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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; सीधी बात</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>हिन्दी का कहानी लेखक हमेशा ही बेचारा रहा है&#8230;तेजेन्द्र शर्मा</title>
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		<pubDate>Sat, 05 May 2012 12:11:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
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		<description><![CDATA[हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को जगरांव, (पंजाब) में... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/05/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: red; background-color: pink;" rowspan="2">
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/At_Leicester_2.jpg"><img class="size-full wp-image-7329 alignleft" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/At_Leicester_2.jpg" alt="" width="195" height="229" /></a>हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार <span style="color: #993300;">श्री तेजेन्द्र शर्मा</span> का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को जगरांव, (पंजाब) में हुआ l वर्तमान में श्री तेजेन्द्र ब्रिटेन में रहकर हिन्दी-साहित्य की सेवा कर रहे हैं l इनकी अब तक की प्रकाशित कृतियों में कहानी संग्रह के अंतर्गत क़ब्र का मुनाफ़ा , बेघर आंखे, यह क्या हो गया, देह की कीमत, ढिबरी टाईट, काला सागर, सीधी रेखा की परतें &#8211; तेजेन्द्र शर्मा समग्र कहानियां (भाग 1), दीवार में रास्ता (शीघ्र प्रकाश्य), तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां – ऑडियो सी.डी. आदि और कविता-संग्रह के अंतर्गत  ये घर तुम्हारा है, तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़लें (सी.डी.), अंग्रेज़ी में &#8211; Black &amp; White (The Biography of a Banker), Lord Byron &#8211; Don Juan, John Keats &#8211; The Two Hyperions, अनूदित कृतियों के अंतर्गत &#8211; ढिबरी टाइट, कल फ़ेर आंवीं (पंजाबी) , पासपोर्ट का रंङहरू (नेपाली), ईंटों का जंगल (उर्दू) आदि प्रकाशित हो चुकी हैं l तेजेंद्र जी को सम्मान के रूप में ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार &#8211; 1995 (प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों। भारतीय उच्चायोग लंदन द्वारा डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (2008), अभिव्यक्ति वैबज़ीन द्वारा आयोजित कथा महोत्सव 2008 में कहानी ओवरफ़्लों पार्किंग को श्रेष्ठ कहानी का 5,000 रुपये का सम्मान, कृति यू.के. द्वारा वर्ष 2002 के लिये &#8220;बेघर आँखें &#8221; को ब्रिटेन की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कहानी का पुरस्कार। प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान – दिल्ली (2007), सरस्वती प्रकाशन, नई दिल्ली। तितली बाल पत्रिका का साहित्य सम्मान – बरेली (2007), सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार – 1998 (सहयोग फ़ाउण्डेशन, मुंबई), सुपथगा सम्मान -1987 &#8211; सुपथगा संस्था (नई दिल्ली)। डी.ए.वी.गर्ल्ज़ कॉलेज, यमुनानगर द्वारा हिन्दी साहित्य मे योगदान के लिये सम्मानित (2007) आदि से नवाजा भी गया है l इनकी अन्य उपलब्धियों में  कथा यू.के. लन्दन के महासचिव, कथा यू.के. के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानन्द साहित्य सम्मान का ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स एवं हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आयोजन। लंदन, बर्मिंघम, यॉर्क, नॉटिंघम एवं वेल्स में कथा गोष्ठियों, कहानी कार्यशालाओं, एवं हिन्दी व कम्पयूटर कार्यशालाओं का आयोजन, टोरोंटो (कनाडा) में हिन्दी कहानी कार्यशाला का संचालन, दिल्ली, मुंबई, भोपाल, शिमला, यमुना नगर, फ़रीदाबाद, गया, वर्धा, लंदन, यॉर्क, बर्मिंघम, वेल्स, न्यूयॉर्क एवं टोरोंटो शहरों में कहानी पाठ। विश्व हिन्दी सम्मेलनों, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों, में भागीदारी एवं मह्त्वपूर्ण योगदान। दूरदर्शन के लिये शांति सीरियल का लेखन। अन्नु कपूर निर्देशित फ़िल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय। एकमात्र प्रवासी साहित्यकार जिसके संपूर्ण साहित्यवालोकन के लिये आलोचनात्मक ग्रंथ तेजेन्द्र शर्मा – वक़्त के आइने में प्रकाशित, जिसमें पैंतीस लेखकों एवं आलोचकों के लेख शामिल हैं (संपादक – हरि भटनागर)। दो वर्षों के लिये ब्रिटेन से प्रकाशित हिन्दी पत्रिका पुरवाई का संपादन, लंदन में हिन्दी फ़िल्मों पर आधारित साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन, कहानियों का ऑल इंडिया रेडियो, मुंबई, एवं दिल्ली व सनराइज़ रेडियो, लंदन से प्रसारण, बीबीसी लंदन (हिन्दी रेडियो), में तीन वर्ष तक समाचार वाचन, ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में वर्ष 1972 से ड्रामा वॉयस, लंदन में हिन्दी नाटकों में अभिनय एवं निर्देशन जिनमें से हास्य नाटक हनीमून एवं वन-एक्ट-प्ले वापसी की ख़ासी चर्चा हुई, लंदन, बर्मिंघम, यॉर्क, मैन्चेस्टर, डर्बी, त्रिनिदाद, टोरोंटो, न्यूयॉर्क, दुबई, भारत के बहुत से शहरों में कवि सम्मेलनों में भाग लेना शामिल है। प्रस्तुत है <span style="color: #993300;">ड़ॉ प्रीत अरोड़ा </span>की श्री तेजेन्द्र शर्मा से एक विशेष मुलाक़ात&#8230;&#8230;</span></h3>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">१)  प्रश्न&#8212;-    ऐसा माना जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, तो तेजेन्द्र जी आपका साहित्य इस उक्ति पर कितना खरा उतरता है ?</span><span style="font-weight: normal;"> </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर- साहित्य समाज का दर्पण होना चाहिये  – आपकी यह बात तो सही है। ऐसा होना ही चाहिये। मगर क्या ऐसा होता है? मुंबई मैं मैने 22 वर्ष बिताये। वहां का एक भी हिन्दी लेखक ऐसा नहीं है जिसका जन्म वहां हुआ हो। यानि कि सभी पहली पीढ़ी के प्रवासी ही वहां हिन्दी लिख रहे हैं। इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि मुंबई का पूरा का पूरा हिन्दी साहित्य प्रवासी साहित्य है। प्रवासी लेखकों की एक ख़ास पहचान होती है नॉस्टेलजिया। वे उस जीवन और समाज के बारे में सोचते हैं जिसे वे पीछे छोड़ आए हैं। शायद इसी लिये उनके साहित्य में उनका अतीत बहुत शिद्दत से उभर कर सामने आता है। जबकि होना यह चाहिये कि लेखक अपने आसपास के समाज के प्रति उदासीन ना हो। जब आप बंगला साहित्य पढ़ते हैं तो आप कोलकता जाए बिना उस शहर को भीतर तक महसूस कर सकते हैं। जबकि मुंबई के हिन्दी साहित्य के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। मुंबई का लेखक जब यू.पी. के किसान के बारे में लिखता है &#8211;  जिसे उसने कभी देखा महसूस नहीं किया &#8211; तो उसका साहित्य समाज का दर्पण कैसे बन सकता है। पिछले 12 वर्षों से मैनें यह मुहिम ब्रिटेन और अमरीका में चला रखी है कि हमें अपने अपनाए हुए देश के परिवेश, संघर्ष, रिश्तों और उपलब्धियों पर अवश्य लिखना चाहिये। जहां तक मेरे साहित्य का सवाल है, उसकी ख़ास बात रही मेरा एअर-इंडियन होना। उस नौकरी की वजह से मैं निरंतर विदेश यात्राएं करता था। जहां एक तरफ़ ईंटों का जंगल, एक ही रंग, किराए का नरक, मलबे की मालकिन, कैंसर, अपराध बोध का प्रेत जैसी कहानियां उस काल में लिखीं वहीं देह की क़ीमत, काला सागर, ढिबरी टाइट, उड़ान, भंवर, कोष्ठक जैसी कहानियां इस लिये लिख पाया क्योंकि एअर इंडिया की नौकरी ने एक भिन्न समाज से मेरा परिचय करवाया।  ब्रिटेन में बसने के बाद मेरी कहानियों में एक विशेष किस्म का परिवर्तन आया। अब मैं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने माहौल को समझने का प्रयास करने लगा। ब्रिटेन आने से पहले मेरे तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। अब नई चुनौतियां थीं, नया परिवेश और नया समाज। क़ब्र का मुनाफ़ा, अभिशप्त, ये क्या हो गया, पापा की सज़ा, छूता फिसलता जीवन, मुझे मार डाल बेटा, तरकीब, कोख का किराया, ज़मीन भुरभुरी क्यों है, कैलिप्सो, होमलेस, कल फिर आना जैसी कहानियां इसी काल में लिखी गई हैं। यानि कि मेरी कहानियां हर उस समाज का दर्पण बनी जहां जहां मैं रहा और जिसकी विशिष्टताओं को मैनें समझने का प्रयास किया। क़ब्र का मुनाफ़ा को कथाकार संपादक हरि भटनागर ने इंडिया टुडे के एक सर्वेक्षण में बीस वर्ष की बीस महत्वपूर्ण कहानियों में शामिल किया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(२) प्रश्न&#8211;जैसाकि आपने बहुत-से देशों  में भ्रमण किया है तो कौन-कौन से देश में नारी की स्थिति को देख कर आपने यह महसूस किया कि यहाँ नारी आज भी अशिक्षित, शोषित व मानवीय अधिकारों से वंचित दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत कर रही है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;बात यह है प्रीत कि सभी धर्मों और देशों में नारी का रुतबा हमेशा से दोयम दर्जे का रहा है। यहां तक कि ब्रिटेन में औरतों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति नहीं होती थी। एक औरत 110 वर्ष पहले रात भर ब्रिटिश संसद की एक अल्मारी में बंद रही ताकि सुबह होने पर अपना वोट डाल सके। शायद उस दिन से पश्चिमी देशों में नारी उत्थान का काम शुरू हो गया था। वैसे नारी को दबाने के लिये धर्म और संस्कृति का सहारा ही लिया गया है। कहीं स्त्री को चेहरा और शरीर छिपा कर रखना पड़ता है तो कहीं उसे संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता। पश्चिमी देशों की स्त्री अपने अधिकार मांगने लगी है शायद इसीलिये वहां विवाह नाम की संस्था की चूलें बुरी तरह हिल गई हैं। यहां अब गर्ल-फ़्रेण्ड और बॉय-फ़्रेण्ड इकट्ठे रहते हैं, बच्चे पैदा करते हैं और कई बार तो तीन तीन बच्चे होने के बाद शादी करते हैं। सिंगल मदर यानि के अकेली माताओं की इन देशों में अलग समस्या है। भारत की महिलाओं की समस्या अलग किस्म की है। जो अशिक्षित हैं, गांव में रहती हैं उन्हें शायद इस बात का ज्ञान भी नहीं हो पाता कि उनका शोषण हो रहा है। क्योंकि जब तक आपको ज्ञान नहीं होगा तब तक आपको महसूस भी कैसे होगा। जहां तक भारत के महानगरों की पढ़ी-लिखी नौकरी-पेशा नारियों का सवाल है, उनकी स्थिति शायद सबसे अधिक ख़राब है। वे बेचारियां अपने पति ही की तरह दफ़्तर जाती हैं, वहां मैनेजर या क्लर्क या जो भी नौकरी करती हैं। ठीक पति की ही तरह बसों और लोकल ट्रेन के धक्के खाती हैं। मगर शाम को वापिस घर आकर खाना बनाना उनका ही काम है। मेरे एक मित्र मुंबई में एक बैंक के जनरल मैनेजर हैं और उनकी पत्नी किसी सरकारी कम्पनी में हिन्दी अधिकारी हैं। मैं देखता हूं कि घर में पत्नी ठीक उसी तरह काम करती है जैसे कि कोई फ़ुल-टाइम हाउसवाइफ़ करती है और पति काम से घर लौट कर टीवी के सामने बैठ जाते हैं और मित्रों से फ़ोन पर बतियाने लगते हैं। भाई को ठीक से चाय तक बनानी नहीं आती। शिक्षा ही शायद मानसिकता को बदल पाएगी। ज़रूरी है मानसिकता को बदलना। पुरुष को समझना होगा कि नारी को बराबर का हक़ मिलना ही चाहिये। नारी भी आज पुरूष की ही तरह काम करती है, मेहनती है, ईमानदार है और कमाल तो यह है कि उतनी ही भ्रष्ठ भी है। आहिस्ता आहिस्ता यह बराबरी सामने आने लगेगी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(३) प्रश्न&#8212;आप कहानीकार भी हैं और कवि भी .आपकी नज़र में कहानी लिखना मुश्किल है या छंदोबद्ध कविता ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; पहले आपके सवाल पर टिप्पणी करना चाहूंगा। मैं अपने आप को कहानीकार मानता हूं मगर कवि नहीं। हां मैं कविता एवं ग़ज़ल लिखने का प्रयास अवश्य करता हूं किन्तु मेरा स्वभाव एक कवि का स्वभाव नहीं है। छंदोबद्ध कविता तो लगभग ग़ायब ही हो गई है। और केवल भारत से ही नहीं टी.एस.ईलियट और डब्ल्यू. एच. ऑडेन के बाद से पूरे विश्व में जैसे छंद की हत्या कर दी गई है। भारत में तो छंदबद्ध कविता लिखना अपराध ही मान लिया गया है। छंद के लिये शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान और अभ्यास की आवश्यक्ता पड़ती है। याद रहे कि तुकांत कविता और तुकबंदी में बहुत अंतर होता है। जब छंद का स्थान तुकबंदी ने ले लिया तो छंदबद्ध कविता अपना स्थान खो बैठी। कविता के लिये प्रतिभा की आवश्यक्ता होती है। जबकि कहानी केवल प्रतिभा से नहीं लिखी जा सकती। कविता सांकेतिक होती है। बिम्ब और कल्पनाशक्ति उसमें महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कहानी में समग्रता होती है। कहानी के विषय समाज की ठोस समस्याओं से जुड़े होते हैं और चरित्रों एवं परिवेश के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और अन्याय का अनावरण किया जाता है। मैं अपनी कहानियों में हमेशा अन्याय के विरुद्ध कमज़ोर व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देता हूं। कविता भावनाओं का त्वरित अधिप्रवाह है तो कहानी रिश्तों और समस्याओं की तर्कसम्मत प्रस्तुति। मैं कहानी में समस्याओं का हल प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूं। यह काम समाज सुधारकों का है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(४) प्रश्न&#8211;आज ई-पत्रिकाओं और ई-पुस्तकों का प्रचलन बढ़ रहा है और समय के अभाव के कारण मुद्रित पत्रिका में प्रकाशित एक कहानीकार की कहानी का पाठक स्वयं लेखक ही बन रहा है ? तो ऐसे में मुद्रित पत्रिकाओं और पुस्तकों का भविष्य क्या है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; यह सवाल बहुत मज़ेदार है। हिन्दी का कहानी लेखक हमेशा ही बेचारा रहा है&#8230; धर्मयुग, सारिका और साप्ताहिक हिन्दुस्तान बंद होने के बाद उसके छपने के लिये केवल लघु पत्रिकाएं ही बचती हैं। यह पत्रिकाएं तीन सौ से लेकर एक हज़ार के बीच ही छपती हैं। हंस और पाखी शायद इसका अपवाद हों। हिन्दी साहित्य के मठाधीशों ने कहानीकारों पर रोक लगा रखी है कि मेरी सहेली, गृहशोभा जैसी व्यवसायिक पत्रिकाओं में रचना भेजी तो उसे साहित्य का दर्जा नहीं मिलेगा। समाचार पत्रों में भी जनसत्ता के अतिरिक्त किसी और अख़बार में छपना मना है। बेचारा कहानीकार इन मठाधीशों को ख़ुश करने के लिये ऐसी पत्रिकाओं में छपने के लिये बाध्य हो जाता है जो लेखकों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं, लेखक ही उसमें छपते हैं और लेखक ही उसे पढ़ते भी हैं। हिन्दी में ई-पुस्तकें अभी अपने शैशव काल में हैं। याद रखिये भारत में हिन्दी आज भी ग़रीब की भाषा है या फिर नारियों की। महानगरीय नई पीढ़ी का हिन्दी से कुछ ख़ास लेना देना नहीं। कम्पयूटर अपेक्षाकृत अमीर लोगों का खिलौना है जिनके घरों में अंग्रेज़ी का राज होता है। इसलिये ई-पत्रिकाएं भी अधिकतर लेखक ही चलाते हैं, लेखक ही लिखते हैं और लेखक ही पढ़ते भी हैं। जिनके पास छपा हुआ साहित्य पढ़ने का समय नहीं है, वे भला कम्पयूटर पर हिन्दी पढ़ने के लिये कैसे समय निकाल सकते हैं। अंग्रेज़ी में किंडल बुक्स (इलेक्ट्रॉनिक) आने के बावजूद साहित्य लिखने और छपने में कोई कमी नहीं आई। बुकर सम्मान के लिये आज भी अच्छी अच्छी किताबें मिलती हैं। हिन्दी की मुद्रित पुस्तकों के लिये निजि पाठकों की बहुत कमी हो गई है। उसका कारण है प्रकाशकों का रवैया। प्रकाशक हिन्दी पुस्तकों को डम्प करता है। निजी पाठकों तक हिन्दी की पुस्तकें नहीं पहुंच पाती हैं। कोई ऐसी दुकानें नहीं हैं जहां आप आसानी से हिन्दी की पुस्तकें ख़रीद सकें। ई-पत्रिकाएं क्योंकि अप्रकाशित रचनाओं की शर्त नहीं रखती हैं इसलिये उन्हें मुफ़्त रचनाएं मिल जाती हैं। ई-पत्रिकाएं और ई-पुस्तकें मुद्रित पत्रिकाओं और पुस्तकों के लिये ख़तरा नहीं हैं, बल्कि उनकी पूरक हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(५) प्रश्न- तेजेन्द्र जी किसी भी उभरते हुए लेखक को शुरूआती दिनों में अपनी कृति को प्रकाशित करवाने के लिए प्रकाशकों की जटिल प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है.मेरा अनुभव भी कटु है.इस बारे में आप अपने निजी अनुभव पाठकों के साथ साझा कीजिए ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, मेरा किस्सा थोड़ा अलग किस्म का है। मैंने अपनी पहली हिंदी  कहानी लिखी 1980 में।  उस से पहले मैं अंग्रेज़ी में लिखा करता था। पहली हिंदी कहानी लिखने में सहायता की इंदु जी (मेरी पत्नी) ने। और मैं सुलेख में लिख कर अपनी कहानी ले कर पहुँच गया नवभारत टाइम्स, मुंबई (उस समय बॉम्बे)  के दफ़्तर। वहां नवभारत टाइम्स के रविवार संस्करण में रविवार्ता के संपादक विश्वनाथ सचदेव से मिला और उनको कहानी दे दी। उन्होंने रख ली और 3 या 4 सप्ताह में  मेरी पहली कहानी प्रतिबिम्ब प्रकाशित  हो गयी।। कोई बखेड़ा नहीं। मेरी दूसरी ही कहानी उड़ान (जो कि एक एअर होस्टेस के जीवन पर आधारित थी) को  डॉक्टर देवेश ठाकुर   ने वर्ष 1982 की सर्श्रेष्ठ कहानियों में शामिल कर लिया। हौसला बढ़ गया। काला सागर  कहानी को आलोचकों ने सराहा। जब 10 कहानियां  हो गयीं तो  फ़ाइल ले कर सीधे वाणी प्रकाशन, दिल्ली  पहुँच गया। उस समय वाणी के मालिक अशोक महेश्वरी और अरुण महेश्वरी बंधू थे।  