझे अपने पास रखना नहीं चाहती है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तब तुम क्या करोगी, सोचा है कुछ  ? काम छोड़  दोगी ?” बड़े  ही आशंका  भरे लहजे  में पूछा था रूबी ने।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “मैं क्या करूंगी, कुछ समझ नहीं पा रही हूँ। उसके लिए तो सारी रात इतना झगडा-झंझट। मेरे  पिता भी मेरी मां की बात मान रहे हैं, मेरे पीछे पड़ गए हैं। मेरा दोष नहीं होने पर भी मुझे पीटते हैं। मेरा  जीवन अब मुझे तीखा लगने लगा है।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> फिर वही कौतुहल, “तुमने तलाक क्यों दिया ?” रूबी  के मन में जाग उठा। फिर भी उसने वह बात नहीं पूछकर पूछा था तेरा वह सोतेला  बाप है ? पूछकर वह संकुचित हो गई थी। हमारे समाज में सौतेली माँ की बात जितनी प्रचलित है, सौतेला बाप उतना प्रचलित नहीं है। लड़की  ने क्या सोचा होगा ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">दीपा  ने कहा था, “जब मेरी अपनी मां होकर भी यदि उसकी  मेरे प्रति ममता नहीं है तो बाप तो पराया आदमी है, वह मेरी हालत क्या समझेगा ? असली बात जानती हो दीदी मेरी माँ अपनी बात को ज्यादा देखती है। मेरे लिए लड़ाई  करेगी तो कल बाप के सामने खराब हो जाएगी। ऐसे  व्यवहार करती है जैसे मैं उसकी कुछ भी नहीं हूँ । अब उसने जिद्द पकड ली है कि मैं यहां से चली जाऊँ। यहां नहीं रहूं।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“चली जा मतलब ? कहां जाएगी तू ? तुम्हारी माँ को छोड़कर  और कौन तेरा है ? ससुराल का रास्ता तो तुम्हारे लिए बंद है। कहां जाने के लिए तुझे वह कह रही है ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “वह कह रही है जहां तेरी इच्छा हो, वहां तू चली जा,  मगर यहां मत रूक।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “वह मां है या कौन ? तुम्हारे कौन- कौन अपने आदमी है कहो तो ? तुम्हारे गांव में तुम्हारी दादी थी ? &#8221; &#8220;दादी माँ ?&#8221; बड़ी उदास होकर कहा था उसने। &#8220;उसे न तो आंखों से दिखता है और न कानों से सुनाई पड़ता  है। गांव में वह भीख मांगकर जीवन गुजार रही है। गांव घर की अवस्था तो और खराब है। दोनो तरफ की दीवार टूट गई है। जैसे- तैसे करके आधी दिवार उठाकर बांस  का ढांचा डालकर वह रहती है। वहां मैं कहां रह पाऊंगी ? एक पूरा मकान नहीं होने पर मुझे कौन वहां रखेगा ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> जीवन  के इस दुख को जानने का अवसर नहीं मिला था रूबी को। छोटे समय से ही उसकी यह बात दूसरे  लोग जानते थे आज तक कि  कहां पढ़ेगी  ?। कहां घूमने जाएगी?। कैसे बच्चों के साथ मेल  जोल बढाएगी?। कैसे घर में  शादी होगी?। किसी भी प्रकार की समस्या होने पर दूसरे लोग समाधान  करते आए थे आज तक। उसे सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ी  चारदीवारी की सुरक्षा के बारे में।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम्हारा और कोई नहीं है ?” निरुपाय होकर पूछा था रूबी ने।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“नहीं, और कोई होने पर चिंता किस बात की थी। जब मेरा बाप मर गया, उसी समय मेरी माँ ने उस आदमी के साथ शादी कर ली। मैने मना किया था हमारा जीवन बरबाद हो जाएगा, उसने मगर सुना नहीं। मेरी  माँ मुझे दादी के पास ले गई। मेरे छोटा भाई कहां चला गया ?। जो आज तक पता नहीं। और माँ की  गोद में एक छोटी बहिन थी, वह मर गई। मेरी दादी माँ ने मुझे गांव ले जाकर बचपन में ही मेरी शादी कर दी। हमारी जाति के लोग अनपढ़ है। दस वर्ष हुए  भी नहीं कि शादी कर दी। तुम जिससे शादी कर रही हो बड़ा  होकर चोर होगा, या चांडाल होगा या खूनी, कैसे पता चलेगा, कहो तो &#8221; ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी  मन ही मन सोच रही थी कि  इस लड़की को पास  में रखने से होगा। ऐसे भी एक कमरा टूटा-फूटा तथा सामान से  भरा पड़ा है, सफाई कर देने से लड़की को सिर ढ़कने की जगह मिल जाएगी। मगर जवान लड़की की जिम्मेदारी कौन लेगा ? इसके अलावा वह लड़का भौंरे की तरह इसके चारो ओर चक्कर काट रहा है। बाद में हमें ही बदनाम होना पडेगा ? रूबी सोच रही थी कि दीपा को नारी सदन में छोड़  देने से ठीक होता। मगर दीपा सुनकर इतनी भयभीत हुई जैसे उसको कोई जेल में डाल रहा हो।