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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव &#187; कहे कबीर</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>कबीरदास की साखियाँ</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Aug 2011 06:30:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[kabir]]></category>

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		<description><![CDATA[संत कबीरदास जी कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक थे.उन्होंने अपने काव्य में सामाजिक कुरीतियों और... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/08/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">
<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_6009" class="wp-caption alignright" style="width: 260px;">
<dt class="wp-caption-dt"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/Photo-of-Kabir1.jpg"><img class="size-thumbnail wp-image-6009 " title="Photo of Kabir" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/08/Photo-of-Kabir1-150x150.jpg" alt="" width="200" height="200" /></a></dt>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #800000;"><span style="font-weight: normal;">संत कबीरदास जी कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक थे.उन्होंने अपने </span><span style="font-weight: normal;">काव्य में  सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक आडम्बरों के खिलाफ काफी  कटाक्ष किया है .कबीर का जन्म 1297 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ ,वे निडर और खरा खरा बोलने वाले कवि थे. </span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #008000;">प्रस्तुत है :</span></h3>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #993366;">उनकी लिखी 50 साखियाँ</span> </span></h3>
</dl>
</div>
</h3>
<h3>दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय ।<br />
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥</h3>
<h3>तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय  ।<br />
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥</h3>
<h3>माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर  ।<br />
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥</h3>
<h3>गुरु  गोविन्द  दोनों  खड़े, काके लागूं पाँय     ।<br />
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥</h3>
<h3>बलिहारी  गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।<br />
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥</h3>
<h3>कबिरा   माला मनहि की, और संसारी भीख ।<br />
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥</h3>
<h3>सुख मे सुमिरन ना किया दु:ख में किया याद ।<br />
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥</h3>
<h3>साईं इतना  दीजिये, जा  मे कुटुम  समाय ।<br />
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥</h3>
<h3>लूट सके  तो लूट  ले, राम  नाम   की  लूट ।<br />
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥</p>
<p>जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।<br />
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥</p>
<p>जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।<br />
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥</p>
<p>धीरे &#8211; धीरे  रे  मना ,  धीरे सब कुछ होय ।<br />
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥</p>
<p>कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।<br />
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥</p>
<p>पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।<br />
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥</p>
<p>कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।<br />
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥</p>
<p>शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।<br />
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥</p>
<p>माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।<br />
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥</p>
<p>माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।<br />
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥</p>
<p>रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।<br />
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥</p>
<p>नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।<br />
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥</p>
<p>जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।<br />
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥</p>
<p>दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।<br />
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥</p>
<p>आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।<br />
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥</p>
<p>काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।<br />
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥</p>
<p>माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।<br />
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥</p>
<p>जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।<br />
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥</p>
<p>माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।<br />
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥</p>
<p>आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।<br />
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥</p>
<p>क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।<br />
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥</p>
<p>गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।<br />
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥</p>
<p>दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।<br />
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥</p>
<p>दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।<br />
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥</p>
<p>दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन ।<br />
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥</p>
<p>ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय ।<br />
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥</p>
<p>हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।<br />
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥</p>
<p>कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार ।<br />
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥</p>
<p>जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।<br />
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥</p>
<p>मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय ।<br />
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥</p>
<p>सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।<br />
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥</p>
<p>अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।<br />
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥</p>
<p>बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।<br />
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥</p>
<p>अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।<br />
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥</p>
<p>कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय ।<br />
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥</p>
<p>पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप ।<br />
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥</p>
<p>बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।<br />
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥</p>
<p>हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध ।<br />
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥</p>
<p>राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।<br />
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥</p>
<p>जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।<br />
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥</p>
<p>तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।<br />
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥</p>
<p>सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।<br />