उन्होंने फ़ाइल रख ली और इंतज़ार करने को कहा। बाद में पता चला कि उन्होंने फाइल डॉक्टर प्रभाकर माचवे को भेज दी थी। माचवे जी ने कहानियों को पढ़ा और अपनी तरफ से पास कर दिया। और मेरा पहला कहानी संग्रह काला सागर प्रकाशित हो गया। सोच कर रोमांच होता है कि मेरे पहले कहानी संग्रह की कीमत केवल तीस रुपये थी।  हाँ मुझे उन पत्रिकाओं ने कभी नहीं छापा  जो किसी विचारधारा विशेष से सम्बन्ध रखती थीं जैसे कि पहल आदि। मगर मैं धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, हंस, कादम्बिनी, सबरंग आदि में खूब छपा।  मैं शायद एक नए लेखक के शुरुआती दिनों के संघर्ष के रोमांच से वंचित रह गया। वाणी प्रकाशन से एक अपनेपन का रिश्ता सा बन गया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(६) प्रश्न&#8211;आज साहित्य में प्रसिद्धि और पैसे की दौड़ में अश्लील और उत्तेजित भाषा का प्रयोग करके दैहिक विमर्श व सत्ता विमर्श जैसे बाजारू एवं भ्रष्ट मुद्दों को भी उठाया जा रहा है जिससे लेखन भी अब एक व्यापार का रूप धारण करता जा रहा है। लेकिन मेरा यह मानना है कि इन विषयों के इलावा भी कई ऐसे अन्य विषय हैं जैसे&#8211; भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आंतकवाद, ग़रीबी, बुढ़ापा, नारी के मानवीय अधिकार, बाल-अपराध व पतित युवा पीढ़ी जिनपर लिखकर एक आदर्श एवं उन्नत समाज की स्थापना की जा सकती है.इस बारे में अपनी राय बताएँ ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; आप को शायद याद हो या नहीं कह नहीं सकता;  डी. एच. लारेंस ने   लेडी चैटर्लीज़ लवर 1928 में लिखी थी और तुरंत उस पर बैन लग गया था। उसे  अश्लील और उत्तेजित भाषा का प्रयोग करने वाला उपन्यास घोषित कर दिया गया। मगर आज वही उपन्यास एक क्लासिक कृति कहलाता है। यही बात मंटो के साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। मंटो की कहानियों को भी अश्लील कहा गया और उन पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया। मगर आज वही कहानियां महान हो गई हैं। एक ख़ास विचारधारा के लेखकों ने साहित्य को भ्रष्टाचार, मज़ूदर, किसान और बाज़ारवाद तक सीमित कर दिया था। महत्वपूर्ण लेखक वही हैं जो किसी थीम विशेष से बंध कर नहीं लिखता। महत्वपूर्ण यह है कि लेखक अपने लेखन को लेकर कितना गंभीर है। अपनी कहानियों से उदाहरण नहीं दूंगा, अन्यथा आत्म-प्रचार का दोष मेरे सिर लगा दिया जाएगा। मगर मैं जितने भी गंभीर आलोचकों की तरफ़ देखता हूं, वे सब महत्वपूर्ण लेखकों पर लिख रहे हैं। जमशेदपुर की विजय शर्मा ने हाल ही में दो महत्वपूर्ण लेख लिखे थे – प्रवासी कहानी में वृद्धावस्था और प्रवासी कहानी में युवावस्था। यानि कि वह वर्तमान कहानियों में यह विषय देख रही हैं। पाखी, नया ज्ञानोदय, हंस, कथा देश, आधारशिला, लम्ही, कथाबिम्ब जैसी बहुत सी पत्रिकाएं हैं जिनमें लगभग सभी विषयों पर कहानियां मिल जाती हैं। हिन्दी साहित्य में पैसा कहां है, मैं नहीं जानता। हां फ़िल्म और टीवी में लिखने पर ज़रूर पैसा मिलता है। मैं जानता हूं क्योंकि जब भारत में था, शांति सीरियल के लिखने में भागीदारी की थी। मगर जहां तक साहित्यिक लेखन का सवाल है वहां पैसे और प्रसिद्धि की दौड़ जैसी कोई चीज़ नहीं है। साहित्यिक लेखन कभी समाज में बदलाव नहीं लाता, उसके लिये जागरूक पत्रकारिता काम आती है। किसी भी भारतीय भाषा का कोई भी लेखक क्रांति नहीं ला पाया। हां यह सच है कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के समय कुछ ऐसे गीत अवश्य लिखे गये जो कि हमारे जांबाज़ों का हौसला बढ़ाते थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(७ )प्रश्न&#8211; आप गज़ल भी लिखतें हैं.गज़ल लिखने के लिए उर्दू भाषा का ज्ञान अनिवार्य है I आपने उर्दू की शिक्षा कहाँ से प्राप्त की है और गज़ल लिखने का शौक आपको कब और कैसे पैदा हुआ ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, जो लोग हिन्दी में हाइकू लिखते हैं क्या आपने उनसे कभी पूछा है कि उनको जापानी आती है या नहीं? क्या आपने गुजराती, पंजाबी या मराठी में ग़ज़ल लिखने वालों से पूछा है कि उन्हें उर्दू भाषा का ज्ञान है या नहीं? उनका जवाब बहुत सरल होगा – कि उन्होंने विधा उधार ली है, भाषा नहीं। ठीक उसी तरह हिन्दी में भी हमने ग़ज़ल विधा की तकनीक उधार ली है। बहर, वज़न आदि उर्दू से लिये हैं मगर भाषा हमारे पास है। हम ग़ज़ल को अपनी भाषा में लिखेंगे। यह जो सोच बनी हुई है कि ग़ज़ल लिखने के लिये उर्दू का ज्ञान ज़रूरी है, इसी कारण हिन्दी ग़ज़ल का कोई स्वरूप उभर नहीं पाया। हम भी उर्दू वालों की तरह ‘मेरा’ और ‘तेरा’ को ‘मिरा’ और ‘तिरा’ लिखने लगे हैं। भला ‘मिरा’ और ‘तिरा’ क्या हिन्दी के शब्द हैं? हमारी भाषा में मात्रा गिराने का रिवाज़ नहीं है तो हम क्यों ऐसा करें। हमें वज़न पूरा करने के लिये ऐसी ख़ुराफ़ातें उधार नहीं लेनी। हमारी भाषा में ‘सुबह’ को ‘सुभ’ नहीं बनना। अब आपके सवाल का दूसरा हिस्सा। मैनें उर्दू की बाक़ायदा शिक्षा नहीं ली। मेरे पिता स्वयं उर्दू में शायरी भी करते थे और कहानियां एवं उपन्यास भी लिखते थे। व  पंजाबी भी उर्दू में ही लिखते थे। घर में उर्दू का माहौल था। बस कब उर्दू के शब्द मेरी शब्दावली में शामिल हो गये। मुझे दोहा और ग़ज़ल इस लिये अच्छे लगते हैं क्योंकि दो पंक्तियों में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है। दोहे कभी लिख नहीं पाया मगर ग़ज़ल अपने आप को लिखवा लेती है। मुझे लगता है कि अभी हिन्दी ग़ज़ल को अपना स्थान बनाने में काफ़ी समय लगेगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(८ )प्रश्न&#8211; आप कथा यू.के के साथ कब और कैसे जुड़े ? इसमें आपकी क्या भूमिका है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; कथा यू.के. का जन्म इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट के रूप में मुंबई में हुआ जहां यह एक रजिस्टर्ड ट्रस्ट है। ट्रस्ट के तीन फ़ाउण्डर ट्रस्टी थे – पत्रकार राहुल देव, पत्रकार एवं कवि विश्वनाथ सचदेव, एवं फ़िल्म अभिनेता नवीन निश्चल। मैं स्वयं ट्रस्ट का मैनेजिंग ट्रस्टी था। इस ट्रस्ट की स्थापना मेरी दिवंगत पत्नी इंदु जी की याद में किया गया जिनका कैंसर से असामयिक निधन हो गया था। ट्रस्ट ने शुरूआत में चालीस वर्ष से कम उम्र के कहानीकारों का सम्मान करने की योजना बनाई और 1995 से 1999 के बीच यह कार्यक्रम मुंबई के एअर इंडिया ऑडिटोरियम में ही किया गया। मेरे ब्रिटेन में बस जाने के बाद वर्ष 2000 से ट्रस्ट के नाम में परिवर्तन किया गया और कथा यूके सामने आई। मैं इस संस्था का महासचिव हूं। काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी इसकी संरक्षक हैं और हाल ही में वरिष्ठ मीडिया हस्ती श्री कैलाश बुधवार ने कथा यू.के. के अध्यक्ष का पद संभाला है। वर्ष 2000 से सम्मान के लिये आयु सीमा हटा दी गई है और कहानी के साथ साथ उपन्यास भी सम्मान के लिये शामिल कर लिये गये हैं। वर्ष 2000 से ही ब्रिटेन में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के लिये पद्मानंद साहित्य सम्मान की भी स्थापना की गई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(९ ) प्रश्न&#8211; भारत में हर शहर में संस्थाएं हैं जो साहित्यिक पुरस्कार देती हैं .इंदु शर्मा कथा सम्मान और पद्मानंद साहित्य सम्मान देने के पीछे आपका क्या उद्देश्य है?</span><br />
<span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8211; प्रीत जी, आपने बिल्कुल ठीक कहा कि भारत में पहले से इतने साहित्यिक सम्मान पहले से दिये जा रहे हैं, तो फिर हमारे सम्मान क्यों। वैसे अब इंदु शर्मा कथा सम्मान को भी 17 साल हो चुके हैं। और तीन वर्षों बाद बीसवां सम्मान समारोह होगा। यानि कि अब हमें भी काम करते हुए कुछ समय तो हो ही गया है। जब पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया था तो उसके पीछे कुछ अलग किस्म की सोच थी। इंदु जी का निधन उनके चालीस वर्ष पूरे करने से पहले ही कैंसर से हो गया था। उन्होंने मुझे कहानी लिखना सिखाया था। मुझे महसूस होता था कि मैं तो भाग्यशाली था कि मुझे जीवन में इंदु जी मिलीं। मगर हर युवा लेखक तो इतना भाग्यशाली नहीं हो सकता। इसलिये मैं हर लेखक में टुकड़ा टुकड़ा इंदु बांट रहा था। यह सम्मान चालीस वर्ष से कम उम्र के कथाकारों के लिये शुरू किया गया। जब मैं ब्रिटेन में बसने के लिये आ गया तो सम्मान का स्वरूप बदल गया। अब मेरी चाहत हुई कि इसे हिन्दी के बुकर सम्मान का दर्जा मिलना चाहिये। आयु सीमा हटा दी गई और कहानी के साथ उपन्यास भी शामिल कर दिया गया। यह सम्मान शायद हिन्दी के एकमात्र विश्वसनीय सम्मान के रूप में उभर कर सामने आया है। इसका आयोजन हर साल ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्डस या हाउस ऑफ़ कॉमन्स में किया जाता है। भारतीय उच्चायोग इस सम्मान के साथ संपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है।  पद्मानंद साहित्य सम्मान मूलतः ब्रिटेन में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य का आकलन है और उसे विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रयास है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१०) प्रश्न&#8211;   विदेशों में रह रहे हिंदी रचनाकारों की रचनाओं के साथ प्रवासी शब्द का उपयोग किया जाता है हिंदी की कई पत्रिकाओं में। क्या आप इससे सहमत हैं या असहमत ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;यह सवाल मेरे दिल के बहुत निकट है। मैंने पहली बार दुबई में हुए खाड़ी सम्मेलन में यह सवाल उठाया था कि क्या दुनियां की किसी भी और भाषा में प्रवासी साहित्य पाया जाता है? ब्रिटेन, हॉलेण्ड, फ़्रांस, पुर्तगाल आदि ने विश्व भर में अपनी कॉलोनियां बनाईं। क्या उनकी भाषाओं में प्रवासी साहित्य मौजूद है। विश्व के हर बड़े शहर में एक चाइना टाउन होती है। क्या चीनी भाषा में प्रवासी साहित्य मौजूद है। फिर हिन्दी की यह समस्या क्यों है? विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य को सीधा सादा हिन्दी साहित्य मानने में क्या अड़चन है। दरअसल हिन्दी साहित्य पहले ही ख़ांचों में बंटा हुआ है – कहीं स्त्री लेखन है तो कहीं दलित लेखन। अब यह प्रवासी साहित्य का शोशा। दरअसल प्रवासी साहित्य तो सीधा सादा व्यापार का सिलसिला बन गया है। उन्हें हिन्दी के बाज़ारवाद में भुनवाया जा रहा है। प्रवासी विशेषांक, प्रवासी सम्मेलन आदि आदि। क्या मॉरीशस, सुरीनाम, अमरीका, फ़िजी, ब्रिटेन, युरोप, खाड़ी देशों का हिन्दी साहित्य एक सा ही है जिसे प्रवासी शीर्षक के तले रखा जा सके। मुझे तो लगता है कि यह एक षड़यंत्र है ताकि विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को मुख्यधारा के साहित्य से अलग रखा जा सके। जब हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जाए तो विदेशों में लिखने वालों को केवल एक पैराग्राफ़ में निपटा दिया जाए। मुझे लगता है कि साहित्य जहां जहां रचा जा रहा है, उसमें वहां की सुगन्ध और स्वाद आना चाहिये। हमारे लेखन को पत्रिकाओं के नॉर्मल अंकों में छापा जाए। हमें प्रवासी विशेषांकों का मोहताज ना बनाइये।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(११) प्रश्न&#8211;क्या आप विदेश में रहकर वहाँ की संस्कृति,सभ्यता,रीति-रिवाज और भाषा से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस कर पाते हैं ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211;पहली पीढ़ी के प्रवासी के लिये यह आसान नहीं होता कि वह अपने अपनाए हुए देश की संस्कृति, सभ्यता और रीति-रिवाज से पूरी तरह जुड़ पाए। उसकी जड़ें अपनी मातृभूमि, संस्कारों एवं भाषा से जुड़ी होती हैं। उससे इस बात की अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिये। हां यह आवश्यक है कि उसे इन सब बातों के प्रति कोई रिज़र्वेशन भी नहीं होनी चाहिये। सौभाग्यवश मैं जिस देश में रहता हूं वहां की भाषा मुझे स्थानीय लोगों से बेहतर आती है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी में की है। शायद वही मेरे काम भी आ रही है। सच तो यह है कि स्थानीय लोग कभी कभी मेरे अंग्रेज़ी ज्ञान के प्रति ईर्ष्या व्यक्त कर चुके हैं। लंदन में विविधता इतनी है कि कोई एक सभ्यता ना तो दिखाई देती है और ना ही सुनाई। यदि हमें इंगलैण्ड की पुरानी परंपराओं को समझना है तो हमें बड़े शहरों से बाहर जाना होगा। मैं ब्रिटेन की कुछ बातों का क़ायल हूं। यहां आम आदमी की बहुत क़दर है। यहां इन्सान को इन्सान समझा जाता है। यहां टुच्चा भ्रष्टाचार नहीं है। एक हज़ार पाउण्ड के घोटाले के लिये भी सांसदों को त्यागपत्र देना पड़ता है बल्कि जेल तक भी हो गई है। विकलांगों के लिये जो सुविधाएं यहां मौजूद हैं उनको देख कर लगता है कि ना जाने हम किस ग्रह पर रह रहे हैं। हम जिस भारतीय संस्कृति की डींगें मारते हैं, वो संस्कृति यहां प्रेक्टिकल रूप में दिखाई दे जाती है। सच्चा समाजवाद अगर कहीं देखा है तो सामंतवाद के इस गढ़ में देखा है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१२) प्रश्न&#8211; आपके द्वारा रचित पुस्तकों के बारे में बताएँ (चाहे वे कहानी-संग्रह ,कविता संग्रह,समीक्षात्मक पुस्तकें ही क्यों न हो ); और इन पुस्तकों में किन-किन विषयों को लिया गया है?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;प्रीत जी तरीके से तो आपको स्वयं मेरी रचनाओं के बारे में मुझे बताना चाहिए कि आप को कैसी लगती हैं। फिर भी आप को बता देता हूँ कि आज तक जो मेरे कहानी संग्रह छपे हैं उनके नाम हैं काला सागर, ढिबरी टाईट, देह की कीमत, ये क्या हो गया, बेघर आँखें, क़ब्र का मुनाफ़ा, और सीधी रेखा की परतें ( जिस में मेरे पहले तीन कहानी संग्रह समग्र भाग-1 के तौर पर छपे हैं)। एक कहानी संग्रह दीवार में रास्ता प्रकाशक के पास प्रकाशनार्थ पड़ा है जिसमें 16 कहानियां शामिल हैं जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरा एक कविता और ग़ज़ल संग्रह भी प्राकशित हो चुका है जिसका नाम है ये घर तुम्हारा है। मैंने चार पुस्तकों का सम्पादन किया है जिस में प्रवासी कविता, ग़ज़ल  और कहानी के संकलन शामिल हैं। मेरे कुछ अन्य भाषाओँ में भी कहानी संकलन प्रकाशित हो चुके हैं &#8211; ईंटों का जंगल (उर्दू), पासपोर्ट का रङहरू (नेपाली), ढिबरी  टाईट एवं कल फेर आंवीं (पंजाबी)। अंग्रेजी में मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ब्लैक एंड वाईट (एक बैंकर की जीवनी), लॉर्ड बायरन, जॉन कीट्स । वैसे एक आलोचनात्मक ग्रन्थ मेरे साहित्य पर भी प्रकाशित हो चुका है तेजेंद्र शर्मा &#8211; वक़्त के आइने में जिसका सम्पादन कथाकार हरी भटनागर ने किया है। मेरे लेखन कि एक विशेषता ही कि मैं विजेता के साथ जश्न नहीं मना पाता। मैं हमेशा अपने आप को हारे हुए इंसान के साथ खड़ा पाता हूँ। ब्रिटेन में बसने के बाद मेरे साहित्य के विषयों में बदलाव आया है। आज मैं विदेशों में बसे भारतीयों की समस्याओं, उपलब्धिओं और संघर्ष की ओर अधिक ध्यान देता हूँ। मैं देखता हूँ कि मेरे चारों ओर जीवन अर्थ से संचालित है, रिश्तों में खोखलापन समा रहा है, बाज़ारवाद इंसान कि सोच को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। पैदा होने से मृत्यु तक हम कैसे बाज़ार के नियमों तले दब रहे हैं, ये सब मेरे साहित्य में परिलक्षित होता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१३) प्रश्न&#8212; टेलीविज़न के बहुचर्चित सीरियल शांति में आपका क्या योगदान रहा है ? क्या इससे आपको प्रसिद्धि प्राप्त हुई ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; हुआ यूं कि मेरे मित्र दिनेश ठाकुर को शांति सीरियल के मुख्य पात्र का रोल करने को कहा गया। जो कलाकार पहले रोल कर रहा था उसकी टी.आर.पी. में कुछ कमी आ गई थी। दिनेश ने यू.टी.वी. को मेरा नाम सुझाया। वैसे भी वे लोग किसी साहित्यिक लेखक को अपनी टीम में शामिल करना चाहते थे। मुझे इससे पहले टी.