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> इस  बार रूबी को कोई जिज्ञासा नहीं थी वरन चिंतित होकर उसने पूछा, “तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हें तलाक देना क्यों चाहते हैं ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">दीपा  अब तक घर में झाड़ू  लगाते-लगाते  उसकी बातों का जवाब  दे रही थी। रूबी का प्रश्न सुनकर जमीन पर पालकी मारकर बैठ गई। हम छत्तीसगढ़ के लोगों की बात तुम नहीं जानती हो, दीदी। उनका चाल- चलन यहां की तरह नहीं है। सारे लोग जंगली गंवार है। दीपा की बातों में जैसे आक्रोश छिटककर आ रहा हो।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी  ने क्रोधित होकर कहा था, “तुम ये फालतू बातें मत करो। हमने  छत्तीसगढ़ के लोगों को देखा नहीं है क्या ? वे भी दूसरे लोगों की  तुलना में कोई कम नहीं है, समझे ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> रूबी  के धमकाने से दीपा कुछ क्षण के लिए चुप हो गई। उसके बाद कहने लगी, “आप शहर वाले लोगों की बात कर रही हो, गांव के लोगों के बारे में क्या जानती हो ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रूबी  मन ही मन सोच रही थी, सिर ढंकने की जगह नहीं है, मगर लड़की की बात तो देखो। मगर दीपा के ऊपर नजर गिरते ही वह नरम हो गई। आंसूओं से छलकती आंखें और रूँआसा चेहरा हो गया दीपा का। बचपन में मेरी दादी ने मेरी शादी कर दी, मेरे लिए उनकी सारी चिंताएं खत्म। शादी होने के बाद मैं अपनी दादी के पास रहती थी। बड़ी  होने पर ससुराल वाले बुलाकर ले गए। मेरी जिस लड़के के साथ शादी हुई थी, वह कुछ भी काम नहीं करता था। सभी बदमाश लड़कों के साथ मिलकर सुनसान जगह में लोगों को लूटने का काम करता था। लूट के पैसों को दारू में  रायपुर, बिलासपुर में अय्याशी में उड़ा  देता था। इसी चोरी के इल्जाम में एक दो बार  जेल भी गया था। बहुत समझाया था कि तुम काम पर जाओ या मजदूरी करो, थोड़ा -मोड़ा  जो मिलेगा उसमें हम सुखी रहेंगे। मगर सुना नहीं।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“इसलिए तुम भाग आई ?” रूबी ने पूछा।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “नहीं, नहीं उसके लिए नहीं। कितने दुख भरे दिन मैने बिताए हैं, क्या कहूंगी तुम्हें। ये दुख तो कुछ भी नहीं है। मैने दुर्गा  माँ का व्रत रखा था। पूरे चौंसठ  गुरुवार उपावस रखे थे  कि उस घर से किस तरह मुक्ति मिल जाए।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुझे क्या वे लोग मार-पीट करते थे ?” बड़े  ही दयाद्र्र लहजे  में बोली थी रूबी।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“नहीं, नहीं, मारपीट नहीं, कैसे कहूं तुम्हे हमारे लोगों के  आचरण की बात। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई , देखो। मगर वे लोग अभी तक कुछ भी नहीं बदले। वे ही पुराने रीति-रिवाज को रखकर बैठे हैं। मेरा यहां जन्म हुआ है। शहर के चाल- चलन में पली-बढ़ी, गांव के वे आलतू फालतू धंधे  मुझे पता नहीं। एक दिन बाहर बैठकर बाल बना रही थी। मेरी सास ने गुस्सा होकर मुझे बुलाया- “ऐ थोडगी , भीतर जाओ काम धंधा तो कुछ नहीं केवल बाहर बैठकर बाल संवारने है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम्हारा नाम थोडगी ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“थोडगी किसी का नाम होता है ? मेरे बाल बच्चे नहीं थे तो, हमारी भाषा में जिसके बच्चे नहीं होते हैं उनको थोडगी कहते हैं। थोडगी एक अपमानजनक शब्द है। मेरे देवर के लिए लड़की  देखने जाना था उस दिन। मेरा मुंह देखने से अशुभ होता, इसके लिए मुझे भीतर भेज दिया मेरी सास ने। उस दिन मैं बहुत रोई। इच्छा हो रही थी दादी के पास चली जाऊँ।