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥</h3>
<h3><span style="color: #993366;">और अब आइये सुनते हैं कबीर की कुछ साखियाँ :</span><object style="height: 390px; width: 640px;" classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="100" height="100" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowScriptAccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/EOTFJCFeO4c?version=3" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed style="height: 390px; width: 640px;" type="application/x-shockwave-flash" width="100" height="100" src="http://www.youtube.com/v/EOTFJCFeO4c?version=3" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></h3>
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		<title>तर्क और तकरार&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jul 2011 06:05:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[संत कबीर के बारे में यह धारणा आम थी की उनका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/-SiIBe_X-7W8/TaKcB60lJaI/AAAAAAAAAo4/-VNtUUkuQcY/s1600/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25A8+%25E0%25A4%259C%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25A1%25E0%25A5%2580.jpg" alt="" width="197" height="132" />संत कबीर के बारे में यह धारणा आम थी की उनका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी है और उन पति-पत्नी के बीच कभी झगडा नहीं होता है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
एक जिज्ञासु इसका राज जानने कबीर के पास पहुँचे और उनसे अपनी जिज्ञासा जाहिर की- मैंने सुन रखा है कि आपका अपनी पत्नी के साथ कभी कोई अनबन या झगडा नहीं होता है । आखिर ऐसा कैसे सम्भव है ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
कबीर ने उन सज्जन को बैठाकर अपनी पत्नी को आवाज दी और उससे कंडील जलाकर लाने को कहा- पत्नी ने कंडील जलाकर वहाँ लाकर रख दिया । तब कबीर ने पत्नी से उन मेहमान को पिलाने के लिये पानी मंगवाया. पत्नी ने पीने का पानी लाकर भी दे दिया जिसे कबीर ने उन आगन्तुक महोदय को पिलाने के बाद उनसे पूछा- मैंने आपको हमारे बीच तकरार नहीं होने का कारण बता दिया है । उम्मीद है आपको भी इससे लाभ हो सकेगा ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><img class="alignright" src="http://3.bp.blogspot.com/-mk8H2jkITno/TaKcnP8hI7I/AAAAAAAAAo8/6xg8nV7ykHY/s1600/%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25AC%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25B02.jpg" alt="" width="117" height="166" /><br />
जिज्ञासु आगंतुक विस्मित मुद्रा में कबीर से बोला- कहाँ ? अभी तक तो आपने मेरे प्रश्न का कोई उत्तर ही नहीं दिया । मैं कैसे समझ सकता हूँ कि आप क्या समझाना चाहते हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
तब कबीर ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए उन्हें बताया- इस समय शाम शुरु हो रही है और रात का अंधेरा होने में अभी कई घंटे बाकि है । ऐसी स्थिति में जब मैंने अपनी पत्नी से कंडील जलाकर लाने को कहा तो उसने मुझसे कोई पूछताछ या तर्क नहीं किया कि इस समय मैं जलते हुए कंडील का क्या करुंगा ? बस मैंने मांगा और उसने लाकर दे दिया ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
वैसे ही यदि वह मुझसे किसी काम के लिये बोलती है तो मैं भी बिना किसी तर्क के उसका बताया हुआ काम कर देता हूँ और जब हमारे बीच में अकारण के तर्क या ऐसा क्यूं जैसी कोई पूछताछ नहीं चलती तो फिर किसी प्रकार की तकरार का  भी कोई कारण हमारे बीच नहीं रहता और इसीलिये लोगों को हमारा दाम्पत्य जीवन सुखी दिखता है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><br />
</span></h3>
<h2><img class="alignleft" src="http://4.bp.blogspot.com/-x0NdmSo6Zc4/Tenr0z7VTYI/AAAAAAAAAwU/NuqQ1qNMtSc/s220/papa%2Bsmall%2B1%25E0%25A5%258B.JPG" alt="My Photo" width="163" height="176" />सुशील बाकलीवाल</h2>
<p><a href="http://najariya.blogspot.com/">http://najariya.blogspot.com/</a></p>
<p><a href="http://swasthya-sukh.blogspot.com/">http://swasthya-sukh.blogspot.com/</a></p>
<p><a href="http://jindagikerang.blogspot.com/">http://jindagikerang.blogspot.com/</a></p>
<p><a href="http://jindagikerang.blogspot.com/"></a>अक्षर जुड-जुड शब्द बनें, शब्द जुडें बनें वाक्य. वाक्य जुडें जब पंक्ति में, तो दिखने लगें विचार ।अक्षरों व शब्दों के जोड-तोड का 42 वर्षीय सफर. &#8216;प्रभुकृपा&#8217;   586, कालानी नगर,  इन्दौर- 452005. (म. प्र.)</p>
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		<title>कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे ।</title>
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		<pubDate>Fri, 22 Jul 2011 04:48:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[मूल्यांकन प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%b8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="text-decoration: underline;">मूल्यांकन</span></h4>
<p style="text-align: justify;">प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रतिरोध के सबसे देसी प्रतीक हैं? जब भी संघर्ष पर उतरता है कबीर की तरह लगने या कहलाने लगता है। ऐसी क्या बात रही है कबीर में कि वे आज के पल-पल बदलते प्रेरणास्त्रोंतों आदर्शों के दौर में भी स्थायी भाव से टिके हुए हैं। युवाओं को भी कबीर वैसे ही आकर्षित करते हैं जैसे उन पर शोध करने वालों को। कई बार लगता है कि कबीर को जितना उन्हें जाननेवाले विद्वान नहीं जीते उससे कहीं ज्यादा कबीर को आमजन जीता है। किसी भी घुटन भरे मकान से निकलने के लिए कबीर खिड़की का काम करते हैं। इसीलिए उनकी पहचान जातिधर्म की नहीं है। आंखें बंद कर कबीर की कल्पना कीजिए तो किसी तस्वीर का अहसास नहीं होता बल्कि उनकी बानी सुनाई देती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" src="http://bargad.files.wordpress.com/2010/09/akath-kahani-prem-ki-september-2.jpg?w=600&amp;h=438" alt="" width="360" height="263" />प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक किताब आई है। अकथ कहानी प्रेम की। इस किताब को पढ़ते समय आज का समय ज्यादा दिखाई देने लगता है। पुरुषोत्तम के कबीर भले ही देशज आधुनिकता के प्रतीक हैं मगर आमजन के कबीर उदारीकरण से गढ़े गए आज के समय के आधुनिक हैं। कबीर की मौजूदगी उपभोगी समाज की आधुनिकता पर सवाल हैं। जो समझौतावादी समाज की संरचना कर रहा है उसमें कबीर बगावत के प्रतीक बन जाते हैं। कबीर जैसा होना अपनी आधुनिकता का भारतीयकरण करना है। जब भी आप जन्मजात गैरबराबरी को चुनौती देने लगते हैं कबीर की तरह बनने लगते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी किताब में एक सवाल किया है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं थीं जो ब्राह्मणों के तथाकथित शाश्वत वर्चस्व को तोड़ते हुए कबीर को हीरो बनाती थीं। मेरा सवाल है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं हैं जो कबीर को शाश्वत बनाती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जात जुलाहा मति का धीर। वो अपनी सामाजिक हैसियत पर व्यंग्य करते हैं मगर हैसियत पाने की चाहत भी नहीं रखते। एक सामान्य की रचना करते हैं। आज के समय में जब गैरबराबरी के नए-नए ढांचे बन गए हैं कबीर अपने व्यंग्यों के पुराने हथियारों से ही लड़ने में सक्षम बनाते हैं। विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कबीर ने पंद्रहवी सदी में मानवाधिकार की बात की। इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे। इस बेहतरीन किताब को पढ़ने से पहले अपने आस पास के समाज को ठीक से देखिये और फिर उनके बीच बनते-बिगड़ते कबीर को खोजने की कोशिश कीजिए। आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।</p>
<h3><img class="alignleft" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SH7ENzE8UaI/AAAAAAAACuQ/csuE6_XrBlU/s200/IMG00591.jpg" alt="" width="200" height="150" /></h3>
<h3>रवीश कुमार</h3>
<p style="text-align: justify;">एन.डी.टी.वी. इंडिया के जाने-माने रिपोर्टर हैं और अपनी खास तरह की बेबाक और सधी हुई रिपोर्टों के लिए जाने जाते हैं। अभी हाल ही में उन्‍हें बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवॉर्ड से सम्‍मानित किया गया है।<strong>कस्बा नाम से उनका एक ब्लॉग है जो काफी चर्चित है। </strong><strong>उन्होंने </strong>जब कस्‍बा नाम से अपना ब्‍लॉग शुरू किया तो उनकी रिपोर्टों के प्रशंसकों को कुछ अच्‍छा पढ़ने का एक और माध्‍यम मिल गया।</p>
<p>(राजस्थान पत्रिका<strong> से साभार)</strong></p>
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		<title>कबीर और मैं</title>
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		<pubDate>Fri, 15 Jul 2011 07:49:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[kahe kabeer]]></category>
		<category><![CDATA[kahe kabir]]></category>