वी. लेखन का कोई अनुभव नहीं था। मैनें कभी भी फ़िल्मी लेखन को साहित्य के मुक़ाबले दोयम दर्जे का नहीं माना। मुझे लगता है कि दोनों तरह के लेखन एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं। मैं प्रेमचन्द की सोच से इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि साहित्य दूध होने का दावेदार है जबकि सिनेमा ताड़ी या शराब की भूख को शान्त करता है। मैं कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी को इस मामले में आदर्श मानता हूं जिन्होंने साहित्य और सिनेमा में एक ख़ूबसूरत समन्वय बना कर रखा। मुझे एपिसोड लिखने का काम मिला। हम तीन लेखक आपस में बांट कर एपिसोड लिखा करते थे। समीर की कहानी थी और हम तीनों उस कहानी से एपिसोड बनाते थे। मुझे कोर्ट के सीनों का एक्सपर्ट माना जाता था। मुझे इस सिलसिले में एक वकील के साथ प्रशिक्षण के लिये भी भेजा गया। शुरू शुरू में मेरे निर्देशक ने शिक़ायत की कि मैं लम्बे लम्बे संवाद लिखता हूं। उसका कहना था कि उसे कैमरा रखने में मुश्किल होती है। तीन तीन कैमरे काम कर रहे हैं, अगर डॉयलॉग छोटे होंगे तो उसे कैमरा प्लेस करने में अधिक सुविधा होगी। मेरी केवल एक ही शर्त थी कि यदि मेरा लिखा हुआ बदलना है तो वह मैं ही बदलूंगा। कोई कलाकार या निर्देशक नहीं। मेरी यह बात उन्होंने मान ली। शांति के बाद की मेरी कहानियों में आप संवादों का अच्छा इस्तेमाल पाएंगे। मुझे लगता है कि संवाद बहुत बार कहानी को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं। मेरे लिखे हुए संवाद भी जीवन से जुड़ी भाषा में होते थे। मैं राजकुमार टाइप भारी भरकम डॉयलॉग में विश्वास नहीं रखता। फिर भी कभी कभी सीन की मांग पर ऐसा करना पड़ता था। प्रसिद्धि अवश्य मिली लेकिन उस प्रसिद्धि को कैश करने से पहले ही मैं भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा बन गया&#8230;. यानि कि लंदन में बसने के लिये आ गया। मगर आज भी जिन लोगों ने शांति सीरियल देख रखा है उनको जब पता चलता है कि मैं भी उसके लेखन से जुड़ा था, तो अचानक उनकी आंखों में मेरे प्रति आदर बढ़ जाता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१४) प्रश्न&#8212;आज की हिंदी आलोचना के बारे में आपका क्या विचार है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; हमारी पीढ़ी के साहित्यकारों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने अपने आलोचक नहीं पैदा किये। हम आज भी उन्हीं आलोचकों की ओर देखते हैं जो कि पिचहत्तर और अस्सी पार कर चुके हैं। एक लम्बे अर्से से हिन्दी साहित्य में आलोचना किसी गुट विशेष के लेखकों को उछालती रही है। यदि आप उस विचारधारा के गुट के हैं तो आपके साहित्य की समीक्षा होगी, आपकी चर्चा होगी वर्ना आप जगदीश चंद्र, पानू खोलिया, सुरेन्द्र अरोड़ा की तरह गुमनाम रह जाएंगे। मुझे याद पड़ता है एक पत्रिका हुआ करती थी ‘पहल’। उसके संपादक उस पत्रिका में एक सूचना प्रकाशित किया करते थे – ‘कृप्या हमें रचना ना भेजें। यदि हमें आवश्यक्ता होगी तो हम स्वयं आपसे रचना मंगवा लेंगे।’ यानि कि वे किसी विचारधारा विशेष की रचनाएं ही छापना चाहते थे। आलोचना आपके लिखे साहित्य की नहीं होती। आलोचना आपकी निजि सोच, निजि विचारधारा की होती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि आपकी समीक्षक के साथ कैसी पहचान है। जबसे मुख्यधारा सिमट कर पांच सात सौ लोगों तक रह गई है, लेखक ही पाठक भी बन गये हैं। साहित्य का जनाधार लगभग समाप्त हो चुका है। मुझे एक कहानी याद आती है ‘कामरेड का कोट’। उस कहानी को इतना उछाला गया कि उसका लेखक उसके बाद कुछ नहीं लिख पाया। पिछली तीन पीढ़ियां नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव से शाबाशी पाने की लालसा में साहित्य रचती रही है। जमशेदपुर की विजय शर्मा, दिल्ली के अजय नावरिया और साधना अग्रवाल व वर्धा के शंभु गुप्त में संभावनाएं हैं कि यदि वे आलोचना को गंभीरता से लें, तो हमारी पीढ़ी को सशक्त आलोचक मिल सकते हैं। पुरानी पीढ़ी नये साहित्य को भी पुरानी दृष्टि से देखती है। हमारे सरोकार उन तक पहुंच नहीं पाते। और ख़ास तौर पर प्रवासी सरोकार तो पुरानी पीढ़ी के आलोचकों की समझ के दायरे में बिल्कुल नहीं आते।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१५) प्रश्न&#8212; तेजेन्द्र जी जो भारतीय परिवार विदेशों में जाकर पूर्ण रूप से बस गए हैं ? क्या उन परिवारों के बुजुर्गों को एंकाकीपन खलता है ? इस बारे में आपकी क्या राय है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; आपने बहुत सही सवाल पूछा है। आपके सवाल के दो पहलू हैं। एक जो भारतीय परिवार विदेशों में जा कर बस गये हैं उन परिवारों के बुज़ुर्गों को विदेश में एकाकी पन खलता है? और दूसरा पहलू है कि जो भारतीय परिवार विदेशों में जा कर बस गये हैं उन परिवारों के बुज़ुर्गों को भारत में एकाकीपन खलता है? दोनों ही स्थितियां बुज़ुर्गों के लिये सहानुभति पैदा करती हैं। बच्चों के विदेश में बस जाने के बाद जब मां बाप अकेले भारत में रह जाते हैं तो उनके अकेलेपन की ख़लिश उन्हें कचोटती रहती है। बच्चे पैसे भेज कर अकेलेपन की भरपाई करते हैं। मगर यह मां-बाप के ख़ालीपन को भर नहीं पाता। किन्तु मां बाप के पास एक तसल्ली होती है कि वे अपनी ज़मीन से कटे नहीं होते। उसी जगह रह रहे होते हैं जहां कभी उन्होंने संघर्ष किया था और उनके संघर्ष के साथी, पड़ोसी उनका साथ देते हैं। विदेश में स्थिति और भी भयावह है। वहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी इतनी आत्ममगन है कि बूढ़े दादा दादी बहुत अकेले पड़ जाते हैं। वे बातचीत का हिस्सा बनना चाहते हैं मगर घर की नकारा वस्तुओं की  तरह महसूस करने लगते हैं। अब क्योंकि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोग ख़ासी बड़ी संख्या में बस गये हैं; सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियां बढ़ गई हैं; इसलिये हमारे बुज़ुर्ग किसी न किसी तरह अपने आपको व्यस्त रख पाते हैं। बहुत से भारतीय बुज़ुर्गों की दोहरी समस्या है। उनका प्रवासन पहले भारत में हुआ जब पाकिस्तान बना या वे प्रवास करने अफ़्रीका गये। उनका दूसरा प्रवासन हुआ जब उनकी अगली पीढ़ी विदेश रहने आ गई या फिर इदी अमीन ने उनको अफ़्रीका से निकाल फेंका। यह दोहरे प्रवासन की मार का असर बहुत गहरा है। मगर फिर भी शारीरिक तौर पर स्वस्थ बुज़ुर्ग अपने आपको किसी ना किसी सामाजिक काम से जोड़े रखते हैं। मैं कुछ ऐसे लोगों से परिचित हूं जो कि उम्र में सत्तर साल से अधिक हैं और वे सप्ताह में एक या दो दिन हस्पतालों में जाकर वॉलंटीयर का काम करते हैं और मरीज़ों की सहायता करते हैं। वैसे अकेलापन मैनें स्थानीय अंग्रेज़ों के बुज़ुर्गों में कहीं अधिक देखा है, जिनके बच्चे उन्हें केवल मदर्ज़ डे, फ़ादर्ज़ डे या फिर क्रिसमिस पर ही याद करते हैं। वर्ना वे ओल्ड पीपल्ज़ होम में जीवन बिता देते हैं – चेहरों पर एक अजीब सा ख़ालीपन लिये।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१६) प्रश्न&#8212;&#8211; आपने बिल्कुल ठीक  कहा कि बुजुर्ग वर्ग ओल्ड पीपल्ज़ होम में जीवन बिता देतें हैं – चेहरों पर एक अजीब सा ख़ालीपन लिये, पर क्या विदेश में ऐसी कोई संस्थाएँ हैं, जो युवा वर्ग को अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए शिक्षाप्रद कार्यक्रम करती हो जिससे वे भारतीय सँस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रख सकें.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8211;बात यह है प्रीत कि ओल्ड पीपल्ज़ होम बनाए ही इसीलिये गये थे क्योंकि ब्रिटेन के स्थानीय बूढ़े मांबाप को उनके बच्चे अकेला छोड़ अपनी ज़िन्दगी जीना शुरू कर देते थे। सरकार ने सोचा कि बूढ़े मां बाप अकेले सड़कों पर जीने को मजबूर न हो जाएं इसलिये उनके रहने के लिये प्रावधान किया गया। वहीं एक दूसरे तरह के भी ओल्ड पीपल्ज़ होम मौजूद हैं जहां बूढ़े मां बाप के बच्चे हर महीने के पैसे देते हैं और उनकी देखभाल वहां करवाते हैं। इसका कारण यह है कि बेटा और बहू नौकरी करते हैं और अपने बूढ़े मांबाप को अकेला घर में नहीं छोड़ना चाहते। ब्रिटेन में क़रीब 20 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। अभी यह नहीं देखा गया कि भारतीय मूल के मां बाप बड़ी संख्या में ओल्ड पीपल्ज़ होम में दिखाई दे रहे हों। यह एक स्थानीय समस्य़ा है जो आहिस्ता आहिस्ता भारतवंशियों तक पहुंच रही है। जहां तक भारतीय संस्कृति और संस्कारों की बात है तो भारतीय विद्या भवन के साथ साथ ऐसी बहुत से संस्थाएं हैं जो कि इस सब के लिये काम कर रही हैं। यहां मंदिर और गुरूद्वारे केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं। यह सामुदायिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं का काम भी निभाती हैं। कथा यू.के. हिन्दी साहित्य के लिये काम कर रही है तो यू.के. हिन्दी समिति हिन्दी शिक्षण के प्रति कटिबद्ध है। भारतीय उच्चायोग इसमें बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। पिछले वर्ष उच्चायोग ने स्वतंत्रता दिवस को भी आम भारतवंशी के लिये एक अनुष्ठान बना दिया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१७) प्रश्न&#8212;-कहते हैं कि सफलता के पीछे  किसी का  हाथ होता है .     आपकी सफलता के पीछे किसका हाथ है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तरः आपके प्रश्न का उत्तर देने का अर्थ है कि मैं पहले आपकी बात से सहमत हूं कि मैं सफल हूं। मुझे नहीं पता कि सफलता के आपके मानदण्ड क्या हैं। मैं एक कहानीकार हूं जो कि हाशिये पर है। विदेशों में हिन्दी भाषा और साहित्य को स्थापित करने में संघर्षरत हूं। सभी हिन्दी प्रेमियों एवं साहित्यकारों का स्नेह मिलता रहा है, शायद इसीलिये एक के बाद एक कार्यक्रम और आयोजन होते चले गये। जब कभी मुझे ऐसा अहसास होगा कि मैं एक सफल व्यक्ति हूं, मैं अवश्य जानने का प्रयास करूंगा कि मेरी सफलता के पीछे किस मित्र का हाथ है। यह सच है कि जीवन के इस मुकाम पर भी संघर्ष करने से डरता नहीं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१८ )प्रश्न&#8212;&#8211;ब्रिटेन की युवा पीढ़ी के बारे में आप क्या कहेंगे ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8212; यह सवाल बहुत गहरा है और बहुत लम्बा जवाब मांगता है। कोशिश करता हूँ कि कम से कम फ़ुटेज खाते हुए जवाब दे सकूं। कुछ साल पहले ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण करवाया गया था जिसके नतीजे बहुत चौंका देने वाले थे। यहाँ के क़रीब पचीस प्रतिशत युवा युद्ध की परिस्थितियों में अपने देश के लिए लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने इस सर्वेक्षण से घबरा कर एक कविता भी लिखी थी। कितना भयावह ख़्याल है कि आपके देश के युवा वर्ग के मन में अपने देश के प्रति ज़रा भी देशभक्ति का भाव ना हो। मारग्रेट थैचर जब ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थीं उन्होंने एक क़ानून बनाया था कि माता पिता अपने बच्चों को शारीरिक दण्ड नहीं दे सकते। यहां बच्चों के मानवीय अधिकारों की रक्षा को बहुत गंभीरता से लिया गया और लिया जाता भी है। बच्चों के सिर से डंडा ग़ायब हो गया। तो युवा पीढ़ी आत्मकेंद्रित होती चली गई। फिर जो मध्य वर्गीय बच्चे यहां विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं वे सभी सरकारी लोन ले कर पढ़ाई करते हैं। जब नौकरी लग जाती है तो अपना कर्ज़ा उतार लेते हैं। इससे भी बच्चों के मन में यह भावना घर कर जाती है कि मां बाप ने उन पर कोई ख़ास ख़र्चा तो किया नहीं। बच्चा बहुत जल्दी परिवार से दूर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बना लेता है। फिर विवाह नाम की संस्था यहां अपना आकर्षण खो चुकी है। शादी से पहले सेक्स ने उसे और अधिक बेकार की संस्था बना दिया है। टूटे परिवारों के बच्चे वैसे भी संस्कारों के मामले में ग़रीब रह जाते हैं। भारतवंशी बच्चे भी बहुत अलग नहीं हैं। जहां मां बाप अमीर है और उनके पास पैसा और प्रॉपर्टी है, उनके बच्चों का व्यवहार अलग है और जहां मां बाप संघर्षशील हैं, उनके बच्चे जल्दी से अपना अलग संसार बसा लेते हैं। अब ओल्ड पीपल्ज़ होम में भारतीय मूल के लोग भी दिखाई देते हैं। मेरा अपनी सोच यह है कि अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद किसी ओल्ड पीपल्ज़ होम में जा कर उन की सेवा करूं जिनके हाथ पांव जवाब दे गये हैं। वहीं रहूं, वहीं सेवा करूं और वहीं करूं अपने अंतिम दिनों का लेखन।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१९) प्रश्न&#8211;तेजेंद्र जी किसी भी कहानी की रचना-प्रक्रिया में  मुख्य रूप से किन-किन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211;रचना प्रक्रिया कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं है। हर लेखक कहानी अपने ढंग से लिखता है। मैं स्वयं भी हर कहानी एक ही ढंग से नहीं लिखता। कभी कभी कोई घटना दिल पर ऐसा असर करती है कि अपने आपको कहानी को रूप में लिखवा कर ही दम लेती है। कभी कभी कोई व्यक्ति कोई एक बात कह जाता है तो वो बात ही इतना आंदोलित कर जाती है कि कहानी का रूप धारण कर लेती है। जैसे मैं देह की कीमत के किसी चरित्र से स्वयं नहीं मिला। बस मेरे एक मित्र ने यह दो पंक्तियों की घटना मुझे विमान में सुना दी थी। मगर उस घटना ने मेरी नींद हराम कर दी और जब तक कहानी नहीं लिखी गई वो तीन चार महीने मेरे लिये तनाव की पराकाष्ठा थे। लंदन में एक महिला अपने निजी जीवन के विषय में बात करते करते रो पड़ी और उसने कहा कि अब तो लगता है कि कोई मेरा रेप ही करदे तो शायद सुख के कुछ क्षण मुझे नसीब हो जाएं। उस एक वाक्य ने कल फिर आना जैसी कहानी लिखवा दी जो कि हंस में प्रकाशित हुई और उसकी बहुत चर्चा भी हुई। फिर भी एक बात कहना चाहूंगा कि घटना कहानी नहीं होती। घटना को कहानी के रूप में लिखने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिये। घटना स्थूल है, उसके पीछे की सूक्ष्म भावनाओं को पकड़ना होगा। उसमें लेखक अपनी कल्पना शक्ति एवं उद्देश्य का तड़का लगाए, तब कहीं कहानी का जन्म होता है। कहानी को अंतिम रूप देने से पहले जुगाली करना बहुत ज़रूरी है। जब तक लेखक स्वयं कहानी से संतुष्ट ना हो जाए, उसे कहानी प्रकाशन के लिये नहीं भेजनी चाहिये। कई बार लेखक कहानी की सामग्री को कहानी समझ कर छपने के लिये भेज देता है। कहानी की सामग्री और कहानी में अंतर स्पष्ट होना बहुत ज़रूरी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(२०) प्रश्न&#8212;आप आज के युवा रचनाकारों और हिन्दी साहित्य प्रेमियों को क्या सन्देश देना चाहेंगे</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, आपके प्रश्न से लगता है कि जैसे मैं कोई बड़ा वरिष्ठ लेखक बन गया हूं जिसे युवा रचनाकारों को संदेश देने का हक़ मिल गया है। दरअसल मैं तो स्वयं अभी अपने आपको साहित्य का विद्यार्थी मानता हूं। मैं युवा लेखकों से स्वयं कुछ सीखने का प्रयास करता हूं। जब मैं किसी युवा लेखक की रचना पढ़ता हूं तो पाता हूं कि यह पीढ़ी आत्मविश्वास से भरपूर है। पंकज सुबीर, मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, प्रत्यक्षा, संजय कुंदन, अजय नावरिया, अल्पना मिश्र के साथ साथ और बहुत से नाम हैं जो कि बेहतरीन कहानियां लिख रहे हैं। इनमें से कुछ एक नाम तो स्थापित लेखक बन चुके हैं और उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। फिर भी इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि यह पीढ़ी इस बात की परवाह ना करे कि पुराने स्थापित या वरिष्ठ आलोचक इनकी रचनाओं के बारे में क्या राय रखते हैं। इस पीढ़ी को अपने लिए लिखना है; अपने पाठकों के लिये लिखना है। सबसे बड़ी बात कि इस पीढ़ी को अपने आलोचक भी स्वयं पैदा करने होंगे। हमारी पीढ़ी की समस्या यही रही कि हमारी पीढ़ी उन आलोचकों की ओर देखती रही जिन्हें हमारे सरोकारों से कोई वास्ता नहीं था। आज के युवा आलोचक साहित्य की समीक्षा तो कर रहे हैं मगर हमें उनसे अपेक्षा है कि वे आलोचना को नई परिभाषाएं भी दें। विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य को भी प्रतीक्षा है कि कोई उस ओर गंभीरता से ध्यान दे। हिन्दी पाठकों और प्रेमियों के लिये यह शुभ घड़ी है कि आज का लेखक विचारधारा के दबाव में साहित्य रचना नहीं कर रहा। आज का लेखक पाठक के लिये सृजन करने की ओर कदम बढ़ा चुका है। एक बात युवा लेखकों से भी कहना चाहूंगा और हिन्दी प्रेमियों से भी – साहित्य के लिये सबसे महत्वपूर्ण है कि उसे पढ़ा जाए। युवा लेखक जब तक अच्छा पढ़ेंगे नहीं तो अच्छा लिखेंगे कैसे। और यदि हिन्दी प्रेमी नहीं पढ़ेंगे तो साहित्य बचेगा कैसे।</span></h3>
<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: green; background-color: orange;" rowspan="2">
<h3 style="text-align: left;"><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #0000ff;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/PRIT-ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd.jpg"><img class="size-full wp-image-7330 alignleft" title="PRIT ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/PRIT-ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd.jpg" alt="" width="77" height="96" /></a>साक्षात्कार प्रस्तुति : ड़ॉ प्रीत अरोड़ा</span></span></h3>