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">रात को कुछ भी नहीं खाकर मैं  सो गई। मेरी सास ने पास  बुलाकर बहुत समझाया था। जिसके  बच्चे नहीं होते हैं, उनका मुंह देखने से अशुभ होता है। कोई भी काम अच्छा नहीं होता है। औरतें वंश को आगे बढ़ाने के लिए हैं और अगर  वह अपना वंश आगे नहीं बढ़ा पाती हैं तो उसका जीवन व्यर्थ है। फिर भी तुम चिंता मत करो। मैं कुछ बंदोबस्त कर दूंगी। दूसरे दिन मेरी  सास ने तरह-तरह की जड़ी -बूटियाँ  पीसकर मुझे पिलाई। उस समय मेरा आदमी जेल में था। इन जड़ी  बूटियों को पीने से क्या लाभ होगा ?, मैं सोच रही थी। उस महीने मेरा शुद्ध स्नान होने के बाद मेरी सास ने बुलाकर मेरे बाल गूंथे थे। कहने लगी, “सारा दिन ये ही कपड़े पहनी रहोगी, बदल दो।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">मुझे  आश्चर्य हो रहा था रात  के समय इतना सजना-धजना क्यों  ? मेरे गांव में न तो नाच हो रहा था न नौटंकी । उस दिन मेरी सास ने मुझे साथ में बैठकर खिलाया। कहने लगी थी जिसके बच्चे नहीं होते हैं वे नरक में जाते हैं। प्रेत होकर घूमते हैं। समझी, आज रात को अपने किवाड़  खुले रखना। रात को तुम्हारे जेठ तुम्हारे कमरे में आएंगे।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> रूबी के  आश्चर्य की सीमा नहीं रही। किसी का किसी के साथ संबंध  बनने की बात तो उसने सुन रखी थी मगर इस उद्देश्य के साथ क्या यह संभव था ? उसी समय उसे महाभारत की अंबिका और अंबालिका की बात याद आ गई। मुनि व्यास की भूमिका बड़ी  महत्वपूर्ण थी वंश रक्षा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए। ऐसे भी उसने सुन रखा था छत्तीसगढ़ की संस्कृति मे संकीर्णता नहीं है। तुमने अपनी सास की बात का विरोध नहीं किया ? पूछा था रूबी ने।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“पता नहीं कौन जानता है ?मेरी सास ने उस बात को मेरे मन को काबू में करके मनवाया था । मैं विरोध नहीं कर पाई।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “बाद में ?” रूबी ने बात को आधे में रोका।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“ये सब इतनी आसानी से मान लेना संभव है ? वह मेरे पिता की  उम्र के थे। एक बाप की  उम्र के आदमी को कैसे मान लिया जाता ? ऐसे भी मेरी अवस्था हिम-शितल थी फिर भी उस बार दो- तीन महीनों तक संबंध रखना पड़ा। सचमुच मैं जैसे प्रेत बन गई थी। उस आदमी के छूने से मेरा शरीर घृणा से भर उठता था। उलटी करने का मन कर रहा था।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम्हारी  जेठानी ने कुछ कहा नहीं ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “क्या कहती ? ये तो पुराना रीति-रिवाज है। जब सारी बातें याद आती है तो शरीर कांप उठता है।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “इसलिए तुम ससुराल छोडकर आ गई ?” रूबी ने पूछा।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“मेरे  देवर का स्वभाव अच्छा नहीं था। मौका मिलने पर शेर की तरह कूद पड़ता था। गिद्ध की तरह नोंच लेता था। भालू की तरह शरीर को काट लेता था।इस शरीर पर उसे जरा भी दया नहीं आती थी। इस कष्ट से कौन मुझे छुडा पाता ? किस के पास मै  फरियाद करने जाती ? कौन मेरे दुख को कम करता ? पेट में रूबी अपना  मालिकपना फेंककर उसके पास दौड़  आई। सिर के बाल को सहलाने लगी। “रो मत, मत रो, चुप हो जा।