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		<description><![CDATA[कबीर कवि और समाज सुधारक थे &#8211; निर्भीक कवि , निर्भीक सुधारक . मैं लिख... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/Sant-Kabir-Das-1990-12-300x240.jpg" alt="Sant-Kabir-Das-1990 (1)" width="300" height="240" />कबीर कवि और समाज सुधारक थे &#8211; निर्भीक कवि , निर्भीक सुधारक . मैं लिख लेता हूँ , समाज में गुरु से मिले आशीष  बाँट  भी  लेता हूँ , पर  मुक्त  नहीं  हो  पता  ! मुक्ति  असंभव  नहीं , तो इतना आसान भी नहीं .पर जानना होगा मुक्ति का गहन अर्थ !</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
&#8216;मुक्ति &#8216; का अर्थ क्या है ? क्या मोह से परे हो जाना मुक्ति है &#8211; मैं नहीं समझता . मोह ही तो ज्ञान है , आंतरिक उद्वेलन है , खुद को परखने का मार्ग है &#8230;. हाँ , खुद को जानकर जब हम दुनिया की भीड़ में हम कुछ देना चाहते हैं और उसका दंभ भरते हैं तो मुक्ति नहीं . दंभ कब आता है , जब हम पात्रता निश्चित नहीं कर पाते . हमने ईश्वर से जो भी लिया अधूरा लिया &#8230;. और अधूरे ज्ञान में हम पात्रता नहीं तय कर पाते , बस भयभीत रहते हैं ! प्रभु पात्रता देखकर चलते हैं , ऐसा नहीं होता तो अर्जुन , कर्ण , दुर्योधन के साथ प्रभु के सम व्यवहार होता &#8230;. मुक्ति स्वयं के संकुचित विचारों से होती है , और तब हम सही चयन करते हैं !</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
सच है मुक्ति का मार्ग ! एक झूठ कठिनाइयों के रास्ते मकड़ी के जाले सा बनाता जाता है , अपनी उलझनें खुद बढ़कर हम चीखते हैं , खुद को सही बताने के लिए क्रोध का सहारा लेते हैं .</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
ईमानदारी है मुक्ति का मार्ग ! किसी भी रिश्ते , किसी भी कार्य में जब झूठ की मिलावट कर हम बेईमानी करते हैं तो मुक्त नहीं हो पाते और जब तक हम खुद के विचलन से मुक्त नहीं , न गुरु गोविन्द नज़र आते हैं , न सही साधू , न उसकी भूख , न वृक्ष की भाषा समझ में आती है .</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
कबीर ने कहा -<br />
माला फेरत जुग हुआ गया ना मन का फेर रे ।<br />
गया ना मन का फेर रे ।<br />
हाथ का मनका छाँड़ि दे मन का मनका फेर ॥&#8230;..  &#8216;  यही हम नहीं समझ पाते . मन के मनके हैं पर हम बहरी मनकों की मालाओं में उलझे हुए हैं .</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कस्तुरी कुँडली बसै, मृग ढ़ुढ़े बन  माहिँ.<br />
ऎसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ..&#8217;   हमारा  सबकुछ  हमारे  भीतर  है , पर हम दूसरों से लेने   , यूँ  कहें  छिनने  को तत्पर  हैं .</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर.<br />
परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर&#8230;&#8217;   हमने जो पाया है उसे छुपा लें तो कैसी मुक्ति &#8230;. ईश्वर ने कण कण में ज्ञान दिया है , &#8211; हम भी वृक्ष और नदी की तरह तो हैं ,पर स्वार्थ का बाँध, कंटीला बाड़ लगा देते हैं . इसकी शाब्दिकता से उबरें &#8230;. वृक्ष अपना फल खुद नहीं खाता , पर जब गलत हाथ उस पर पड़ते हैं तो वृक्ष के फल स्वतः अन्दर से सड़ जाते हैं . नदी अपना जल खुद नहीं पीती , पर सूख जाती है, दिशा बदल लेती है . परमारथ अर्थपूर्ण हो , समभाव आपके अस्तित्व पर प्रश्न खड़े कर देगा .<br />
कबीर  और मैं कहने से मेरा अर्थ है &#8230;. कबीर को यूँ हीं नहीं पढ़ो , अपने मैं का आकलन करो &#8211; फिर हम और तुम भी कह सकेंगे ,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सोना सज्जन साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार.<br />
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धकै दरार..</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि.<br />
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि..</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>निम्न पंक्तियों में मैं और कबीर का अंतर है &#8211; </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>`कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर ।<br />
तब पैंडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर ,कबीर ॥1॥ </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भावार्थ &#8211; कबीर कहते हैं -मेरा मन जब मर गया और शरीर सूखकर कांटा हो गया, तब,<br />
हरि मेरे पीछे लगे फिरने मेरा नाम पुकार-पुकारकर-`अय कबीर ! अय कबीर !&#8217;- उलटे वह मेरा जप करने लगे । </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जब मानव के अहंकार का भाव मिट जाता है तब वह तत्व दर्शन का अधिकारी बन जाता है। अन्यथा मनुष्य कितने भी प्रयत्न कर ले, वह तत्व का दर्शन नहीं कर सकता है। चाहे जितना दान, पुण्य, सेवा, तपस्या करे, वेदांत का महान विद्वान बन जाए तो भी तत्व का दर्शन अहंकार का त्याग किए बिना संभव नहीं है। दान, पुण्य, सेवा आदि जितने भी कर्म हैं वे सारे के सारे अहंकार को मिटाने में सहायक तो हैं लेकिन तत्वदर्शी बनाने के साधन नहीं हैं। </strong></p>
<h2><strong>सुमन सिन्हा </strong></h2>
]]></content:encoded>
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		<title>चुभ-चुभ कर भीतर चुभे, ऐसे कहे कबीर.</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Jul 2011 06:12:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[gagan sharma]]></category>
		<category><![CDATA[kahe kabeer]]></category>

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		<description><![CDATA[महाभारत काल में माँ के द्वारा त्यागे जाने और फिर अधिरथ द्वारा पाले जाने वाले... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%87-%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Sadgurukabir.JPG"><img class="alignleft" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/63/Sadgurukabir.JPG/220px-Sadgurukabir.JPG" alt="Sadgurukabir.JPG" width="220" height="310" /></a>महाभारत काल में माँ के द्वारा त्यागे जाने और फिर अधिरथ द्वारा पाले जाने वाले कर्ण ने जैसे उस युग में अपनी गौरव गाथा फैलाई थी उसी प्रकार कबीर ने अपनी जननी द्वारा त्यागे जाने और जुलाहा परिवार में परवरिश पाने के बाद भक्ति काव्यधारा में अपने नाम को सूर्य की भांति स्थापित कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">संसार में ऐसे अनेक साहित्यकार हुए हैं जो अपने युग से प्रभावित ना हो युग को ही प्रभावित करते रहे हैं। निर्गुण संप्रदाय के प्रतिनिधी संत कबीर ऐसे ही लोकचेता कवि थे। जाति संप्रदाय से उपर उठ कर उन्होंने मनुष्य धर्म को प्रतिष्ठित किया। वे युगांतकारी संत, दार्शनिक, कवि एवं समाजसुधारक थे। उनकी सपूर्ण काव्य रचना “ बीजक” नामक ग्रंथ में संकलित है।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर के जन्म पर विद्वान एकमत नहीं हैं। जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म 1453 ई। में बनारस में एक विधवा ब्राह्मणी के यहां हुआ था। लोकलाज के ड़र से जननी के द्वारा नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़ देने के पश्चात नीरू-नीमा जुलाहा दंपत्ति ने वहां से ला कर अपने घर में उनका पालन-पोषण किया। कबीर की शिक्षा घर की हालत और गरीबी के कारण ठीक से नहीं हो पाई थी। उन्हीं के अनुसार “मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहीं हाथ”। पर बौद्धिक विलक्षणता उनमें कूट-कूट कर भरी हुए थी। उन पर स्वामी रामानंद के विचारों का बहुत प्रभाव था। कबीर उन्हें ही अपना गुरु मान अपने विचार लोकार्पित करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर ने धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंड़ों पर निर्मम प्रहार किए पर साथ ही उनकी समरसता और एकात्म्यता पर भी जोर दिया। उन्होंने भगवान राम को “अनहदनूर” कह कर हिन्दु-मुस्लिम धर्मों की सभ्यता को रेखाकिंत किया। यह विशाल और शाश्वत भाव किसी और के पास नहीं था। इसीलिए सैकड़ों लोग उनके मुरीद बन गये। हिन्दु मुसलमान समान रूप से उनकी जमात में शामिल हो गये। आज कबीर पंथी भारत में ही नहीं विदेशों में भी फैले हुए हैं। कबीर पंथ सुदूर फीजी तथा मारिशस तक अपनी शाखाओं द्वारा लोगों में धर्म समभाव का प्रसार कर रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर ने कविताएं नहीं लिखीं अपने विचार प्रकट किये हैं। वे मस्त मौला थे, जो दिल में आता था स्पष्ट कह देते थे। तभी तो कहते हैं “चुभ-चुभ कर भीतर चुभे ऐसे कहे कबीर”। उनके लिये सब बराबर थे। सभी खुदा के बंदे थे। उनका चिंतन लोकहित में होता था – “सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय। का पर दया कीजिए, का पर निर्दय होय।”</p>
<p style="text-align: justify;">उन्हें सभी धर्मों के लोग प्रेम करते थे। वे मुसलमान नहीं थे, हिन्दु हो कर हिन्दु नहीं थे, साधू हो कर गृहस्थ नहीं थे, योगी हो कर भी योगी नहीं थे। पर विड़ंबना यह रही कि कुछ तंगदिल अनुयायियों ने सांप्रदायिक सौहार्द के इस प्रतीक के अवसान के बाद उनके हिन्दु मुस्लिम होने को ले संघर्ष शुरु कर दिया। कहते हैं कि उनका शव फूलों के ढेर में तब्दील हो गया जिसे आधा आधा बांट हिन्दु तथा मुस्लिम रस्मों के अनुसार अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद भी आपसी वैमनस्य खत्म नहीं हुआ तो मजार और समाधि के बीच दिवार खड़ी कर दी गयी। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर अपने जीवन काल में ही कह गये थे -“कबीरा तेरी झोपड़ी गलकटियन के पास, करनगे सो भरनगे तू क्यों होत उदास&#8221;।</p>