<p style="text-align: left;"><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #0000ff;">जन्म &#8211; २७ जनवरी. शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनों वर्षों में प्रथम स्थान के साथ और मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य . कार्यक्षेत्र-. अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद।</span></span><span style="font-weight: normal; text-align: justify; background-color: orange;"> </span></p>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
]]></content:encoded>
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		<title>भाषा का सम्मान तभी संभव है, जब उसका सम्बन्ध साहित्य से हो :अनिरुद्ध</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Feb 2012 05:34:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[सीधी बात अनिरुद्ध सहाय से अनिरुद्ध जी से वार्ता करती ज्योत्सना पाण्डेय भोजपुरी साहित्य के... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/02/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a4%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a5%88/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><div style="text-align: left;" dir="ltr">
<div class="g-container" style="background-color: white; line-height: 16px; text-align: -webkit-auto;">
<div class="datestamp" style="border-bottom-color: #cccccc; border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 1px; margin-bottom: 4px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: -16px; padding-bottom: 4px; padding-top: 11px; position: relative; top: 0px;">
<div style="color: #666666; font-family: mangal, arial, verdana, sans-serif; font-size: 12px;"><strong><span style="background-attachment: initial; background-clip: initial; background-color: white; background-image: initial; background-origin: initial; color: purple; font-family: Mangal, serif; font-size: 8pt;" lang="HI">सीधी बात अनिरुद्ध सहाय से</span><span style="background-attachment: initial; background-clip: initial; background-color: white; background-image: initial; background-origin: initial; color: purple; font-family: Mangal, serif; font-size: 8pt;"> </span></strong></div>
</div>
</div>
<div class="g-container story-body" style="background-color: white; clear: both; font-family: mangal, arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 16px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 160px; padding-top: 0px; text-align: -webkit-auto;">
<div class="bodytext" style="font-size: 1em; padding-bottom: 16px;">
<div class="module " style="clear: both; display: inline; font-size: 1em;">
<div class="image img-w304" style="clear: right; float: right; font-size: 1em; margin-left: 16px; margin-right: -160px; margin-top: 12px; width: 304px;"><a style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" href="http://2.bp.blogspot.com/-TLBrMPkFMg0/TzTnH96QVDI/AAAAAAAAGIg/MTzw2weFp80/s1600/aniruddh%2526jyotsana.jpg"><span style="color: #333333;"><img src="http://2.bp.blogspot.com/-TLBrMPkFMg0/TzTnH96QVDI/AAAAAAAAGIg/MTzw2weFp80/s320/aniruddh%2526jyotsana.jpg" border="0" alt="" width="304" height="320" /></span><span style="color: black;">अनिरुद्ध जी से वार्ता करती ज्योत्सना पाण्डेय </span></a></div>
</div>
<div class="ingress" style="color: #333333; font-size: 14px; font-weight: bold; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 8px;">
<div style="text-align: justify;">भोजपुरी साहित्य के गौरव सुमधुर भोजपुरी गीतों के रचयिता कवि श्री अनिरुद्ध जी इन दिनों गुजरात राज्य की यात्रा पर हैं और गांधीनगर में निवास कर रहे हैं.प्रस्तुत है उनसे परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के लिए ज्योत्सना पाण्डेय के द्वाराकी गयी साहित्यिक वार्ता का संक्षेप-</div>
</div>
<div style="color: #333333; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;"><strong>१- प्रश्न &#8211; अपने विषय में कुछ बताएं..</strong><strong>उत्तर -</strong><span style="text-align: justify; background-color: white;"> मेरा जन्म बिहार राज्य के सारण जिले के डीहीं ग्राम में ९ मार्च १९२८ को हुआ . पिता स्व० श्री जगदेव सहाय स्वयं उर्दू व फारसी के प्रकांड विद्वान थे. हाईस्कूल तक की शिक्षा राजपूत हाईस्कूल से, तदोपरांत इंटरमीडिएट (कला) राजेन्द्र कालेज, छपरा से प्राप्त की.</span></p>
</div>
<div class="module " style="clear: both; color: #333333; display: inline; font-size: 1em;">
<div class="box bx-quote" style="clear: right; float: right; font-size: 1em; margin-bottom: 0px; margin-left: 16px; margin-right: -160px; margin-top: 12px; width: 304px;">
<div class="content" style="font-size: 1em; padding-top: 56px; position: relative;">
<div class="body" style="font-size: 1em; padding-bottom: 4px;">
<blockquote style="padding: 0px; margin: 0px;">
<div style="color: #505050; font-size: 18px; font-weight: bold; line-height: 24px; padding-bottom: 7px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 5px; position: static;"><span class="start-quote" style="background-attachment: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; background-image: url(http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/images/core/2/sprites/module.png); background-origin: initial; background-position: 0px -193px; background-repeat: no-repeat no-repeat; border-bottom-color: #d8d8d8; border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 1px; border-top-color: #d8d8d8; border-top-style: solid; border-top-width: 1px; display: block; height: 46px; position: absolute; text-indent: -5000px; top: 0px; width: 304px;">&#8220;</span>श्री अनिरुद्ध जी के द्वारा भोजपुरी भाषा में रचित काव्य संग्रह &#8220;पनिहारिन&#8221; अपनी माटी की सोंधी सुगंध का एहसास दिलाती है.विहान के गीत , साँझ के गीत, खेत-खलिहान के गीत, देश-गीत, छंद, लय,अलंकार आदि सभी साहित्य की परंपरा का अनुनाद करते हैं <span class="end-quote" style="font-family: arial, verdana, sans-serif;">&#8220;</span></div>
</blockquote>
<div class="person" style="font-size: 1em;">
<div class="person-info" style="font-size: 1em; padding-bottom: 8px; position: relative; top: -4px;">
<div class="name" style="font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 11pt; line-height: 17px; text-align: justify;" lang="AR-SA">सन १९६२ में भारत-चीन युद्ध काल में समय की मांग को देखते हुए अनिरुद्ध जी ने देश के जवानों में जोश भरने के लिए</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px; text-align: justify;" lang="AR-SA"> </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 11pt; line-height: 17px; text-align: justify;" lang="AR-SA">अनेक देश गीतों की रचना की. </span></div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="module inline-contextual-links" style="clear: right; color: #333333; display: inline; float: right; font-size: 1em; margin-bottom: 8px; margin-right: -160px; margin-top: 12px;">
<div class="list li-relatedlinks" style="clear: right; float: none; font-size: 1em; margin-left: 16px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; width: 224px;">
<h3 class="title" style="border-bottom-color: #cccccc; border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 1px; border-top-color: #cccccc; border-top-style: solid; border-top-width: 1px; height: 24px; padding-bottom: 10px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px; position: relative; top: 0px; margin: 0px;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; line-height: 21px;" lang="AR-SA"><span style="font-size: small;">मूर्धन्य साहित्यकारों की राय :</span></span></h3>
<div class="content" style="font-size: 1em; margin-bottom: 8px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden; padding-top: 8px;">
<ul style="list-style-image: initial; list-style-position: initial; list-style-type: none; margin-bottom: 16px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden; padding: 0px;">
<li class="ts-headline body-disabled first teaser" style="background-image: none; background-position: -3284px 8px; background-repeat: no-repeat no-repeat; display: block; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 8px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; top: 0px; padding: 0px;">
<div style="line-height: normal; text-align: justify;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt;">&#8220;</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">श्री अनिरुद्ध जी की रचनाएँ सुनने का प्रायः ही अवसर मिला है.जिन लोगों ने भोजपुरी के ग्रामीण सौंदर्य की रक्षा करते हुए उसमें माधुरी और लालित्य भरने की कोशिश की है</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt;">, </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">उनमें अनिरुद्ध जी एक प्रमुख युवक हैं. इनका मधुर कंठ इनके गीतों में और भी रस भर देता है. मेरी कामना अनिरुद्ध जी चिरंजीवी हों और अपनी वाणी</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt;" lang="AR-SA"> </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">की रस माधुरी से लोगों के हृदयों को तृप्ति देते रहें.&#8221;</span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">रामवृक्ष</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt;" lang="AR-SA"> </span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">बेनीपुरी</span></strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt;"> </span></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;">मांझी</div>
<div style="text-align: justify;">२५-१-५३</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">======</span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">&#8220;</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">अनिरुद्ध जी की कविताएँ बहुत ही सरस और अनूठी कल्पना से अलंकृत हैं. मैं समझता हूँ कि उनमें ओजगुण की वृद्धि और होगी. नि:संदेह उनमें एक प्रतिभाशाली कवि की रचना शक्ति है. मैं उनके विकास को उत्सुकता से देखता रहूँगा.&#8221;</span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">रामविलास शर्मा</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;" lang="AR-SA"> </span></strong></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;">छपरा</div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">१-६-५३</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="line-height: 18px; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt; line-height: normal;">======</span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">&#8220;</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">श्री अनिरुद्ध जी के गीतों में भोजपुरी के प्राणों का आर्द्र माधुर्य है. एक ऐसी निश्छल सरलता</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">, </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">जो रसानुभूति से द्रवित हो गीत की कड़ी बन जाये</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">, </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">कवि अनिरुद्ध में पाई जाती है. परिमार्जन के पश्चात गीतों के आकाश में कवि के प्रिय स्वरों को उड़ान भरने योग्य पर प्राप्त होंगे. इतना ही नहीं</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">, </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">अधिक तन्मयता उन्हें जन-जन के मन प्राणों में नीड़ बनाकर बस जाने की क्षमता प्रदान करेगी</span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;">, </span><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">विश्वास है.</span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">जानकी वल्लभ शास्त्री</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;" lang="AR-SA"> </span></strong></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">हाजीपुर</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">३१-१०-५५</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="line-height: 18px; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt; line-height: normal;">======</span><span style="font-size: 12pt;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">&#8220;</span><span style="font-size: 14px; line-height: 20px;" lang="AR-SA">अनिरुद्ध जी की भोजपुरी कविताएँ बड़ी सुन्दर और सामयिक हैं. होनहार कवि के आगे बढ़ाने की कामना करता हूँ.</span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">राहुल सांकृत्यायन</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;" lang="AR-SA"> </span></strong></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;">छपरा</div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">१८-१-५६</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="line-height: 18px; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt; line-height: normal;">======</span><span style="font-size: 12pt;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">&#8220;</span><span style="font-size: 14px; line-height: 20px;" lang="AR-SA">श्री अनिरुद्ध जी भोजपुरी काव्य के रससिद्ध कवि हैं.कविताओं में रस का स्रोत उमड़ पडता है.इनके पढने में भी वह जादू है कि सुनने वाले विभोर हो उठाते हैं .जहाँ तक भोजपुरी कविताएँ सुनने को मिली हैं</span><span style="font-size: 12pt;">, </span><span style="font-size: 14px; line-height: 20px;" lang="AR-SA">मुझे अनिरुद्ध जी की कविता सबसे अधिक पसंद आई है. मैं इनके उत्तरोत्तर विकास की कामना करता हूँ.&#8221;</span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">श्याम नारायण पाण्डेय</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;" lang="AR-SA"> </span></strong></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;">आजमगढ़</div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">१२-२-५६</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="line-height: 18px; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt; line-height: normal;">======</span><span style="font-size: 12pt;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">&#8220;</span><span style="font-size: 14px; line-height: 20px;" lang="AR-SA">श्रीअनिरुद्ध जी की रचना &#8220;पनिहारिन&#8221;सुना. उसमें ग्राम को छूकर बहती नदी का प्रवाह है.स्वाभाविकता के साथ ही साथ माधुर्य की छटा जो कवि ने उसमें भर दी है उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे</span><span style="font-size: 12pt;">, </span><span style="font-size: 14px; line-height: 20px;" lang="AR-SA">उसमें फूलों के साथ -साथ दीप भी जलते बह रहे हों. उसकी गूँज मेरे कानों में बहुत दिनों बनी रहेगी.&#8221;</span><span style="font-size: 12pt;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><strong> <strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif;" lang="AR-SA">बच्चन</span></strong><strong><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 18px;" lang="AR-SA"> </span></strong></strong><span style="font-weight: bold; background-color: white; text-align: -webkit-auto;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;"><span lang="AR-SA">छपरा</span><span style="font-size: 12pt; line-height: 18px;"> </span></div>