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">कुछ समय बाद अपने आंसू पोंछकर उठ गई थी दीपा, और हर दिन की तरह अपना काम करने लगी। उसके बाद दोनों ने एक दूसरे के साथ और कोई बात नहीं की। काम खत्म करके अपना नाश्ता खाकर वह चुपचाप चली गई थी। उसके जाने के बाद घर में अद्भुत शांति छा गई थी जैसे तेज बारिश के बाद खुले आकाश में एक शून्यता। मगर रूबी का मन सारा  दिन भारी रहा। इन सारी बातों ने उसको  मादक द्रव्य की तरह नशाग्रस्त कर दिया था। बाहर  उसकी अपनी दुनिया है, वह समझ नहीं पाई थी।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">दीपा  के चेहरे की हंसी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी। कभी  उसका चेहरा पत्थर की मूर्ति की तरह दिखता था तो कभी कृष्णपक्ष की रात की तरह।कभी जिद्दी स्त्रोत  की तरह विवृत तो कभी प्रतिक्रियाशील नारीनेत्री की तरह। एक दिन सिर पर निकले गुमडे   के साथ आई थी वह। रूबी ने पूछा “अरे ! यह क्या हुआ ? कहीं गिर पड़ी ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">उस  दिन अपना दुख बताने के बाद आज तक वह दूर- दूर रहने लगी। रूबी का प्रश्न सुनकर कहने लगी, “कल शाम को मेरे पिता ने मुझे खूब पीटा है। चोटी पकड़कर  इतनी  जोर से फेंका कि सिर फूल गया है।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम्हारी माँ ने कुछ नहीं कहा ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “वह दो दिन पहले अपने ससुराल गई है। होने से भी क्या करती। वह तो चाहती है, मैं कैसे भी यहां से चली जाऊँ। मेरे पिता को लेकर उसको मुझ पर बहुत संदेह है।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “ये सब क्या चल रहा है ? रूबी ने कहा। तुम्हारे बाप ने तुझे क्यों मारा, सही- सही कहो ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“दारु पीने के लिए पैसे मांगे। मैं पैसे कहां से लाती ? मैं कौन-सी मजदूरी करती हूँ कि हर दिन हाथ  में कुछ पैसे आएंगे, जो घर को ले जाऊंगी।। जिस-तिस घर काम करके जो महीने के पैसे मिलते हैं, उनसे घर के लिए महीने भर का चावल खरीद लेती हूँ। तुम्हारे घर की तरह कम चावल नहीं खाते हैं ? तुम तो जानती हो, एडवांस लेकर घर में खप्पर बदलने के लिए दिए थे , और कहाँ से पैसे लाती जो उसको दारु पीने के लिए देती ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">इतनी  होशियार होने के बाद भी तुम्हारे माँ- बाप तुम्हें  घर से निकालना चाहते हैं  ? कैसे लोग हैं ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">असली  बात क्या है, जानती हो दीदी, वह मेरा असली बाप नहीं है इसलिए मेरी माँ मन में संदेह करती है। वह तो मौका खोजती है कि मैं कैसे भी यहां से भागूं। इसलिए झूठ बोलकर कि मेरा उस लड़के के साथ संबंध हैं, कहकर झगड़ा करती है। और मेरा बाप बेकार बैठे- बैठे उसके रोजाना का दारू-खर्च मुझसे हासिल करना चाहता है। पैसा नहीं मिलने पर उस लड़के  का बहाना बनाकर मुझे पीटता है। मैं सोच रही हूँ चली जाऊँ ?</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“कहाँ जाओगी ? तुम्हारा  तो कोई नहीं है ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “उस लड़के के साथ ही चली जाऊंगी ?”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“मतलब ?” दीपा की बात सुनकर रूबी को आश्चर्य होने लगा। &#8220;वह लड़का तो तुझे बहुत परेशान करता है, कह रही थी हर दिन रास्ते में चलने नहीं देता है। कितनी बार तुमने पत्थर फैंका है , झगड़ा किया है और  उस लड़के  के सामने हाथ जोड़कर  विनती की हो कि वह तुम्हारे जीवन से चला जाए। और अब कह रही हो कि उस लड़के के साथ चली जाऊँगी ? कहीं लड़की ने डूबकर पानी तो नहीं पी लिया ? या अपने को लेकर तरह-तरह की काल्पनिक कहानियां बनाकर तो नहीं सुना दी उसने आज तक ? &#8221; रूबी भी बचपन में इस तरह की कल्पना किया करती थी, कि वह बहुत पैसे वाली है। सारे लोग उसको प्यार करते हैं। जीवन दांव पर लगाने वाला उसका एक प्रेमी भी है। एक दिन रूबी को कैंसर हो गया है और वह मृत्युशैया पर अपने आखिरी दिन गिन रही है। सभी रो रहे हैं, सभी को रोता देख वह खुद भी रो रही है। दीपा उस तरह के कहीं सपने तो नहीं देख रही है ? आज यह भोलीभाली लड़की  अपने दुख और दुर्दशा की कहानी सुनाकर कहीं उसे मूर्ख तो नहीं बना रही है।