<p style="text-align: justify;">साहेब बंदगी साहेब।</p>
<h2 style="text-align: justify;"><a href="http://2.bp.blogspot.com/-QnzlnAl_QSY/TfcHGiLyESI/AAAAAAAAAiU/aS5PYkDptqI/s220-h/papa.jpg"><img id="profile-photo" class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/-QnzlnAl_QSY/TfcHGiLyESI/AAAAAAAAAiU/aS5PYkDptqI/s220/papa.jpg" alt="My Photo" width="85" height="113" /></a></h2>
<h2 style="text-align: justify;">गगन शर्मा</h2>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://kuchhalagsa.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html">http://kuchhalagsa.blogspot.com/</a></p>
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		<title>सुख में सुमिरन &#8230;.</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Jul 2011 07:46:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[kahe kabir]]></category>

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		<description><![CDATA[कबीर रहता है मेरे मन में खड़ा होता है भरी भीड़ में टूटते भंग होते... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.parikalpna.com/?attachment_id=5024" target="_blank"><img class="alignleft" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2011/07/sant-kabir-das-325_061411103023-150x150.jpg" alt="" /></a>कबीर रहता है मेरे मन में<br />
खड़ा होता है भरी भीड़ में<br />
टूटते भंग होते मोह को देख<br />
रोता है जार जार<br />
सन्नाटे में कहती है उसकी सिसकियाँ<br />
&#8216;साबुत बचा न कोय &#8216;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<p><strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.सुख में सुमिरन &#8230;.&#8217; इस विषय पर लिखने का प्रयास किया है.सार सिर्फ इतना सा है कि अगर अपने सुख के पलों में हम ईश्वर को याद करते हुए अपने आस पास महसूस करते रहें तो आज हम परेशानियों से या तो बचे रहेंगे या उन से पार पा लेंगे.</strong></p>
<h2>क्यों भूल गया तुम को?</h2>
<h3>उस क्षण !<br />
मैंने तुमको<br />
किया था<br />
याद बहुत<br />
जब<br />
गहरे अंधेरों में<br />
खुद को<br />
डूबता पाया था</h3>
<h3>उस क्षण !<br />
जब मैं गिन रहा था<br />
साँसे<br />
गुमनामी की<br />
रोग शैय्या पर<br />
लेटे हुए<br />
मैं याद करता था<br />
तुम को</h3>
<h3>उस क्षण !<br />
जब मेरे अपने<br />
होते जा रहे थे दूर<br />
नाज़ुक से<br />
मुलायम हाथों को<br />
छिटक कर</h3>
<h3>मैं<br />
हाथ जोड़े खड़ा था<br />
तुम्हारे सामने</h3>
<h3>समय का<br />
तेज चलता पहिया<br />
न जाने<br />
कब वो दिन बीत गए<br />
पूरे होते सपनों की उड़ान में<br />
अनोखी आशाओं के<br />
मखमली बिस्तर पर<br />
मैं भूल गया था<br />
तुमको</h3>
<h3>और अब<br />
फिर झेल रहा हूँ<br />
झंझावातों को<br />
खड़ा हूँ<br />
हाथ जोड़े<br />
तुम्हारे सामने<br />
झुकी नजरों से<br />
मांग रहा हूँ<br />
आसरा<br />
तुम्हारे आँचल में</h3>
<h3>मैं शरमा रहा हूँ<br />
कुछ भी कहने में<br />
तुम्हारी मूरत से<br />
नज़र मिलाने का साहस<br />
अब नहीं रहा</h3>
<h3>काश !<br />
उसी तरह तुमको<br />
रखता साथ<br />
मन के भीतर<br />
किसी कोने में<br />
तो शायद<br />
मेरा आज<br />
आज न होता<br />
जी रहा होता<br />
मैं<br />
सुनहरे बीते कल को<br />
आज बना कर</h3>
<h3>कर रहा हूँ<br />
खुद से एक प्रश्न<br />
क्यों भूल गया तुम को ?<br />
उन पलों में .</h3>
<h2>यशवन्त माथुर</h2>
<p><a href="http://jomeramankahe.blogspot.com">http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/</p>
<p>http://jomeramankahe.blogspot.com</a></p>
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		<item>
		<title>कहे कबीर&#8230;&#8230;.उँगलियॉ बेचैन हैं ज़ख्म कुरेदने वाले&#8230;!</title>
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		<pubDate>Wed, 06 Jul 2011 06:01:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[m.verma]]></category>
		<category><![CDATA[poem]]></category>

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		<description><![CDATA[रुदन और क्रंदन तभी सार्थक हैं जब दिलासे की थपथपाहट मिले दर्द का बयां तब... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%81%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%89-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5573929026783061490" class="aligncenter" src="http://3.bp.blogspot.com/-gqxaPzXEUxY/TVqS6vykpfI/AAAAAAAACB0/uoV_a_zT868/s400/391452194_7bd659bf92.jpg" border="0" alt="" width="400" height="300" /></h3>
<h3>रुदन और क्रंदन तभी सार्थक हैं<br />
जब दिलासे की थपथपाहट मिले<br />
दर्द का बयां तब करो<br />
जब संवेदना की आहट मिले &#8230;  पर  कभी कभी  &#8230;  कई  बार  अकुलाहट  में  आहटें  धोखा  कर  जाती  हैं  , और  यह भी  याद  नहीं  रहता  कि  सुनी  इठ्लैहें  लोग  सब  बाँट  ना  लैहें  कोय &#8230;</h3>
<h2>उँगलियॉ बेचैन हैं ज़ख्म कुरेदने वाले&#8212;</h2>
<h4>मत करो प्रश्न<br />
उत्तर नहीं पाओगे<br />
और फिर निरुत्तर रहकर<br />
ख़ुद ही पर झुंझलाओगे<br />
प्रतिउत्तर में आएंगे<br />
सैकड़ो प्रश्नों के जाल<br />
और फिर तुम्हारा अस्तित्व ही<br />
बन जाएगा एक सवाल<br />
क्या हुआ गर प्रहरी सो गया<br />
मत ढूढो गर तुम्हारा कुछ खो गया<br />
बचा सको तो बचा लो<br />
तुम्हारे पास जो कुछ बचा है<br />
खोये को ढूढ़ते ढूढ़ते तुम<br />
बचे को भी खो दोगे<br />
अपने हालात पर फिर<br />
फूट फूट कर रो दोगे<br />
रुदन और क्रंदन तभी सार्थक हैं<br />
जब दिलासे की थपथपाहट मिले<br />
दर्द का बयां तब करो<br />
जब संवेदना की आहट मिले<br />
नमक मल देंगे वे<br />
गर दिखलाओगे छाले<br />
अपने ज़ख्म मत दिखलाओ<br />
उँगलियॉ बेचैन हैं<br />
ज़ख्म कुरेदने वालों की<br />
जो करना है करो<br />
पर प्रश्न मत करो<br />
उत्तर नहीं पाओगे<br />
और फिर निरुत्तर रहकर<br />
ख़ुद ही पर झुंझलाओगे</h4>
<h4>M VERMA<br />
<a href="http://ghazal-geet.blogspot.com/"> http://ghazal-geet.blogspot.com/</a></h4>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>दिया कबीरा रोये</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jul 2011 08:12:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[कबीर की वाणी कबीर का नाम कबीर की ख्वाहिश और चलती चक्की से भी तेज... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/07/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%af%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="font-weight: normal;"><img class="aligncenter" src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2010/05/s_kabir1.gif?w=308" alt="कबीर दास--ओशो" width="308" height="265" />कबीर की वाणी</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> कबीर का नाम</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> कबीर की ख्वाहिश</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> और चलती चक्की से भी तेज चलता समय &#8230;.</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> अब तो साई इतना देते हैं</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> कि चाहो तो कई लोग न भूखे जाएँ !</span><br />
पर सिमट चला है दृष्टिकोण<br />
सिमट चली हैं चाहतें<br />
संकुचित मन &#8230;.<br />
न साधू रहे वैसे<br />
ना घर रहे वैसे !<br />
पहले खुले दरवाज़े से<br />
मांग के स्वर<br />
गृहिणी तक पहुँच जाते थे<br />
और अन्नपूर्णा सी स्त्री<br />
अपने हाथ से दान दे<br />
आशीषें बटोरती थी &#8230;.<br />
अब पहली मंजिल के दरवाज़े तक नहीं दिखते<br />
ना ऊँची सोसाइटी में साधू का प्रवेश होता है<br />
भिक्षाटन भी सट्टे का गेम हो गया है<br />
&#8230;. भरी भीड़ में खड़ा खड़ा<br />
दिया कबीरा रोये<br />
&#8230;. खाली खाली आँखों में<br />
साया बचा न कोय !!!<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230; उथलपुथल मेरे ही भीतर नहीं हर तरफ है , पाते हैं कुछ और रंजना जी के शब्दों में -<br />
ऐसी बानी बोलिए , मन का आपा खोए<br />
औरन को सीतल करे , आपहुँ सीतल होए&#8230;।&#8221;</h4>
<h4>
कबीर जी का यह दोहा अपन अन्दर बहुत सुन्दर अर्थ समेटे हुए है | बोलना  सिर्फ मनुष्य को मिला है और अपनी बोली से ही वह अपने  मित्र और अपने दुश्मन बना लेता है<br />
यह दोहा अक्सर लोग तब दोहराया जाता है  जब उनके सामने कोई गुस्से में आकर किसी के लिए अपशब्द प्रयोग करने लगता है  और वे उसे शान्त करना चाहते हैं  । कई बार इसका एक जादुई-सा असर हो भी जाता था और उस व्यक्ति का गुस्सा इतना तो ठण्डा हो ही जाता था , कि वह सही-ग़लत का फ़र्क समझ सके ।</h4>