<div style="text-align: justify;">२६-११-५६</div>
<div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span style="font-family: 'Arial Unicode MS', sans-serif; font-size: 16px; line-height: normal;">======</span></div>
</li>
</ul>
<div class="more-contextual-links" style="font-size: 12px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 1px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 3px;"><a style="color: #4a7194; display: inline-block; position: relative; text-decoration: none;" href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/02/120210_amitabh_pkp.shtml#more-contextual-links"></a></div>
</div>
</div>
</div>
<div style="color: #333333; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;"><strong>२- प्रश्न- क्या सृजन कार्य अब भी जारी है ?</strong></div>
<div style="color: #333333; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;"><strong> </strong><strong>उत्तर &#8211; </strong>हाँ ! जारी है. एक काव्य संग्रह &#8220;पनिहारिन&#8221; प्रकाशित हो चुका है. इसके अतिरिक्त &#8220;भोजपुरी काव्य संग्रह&#8221; , &#8220;भोजपुरी गज़ल संग्रह&#8221;, मेघदूतम का भोजपुरी भाषा में अनुवाद व &#8220;कृष्ण-लीला&#8221; नामक एक गीत नाटिका (इसमे मथुरा गमन तक का चित्रण किया गया है)  प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं.</div>
<div style="color: #333333; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;"><strong>३- प्रश्न- हिंदी खडी बोली में भी लिख सकते थे , फिर भोजपुरी को लेखन का माध्यम चुनने का कारण क्या है &#8230;?</strong><strong>उत्तर-</strong><span style="text-align: justify; background-color: white;"> राजेन्द्र कालेज के प्राचार्य पूज्य मनोरंजन बाबूजी ने भोजपुरी में लिखने को प्रेरित किया, उन्होंने कहा- हिन्दी में बहुत से लोग लिख रहे हैं, तुम अपनी प्रतिभा मातृभाषा को समर्पित करो, मैं हरसंभव सहयोग करूँगा&#8230;.बस ! तभी से मैंने भोजपुरी भाषा को अपनी रचनाओं का प्रधान माध्यम माना &#8230; हिंदी खड़ी बोली में भी कुछ स्वतंत्र रचनाएँ लिखी.</span></p>
</div>
<div style="color: #333333; font-size: 14px; line-height: 20px; margin-bottom: 16px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 4px;">
<div style="text-align: justify;"><strong>४- प्रश्न- भोजपुरी भाषा में लेखन की चुनौतियां क्या है, तथा भाषा के प्रति उदासीनता का क्या कारण मानते हैं ..?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर- </strong><span style="background-color: white;">किसी भी भाषा का सम्मान तभी संभव है, जब उसका सम्बन्ध साहित्य से हो, व्याकरण की शुद्धता से हो, भाषा में एक चुम्बकीय आकर्षण हो , मैं तो इसी विचार व दृष्टिकोण के साथ भोजपुरी कविताओं व गीतों की रचना करता हूँ&#8230;&#8230;.</span></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="background-color: white;"><br />
</span></div>
<div style="text-align: justify;">आजकल भोजपुरी भाषा में प्रयुक्त द्विअर्थी सम्वाद उसे &#8220;अश्लील भाषा&#8221; कहलाने के लिए उत्तरदायी है. जिस कारण भोजपुरी भाषा को निजभाषा कहने में कुछ लोगों को हीनता का बोध होता है, आजकल वही साहित्य परोसा जाता है, जिसे जनसामान्य आसानी से पचा सके व उसका रसास्वादन कर सके&#8230;.. मेरा सोचना यही है कि यह भी एक कारण हो सकता है भाषा के प्रति बुद्धिजीवियों की उदासीनता का&#8230;. प्रसारण माध्यमो से भोजपुरी भाषा का जो स्वरुप सामने आ रहा है ,वह व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध नहीं है&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>५- प्रश्न- हिंदी नव जागरण में देशभाषा का जागरण आवश्यक था , हिंदीभाषी प्रदेशों में अवधी व भोजपुरी क्षेत्र भाषाएँ प्रमुख होने पर भी , आधुनिक भारत में इसका अभाव क्यों है ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> हिन्दी नव जागरण में देश भाषा का जागरण आवश्यक था, परन्तु देश में हो रहे देशव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलनों में जन जागरण भी आवश्यक था&#8230; शायद यही कारण है, कि एक देश एक भाषा की नीति को प्रमुखता से रखा गया और इस जागरण काल में हिन्दी खडी बोली साहित्यिक क्षेत्र में प्रमुखता से निखर कर आई, और क्षेत्रीय भाषाएँ पिछड़ गयी.</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>६- प्रश्न- हिन्दी साहित्य के इतिहास में अवधी, भोजपुरी, ब्रज आदि भाषाओं को सम्मान मिला है, आधुनिक हिन्दी साहित्य में इसका अभाव क्यों ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में भोजपुरी, अवधी, मैथिली व ब्रज आदि क्षेत्रीय भाषाएँ सम्मिलित नहीं यह क्षोभ का विषय है&#8230;.क्षेत्रीय भाषाएँ क्षेत्र के भीतर ही सीमित रह गयी हैं&#8230;कारण, लोगों में लोक भाषाओं के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता का अभाव है.. किसी भी भाषा को उचित सम्मान मिले इसके लिए आवश्यक है, कि भाषा को भाषा का पूर्ण रूप देने की बात हो, भाषा को इतना सामर्थ्यवान बना दें कि वह जनसामान्य की भाषा हो जाए, और साहित्य जनसामान्य के लिए हो&#8230;. रामचरित मानस इसका उदाहरण है&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>७- प्रश्न- भोजपुरी में कटनी, ओसवनी, रोपनी, दउनी आदि गीतों को लिखने का क्या औचित्य है ? क्या इनसे प्रेरणा मिलती है ? या ये उत्थान में सहायक हैं ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> हाँ ! इस प्रकार के गीत हमें हमारे कर्म के प्रति जागरूक रखते हैं, इनसे कर्म के प्रति उत्साहवर्धन की प्रेरणा मिलती है&#8230; जिन गीतों के द्वारा अपने कर्म के लिए कर्तव्यबोध की मंगल भावना जाग्रत हो, वे निश्चय ही उत्थान के कारक हैं&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>८- प्रश्न- भोजपुरी में लेखन की प्रेरणा किससे मिली, व समकालीन भोजपुरी कवियों से कैसे सम्बन्ध रहे&#8230;?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> मुख्य प्रेरणा स्रोत तो पूज्य मनोरंजन बाबू जी ही रहे किन्तु आचार्य महेंद्र शास्त्री, डॉ० राम विचार पाण्डेय, पं० श्याम नारायण पाण्डेय जी का वृहदहस्त सदैव शीश पर रहा&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;">प्रो० रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव, सतीश्वर सहाय वर्मा &#8220;सतीश&#8221;, डॉ० उमाकान्त वर्मा, कविवर कन्हैया जी, पाण्डेय कपिल, डॉ० प्रभुनाथ सिंह, मूसा कलीम, मैनेजर पाण्डेय &#8220;मनमौजी&#8221; आदि से मित्रवत सम्बन्ध रहे&#8230;अर्जुन कुमार &#8220;अशांत&#8221; मेरे सहपाठी भी रहे, और अभिन्न मित्र भी&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>९- प्रश्न- आजकल भोजपुरी भाषा में रचनात्मकता कितनी बढ़ी है , इसमें भाषा के योगदान को आप किस रूप में देखते हैं ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> भाषा जिस रूप में सामने आनी चाहिए, उस प्रकार नहीं आई.. रचनात्मकता तो निश्चितरूप से बढ़ी है&#8230; भोजपुरी में दूरदर्शन पर नाटकों की श्रृंखलाएं प्रसारित हो रही हैं , भोजपुरी में फ़िल्में बन रही हैं , इस सबका सम्बन्ध कहीं न कहीं साहित्य से है.. परन्तु भाषा का स्तर घटा है.</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>१०- प्रश्न- संविधान की आठवीं सूची में क्षेत्रीय भाषा मैथिली ने स्थान पा लिया है, भोजपुरी ने नहीं, क्या ऐसा सरकारी योगदान की कमी के कारण है ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> सरकारी योगदान का अभाव तो है, पर मेरा ऐसा मानना है कि मुख्य कारण भाषा का पूर्णरूपेण परिष्कृत न होना ही है..मैथिली पूर्णरूपेण शुद्ध व सिद्धांतों पर आधारित भाषा है, इसलिए यह सम्मानित भाषा है, और संविधान की आठवीं सूची में स्थान पाने की अधिकारिणी भी है&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>११- प्रश्न- भूमंडलीकरण के इस दौर में लोक भाषाओं के भविष्य को कैसे देखते हैं ?</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-</strong> भाषा को सर्वव्यापक बनाया जाए, भाषा सर्वग्राह्य हो ये ध्यान में रखते हुए, ऐसी रचनाओं का सृजन किया जाए जो सभी के लिए हों, तो लोकभाषाओं का भविष्य भी निश्चित ही सुन्दर होगा !</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #000000;"> () () ()</span></div>
</div>
</div>
</div>
</div>
]]></content:encoded>
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		<title>चीन की भाषा मैन्डरीन को भी पीछे छोड़ चुकी है हिन्दी :डॉ. सुधा ओम ढींगरा</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Aug 2011 07:03:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविनाश वाचस्पति</dc:creator>
				<category><![CDATA[चर्चा-परिचर्चा]]></category>
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		<description><![CDATA[साक्षात्कार कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ad%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="text-decoration: underline;">साक्षात्कार</span></strong></p>
<h3 style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaOmDhingra/Sudha_Om_Dhingra.jpg" alt="" width="144" height="195" />कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही <span style="color: #800000;">डॉ. सुधा ओम ढींगरा</span> का जन्म ७ सितम्बर १९५९ को जालन्धर (पंजाब) के प्रतिष्ठित एवं साहित्यिक परिवार में हुआ। एम.ए., पी.एच.डी. करने के बाद 1982 में शादी कर सेंट लुईस (मिज़ूरी) आईं। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की चर्चित पत्रकार हैं। जालन्धर रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार रही हैं। 1985 में इंडिया आर्टस ग्रुप की स्थापना की एवं हिन्दी नाटकों का मंचन। वर्तमान में इसकी संरक्षक एवं कलाकार हैं। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से सेंट लुईस में रेडियो प्रोग्राम कई वर्षों तक चलाया। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी सेंट लुईस (मिज़ूरी) में हिन्दी पढ़ाई ।1988-89 में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का वार्षिक अधिवेशन सेंट लुईस (मिज़ूरी) में करवाया। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के अनेक पदों पर कार्य किया और कर रही हैं। हिन्दी विकास मंडल नार्थ कैरोलाईना की पूर्व अध्यक्ष। वर्तमान में हिन्दी विकास मंडल के न्यास मंडल की सदस्य। हिन्दू सोसाइटी, नार्थ कैरोलाईना की प्रोग्राम कमेटी की पूर्व &#8211; सभाध्यक्ष। &#8220;विभूति&#8221; उत्पीड़ित नारियों के सहायतार्थ संस्था की संस्थापक एवं संरक्षक। &#8220;इंडियन क्लासिकल एवं म्यूiज़क सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना की पूर्व निर्देशक। अनगिनत कवि सम्मेलन और संगीत कार्यक्रम करके भाषा, साहित्य और लोक-कथाओं, लोक-कलाओं को आगे बढ़ाया है। साथ ही साथ ऐसे महती काय… में बहुत सी संस्थाओं के लिए बार-बार लगातार धन भी जुटाया है।21 सितम्बर, 1996 अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक काय… के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एम्बैसेडर नरेश चन्द्र से सम्मानित।हिन्दी साहित्य की सेवाओं के लिए नार्थ कैरोलाईना में नागरिक अभिनंदन।’हैरिटेज सोसाइटी (नार्थ कैरोलाइना)’ द्वारा &#8220;प्रतिष्ठित कवियत्री, वर्ष 2005&#8243; से सम्मानित डॉ. सुधा ओम ढींगरा से परिकल्पना ब्लॉगोत्सव हेतु  <span style="color: #800000;">साहित्य और कुछ अनछुए पहलूओं पर परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के सलाहकार संपादक श्री अविनाश वाचस्पति की बातचीत </span>हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं :</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सुधा जी,आपका स्वागत है परिकल्पना ब्लॉगो त्सव द्वितीय में</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जी धन्यवाद आपका और परिकल्पना से जुडी पूरी टीम का !<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप हिन्दी साहित्य में कब आईं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> आई कहाँ हूँ, अभी तो कलम को माँज रही हूँ | अविनाश जी, साहित्य का समुद्र बहुत गहरा है, लगता है अब तक घोघे- सिप्पियाँ ही हाथ लगे हैं, न जाने कितनी डुबकियाँ और लगानी पड़ेंगी हीरे जवाहरात ढूँढने के लिए | और इस जन्म में ढूँढ भी पाऊँगी या नहीं, समय बताएगा | आप ने पूछा है तो यह ज़रूर बता देती हूँ कि लिखना बहुत छुटपन से शुरू हो गया था | जब बच्चे खेला करते थे तो मैं काग़ज़ कलम ले कर अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाया करती थी | मेरा बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था | मैं पोलियो सर्वाइवल हूँ | तीन माह की थी जब पोलिओ हुआ था | माँ -बाप डाक्टर थे, अपंग होने से तो मुझे बचा लिया पर दाईं टाँग कमज़ोर रह गई अतः अपने  हम उम्र के बच्चों के साथ खेल नहीं पाई | बरामदे में बैठी उन्हें खेलते देखती तो मेरी परिकल्पना की दुनिया सज जाती | उसी दुनिया से निकल कर कभी-कभी उनके साथ खेलने चली जाती और सम्भल न पाती तो गिर जाती&#8230;कुछ बच्चे उठाने को दौड़ते और कुछ लंगड़ी &#8211; लंगड़ी कह कर चिढ़ाते..बालमन चोट के दर्द से कहीं अधिक &#8216;लंगड़ी&#8217; शब्द से आहत होता | रोती हुई बरामदे में आ बैठती और लंगड़ी शब्द का दंश भीतर कचोटता रहता और तरह -तरह के विचारों के साथ बालमन की सोच घुलती- मिलती रहती और कलम से काग़ज़ पर उतर जाती.. घर का माहौल बहुत सकारात्मक था |  पापा हिम्मत बंधाते कि मुझे कुछ अलग करके दिखाना है | बस उसी अलग दिखने में लिखती रही | दैनिक समाचार पत्रों के बाल स्तम्भों और फिर युवा मंचों में छपती रही | युवावस्था में दैनिक पंजाब केसरी, वीर प्रताप, हिन्दी मिलाप के साहित्यिक संस्करणों में कहानियाँ, कविताएँ और फिर धारावाहिक उपन्यास छपा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">साहित्य से जुड़कर आपको कैसा महसूस हुआ ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य तो खाना -पीना, ओढ़ना- बिछौना है | इश्क करती हूँ इससे | इसके प्रेम ने ही बचपन में मुझे सम्भाला और बड़ी होने पर सकारात्मक सोच वाली आत्मविश्वासी, दृढ़निश्चयी, सुदृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला बनाया | जीवन में बहुत उतार -चढ़ाव देखे, उदास क्षणों को अपने दोस्तों की वजह से ख़ुशी -ख़ुशी संभलती रही | अविनाश जी आप ज़रूर जानना चाहेंगे कि मेरे दोस्त कौन हैं .. जी.. काग़ज़ -कलम और पुस्तकें | साहित्य साँस है मेरी, इससे अलग मैं कुछ भी नहीं | अब आप समझ गए होंगें कि मैं कैसा महसूस करती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://hindi.webdunia.com/articles/1105/25/images/img1110525072_1_2.jpg" alt="लेखिका सुधा ओम ढींगरा कहानी वाचन करते हुए" width="190" height="454" />जब आपने साहित्य सृजन शुरू किया तो उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थीं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> यादों के गलियारों में घुमा दिया इस प्रश्न ने.. जब मैंने लिखना शुरू किया, जीवन शैली बड़ी सरल और सादा थी | बाज़ारवाद और भौतिकवादी जैसी सोच ने अभी पैर नहीं पसारे थे | कम्प्यूटर, अंतरजाल और दूरदर्शन आस -पास नहीं थे | हाँ युवावस्था तक जाते -जाते दूरदर्शन से पहचान हो गई थी और उसका हिस्सा भी मैं बन गई थी, आकाशवाणी और रंगमंच से मैं पहले से ही जुड़ी हुई थी पर कम्प्यूटर से तो अमेरिका आकर ही मिली हूँ&#8230;. कहने का भाव है कि मनोरंजन के लिए रेडियो या फ़िल्में थीं और कोई साधन नहीं था | पुस्तकें पढ़ने का खूब चलन था | एक से एक बढ़िया लेखक को पढ़ने की प्रतिस्पर्धा रहती थी | पढ़ने की रूचि और क्रम आज तक जारी है, चाहे वरिष्ठ कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा का साहित्य हों या युवा लेखक पंकज सुबीर का, एक विद्यार्थी की तरह पढ़ती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> काफ़ी हॉउस में साहित्यिक चर्चा के लिए बुद्धिजीवी इकट्ठे होते थे | आकाशवाणी और भाषा विभाग के खुले प्रांगणों में बहुत सारे साहित्यिक कवि सम्मेलन हुआ करते थे | धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका पत्रिकाएँ साहित्यिक रूचि वालों में खूब पढ़ी जाती थीं | दैनिक समाचार पत्रों में साहित्य के अलग संस्करण होते थे और साहित्य के लिए अलग पृष्ट भी रखे जाते थे | समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्टों पर छपना भी उपलब्धि मानी जाती थी | समाचार पत्रों के साहित्यिक संपादक भी बड़े सुन्दर पत्र लिख कर रचनाएँ लौटाया करते थे |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की एक स्तंभ हैं, कृपया यह बताएं कि आपकी नज़रों में साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्तमान स्वरुप क्या है?