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“तुम क्या आज जा रही हो ?” रूबी ने पूछा।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “नहीं, कल शाम को जाऊंगी।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> रूबी  ने अलमारी में से एक गाढ़े रंग की साड़ी निकालकर दीपा को दी। उस साड़ी  को उसने समेटकर पालिथीन में भर दिया।दीपा  कहने लगी, “मैने एक लड़की को कह दिया है वह आकर काम करेगी, आप चिंता मत करना।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">सब  कुछ जैसे घालमेल हो जा रहा  हो। रूबी विश्वास करेगी  या अविश्वास ? दीपा काम करने के बाद जब जाने लगी तो रूबी उसके  पीछे- पीछे कॉलोनी के मुख्य फाटक तक गई। शायद वह घटना की वास्तविकता जानना चाहती थी। या वह उस प्रेमी पागल लड़के को देखना चाहती थी। गेट के पास वाले कलवर्ट पर बैठा हुआ था वह लड़का। यह वही लड़का था जिसके साथ दीपा जाना चाहती थी ? इतना गंदा ? शायद रूबी ने इतना गंदा लड़का कभी देखा तक नहीं था। तरल काले कोलतार की तरह उसका शरीर दिख रहा था। गाल पर एक कटा हुआ लंबा दाग। दोनो ने रुककर कुछ बात की, फिर रूबी अपने घर को लौटी। उसने लंबी सांस ली।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">दूसरे दिन दीपा ने अपना नियमित काम  कर लिया था। रूबी रोजाना  दीपा को चाय नहीं पिलाती थी, मगर उस दिन दीपा ने पीने के लिए चाय मांगी थी। पहले से ही उसने अपने कपड़े  पॉलिथीन में भरकर रख दिए थे। रूबी ने दो बिंदी पैकेट, एक पुरानी बेडशीट, आधा हुआ टेलकम पावडर का डिब्बा दीपा को दिया । चाय पीने के बाद दीपा ने कहा, “जा रही हूँ। और तो इधर नहीं आ पाऊँगी।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“हाँ” रूबी ने कहा था।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> दीपा  गेट पारकर जा रही थी।  रुबी ने पीछे से आवाज लगाई, “दीपा सुनो तो।”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> पीछे  मुडकर दीपा ने देखा।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “तू क्या अपनी खुशी से उस लडके के साथ जा रही है ?।</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> “खुशी मन से ?” दो कदम पीछे मुडकर आई वह।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“आप तो सब जानती हैं, फिर पूछ रही हो ? आपने तो देखा ही है उस लड़के ने मेरी क्या गत बना दी है ? घर  से बेघर कर दिया मुझको। किधर जाती मैं ? जैसे  भी करके एक मनुष्य का सहारा तो है। कुत्ते, बिल्ली का जन्म पाना बल्कि अच्छा  है। मुझे लग रहा था उसके लिए मैं निराश्रय हुई, अब वही  मुझे आश्रय भी देगा।”</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“इतनी नफरत से घर परिवार बसना संभव है ?” रूबी ने कहा।</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">“जानती सब हूं, मगर मेरे पास और कोई ऊपाय नहीं है। मैं यह बात भी जानती हूं कि लडके का वर्ष, डेढ़  वर्ष में मेरे से मन टूट जाएगा। फिर ?”</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> इस  फिर का कोई उत्तर नहीं था रूबी के पास। दीपा ने भी उत्तर  की आशा  नहीं की थी। और कहने लगी, “जा रही हूँ।”</span></span></h3>
<p><span style="font-weight: normal;"><span style="font-weight: normal;">() () ()</span></span></p>
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