<h4>पर आज कल के समय में तो लगता है यही सही है<br />
ऐसी बानी बोलिए, जम कर झगड़ा होए<br />
पर उससे ना बोलिए, जो आप से तगड़ा होए !!<br />
आज कल कोई किसी कि नहीं सुनना चाहता है | वह जो बोल रहा है वही सही है मीठी बोली सिर्फ मतलब हो तो बोली जाती है | आज कल के नेता राजनेता इसी तरह की मतलबी बोली बोलते हैं और जनता को बेवकूफ बनाते हैं |<br />
कबीर जी का यह दोहा बदलते वक़्त के साथ लगता है बदल सा गया है<br />
संत कबीर कह गये हैं : शीतल शब्द उचारिये, अहं आनिये नाहिं।<br />
किसी भी मन को शीतल करने वाले शब्द बोलने का अभ्यास करने से मन में कठोर शब्दों को लाने का भाव कम होता जाता है। वस्तुतः कठोर शब्द अपनाने की आवश्यकता होती नहीं, किंतु मधुर वचन कहने का अभ्यास न होने की वजह से कठोर शब्द आसानी से प्रकट हो जाते हैं।<br />
वाणी का एक स्वरूप बिना कुछ कहे अपनी महत्ता जाताना भी है।इस लिए अपने मन के भाव कोमल रखिये तभी वह जब जुबान से निकेलंगे तो सामने वाले को मीठे लगेंगे |</h4>
<h3><a href="http://1.bp.blogspot.com/-6PXJ-6Na8o8/ThF01wmMzAI/AAAAAAAAFvM/ORzzoiBuaq4/s1600/ranjana+bhatiya.jpg"><img class="alignleft" style="border: 0px initial initial;" src="http://1.bp.blogspot.com/-6PXJ-6Na8o8/ThF01wmMzAI/AAAAAAAAFvM/ORzzoiBuaq4/s1600/ranjana+bhatiya.jpg" border="0" alt="" width="96" height="96" /></a>रंजना भाटिया</h3>
<h4><a href="http://ranjanabhatia.blogspot.com/">http://ranjanabhatia.blogspot.com/</a></h4>
<h4><a href="http://ranjanabhatia.blogspot.com/"></a><a href="http://amritapritamhindi.blogspot.com/">http://amritapritamhindi.blogspot.com/</a></h4>
<h4><a href="http://poetrysaaya.blogspot.com/">http://poetrysaaya.blogspot.com/</a></h4>
<h4><a href="http://www.kavitakosh.org/ranjanabhatia">http://www.kavitakosh.org/ranjanabhatia </a></h4>
<h4><a href="http://knol.google.com/k/ranjana-bhatia/...">http://knol.google.com/k/ranjana-bhatia/&#8230;</a></h4>
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		<item>
		<title>&#8216;कबिरा खड़ा बजार में&#8217;</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Jun 2011 06:02:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[giriraj sharan]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8216;कबिरा&#8217; अब बाज़ार में खड़ा होकर सबकी ख़ैर नहीं माँगता। वह अपने काम का पैसा... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/06/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" style="border: 0px initial initial;" src="http://www.kavitakosh.org/kk/images/thumb/d/d7/Kabir.gif/140px-Kabir.gif" border="0" alt="" width="140" height="139" />&#8216;कबिरा&#8217; अब बाज़ार में खड़ा होकर सबकी ख़ैर नहीं माँगता। वह अपने काम का पैसा माँगता है। यह कोई मेरा ही अनुभव नहीं है, साहित्य के क्षेत्र में काम करनेवाले मेरे जैसे अन्य व्यक्तियों का भी यही अनुभव होगा। कई लोग नहीं कहते, मैं कह रहा हूँ। कह ही नहीं रहा हूँ, बल्कि लिखित रूप में काग़ज़ पर अंकित भी कर रहा हूँ ताकि समकालीन साहित्य के साथ-साथ मेरा यह दस्तावेज़ भी सुरक्षित हो जाए और आनेवाली पीढि़याँ यह समझ सकें कि समाज में बाज़ार का वर्चस्व किस तरह कबीर को बिकाउ  माल बना देता है और जो बिकाउ  माल बनने के लिए तैयार नहीं होता, उसे &#8216;बाज़ार&#8217; किस तरह कबाड़ी के गोदाम में फेंक देता है।</p>
<p style="text-align: justify;">बाज़ार में खडे़ होकर भी कबीर के मन में ख़ैर, नेकी, भलाई, शुभकामना थी, उसका संबंध मानवीय सरोकारों तथा समाज के नैतिक मूल्यों से था। यह मानवीय सरोकार और नैतिक मूल्य अब नहीं रहे हैं। बाज़ार की वर्तमान व्यवस्था में अब इनकी कोई संभावना नहीं रही है। मेरा मित्र व्यापारी की आँखों में धूल झोंककर नक़ली नोट चलाने में सफल हो जाता है तो अपने इस काम पर ख़ुश होकर डींग मारता है कि उसने व्यापारी को किस चालाकी से मूर्ख बनाया। व्यापारी अपने ग्राहक को डुप्लीकेट माल भिड़ाकर उससे असली की क़ीमत वसूल कर लेता है तो यह सोचकर प्रसन्न होता है कि उसने चुटकी बजाते ग्राहक से कितना फ़ालतू पैसा हड़प लिया।<br />
&#8216;कबीर&#8217; जब बाज़ार में खडे़ थे, तब घर और बाज़ार के नैतिक मूल्यों में कोई अंतर नहीं था। दोनों के संबंध मानवीयता पर टिके थे। तब बाज़ार लाभ कमाने का माध्यम नहीं था, आजीविका कमाने का माध्यम था। बिल्कुल वैसे ही जैसे और बहुत से व्यवसाय होते हैं। तब यह संभव था, संभव भी और स्वाभाविक भी, कि कबीर बाज़ार के बीच खडे़ होकर सबकी ख़ैर माँगते दिखाई दें और पूर्ण रूप से निष्पक्ष रहकर अपने-बेगाने में अंतर न करें। वह समय अब नहीं है। अब कबीर को &#8216;अपने लोगों&#8217; की ख़ेमाबंदी करते और विरोधी पक्ष के ख़ेमे को उखाड़ने के षड्यंत्र में फँसा हुआ देखा जा सकता है। इस कला का प्रदर्शन करते हुए भी देखा जा सकता है कि दूसरों को पीछे धकेलकर उन्हें अनदेखा करके स्वयं बाज़ार में सबसे आगे कैसे पहुँचा जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आप मानें या न मानें, लेकिन सच यही है कि बाज़ार की भौतिकवादी सभ्यता ने जो सबसे घातक आव्र मण किया, वह मानवीय सरोकारों और नैतिक मूल्यों पर ही किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह आव्र मण मानव-जीवन के हर क्षेत्र में हुआ है। साहित्य व्यवसाय बन गया और रिश्ते-नाते तक व्यावसायिक हो गए। कृषियुग की सभ्यता औद्योगिक युग की सभ्यता के मुक़ाबले में हार गई। इसे तो हारना ही था, क्योंकि औद्योगिक विकास मानव-समाज की उन्नति का अगला चरण था और उसे रोका नहीं जा सकता था। रोकना तो दूर की बात है, पुरानी कृषि-प्रणाली को एक दिन स्वयं भी औद्योगिक स्तर पर व्यवस्थित हो जाना था। भारत का कृषि-समाज आज इस प्रवि्र या से गुज़र रहा है। पर जो बात मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि विकास की गति में उन चीज़ों को बचा लेना क्यों संभव नहीं हुआ, उन्हें बचाए रखने का प्रयास क्यों नहीं किया जा सका, जो अच्छी थीं, मानवीय मूल्यों का आधार थीं, नैतिक और सांस्कृतिक पहचान रखनेवाली थीं? बेकार और समय के अनुकूल न रहनेवाली चीज़ों के साथ उन्हें भी विकास के पहिए के नीचे क्यों रौंद जाने दिया गया? आँधी आती है तो वृक्ष के सूखे या पीले पड़ गए कमज़ोर पत्तों को झटककर नीचे गिरा देती है। हरे पत्ते ज्यों-के-त्यों शाखाओं पर बने रहते हैं, पर यहाँ ऐसा नहीं हुआ। औद्योगिक विकास की आँधी में बेकार हो गई मान्यताएँ ही नहीं, वे परंपराएँ भी तिनकों की तरह उड़ गइंर्, जिन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए था।</p>
<p style="text-align: justify;">मेरा कहना है कि ख़तरा बाज़ार ने नहीं, बाज़ार की मानसिकता ने पैदा किया था। मानव-समाज मूल्यों को छोड़ता गया और लाभ पर केंदि्रत हो गया। अधिक-से-अधिक लाभ कैसे मिल सकता है, कहाँ से मिल सकता है, इसे पाने की विधि क्या हो? लाभ पाने के लिए यदि कोई अनैतिक कार्य भी करना पडे़ तो उसे करने में कोई बुराई नहीं है। बाज़ार लाभ पर टिका है और लाभ के इच्छुक लोगों की मानसिकता यही होती है। भारत के पूर्ववर्ती नैतिक समाज में यह कहावत प्रचलित थी कि व्यापार की वस्तुओं में लाभ इतना रहना चाहिए, जितना आटे में नमक। नैतिक समाज जब बाज़ारवादी सभ्यता से प्रभावित हुआ तो यह सोच बदल गई। अब व्यापारी नमक की चुटकी बराबर वस्तु पर लाभ इतना कमाना चाहता है, जितना परात-भर आटा।</p>
<p style="text-align: justify;">बाज़ार ने हमारे सोच को बदला और इस बदलाव का सबसे दुखद पहलू यह है कि मानव-सेवा के वे क्षेत्र भी, जो किसी भी दृष्टिकोण से व्यापारिक मानसिकता या बाज़ार की भौतिकवादी सभ्यता से नहीं जोडे़ जा सकते थे, पूर्ण रूप से व्यावसायिक बन गए। उदाहरण के लिए आप राजनीति के वर्तमान संदर्भों को लीजिए। चर्चा आरंभ होते ही सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि क्या राजनीति में आनेवाले लोग वास्तव में जनसेवा की भावना से इस क्षेत्र में आते हैं? इस प्रश्न का उत्तर सौ प्रतिशत लोगों का यही होगा कि नहीं। वे स्वार्थ-सिद्धि केे लिए आते हैं, सुख-सुविधा पाने के लिए आते हैं। क्योंकि राजनीति ऐसा क्षेत्र बन गया है, जो सबसे ज़्यादा सुख-सुविधाओं की संभावनाओं वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">ये राजनेता जनसाधारण को समाज-सेवा का आश्वासन देते हैं। निष्ठापूर्वक और निस्वार्थ-भाव से कार्य करने की सौगंध लेते हैं, किंतु जन-समर्थन पाकर जब वे सफल हो जाते हैं, संसद या विधानसभाओं में जनता का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं तो उनकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। वे नैतिक और मानवीय मूल्य बहुत पीछे छूट जाते हैं, जिनका प्रदर्शन वे अपनी सफलता से पूर्व अथवा संघर्ष के दौरान करते आए थे। यह स्थिति केवल राजनीति में ही नहीं, समाज के सभी क्षेत्रों में है। धर्म हो, शिक्षा हो, साहित्य हो, आज सभी व्यावसायिक मानसिकता के घेरे में आ गए हैं, किंतु व्यावसायिक मानसिकता को छिपाने के लिए जिस आवरण का सहारा लिया जाता है, उसे वे अवश्य ही ओढे़ रहते हैं। आधुनिक समाज आज नेताओं के इसी दोगलेपन में जी रहा है। नैतिक मूल्य और मानव-प्रेम केवल दिखावा करने के लिए रह गए हैं, उन बुराइयों को छिपाने के लिए रह गए हैं, जिन्हें समाज भोग तो रहा है, पर वैचारिक स्तर पर स्वीकार नहीं कर रहा है।<br />