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, आप का बड़प्पन है जो आप ऐसा कह रहे हैं, मुझे तो अभी बहुत कुछ करना है | इस विषय पर अभी ठोस और स्पष्ट कुछ नहीं कहा जा सकता | भारत इस समय परिवर्ती दौर से निकल रहा है, उसी दौर से </span><span style="font-weight: normal;">जा रहा है जिसमें अमेरिका सिक्सटीज़ में गया था | अब अमेरिका पूरब की ओर मुड़ रहा है | मैंने स्वयं १९८३ से अब तक अमेरिका में ज़मीन असमान का अन्तर देखा है | अब विवाह, पारिवारिक मूल्य, बच्चों के लिए सरोकार उनकी प्राथमिक अपेक्षा हो गई है | मेरे विचार से  साहित्य-संस्कृति और समाज तीनों आपस में जुड़े हुए हैं | आर्थिक कारण हो या पश्चिम का प्रभाव, जब समाज में छाए उपभोक्तावाद से बाज़ारवादी सोच बढ़ रही हो, पश्चिम का भौतिकवाद और मल्टी नैशनल कल्चर समाज पर हावी हो रहा हो, वहाँ साहित्य पर उसका असर तो होगा ही | पिछले दिनों लिव-इन-रिलेशनशिप पर मैंने भारत के ही एक लेखक की कहानी पढ़ी और फिर सुना कि लिव-इन-रिलेशनशिप का कानून भी पास हो गया है | हैरानी हुई कि भूमंडलीकरण से जिन देशों के प्रभाव से भारत में यह संस्कृति तेज़ी से फैल रही है वहाँ लिव-इन-रिलेशनशिप के उद्भव और विकास के कारण और थे | भारतीय तो शादी की संस्था में विश्वास करते हैं उसे सुदृढ़ता से निभाते हैं | हमारे समाज में सांस्‍कृतिक मूल्‍य, नैतिकताएं और मान्यताओं की वजह से वैश्विक संस्‍कृतियों में हमारी विशिष्ट पहचान है | दूर देशों में अपनी</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> पारिवारिक सुदृढ़ता और सुरक्षा के बल पर प्रवासी भारतीयों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा को विश्व के कोने -कोने में पहुँचाया है | मैं बहुत सकारात्मक सोच की हूँ, परिवर्ती दौर के संघर्ष और चुनौतियों से जो </span><span style="font-weight: normal;">साहित्य लिखा जाएगा वह हिन्दी साहित्य को समृद्ध ही करेगा जैसे कि हर युग में होता आया है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">हिंदी साहित्य की दिशा दशा पर आपकी क्या राय है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> बहुत अच्छी है&#8230;विदेशों में रह रहे भारतीय रचनाकारों के पास अंग्रेज़ी भाषा का विकल्प होते हुए भी वे हिन्दी में लिख कर साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं और देश में तो रोज़ ही नए रचनाकार साहित्य के हवन में सामग्री डाल रहे हैं | वैश्वीकरण ने जहाँ भारतीयों को कोने -कोने में पहुँचा दिया है वहीं अंतर्जाल ने हिन्दी साहित्य को घर -घर पहुँचा दिया है | तकनीकी युग में जहाँ आज नए साधनों से हिन्दी का प्रसार हो रहा है वहीं अनेक नए</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> लेखक, कवि, आलोचक, कहानीकार, व्यंग्यकार, समीक्षक हिन्दी साहित्य से जुड़े हैं और अपने लिए भूमि तलाश रहे हैं | ये सब कैसा लिख रहे हैं समय की दृष्टि ही देखेगी और हिंदी साहित्य की दिशा को भी निर्धारित करेगी |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आपकी नज़रों में हिंदी साहित्य का भविष्य कैसा है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> चीन की भाषा मैन्डरीन को भी पीछे छोड़ चुकी हिन्दी, विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली -समझी जाने वाली भाषा बन चुकी है और संख्या में लगभग एक अरब के करीब आती है | पर दुःख की बात है कि अभी तक यूएन में हम इसे नहीं पहुँचा सके जबकि छह भाषाएँ अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, चीनी, रूसी, स्पैनिश तथा अरबी अपने -आप को वहाँ मान्यता दिलवा चुकी है | पर मैं बहुत आशावान हूँ &#8230;अंतरजाल पर हिन्दी भाषा और उसका साहित्य राष्ट्रीय संस्कृति को व्याख्यायित कर रहा है | निस्संदेह हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">हिन्दी के विकास में अंतरजाल कितना कारगर सिद्ध हो रहा है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, अंतरजाल से साहित्य और पत्र-पत्रिकाओं को बृहत् पाठक वर्ग मिला है | साहित्यकारों का पाठकों से सीधा संवाद हो रहा है और प्रकाशकों को बाज़ार मिल रहा है | यह एक सशक्त माध्यम है, अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने इसी माध्यम का प्रयोग करके चुनाव जीता | हिन्दी और साहित्य को इस माध्यम से बहुत आगे ले जाया जा सकता है | वैसे काम हो भी रहा है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">न्यू मीडिया के सन्दर्भ में आपकी व्यक्तिगत राय क्या है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अभिव्यक्ति का यह बहुत ही समर्थ माध्यम है, अगर इसका सही प्रयोग किया जाए |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप तो स्वयं साहित्यकार हैं, एक साहित्यकार जो गंभीर लेखन करता है उसे चिट्ठालेखन यानी ब्लॉगिंग करना चाहिए या नहीं?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> हमारे कई साहित्यकार इसकी महत्ता को समझ नहीं पा रहे हैं और वे चिट्ठालेखन को समय की बर्बादी समझते हैं | इसलिए इससे दूर रहते हैं | पर इससे लेखन को बृहद फलक मिलता है, पाठकों से सीधा संवाद होता है और रचनात्मक ऊर्जा का विकास ही होता है, निकास नहीं | अविनाश जी, बात फिर वहीं आती है कि आप इसका प्रयोग कैसे करते हैं | हर तकनीक का गणित होता है आप जमा करना जानते हैं तो घटाव से बच सकते हैं | हाँ आप को अपनी सोच और प्राथमिकताएँ सही रखनी पड़ती हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में आज के साहित्यकार सफल हैं या नहीं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करना साहित्यिक संस्थाओं और संघठनों का सामूहिक  प्रयास है | व्यक्तिगत तौर पर धारा, विचार, वाद का नहीं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आज की कविता की आधुनिकता अपनी देसी ज़मीन के स्पर्श से वंचित क्यों है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> भारत में भाषा और देसी संस्कार भी तो समाप्त हो रहे हैं | अंग्रेज़ी का वर्चस्व दिन व दिन बढ़ रहा है और पश्चिमी की सोच, भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर हावी हो रही है | भाषा और संस्कृति का तो चोली दामन का सम्बन्ध होता है | विदेशों में तो किशोरावस्था तक मातृ-भाषा में शिक्षा दी जाती है और बच्चों में संस्कार डालने की हर सम्भव कोशिश की जाती है | अब भारत में तो अपनी भाषा के संस्कार बचपन में ही समाप्त कर दिए जाते हैं | माँ -बाप भी बड़ी शान से कहते हैं कि हमारा बच्चा अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ता है | अविनाश जी मैं मानती हूँ कि रोटी- रोज़ी अंग्रेज़ी के साथ जुड़ी हुई है, हिन्दी के साथ नहीं इसलिए अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा बहुत ज़रूरी है |  पर अपनी भाषा के संस्कारों की नींव बचपन ही में डाल दी जाए तो कोई भी भाषा सीख कर रोटी कमाना मुश्किल नहीं | यूके और अमेरिका में आई प्रवासियों की पहली पीढ़ी जो इन देशों में अपने -अपने कार्य क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाई है उनमें से अधिकतर सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए हैं | अगर आप के पास अपनी भाषा के संस्कार हैं, तो आप किसी भी भाषा के मूल को पकड़ सकते हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> विदेशों में पैदा हुई दूसरी पीढ़ी को कंफ्यूज्ड देसी कहा जाता था पर वह पीढ़ी अपनी सोच, व्यवहार और जीवन -शैली में बहुत स्पष्ट है | विदेश के सही -ग़लत को समझते हुए वह भारतीय है और भारतीय होने में गर्व महसूस करती है और विदेशों में प्रवासी भारतीयों ने भी अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति , अपनी भाषा को संभाल कर रखा हुआ है | यह उनकी पहचान है, अस्मिता है | पर आज भारत की युवा पीढ़ी कंफ्यूज्ड देसी बन चुकी है | परम्परावादी और संस्कारी देश में पैदा होकर वे पश्चिम का जिस तरह से अनुकरण कर रहे हैं और उन जीवन मूल्यों को भी अपनाते जा रहे हैं, जिन्हें पश्चिम बहुत पहले छोड़ चुका है | ऐसे समय और वातावरण में कविता हो या कहानी देसी ज़मीन का स्पर्श कहाँ से लाएगी |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> शिक्षा प्रणाली, शिक्षा संस्थाओं के साथ -साथ साहित्य के कुछ कर्णधार भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं | जब वे ऐसी रचनाओं को प्रोत्साहित करेंगे तो बाकि भी वैसी ही लिखेंगे |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">क्या हिंदी चिट्ठाकारिता में नया सृजनात्मक आघात देने की ताक़त छिपी हुई है ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> हर नया मिडिया नई ऊर्जा लेकर आता है और अपने भिन्न स्वरूप से, नई अपेक्षाओं और नई संभावनाओं से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है | चिट्ठाकारिता हिन्दी, साहित्य और संस्कृति के फैलाव- प्रसार में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा|</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">कुछ व्यक्तिगत जीवन से जुड़े सुखद पहलू हों तो बताएं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> जीवन को उत्सव की तरह मानती हूँ | हर पल को भरपूर जीती हूँ | C.Wintercle Olson का कथन हमेशा मेरे सामने रहता है&#8211;</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> Every new day is a gift that&#8217;s why we call it the present.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> और इसे भी याद रखती हूँ &#8230;..</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The time to be happy is now.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The place to be happy is here.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> The way to be happy is to make others so.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, मेरे मम्मी -पापा और भैया तीनों डाक्टर थे | अब तीनों इस दुनिया में नहीं हैं | भैया तो कम उम्र में चले गए और मुझ से वे दस साल बड़े थे | बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बिता पाई थी इसलिए माँ -पा ने बहुत लाड़ प्यार से पाला था | बहुत संस्कारित परिवार था | जीवन को सुखद पूर्वक जीने के लिए तीन P उनसे लिए | हैरान हो गए न कि ये तीन P क्या है..? जी..Prem, Patience और Preyer. स्वभाव में गिलास को आधा भरा ही देखने की  आदत बन चुकी है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगी आप ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपको इस बात का शायद अंदाजा नहीं होगा कि विदेश में परिकल्पना ब्लॉगोत्सव की कितनी धूम है, हर कोई जो हिंदी और हिन्दुस्तान से जुडा है वह आत्मीय रूप से परिकल्पना ब्लॉगोत्सव से भी जुडा है . रवीन्द्र प्रभात जी और आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं हिंदी के विकास में , और क्या कहूँआप स्वयं बहुत अनुभवी हैं | हाँ, शुभकामनाएँ ज़रूर देती हूँ |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">नए चिट्ठाकारों के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> समाज और साहित्य के प्रति सचेत रहते हुए सृजनात्मक, उद्देश्यपूर्ण और उपयोगी लिखा जाए जो सीधा पाठक के हृदय और मस्तिष्क पर छा जाए ताकि इस माध्यम की ताकत सार्थक हो जाए |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आज के रचनात्मक परिदृश्य में अपनी जड़ों के प्रति काव्यात्मक विकलता क्यों नहीं दिखाई देती ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> जड़ों से ही छूटते जा रहे हैं तो विकलता कहाँ नज़र आयेगी | जब जड़ों की तलाश शुरू होगी तब इसकी तरफ मुड़ा जायेगा |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">आपकी नज़रों में साहित्यिक संवेदना का मुख्य आधार क्या होना चाहिए ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> संवेदना कहीं भी किसी के प्रति भी उभर सकती है, निर्भर करता है, आप ने उन पलों को कितना और कैसे जिया है | जितनी गहराई से आप जीते हैं, उतना ही डूब कर आप लिख सकते हैं | डूब कर तो अपने इर्द -गिर्द के वातावरण और जीवन को ही लिखा जा सकता है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">कुछ अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से जुड़े कोई सुखद संस्मरण बताएं ?</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> काम को बेहद आन्नद और प्रेम से करती हूँ | परेशानी को अधिक स्थान नहीं देती, बड़ी जल्दी उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाती हूँ | मस्त रहती हूँ | लेखन और हिन्दी चेतना ने विश्व में कई भाई- बहन दिए हैं |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अपनी पुस्तकों के साथ -साथ हिन्दी चेतना मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है | यह उत्तरी अमेरिका की पहली ऐसी प्रकाशित हिन्दी पत्रिका है, जो लोकप्रिय हो रही है और स्तरीय पत्रिका मानी जाती है |</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अविनाश जी, साहित्य जगत से एक ही निवेदन है कि विदेशों के शब्द शिल्पियों के लेखन को प्रवासी लेखन कह कर हाशिये में न डालें |</span></h3>
<h3>आपने हमें अपना कीमती समय दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद सुधा जी !</h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">जी, धन्यवाद आपका भी !</span></h3>
<p><span style="font-weight: normal;">() () ()</span></p>
]]></content:encoded>
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		<title>चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jul 2011 05:09:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>loksangharsha</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[अन्तराष्ट्रीय शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री गौहर रजा से समसामयिक विषय... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ad%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://loksangharsha.blogspot.com/2011/06/blog-post_5668.html"><br />
</a></h3>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://2.bp.blogspot.com/-46yqadtcGfc/Til8_uHkpkI/AAAAAAAABwk/IPQkAxuMHxg/s1600/Gauhar%2BRaza.jpg"><img src="http://2.bp.blogspot.com/-46yqadtcGfc/Til8_uHkpkI/AAAAAAAABwk/IPQkAxuMHxg/s320/Gauhar%2BRaza.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<h3 style="text-align: justify;">अन्तराष्ट्रीय  शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री  गौहर रजा से समसामयिक विषय पर लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर  सिंह सुमन ने जंहगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट में जाकर विशेष साक्षात्कार  लिया</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न : पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से आप क्या सोचते हैं ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर : ब्रेख्त ने लिखा था और  चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया।  उन्होंने जनवाद के खिलाफ मत दिया क्योंकि वह जनवादी थे  बंगाल के सन्दर्भ में यह लाईनें मुझे याद आयीं इस रियलिटी से मुंह नहीं  मोड़ा जा सकता है कि बंगाल की जनता सरकार से नाराज थी। उसकी वजह वामपंथ की  गलतियाँ थी। जिसका सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक  था। इससे जो कुछ हुआ है भयंकर है।  भयंकर इसलिए है कि  चुनाव के बाद एक महीने के अन्दर ही पेट्रोलियम  पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> बिना लगाम के बाजार के हाथों  मुल्क बेचने की प्रक्रिया इतनी तेज व भयंकर है कि इससे पहले इस मुल्क को यह  गति देखने को नहीं मिली। जब वामपंथ कमजोर होता है तब वह अपने अन्दर कमजोर  ही नहीं होता है बल्कि बुर्जुवा पार्टियों के अन्दर जो वामपंथी असर होता है  वह भी कमजोर हो जाता है और हमारे सामने सैकड़ों हजारो उदहारण है बी.टी डंकल  से लेकर मोंसंटो वहां से लेकर परमाणु   डील तक या छोटे दफ्तर से लेकर  कैबिनेट  मिनिस्टर तक एक लूट की स्तिथि पैदा हो गयी है और इसमें आम आदमी की  आवाज जो वामपंथी विचारधारा के गले से निकलती थी वह पूरी तरह से दब गयी यह  है हमारी गलतियों का नतीजा है बंगाल में।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न: क्या मार्क्सवाद प्रासंगिक है ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर  : जहाँ तक मार्क्सवाद को मैं एक वैज्ञानिक विचारधारा मानता हूँ वैज्ञानिक  विचारधारा कहने का मतलब यह है बदलाव। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ धर्म  एक ऐसी चीज है जो नहीं बदलता है। जितना पुराना हो उतना ही बेहतर यह सिर्फ  ससियेंस है जो जितनी नयी हो उतनी बेहतर।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