महिलाओं का शब्दों में सबसे अधिक सम्मान करने और उनके उत्पीड़न के विरुद्ध सबसे प्रबल आवाज़ उठानेवाला व्यक्ति अवसर पाते ही उनके विरुद्ध घिनोने अपराध कर बैठता है, किंतु अपने उन आदर्शों का प्रदर्शन फिर भी जारी रखता है, जो उसने दिखावे के लिए अपना रखे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">कबीर अब बाज़ार में खड़ा सबकी ख़ैर नहीं माँगता, वह भलाई का प्रदर्शन करते हुए अपनी अधिक-से-अधिक क़ीमत माँगता है। पहला &#8216;कबीरा&#8217; आश्वस्त था कि उसके पास जो सामग्री है, उस पर किसी प्रकार के सुंदर लेबिल लगाने की आवश्यकता नहीं है, उसे विज्ञापित करने की ज़रूरत नहीं है। उसकी चर्चा स्वयं करने और दूसरों से करवाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह दमकता हुआ सोना है और ग्राहक निश्चित रूप से उसकी ओर स्वयं खिंचते चले आएँगे। आते भी थे, परखते भी थे और बिना किसी पक्षपात तथा भेद-भाव के उसकी सराहना भी करते थे। अब वे दिन नहीं रहे हैं। अब बाज़ार की सभ्यता और उसकी प्राथमिकताएँ बदल गई हैं, मान्यताएँ परिवर्तित हो गई हैं। अब कबीर साहब को बाज़ार के बीच खडे़ होकर डुगडुगी पीटनी पड़ती है। अपनी सामग्री को, चाहे वह कितनी ही स्तरीय क्यों न हो, विज्ञापित करना होता है। उसके गुण स्वयं बताने होते हैं, और अपने गुट के लोगों को इस अभियान पर लगाना होता है कि अपना माल अच्छी-से-अच्छी क़ीमत पर बेचा जा सके।</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्य के क्षेत्र में अब एकमुखी प्रतिभा के व्यक्ति को वह सफलता मिलनेवाली नहीं है, जिसका वह अधिकारी है। उसे चतुर्मुखी होना चाहिए। विश्लेषण करता हूँ तो मुझे लगता है कि उच्चस्तरीय साहित्य का सर्जन करने वाली प्रतिभाएँ प्राय: एकपक्षीय होती हैं, बहुपक्षीय नहीं होतीं। वे अपना पूरा समय सोच, विचार, अध्ययन और लेखन में व्यय करती हैं। उनका प्रयास होता है कि उनकी लेखनी से अच्छी-से-अच्छी चीज़ निकले। लेखन, अध्ययन, विचार, चिंतन आदि की प्रवि्र या में उन्हें किसी और बात का न तो ध्यान आता है और न  उनका दिमाग़ किसी अन्य दिशा में काम करना पसंद करता है। पसंद करने या न करने की बात भी अर्थहीन है, क्योंकि वे चाहें भी तो ऐसा नहीं कर पाएँगे। प्रकृति उन्हें रचनात्मक प्रतिभा देकर तो भेजती है, किंतु व्यावसायिक दृष्टिकोण देकर नहीं। उनका मस्तिष्क एकपक्षीय होता है। ऐसे लोग निष्ठा और ईमानदारी के साथ लेखन-कार्य में व्यस्त रहते हैं, पर बाज़ार में अपने नाम और काम को पि्रय बनाने में विफल हो जाते हैं। इनकी तुलना में ऐसे साहित्यकार, जो दोपक्षीय प्रतिभा के धनी हैं, अर्थात् जिनमें लेखन की क्षमता भी है और स्वयं को बेचने की कला भी जो जानते हैं, वे बाज़ार में सफल हो जाते हैं। लेखन की क्षमता इन रचनाकारों में भले ही अन्य रचनाकारों की तुलना में कम हो, किंतु अपने-आपको विज्ञापित करने, अपने कार्य को चर्चा में लाने तथा अपने लिए बाज़ार बनाने में इनकी व्यावसायिक बुद्धि बहुत अच्छी तरह काम करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">गुटबाज़ी, जोड़-तोड़, ख़ेमाबंदी और लाभदायक संस्थानों से संपर्क, इन सब पक्षों पर भी उनकी जितनी प्रतिभा व्यय होती है, उतनी लेखनकार्य में नहीं होती। अब प्रसिद्धि मिलती नहीं, प्रसिद्धि कमाई जाती है। किसी चीज़ को कमाने में जिस चतुरता या कलाकारी की आवश्यकता है, उसे विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है। हमने बाज़ार के स्वभाव को समझनेवाले कितने ही &#8216;कबीरों&#8217; को दस-दस वर्ष पुरानी और बार-बार दोहराई जानेवाली कविताओं को मंच पर पढ़ते, श्रोताओं की वाह-वाही लूटते तथा नोटों को अपने ब्रीफकेस में भरते देखा है। आपने भी देखा होगा, किंतु यदि किसी के मन में उनके प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हो रही हो तो मैं इसका समर्थन नहीं करूँगा, क्योंकि ईर्ष्या करनेवाला उन गुणों का धनी नहीं है, जिनके वे हैं। वह लिख सकता है, बेच नहीं सकता तो इसमें दोष किसका है? अच्छे-से-अच्छा और गुणवत्ता में उच्च स्तर का उत्पाद यदि आपके पास है, तो भी उसे पाने के लिए अधिक लोग आपके पास नहीं आएँगे। आपको ही ग्राहकों के बीच जाना होगा और जाना ही नहीं होगा स्वयं को सर्वश्रेष्ठ उत्पादक के रूप में स्थापित भी करना होगा। इसके लिए क्या-क्या विधियाँ अपनानी होती हैं, यह मैं भी जानता हूँ और आप भी जानते हैं, किंतु उन विधियों को वि्र यात्मक रूप इसलिए नहीं दे पाते हैं, क्योंकि वे सब कार्य करने की प्रवृत्ति हममें नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मान लीजिए कि आप एकपक्षीय प्रतिभा वाले साहित्यकार हैं। आपमें अच्छे-से-अच्छा लिखने की क्षमता है, किंतु आपमें उसे और अपने-आपको लोकपि्रय बनाने की चतुराई नहीं है तो आप बाज़ार में खडे़ होकर सबकी ख़ैर माँगा कीजिए और उन लोगों को देखा कीजिए, जो अपने नाम और काम की क़ीमत वसूल करना जानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ मूल प्रश्न अपने आपसे कीजिए। स्वयं से पूछिए कि क्या आपने अपना कोई ऐसा गुट तैयार किया है, जिसकी पहुँच उन प्रभावशाली लोगों तक हो, जिनके हाथ में साहित्य के बाज़ार की नकेल रहती है? क्या आपने प्रचार-प्रसार के लिए ऐसी संस्था से संपर्क साधा है, जो आपको जल्दी-जल्दी और समय-समय पर बाज़ार की शक्तियों के सामने प्रस्तुत करती रहे? क्या आपने ऐसे सुप्रसिद्ध समीक्षकों और समालोचकों को मोहित करने के लिए योजनाबद्ध तरीक़े से कार्य किया है, जो अपनी लेखनी से आपको आगे बढ़ाने में सहायक हो सकते हों? क्या आपने किसी ऐसे प्रभावशाली ग्रुप का सहयोग लेने में सफलता प्राप्त कर ली है, जो पहले से साहित्य के बाज़ार में अग्रणीय है? यह सब कार्य करने के लिए आपने कितना समय और कितना धन व्यय किया है? यदि इन सब प्रश्नों का उत्तर आपके पास नकारात्मक है तो स्वीकार कर लीजिए कि आपमें लेखन की क्षमता कितनी भी हो, किंतु बाज़ार की जो अनिवार्यताएँ हैं, उन्हें पूरा करने की क्षमता आपमें नहीं है। आपका मस्तिष्क एकपक्षीय है, दोपक्षीय नहीं है। आप लिख सकते हैं, बेच नहीं सकते और जब बेच नहीं सकते तो बाज़ार के बीच ख़ाली हाथ सबके लिए ख़ैर माँगने के अतिरिक्त आप कर ही क्या सकते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">यह व्यवसाय की दुनिया है, बाज़ार की दुनिया है। बाज़ार हमारे मुहल्ले में है, मुहल्ले के हर गली-कूचे में है, उस कमरे में है, जहाँ बैठकर ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं। टी.वी. की उद्घोषिका हर डेढ़-दो मिनट के बाद लंबा कामर्शियल ब्रेक ले रही है। मैं इस ब्रेक को सहने और स्वीकार करने के लिए बाध्य हूँ। बार-बार दृष्टि के सामने आनेवाले उन विज्ञापनों को देखने के लिए बाध्य हूँ, जिन्हें महिलाओं की आकर्षक देहों से सजाया गया है। यह कामर्शियल ब्रेक टी.वी. चैनलों के कार्यक्रमों पर ही नहीं लगा है, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और समाज की पूरी व्यवस्था पर लगा हुआ है। हम सब एक लंबे कामर्शियल ब्रेक से गुज़र रहे हैं। इस लंबी होती जा रही कामर्शियल ब्रेक की अवधि से यदि थोड़ा समय बचा रह गया है, तो हम यदि साहित्यकार हैं तब उसे अपनी सृजनात्मक गतिविधियों पर लगा सकते हैं। शेष समय तो हमें उस कामर्शियल ब्रेक का हिस्सा ही बना रहना है, जिसके हममें से ज़्यादातर लोग चाहे-अनचाहे दर्शक हैं।<br />
विशुद्ध साहित्यसेवा और शुद्ध समाजसेवा या जनसेवा का अब कोई अर्थ नहीं रहा है। बाज़ार की संस्कृति ने मान्य नैतिक व्यवस्था पर कैसा भरपूर हमला किया है, इसे समझने के लिए कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो आपके सामने खुला न हो। बाज़ार की अनिवार्यताएँ अपने लिए एक नई नैतिक कसौटी निर्मित करने के लिए संघर्षरत हैं। जैसे-जैसे बाज़ार बढ़ रहा है, पहले जैसे समाजसेवक और जनसेवक लुप्त होते जा रहे हैं, बिल्कुल ऐसे ही जैसे जीव-जंतुओं की कुछ प्रजातियाँ अपना अस्तित्व विलीन करती जा रही हैं। निकट भविष्य में वह समय भी आएगा, जब समाजसेवक या जनसेवक को सेवाकर्मी कहना अधिक बेहतर समझा जाएगा, क्योंकि कर्म के बदले में कुछ-न-कुछ प्राप्त करने का जो भाव है, वह सेवक में नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">ये परिवर्तन अकारण नहीं हुआ है। यह विस्तार पाते जा रहे बाज़ार की उस संस्कृति से निकला है, जिसका सामना हम सब इस समय कर रहे हैं। ऐसे में साहित्यसेवा में लगे बहुत से लोग यदि साहित्यकर्मी बनते जा रहे हैं तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किंतु &#8216;सेवक&#8217; से &#8216;कर्मी&#8217; बनने का जो रुझान है, वह निस्संदेह चिंताजनक है। सेवा में समर्पण का भाव रहता है, किंतु कर्मी की श्रेणी में आते ही व्यक्ति सेवा से अधिक प्राप्ति की भावना से जुड़ जाता है। प्राप्ति की भावना उसे काम की गुणवत्ता पर ध्यान देने से रोकती है, अधिक-से-अधिक प्राप्त करने की लालसा पैदा करती है।<br />
देश में इतने कवि-सम्मेलन पहले कभी नहीं होते थे, जितने अब होते है। इन्हें अब बडे़ उद्योग की तरह चलाया जा रहा है। यहाँ तीन पक्ष उपस्थित हैं। एक पक्ष निवेशकर्त्ताओं का है, दूसरा व्यवस्थापकों का और तीसरा मंच पर पसंद किए जानेवाले कवियों का। इन तीनों पक्षों में ग़ज़ब का तालमेल है। आयोजक और निवेशक कभी राजनीतिक कारणों से, कभी सामाजिक कारणों से और कभी किन्हीं अन्य कारणों से समय-समय पर ये आयोजन करते रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गठित साहित्यिक संस्थाओं की ओर से भी विशेष अवसरों पर ऐसे कार्यव्र म आयोजित किए जाते रहते हैं। आप इनके रूप-स्वरूप पर दृष्टि डालेंगे और परदे के पीछे की इनकी सच्चाई को परखने की कोशिश करेंगे तो ज्ञात होगा कि ऐसे कार्यव्र म साहित्यसेवा की भावना से आयोजित नहीं होते, अपितु बाज़ार की अनिवार्यताओं के आधार पर चलाए जाते हैं। इनमें साहित्य का मापदंड नहीं वरन् बाज़ार का मापदंड लागू होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कवि-सम्मेलनों का व्यवसाय उसी तरह योजनाबद्ध ढंग से चलता है, जिस प्रकार कोई उद्योग-धंधा चलाया जाता है। मंचों पर अच्छा प्रदर्शन कर सकनेवाले खिलाड़ी अपनी समर्थक टीम का चयन करते हुए इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देते हैं कि टीम में ऐसा कोई अवांछित तत्त्व न आने पाए, जो उनकी लोकपि्रयता के लिए ख़तरा बन सकता हो। टीम का मुखिया निरंतर कवि-सम्मेलनों के उन बडे़-बडे़ आयोजकों के संपर्क में रहता है, जो समय-समय पर ऐसे कार्यव्र म कराते रहते हैं। मंच पर किस प्रकार का साहित्य प्रस्तुत किया जाता है, इस पर कोई टिप्पणी करना बेकार है, क्योंकि इनका हाल हर प्रतिभाशाली साहित्य-प्रेमी भली प्रकार जानता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक ऐसी ही स्थिति पत्र-पत्रिकाओं की भी है। अधिकांश राष्ट्रीय एवं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादक भली प्रकार जानते हैं कि किसे सामने लाना है और किसे अनदेखा करना है। किन-किन नामों को आगे बढ़ाना है, किन-किन को पीछे धकेलना है। किस ग्रुप का समर्थन करना है, किसका विरोध। सबके अपने-अपने गु्रप हैं, जिनके नाम पहले से निश्चित हैं। उन्हीं को बार-बार दोहराया जाता रहता है। इस बाज़ार में भी बाहर के लोग प्रवेश नहीं कर पाते। वही प्रवेश कर पाते हैं, जिनके पास पहले के दिग्गजों की सिफ़ारिश हो या जिन्होंने इन उ ँची दुकानों पर पहुँच बनाने का रास्ता खोज लिया हो।</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म-उद्योग का हाल इससे भी बुरा है। सभी बडे़ दुकानदारों के जाँचे-परखे और बरते हुए ग्राहक तय हैं। इंडस्ट्री के ग्लैमर और पैसे की चमक-दमक के आकर्षण से प्रभावित कितने ही युवा, युवतियाँ पि़ ल्म-उद्योग की तरफ़ भागते हैं और अपने लिए हर द्वार बंद पाकर ठोकरें खाते हैं, फुटपाथों पर सोते हैं और ख़ाली हाथ घर लौट आते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यह विवरण देने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि जो कुछ उ पर की पंक्तियों में कहा गया है, वह सर्वविदित है। यह कोई ऐसा रहस्य नहीं है, जिसे पहली बार उद्घाटित किया जा रहा हो। यहाँ इसका वर्णन केवल इसलिए करना पड़ा, ताकि जिस बाज़ार के प्रभुत्व की बात हम प्रारंभ से लेकर चले थे, उससे संबंधित सभी पक्षों को आपके सामने रखा जा सके।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्र-पत्रिकाएँ, कवि-सम्मेलन, सरकारी-अर्द्धसरकारी साहित्यिक संस्थाएँ तथा पि़ ल्म जगत् कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें लेखक और साहित्यकार अपनी प्रतिभाओं का कुछ-न-कुछ प्रदर्शन अवश्य कर सके हैं, किंतु आज ये सब बाज़ार का अंग हैं और बाज़ार भीड़ के रुझान को देखकर चलता है या उन व्यक्तियों की इच्छा के अनुसार चलता है, जिन्होंने बाज़ार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब मैं आपसे आख़िरी बात कहता हूँ। यदि आप एकपक्षीय प्रतिभावाले साहित्यकार है, लिख सकते हैं, उसे बाज़ार में ले जाकर बेच नहीं सकते, रचनात्मक गुण आपमें उच्च स्तर के हैं, किंतु व्यावसायिक गुण नाममात्र के भी नहीं हैं, तो आप साहित्य के बाज़ार में जाने का साहस मत कीजिए, क्योंकि यदि आप केवल साहित्य के मोती लेकर बाज़ार में जाते हैं और उनका गुणगान करने और कराने पर आवश्यक ध्यान नहीं देते तो विश्वास कीजिए, कोई ग्राहक आपके पास नहीं फटकेगा और कबीर की भाँति आप भी भरे बाज़ार में सबकी ख़ैर माँगने की परंपरा ऐसे समय दोहरा रहे होंगे, जब आधुनिक बाज़ार के वातावरण को इसकी आवश्यकता नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">क्षमा कीजिए, मेरा उद्देश्य किसी को निराश करना नहीं है। जीवन, साहित्य, मानवता, संस्कृति, राजनीति तथा सभी ललित कलाओं में अंदर तक प्रवेश कर गए बाज़ार की एक हलकी-सी झलक दिखलाकर आपको यह बताना है कि हम किस तरह व्यापार की दुनिया में जी रहे हैं और भीड़ की दुनिया किस तरह ललित-कलाओं से उनका स्तर छीन रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">निराश न हों। संघर्ष करते रहें। लिखते रहें, क्योंकि लेखन पर विराम लगाना आपके वश में नहीं है। एक दिन आ सकता है, जब &#8216;कबीरा&#8217; बाज़ार में खड़ा होकर सबकी ख़ैर माँग रहा हो और वहाँ उपस्थित अधिकांश व्यक्ति उसकी आवाज़ पर आकर्षित हो रहे हों।</p>
<h4><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/-jGJvn3UPkMw/Tfx9ryYgrVI/AAAAAAAAFqE/m4mbdQz7gMY/s1600/Giriraj+Sharan+Agrawal%255B1%255D+%25281%2529.jpg" alt="" width="150" height="202" /></h4>
<h4></h4>
<h4></h4>
<h4>() साहित्यभूषण डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल<br />
16 साहित्य विहार<br />
बिजनौर (उ.प्र.)</h4>
]]></content:encoded>
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		<title>कबीर का युग तो गयो भाई , अब  इस युग की बात करौ न कोय &#8230;.</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Jun 2011 05:29:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumansinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहे कबीर]]></category>
		<category><![CDATA[kahe kabir]]></category>
		<category><![CDATA[samir lal]]></category>
		<category><![CDATA[vyangya]]></category>

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		<description><![CDATA[कबीर का युग तो गयो भाई , अब इस युग की बात करौ न कोय... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2011/06/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%97-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%8b-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%87%e0%a4%b8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: left;" dir="ltr">
<div style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/sameer-lal.jpg" alt="Sameer Lal" /></div>
<div style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #990000;">कबीर का युग तो गयो भाई , अब  इस युग की बात करौ न कोय &#8230;. </span></strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #990000;">बात करोगे तो वक़्त चला जायेगा और नया सार रह जायेगा , चिट्ठाकारों के लिए सारथी समीर जी ने सार दिए हैं , चलिए उस सार को आधार बनाया जाए -</span></strong></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: blue; font-size: large;"><strong>चिट्ठाकारों के लिये गीता सार</strong></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>मित्रों, यह बात तो मुझे कहने की जरुरत ही नहीं कि मैं आप सबके लिये कितना विचारता और चिंतित रहता हूँ. <img src='http://www.parikalpna.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>जो कुछ भी करता हूँ, पढ़ता हूँ, लिखता हूँ, बस हर वक्त आपका ख्याल रहता है और आजकल तो कुछ ज्यादा ही, पता नहीं क्यूँ. <img src='http://www.parikalpna.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>अब देखिये, गीता पढ़ी, सार पढ़ा और आप याद आये, तो आप भी पढ़ें, चन्द पंक्तियों में पूरी गीता का सार:</strong></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: blue; font-size: large;"><strong>चिट्ठाकारों के लिये गीता सार</strong></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">क्यूँ व्यर्थ परेशान होते हो, किससे व्यर्थ डरते हो</div>
<div style="text-align: justify;">कौन तुम्हारा चिट्ठा बंद करा सकता है.</div>
<div style="text-align: justify;">चिट्ठाकार न निकाला जा सकता है और न ही निकलता है. (भले ही नाम बदल ले, मगर रहेगा जरुर-यह एक लत है)</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ.</div>
<div style="text-align: justify;">आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है.</div>
<div style="text-align: justify;">कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">व्यस्तता का दौर चल रहा है&#8230;</div>
<div style="text-align: justify;">(चुनाव का समय चल रहा है..किसी के पास समय नहीं है)</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">वैसे भी तुम्हारा क्या गया, कोई पैसा देकर तो लिखवाये नहीं थे, जो तुम रो रहे हो.</div>
<div style="text-align: justify;">वैसे भी बहुत अच्छा तो लिखे नहीं हो, जो दुखी होते हो. (वरना तो अखबार में छपते, यहाँ क्या कर रहे होते)</div>