विचारधारा का जहाँ तक ताल्लुक  है। विचारधारा में बदलाव ही उसे ससियेंस बनता है। दुनिया में अभी भी  पूँजीवाद  व सामंतवाद मौजूद है इसलिए मूल कानून है आज भी मार्क्सवाद पूरे  उतरते हैं लेकिन हर जगह की परिस्तिथियों के हिसाब से लागू किया जा सकता है।  इसका उदहारण हम टेक्नोलॉजी से लें हमारे देश में छोटे खेत हैं जब हम  ट्रक्टर की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते हैं तब हमें छोटे ट्रक्टर की जरूरत  होती है जिन मुल्कों में बड़े-बड़े खेत होते हैं वहां बड़े ट्रक्टर की  जरूरत होती है। बिलकुल यही बात मार्क्सवाद तक पूरी उतरती है मार्क्सवाद को  देश की परिस्तिथियों की हिसाब से अप्लाई किया जाना चाहिए जो बातें बंगाल पर  लागू होंगी, वह बातें शायद गुजरात व उत्तर प्रदेश पर सही न उतरें।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> मशीनी तरीके मर्क्सिजम अप्लाई  करने से हर चूक इन्कलाब को कई दशक पीछे धकेल देती है। यही हुआ है दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में जहाँ मार्क्सवाद धर्म की तरह इस्तेमाल किया गया वहां व्यक्ति या समूह धर्म की और मुड़ेगा मार्क्सवाद की तरफ नहीं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रश्न: वामपंथ के नए मुद्दे क्या होने चाहिए ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर:   बदलाव की गुंजाइश हर वक्त है। बंगाल केरल की स्तिथि झकझोरने वाले हालात  हैं। हमें यह समझना होगा कि पुराने तरीके से काम नहीं चलेगा नए तरीके से  सोचना होगा और रचनात्मक होना होगा जो हम तीस चालीस दशक में थे रचनात्मक  आन्दोलन की जरूरत है। नया कम्युनिस्ट पैदा करना होगा और जिन सवालों से हमने  मुंह फेरा है। जिसमें प्रमुख सवाल है जाति का सवाल व साम्प्रदायिकता के  सवाल पर चिंतन करना बहुत जरूरी है। अगर इस देश में फासिस्ज्म आयेगा वह  साम्प्रदायिकता व जातिवाद के नाम से आएगा। इन दोनों मुद्दों को हमने नहीं  समझा तो हम पिछड़ जायेंगे। हमारे पिछड़े देश की जनता को और पिछड़ना होगा।  हमारे आस-पास के देशों में अमेरिका ने यह स्तिथि पैदा कर दी है कि लोकतंत्र  न बचे जो हमारे लिये बहुत बड़ा खतरा है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> अगर इस देश में लोकतंत्र बचाना है तो उसकी भी जिम्मेदारी वामपंथ की है।<br />
सुमन</span><br />
<a href="http://loksangharsha.blogspot.com/">लो क सं घ र्ष !</a></h3>
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		<title>साम्प्रदायिकता तर्क के बजाये जोर जबरदस्ती और सामाजिक हिंसा पर आधारित होती है:मुद्राराक्षस</title>
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		<pubDate>Wed, 20 Jul 2011 05:22:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: red; background-color: pink;" rowspan="2"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Mudra-Rakshas-Sanklit-Kahaniyan_m2-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /><span style="color: #993300;"> </span></p>
<p>सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है : मुद्राराक्षस</p>
<p><span style="color: #000080;">विगत दिनों मुम्बई में हुए सीरियल बम ब्लास्ट और उसपर विभिन्न राजनीतिज्ञों के साथ -साथ दिग्विजय सिंह की वयानवाजी ने आतंकवाद पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है ! किसी का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने कुछ भी गलत नहीं कहा तो कुछ लोगों का मानना है कि उनके बयान हास्यास्पद है &#8230;.कहा गया है कि चाहे हिन्दू आतंकवाद हो चाहे मुस्लिम आतंकवाद , आतंक तो आतंक ही होता है न ? इन्हीं विषयों पर<span style="color: #993300;"> डा. विनय दास</span> ने प्रख्यात साहित्यकार <span style="color: #993300;">श्री मुद्रा राक्षस </span>से बात की , प्रस्तुत है मुद्रा जी से हुयी बातचीत के प्रमुख अंश :</span></th>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनय दास:वर्तमान परिवेश में आप साम्प्रदायिकता को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:समाज में जब विचार प्रक्रिया में रोगाणु पैदा होते है तो वे साम्प्रदायिकता का रूप ले लेते है । जैसे मनुष्य बीमार होता है वैसे ही समाज में अस्वास्थ्य का लक्षण साम्प्रदायिकता होती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: समाज के लिए हिंदू साम्प्रदायिकता ज्यादा घातक है या मुस्लिम?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:किसी प्रकार की कोई भी साम्प्रदायिकता समाज के लिए घातक होती है । क्योंकि साम्प्रदायिकता तर्क के बजाय जोर जबरदस्ती और सामाजिक हिंसा पर आधारित होती है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : मुझे लगता है इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया दोनों ने मात्र मुस्लिम को ही आतंकवादी के तौर पर पेश किया है। क्या आप को नही लगता की इस सन्दर्भ में मीडिया वालो ने अपनी अति रंजित भूमिका निभाई है ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:यह बात तो सच है। समाज की तरह मीडिया में भी अर्धशिक्षित और अल्प शिक्षित लोगो की बहुतायत है। समाज को लेकर उनके विचार गंभीर नही होते । फूटपाथी विचारधारा ही उन पर हावी होती है। यही वजह है की वे विवेक से काम लेते नही दिखते। मीडिया के अधिकांश लोग चूंकि हिंदू है। इसलिए वे एक हिंदू की तरह ही सोचते है और ये नतीजे निकाल लेते है की जो हिंदू नही है वह ग़लत है । इसी आधार पर उन्होंने मुसलमानों को सांप्रदायिक मान लिया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास :आज यह आम धारणा बन कर रह गई है की हिन्दी पत्रकारिता करनी है तो हिंदू बनकर करना होगा,ठीकउसी तरह जिस तरह से उर्दू पत्रकारिता मुसलमान बनकर की जाती है । क्या आप को नही लगता की आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया अपनी अतिवादी भूमिका के कारण जनता की दृष्टि में अविश्वसनीय होते जा रहे है ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:अविश्वसनीयता की बात तो सही है आप की । लेकिन उनका महत्त्व इसलिए बना हुआ है की अर्ध्शिक्षा या कुशिक्षा बहुत प्रभावी भूमिका अदा करती है । गहरे विचार समाज में लोकप्रिय नही होते । यही स्तिथि मीडिया में काम करने वाले लोगो की भी होती है । यही वजह है की वे अधिकांशत: सतही रह जाते है। सामाजिक चेतना न तो उनमें होती है और नही वे सामाजिक चेतना दे पाते है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास:क्या आप को लगता है की समाज के शिक्षित होने के साथ समाज की यह तस्वीर बदल जायेगी?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्रराक्षस:अर्ध शिक्षा किसी भी युग में समाप्त नही होती। इतिहास में किसी युग में समग्र शिक्षित समाज का उदाहरण नही मिलता है समाज अधिकांश:लोकप्रियता पर चलता है । अन्तर यही होता है की अगर समाज को चलने वाला महत्वपूर्ण विचारक है तो उसकी बात नीचे तक जाती है. आज समाज में जो लोग ऊपर है वे ख़ुद भी वैचारिक दृष्टि से अर्ध शिक्षित या कुशिक्षित है। इसलिए समाज में अर्धशिक्षित या कुशिक्षित ही लोकप्रिय है ,जिसकी आड़ में हमारे राजनेता और धर्म के ठेकेदार काजी पंडित अपना-अपना उल्लू सीधा करते है। समाज में आतंक पैदा करते है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास:इस वक़्त आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी कहा जा रहा है प्रकारांतर से अब मुस्लिम समाज कोऔर इसके पूर्व सिखों को आतंवादी कहकर प्रताडित किया जाता रहा है । क्या आपको नही लगता है की हमारी सरकार की सोच अंग्रेजो की दस्ता से आज भी मुक्त नही हो पाई है क्योंकि वे भी पहले तमाम जातियों औरइलाको को अपने स्वार्थवश अपराधी घोषित किया करते थे और आज हमारी सरकार और मीडिया मिलकर इसीदुष्प्रचार को हवा दे रहे है । इस पर आप कुछ कहें । </strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: सच ये है की सत्ता स्वयं किसी भी तरह के आतंकवाद की जननी होती है । आज यह बात छुपी नही है की पंजाब का आतंकवाद ख़ुद तत्कालिन सरकार की देन या उस समय तक जिसे पंजाब के आतंकवाद का सबसे बड़ा करता धरता मन गया ,वह भिन्दर्वाला स्वयं कांग्रेस की देन था। दुनिया में अगर मुसलमानों को फिलिस्तीन से बेदखल करके इसराइल या यहूदी राज न बनाया गया होता तो मुसलमान युवा , हथियार न उठाते । सब जानते है की अमेरिका ने मध्य एशिया की इराक , बेरुत और अफ्गानिश्तान सहित इस्लामी देशो में भयानक अत्याचार न किए होते तो जिसे आज अमेरिका इस्लामी आतंकवाद कह रहा है उसके यह हालत न होती । जब पहल किए हो तो उसका दुष्परिणाम भोगना ही होगा । भारत में साथ के दशक से वामपंथी युवा ने हथियार उठाये । जिसे नक्सल वर्ग कहा जा रहा है। क्योंकि गावो में सामंती समाज ने जो भयानक अत्याचार किए उन्हें सरकार ने कभी नही रोका बल्कि अत्याचारी सामंतो किया साथ पुलिस प्रशाशन ने दिया । ऐसे हालत में जुल्म करने वालो ने हथियार उठाये। देश के सारे ही पूर्वोत्तर राज्यों में ख़ुद हमारी सरकार भयानक अत्याचार और आतंकवाद की जिम्मेदार है । ऐसे स्तिथि में आतंकवाद की आलोचना न्याय सांगत नही । इस प्रदेश में आज जो शाशन है वह पिचले लंबे अर्शे से हिंदुत्व की सहायता करता रहा है। आखिर मायावती ने नरेंद्र मोदी के साथ चुनाव प्रचार किया था और एक तरह से गुजरात के मुसलमानों के नरसंहार का समर्थन किया था । मायावती सरकार से यही उम्मीद की जा सकती है की वह हर ऐसे क्षेत्र को आतंवाद की नस्सेरी बता दे ,जहाँ लोग उससे सहमत नही है। अभी मायावती ने सिर्फ़ आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी बाते है वह समय दूर नही जब वह देवरिया से लेकर सारे ही पूर्वी उत्तर प्रदेश को आतंकवाद की नर्सरी बता दे ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: आज अन्तर्रष्ट्रीय <strong>स्तर </strong> पर आतंकवाद का जो कहर <strong>बरस </strong> रहा है उसके मूल में लोग I.S.I की भूमिका को लगातार चिन्हित करते है । इस सन्दर्भ में कुछ कहें । </strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस : यह सिर्फ़ हिंदू प्रचार है । I.S.I ने जो कुछ किया है उसे सिर्फ़ आरूप के रूप में ही बताया जा रहा है। प्रमाद आज तक कोई नही दिया गया। I.S.I से ज्यादा भयानक भूमिका इस्राइल के मोशाद की है । जिसने सीधा संपर्क विश्व हिंदू परिषद् से बनाया हुआ है, किंतु इस पर कभी कोई चर्चा नही करता ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास: अभिनव भारत ,सरस्वती शिशु मन्दिर ,बजरंग दल अगर आज आतंकवादी संगठन है तो क्यासिमी,मकतब और मदसे आतंकवाद की जुंनानी नही है ?यदि दोनों की भूमिका एक सी है तो एक दूसरे से शिकायत क्यों ?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्रराक्षस: वैसे तो यह सच ख़ुद एक ऐतेहासिक विद्रूप है । हिंदू आतंकवाद को लेकर मैं लगातार लिखता रहा हूँ और यह भी लिखा है की जिसे मुसलमानों का विस्फोट माना जा रहा है ,उनके पीछे हिंदू संगठन ही है । आज ख़ुद सरकार को भी यह अनुभव हो रहा है । सिमी से ज्यादा खतरनाक बजरंग दल है । उसकी कारगुजारिया उङीसा और कर्नाटक ही नही सारे देश में देखी जाती रही है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : इन दिनों हिंदू और उसके विभिन्न आनुषांगिक संगठनो को बिना प्रमाण के आतंकवादी घोषित किया जा रहा है । क्या आप को नही लगता की हमारी सरकार इस दृष्टि को अपना कर अल्पसंख्यको को मरहमलगा उनका वोट बैंक हथियाने की साजिश कर रही है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस:यह बात पूरी तरह ग़लत है । आज से दो साल पहले नांदेड का उदाहरण देते हुए मैंने लिखा था की हिंदू संगठन खतरनाक हो चुके है आज सारे प्रमाण सामने है । नांदेड में बम बनाते वक़्त का विष्फोट हो या कानपूर का या फिर मालेगाव का,इन सभी में मौके पर हिंदू युवक ही मरे। उन स्थानों से भारी मात्र में बम बनने की सामग्री ,इस्लामी दाधिया,टोपिया और लुन्गीय बरामद हुई । यानी की हिंदू युवक मुस्लिम वेश बनाकर विष्फोट करते थे । मालेगाव विष्फोट में जो मोटरसाईकिल इस्तेमाल हुई थी ,वह किसी मुस्लमान की तो नही थी? और अब किस तरह का प्रमाण चाहिए ,हिंदू आतंकवाद को सिद्ध करने के लिए । इस देश के सारे विस्फोटो की जांच होनी चाहिए ।<br />
लेकिन होता यह है की ऐसे विस्फोटो की साड़ी जांच पड़ताल गड्ढे में दबा दी जाती है । ऐसी स्तिथि में आतंकवाद के सच को सामने लाना भी जटिल होता जा रहा है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास : क्या कारण है की जब-जब चुनाव या राष्ट्रिय पर्व नजदीक आते है आतंकवादी गतिविधिया बढ़जाती है और मीडिया उनका डरौना दिखलाता है,आखिर क्यों ?उसके पहले या बाद में क्यों नही?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: ये सच नही है। पहले और बाद में भी यही होता रहा है । यह अलग बात है की जब चुनाव आते है तो लोग सब कुछ चुनाव से जोड़कर छुट्टी पा लेते है ।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनयदास :इधर जितने भी विष्फोट या विभिन्न देशो के राष्ट्राध्यक्षों ,प्रधानमंत्रियो की जो हत्याएँ हुई हैउनमें अक्सर C.I.A को जोड़ा जाता रहा है । इस सन्दर्भ में कुछ कहें ।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मुद्राराक्षस: C.I.A का काम बहुत लंबे समय तक पूरी दुनिया में बहुत कहाराब रहा है। ख़ुद अमेरिका में भी C.I.A के विरूद्व काफी लिखा गया है। इधर C.I.A ख़ुद चर्चा में इसलिए नही है की उसकी भूमिका ख़ुद अमेरिकी सरकार अदा करती रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">() () ()</p>
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		<title>स्वामी अनंत बोध कितनी से सीधीबात</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jul 2011 06:10:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>GIRISHBILLORE</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[intarview]]></category>

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		<description><![CDATA[वेबसाईट &#8220;विश्वकल्याण साधानायातन &#8221; सनातन धारा फ़ाउंडेशनपू्ज्य महाराज श्रीश्री यंत्र मंदिरअनंत बोध]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वेबसाईट &#8220;<a href="http://shriyantramandir.com/">विश्वकल्याण साधानायातन</a> &#8221;<br />
सनातन धारा फ़ाउंडेशनपू्ज्य महाराज श्रीश्री यंत्र मंदिरअनंत बोध</strong></p>
<p><object id="boo_embed_399343" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="400" height="129" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="data" value="http://boos.audioboo.fm/swf/fullsize_player.swf" /><param name="scale" value="noscale" /><param name="salign" value="lt" /><param name="bgColor" value="#FFFFFF" /><param name="allowScriptAccess" value="always" /><param name="wmode" value="window" /><param name="FlashVars" value="mp3LinkURL=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh&amp;mp3Title=swami+anant+bodh&amp;mp3Time=03.48am+29+Jun+2011&amp;rootID=boo_embed_399343&amp;mp3=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh.mp3%3Fsource%3Dembed&amp;mp3Author=girishbillore" /><param name="src" value="http://boos.audioboo.fm/swf/fullsize_player.swf" /><param name="bgcolor" value="#FFFFFF" /><param name="flashvars" value="mp3LinkURL=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh&amp;mp3Title=swami+anant+bodh&amp;mp3Time=03.48am+29+Jun+2011&amp;rootID=boo_embed_399343&amp;mp3=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh.mp3%3Fsource%3Dembed&amp;mp3Author=girishbillore" /><embed id="boo_embed_399343" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="129" src="http://boos.audioboo.fm/swf/fullsize_player.swf" flashvars="mp3LinkURL=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh&amp;mp3Title=swami+anant+bodh&amp;mp3Time=03.48am+29+Jun+2011&amp;rootID=boo_embed_399343&amp;mp3=http%3A%2F%2Faudioboo.fm%2Fboos%2F399343-swami-anant-bodh.mp3%3Fsource%3Dembed&amp;mp3Author=girishbillore" wmode="window" allowscriptaccess="always" bgcolor="#FFFFFF" salign="lt" scale="noscale" data="http://boos.audioboo.fm/swf/fullsize_player.swf"></embed></object></p>