<div style="text-align: justify;">तुमने ऐसा लिखा ही क्या था जो पढ़ा जाता.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">तुम्हें तो यूनिकोड में लिखना भी नहीं आता था</div>
<div style="text-align: justify;">जो कुछ सीखा, यहीं से सीखा</div>
<div style="text-align: justify;">जो कुछ सीखा, यहीं लिख मारा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कम्प्यूटर लेकर आये थे, यूनिकोड सीखकर चले</div>
<div style="text-align: justify;">जो आज तुमने सीखा, कल कोई और सिखेगा (कोई तुम्हारा पेटेंट तो है नही)</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">जो टूल लिखने को इस्तेमाल करते हो, वो भी तुम्हारा नहीं है .</div>
<div style="text-align: justify;">आज तुम इस्तेमाल कर रहे हो, कल कोई और भी करेगा और परसों कोई और.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">ब्लाग का पन्ना भी तुम्हारा नहीं है, या तो ब्लाग स्पाट का है या वर्डप्रेस का</div>
<div style="text-align: justify;">और तुम इसे अपना मान बैठे हो और खुश हो मगन हो रहे हो.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">बस यही खुशी तुम्हारे टेंशन का कारण है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">ब्लाग, ब्लागर बीटा से होता हुआ न्ये ब्लागर पर चला गया</div>
<div style="text-align: justify;">तुम्हारा टेम्पलेट चौपट हो गया और अब तुम रो रहे हो.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">जिसे तुम बदलाव समझ रहे हो, यह मात्र तुमको तुम्हारी औकात बताने का तरीका है.</div>
<div style="text-align: justify;">जिसे तुम अपना मानते रहे वो तुम्हारा नहीं.</div>
<div style="text-align: justify;">(अब फिर बैठो और टेंम्पलेट ठीक करो, और जो पुरानी टिप्पणियों के नाम गये वो तो ठीक भी नहीं कर सकते)</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">एक पोस्ट पर ढ़ेरों टिप्पणियां मिल जाती है,</div>
<div style="text-align: justify;">पल भर में तुम अपने को महान साहित्यकार समझने लगते हो.</div>
<div style="text-align: justify;">दूसरी ही पोस्ट की सूनी मांग देख आंख भर आती है और तुम सड़क छाप लेखक बन जाते हो.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">टिप्पणियों और तारीफों का ख्याल दिल से निकाल दो,</div>
<div style="text-align: justify;">बस अच्छा लिखते जाओ&#8230; फिर देखो-</div>
<div style="text-align: justify;">तुम चिट्ठाजगत के हो और यह चिट्ठाजगत तुम्हारा है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">न यह टिप्पणियां तुम्हारे लिये हैं और न ही तुम इसके काबिल हो</div>
<div style="text-align: justify;">(वरना तो किसी किताब में छपते)</div>
<div style="text-align: justify;">यह मिल गईं तो बहुत अच्छा और न मिलीं तो भी अच्छा है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कम से कम छप तो जाता है, फिर तुम्हें परेशानी कैसी?</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">तुम अपने आपको चिट्ठे को समर्पित करो</div>
<div style="text-align: justify;">यही एक मात्र सर्वसिद्ध नियम है</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">और जो इस नियम को जानता है</div>
<div style="text-align: justify;">वो इन टिप्पणियों, तारीफों और प्रतिपोस्ट की टेंशन से सर्वदा मुक्त है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #990000;">-स्वामी समीर लाल &#8216;समीर&#8217;</span></strong></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><span style="color: #990000;"><br />
</span></strong></div>
<div style="text-align: justify;">वो आया था</div>
<div style="text-align: justify;">दिन भर की मशक्कत के बाद</div>
<div style="text-align: justify;">पसीने में लथपथ</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कुछ देर ठहरा</div>
<div style="text-align: justify;">फिर चला गया!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">उसके पसीने की बू</div>
<div style="text-align: justify;">अब भी ठहरी है</div>
<div style="text-align: justify;">अपनी ललकार लिए!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">सफलता यूँ ही तो</div>
<div style="text-align: justify;">हासिल नहीं होती!!</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #202020; font-family: Arial, Tahoma, Verdana; font-size: 15px;"> </span></div>
<div style="line-height: 20px; padding-bottom: 5px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px; margin: 0px;"></div>
<blockquote style="background-attachment: initial; background-clip: initial; background-color: navajowhite; background-image: initial; background-origin: initial; background-position: initial initial; background-repeat: initial initial; border-bottom-color: #dddddd; border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 1px; border-top-color: #dddddd; border-top-style: solid; border-top-width: 1px; font: normal normal normal 1em/normal Arial; line-height: 1.5em; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 10px; padding-bottom: 0px; padding-left: 10px; padding-right: 10px; padding-top: 10px;"><p><a style="color: #2490d2; text-decoration: none;" href="http://4.bp.blogspot.com/_S46EZmGC1oo/S7Nj2DfC_OI/AAAAAAAAF6k/jRIL3SmnCIM/s1600/sameer+lal01.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5454813353975413986" style="cursor: pointer; float: left; height: 160px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 120px; border-width: 0px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_S46EZmGC1oo/S7Nj2DfC_OI/AAAAAAAAF6k/jRIL3SmnCIM/s200/sameer+lal01.jpg" border="0" alt="" /></a>लेखक परिचय<br />
नाम : समीर लाल &#8220;समीर&#8221;<br />
उम्र : 46 वर्ष<br />
स्थान : जबलपुर से कनाडा<br />
शौक : पढ़ना, मित्रों के साथ बातचीत करना, लिखना और नये ज्ञान की तलाश<br />
ब्लाग : <a style="color: #2490d2; text-decoration: none;" href="http://udantashtari.blogspot.com/">उडनतश्तरी</a></p></blockquote>
<p>=======================</p>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: blue; font-size: large;"><strong>शतरंज&#8230;..</strong></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">शतरंज के खेल में</div>
<div style="text-align: justify;">घोड़ा हमेशा ढाई घर</div>
<div style="text-align: justify;">चलता है</div>
<div style="text-align: justify;">और</div>
<div style="text-align: justify;">ऊँट तिरछा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">चलाते तुम हो</div>
<div style="text-align: justify;">चाहो तो</div>
<div style="text-align: justify;">घोड़ा</div>
<div style="text-align: justify;">एक घर चला दो</div>
<div style="text-align: justify;">या</div>
<div style="text-align: justify;">ऊँट को</div>
<div style="text-align: justify;">सीधा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">लेकिन तुम</div>
<div style="text-align: justify;">ऐसा नहीं करते!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">हर चीज के अपने</div>
<div style="text-align: justify;">कायदे होते हैं!!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: blue; font-size: large;"><strong>कहीं तुम मुझे&#8230;&#8230;!!!</strong></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मैं दौड़ रहा हूँ</div>
<div style="text-align: justify;">मुझे धावक न समझना!</div>
<div style="text-align: justify;">मैं तैर रहा हूँ</div>
<div style="text-align: justify;">मुझे तैराक न समझना!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><a style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;" href="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Shv6qUipMLI/AAAAAAAADSs/qmwovIppYCg/s1600/samportblog.jpg"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Shv6qUipMLI/AAAAAAAADSs/qmwovIppYCg/s800/samportblog.jpg" border="0" alt="Sameer Lal" /></a>सब मजबूरियाँ हैं&#8230;.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मैं हँसता भी हूँ</div>
<div style="text-align: justify;">कहीं तुम मुझे</div>
<div style="text-align: justify;">खुश तो नहीं समझते!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">यूँ तो मैं</div>
<div style="text-align: justify;">सांस भी लेता हूँ,</div>
<div style="text-align: justify;">कहीं तुम मुझे&#8230;&#8230;!!!</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong><span style="color: blue;">&#8211;समीर लाल ’समीर’</span></strong></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
</div>
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