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		<title>सीधी बात वन्दना गुप्ता से</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Jul 2011 07:55:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>GIRISHBILLORE</dc:creator>
				<category><![CDATA[बतकही]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[intarview]]></category>
		<category><![CDATA[sidhi bat]]></category>
		<category><![CDATA[vandana gupta]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8220;ज़ख्म फूलों ने दिए ..!!, जिंदगी एक खामोश सफ़र, एवं एक प्रयास  ब्लॉग की स्वामिनी गृहणी श्रीमती वंदना... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><a href="http://1.bp.blogspot.com/_-TXSTwXBcos/TSa-CeWryhI/AAAAAAAAAQ4/kZYH2-noqtM/S220-h/vandanaji.jpg"><img id="profile-photo" class="aligncenter" src="http://1.bp.blogspot.com/_-TXSTwXBcos/TSa-CeWryhI/AAAAAAAAAQ4/kZYH2-noqtM/S220/vandanaji.jpg" alt="My Photo" width="98" height="113" /></a>&#8220;<a href="http://redrose-vandana.blogspot.com/" target="_blank">ज़ख्म फूलों ने दिए ..!!</a>, <a href="http://vandana-zindagi.blogspot.com/" target="_blank">जिंदगी एक खामोश सफ़र</a>, एवं <a href="http://ekprayas-vandana.blogspot.com/" target="_blank">एक प्रयास </a> ब्लॉग की स्वामिनी गृहणी श्रीमती वंदना गुप्ता से विगत  रविवार 03.07.2011 को ब्लागोत्सव के लिए  विशेष भेंट श्रोताओं से साझा कर रहा हूँ </h3>
<h3>गिरीश बिल्लोरे मुकुल </h3>
<p><object id="bplayer" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="320" height="291" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="wmode" value="opaque" /><param name="src" value="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1792195" /><param name="name" value="bplayer" /><embed id="bplayer" type="application/x-shockwave-flash" width="320" height="291" src="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1792195" name="bplayer" allowfullscreen="true" allowscriptaccess="always" wmode="opaque"></embed></object></p>
</p>]]></content:encoded>
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		<title>ब्लॉग लेखन से नए साहित्य का उदय हो रहा है, यह अद्भुत घटना है</title>
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		<pubDate>Wed, 06 Jul 2011 04:45:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[gauhar raza]]></category>
		<category><![CDATA[intarview]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8220;साहित्य का जहाँ तक ताल्लुक है वह रिफाइंड फॉर्म होता है। रिफाइंड फार्म हर ब्लॉग... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8220;साहित्य का जहाँ तक ताल्लुक है वह रिफाइंड फॉर्म होता है। रिफाइंड फार्म हर ब्लॉग व ब्लॉगर के लेखन को साहित्य नहीं कहा जा सकता है। वर्चुअल दुनिया की सम्पूर्ण विषय वस्तु साहित्य नहीं है। ब्लॉग लेखन से नए साहित्य का उदय हो रहा है, यह अद्भुत घटना है। साहित्य का लोकतान्त्रिक स्वरूप विकसित हो रहा है। ब्लॉग लेखन से उत्पन्न साहित्य प्रकाशक, वितरक, विज्ञापन दाताओं के दबाव से मुक्त है। यह साहित्य लोकतान्त्रिक  है। परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2011 के आयोजक श्री रवीन्द्र  प्रभात के प्रयास की सराहना करता हूँ । मैं आज हिंदी में ब्लॉग लेखन की शख्त आवश्यकता महसूस करता हूँ दुनिया की सबसे बड़ी जबान हिंदी है। हमारे देश में 35 % नवजवान जिनकी शिक्षा हिंदी जबान में होती है। 35% का अर्थ है कि करोडो-करोड़ लोग हिंदी दुनिया वर्चुअल दुनिया का हिस्सा अगर नहीं बनती है तो हम पिछ्ड जायेंगे।आपका प्रयास महत्वपूर्ण है आप अगुवा दस्ते का कार्य कर रहे हैं। यह प्रयास इस वजह से महत्वपूर्ण है कि आने वाले कल का नवजवान वर्चुअल वर्ल्ड से दूर नहीं रह सकता है या यूं कहे कि वह रह ही नहीं पायेगा। यह जिम्मेदारी पूर्ण कार्य है। मैं परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2011 की सफलता की कामना करता हूँ।&#8221;</span></h3>
<p><strong> </strong></p>
<div><strong><span style="color: #000099;"><strong><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/gauhar-raza-300x199.jpg" alt="gauhar raza" width="300" height="199" /></strong></span></strong></div>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000099;"><span style="color: #000000;">उ</span></span><span style="color: #000099;"><span style="color: #000000;">परोक्त विचार </span></span><span style="color: #000080;"><span style="color: #000000;">अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर</span> <span style="color: #0000ff;">श्री गौहर रजा </span><span style="color: #000000;">के हैं &#8230; गौहर रजा की ये बात हमारी [ब्लॉगर समाज की ] शक्तियों को प्रदर्शित करती है .हमें अपनी शक्तियों पर अब तो विश्वास हो ही जाना चाहिए ,हम बिलकुल निष्पक्ष और वास्तविकता के पक्षधर हैं .</span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;"><span style="color: #000000;"> </span></span><br />
<span style="color: #000099;"><span style="color: #0000ff;">श्री गौहर रजा</span> <span style="color: #000000;">साहब अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर, शिक्षाविद, वैज्ञानिक तथा जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर हैं,साथ हीं कई चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मों के निर्माता भी हैं, गौहर साहब यारों के यार हैं -बहुत दिलकश है उनका अंदाजे बयां वो चाहे विज्ञान का कोई सन्देश हो या हो जीवन का कोयी फलसफा !</span></span></h3>
<p><span style="color: #000099;"><strong> </strong></span></p>
<div><span style="color: #000099;"><span style="color: #000099;"><strong> </strong></span></span></div>
<h3><span style="color: #000099;"><span style="color: #000000;">विगत दिनों परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के मुख्य संपादक <span style="color: #0000ff;">श्री रवीन्द्र प्रभात </span>उनसे  जहांगीराबाद मीडिया </span><span style="color: #000000;">इंस्टिट्यूट में रूबरू हुए और परिकल्पना ब्लॉगोत्सव हेतु हिंदी ब्लोगिंग की दिशा-दशा पर खुलकर बात की, जो अपने आप में अनूठा है और आज के बदले हुए माहौल पर सशक्त टिपण्णी का ज्वलंत उदाहरण, लीजिये आप स्वयं सुनिए :</span></span></h3>
<h3><span style="color: #000099;"><span style="color: #000000;"><br />
</span></span>()बीस वर्षों से वर्चुअल दुनिया का इस्तेमाल बढ़ा है। रुढ़िवादी दुनिया इसका इस्तेमाल पहले से कर रही है&#8230;&#8230;&#8230;।<br />
()वर्चुअल टेक्नोलोज़ी में जबरदस्त सामर्थ्य है&#8230;&#8230;&#8230;।<br />
()वर्चुअल दुनिया की सम्पूर्ण विषय वस्तु साहित्य नहीं है &#8230;&#8230;&#8230;!</h3>
<h2><strong><span style="color: #0000ff;">(भाग-१)</span></strong></h2>
<h2><strong> </strong><br />
<object style="height: 390px; width: 640px;" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="100" height="100" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowScriptAccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/LlLHo20WDQg?version=3" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed style="height: 390px; width: 640px;" type="application/x-shockwave-flash" width="100" height="100" src="http://www.youtube.com/v/LlLHo20WDQg?version=3" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object><br />
<strong><span style="color: #0000ff;">(भाग-२)</span></strong><br />
<object style="height: 390px; width: 640px;" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="100" height="100" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowScriptAccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/IwjfZ9RBdWc?version=3" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed style="height: 390px; width: 640px;" type="application/x-shockwave-flash" width="100" height="100" src="http://www.youtube.com/v/IwjfZ9RBdWc?version=3" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></h2>
</p>]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>बेलफ़ास्ट से को  प्रवासी भारतीय शोध-छात्र श्री दीपक मशाल हुई बातचीत</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jul 2011 08:33:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>GIRISHBILLORE</dc:creator>
				<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[interview]]></category>

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		<description><![CDATA[परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के संपादन सहयोगी श्री गिरीश बिल्लोरे जी की दीपक मशाल से हुई बातचीत से संवंधित... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ad/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste">
<p><strong><span style="color: #000080;">परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के संपादन सहयोगी श्री गिरीश बिल्लोरे जी की दीपक  मशाल से हुई बातचीत से संवंधित वीडियो देखने से पहले आईये उनकी एक प्यारी सी लघुकथा  पर दृष्टि डाली जाए &#8230;.</span></strong></p>
</div>
<h3>शनि की छाया</h3>
<ul>
<li><strong>दीपक ‘मशाल’</strong></li>
</ul>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">पूजा के लिए सुबह मुँहअँधेरे उठ गया था वो, धरती पर पाँव रखने से पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन कर प्रातःस्मरण मंत्र गाया ‘कराग्रे बसते लक्ष्मी.. कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तु…..’. पिछली रात देर से काम से घर लौटे पड़ोसी को बेवजह जगा दिया अनजाने में.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">जनेऊ को कान में अटका सपरा-खोरा(नहाया-धोया), बाग़ से कुछ फूल, कुछ कलियाँ तोड़ लाया, अटारी पर से बच्चों से छुपा के रखे पेड़े निकाले और धूप, चन्दन, अगरबत्ती, अक्षत और जल के लोटे से सजी थाली ले मंदिर निकल गया. रस्ते में एक हड्डियों के ढाँचे जैसे खजैले कुत्ते को हाथ में लिए डंडे से मार के भगा दिया.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">ख़ुशी-ख़ुशी मंदिर पहुँच विधिवत पूजा अर्चना की और लौटते समय एक भिखारी के बढ़े हाथ को अनदेखा कर प्रसाद बचा कर घर ले आया. मन फिर भी शांत ना था…</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">शाम को एक ज्योतिषी जी के पास जाकर दुविधा बताई और हाथ की हथेली उसके सामने बिछा दी. ज्योतिषी का कहना था- ”आजकल तुम पर शनि की छाया है इसलिए की गई कोई पूजा नहीं लग रही.. मन अशांत होने का यही कारण है. अगले शनिवार को घर पर एक छोटा सा यज्ञ रख लो मैं पूरा करा दूंगा.”</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">‘अशांत मन’ की शांति के लिए उसने चुपचाप सहमती में सर हिला दिया.</div>
<div style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://mahavir.files.wordpress.com/2010/05/deepak-mashal-2.jpg" alt="" width="124" height="150" /></div>
<h3>() दीपक चौरसिया ‘मशाल’</h3>
<p><strong>संक्षिप्त परिचय :</strong><br />
२४ सितम्बर सन् १९८० को उत्तर प्रदेश के उरई जिले में जन्मे दीपक चौरसिया ‘मशाल’ की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के ही कोंच नामक स्थान पर हुई. बाद में आपने जैव-प्रौद्योगिकी में परास्नातक तक शिक्षा अध्ययन किया और वर्तमान में आप उत्तरी आयरलैंड (यू.के.) के क्वींस विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. शोध में संलग्न हैं. १४ वर्ष की आयु से ही आपने साहित्य रचना प्रारंभ कर दी थी. लघुकथा, व्यंग्य तथा निबंधों से प्रारंभ हुई. आपकी साहित्य यात्रा धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी तथा कहानियाँ तक पहुँची. साहित्य के अतिरिक्त चित्रकारी, अभिनय, पाक कला, समीक्षा निर्देशन तथा संगीत में आपकी गहरी रूचि है. तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपकी विविध विधाओं की रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. आपकी कविताओं में जहाँ एक ओर प्रेम की सहज संवेदना अभिव्यक्ति होती है वहीं सामाजिक सरोकार और विडम्बनाओं के प्रति कचोट स्पष्ट भी दिखाई देती है.इसी वर्ष आपकी कविताओं का संग्रह “अनुभूति” शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है.पुस्तक के लिए नीचे लिखे पते पर संपर्क कीजिए:</p>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><strong>शिवना प्रकाशन</strong></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">P.C. Lab, Samrat Complex Basement,</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">Opp. New Bus Stand, Sehore, M.P. 466001, India.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">Phone: +91-9977855399, +91-7562405545</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">E mail: shivnaprakashan@gmail.com</div>
<h3><span style="font-family: Arial;"><span style="line-height: normal;"><span style="color: #000080;">अब आईए सुनते हैं दीपक मशाल से हुईबातचीत के प्रमुख अंश</span></span></span></h3>
<h3><object id="bplayer" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="320" height="291" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="wmode" value="opaque" /><param name="src" value="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1307659" /><param name="name" value="bplayer" /><embed id="bplayer" type="application/x-shockwave-flash" width="320" height="291" src="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1307659" name="bplayer" wmode="opaque" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></h3>
<h3><span style="font-family: Arial;"><span style="line-height: normal;"></p>
<p></span></span></h3>
</p>]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>समीर लाल बवाल सलिल समाधिया का कौतुहल</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Jul 2011 05:24:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>GIRISHBILLORE</dc:creator>
				<category><![CDATA[सीधी बात]]></category>
		<category><![CDATA[interview]]></category>
		<category><![CDATA[vidio]]></category>

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		<description><![CDATA[लाल और बबाल की जुगलबंदी से पूरा हिंदी ब्लॉगजगत वाकिफ है, आज गिरीश बिल्लोरे एक... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%af/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><img class="aligncenter" src="http://1.bp.blogspot.com/_g913jq_Eces/SQ2lPPNNoBI/AAAAAAAAAGg/Qw4q4-S7F7o/S240/Lalnbavaal.JPG" alt="लाल एण्ड बवाल" width="200" height="150" />लाल और बबाल की जुगलबंदी से पूरा हिंदी ब्लॉगजगत वाकिफ है, आज गिरीश बिल्लोरे एक साथ समीर लाल बवाल सलिल समाधिया से सीधी बात कर रहे हैं , आईये आप भी शामिल होईए &#8230;!<br />
<object id="bplayer" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="320" height="291" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowfullscreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="wmode" value="opaque" /><param name="src" value="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1196730" /><param name="name" value="bplayer" /><embed id="bplayer" type="application/x-shockwave-flash" width="320" height="291" src="http://static.bambuser.com/r/player.swf?vid=1196730" name="bplayer" wmode="opaque" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></h3>
</p>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%af/feed/</wfw:commentRss>
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