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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>असगर अली इंजीनियर ने कहा था- ‍’कलम का सौदा करने वाला कभी लेखक नहीं हो सकता !’</title>
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		<pubDate>Fri, 17 May 2013 07:52:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े लेखक व चिंतक असगर अली इंजीनियर के असामयिक निधन से बेगूसराय... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/05/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%a5/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_8066" class="wp-caption alignright" style="width: 236px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/05/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%a5/asgar-ali/" rel="attachment wp-att-8066"><img class="size-full wp-image-8066" alt="साहित्य व रंग जगत के नामचीन शख़्सियत हबीव तनवीर, डा. नामवर सिंह एवं असगर अली इंजीनियर.. तस्वीर: 2008 में प्रलेस के राष्ट्रीय अधिवेशन, गोदरगावां की है.." src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/05/asgar-ali....jpeg" width="226" height="158" /></a><p class="wp-caption-text">साहित्य व रंग जगत के नामचीन शख़्सियत हबीव तनवीर, डा. नामवर सिंह एवं असगर अली इंजीनियर.. तस्वीर: 2008 में प्रलेस के राष्ट्रीय अधिवेशन, गोदरगावां की है..</p></div>
<p>प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े लेखक व चिंतक असगर अली इंजीनियर के असामयिक निधन से बेगूसराय स्थित गोदरगावां का विप्लवी पुस्तकालय परिवार मर्माहत है। पांच वर्ष पूर्व यहाँ पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव सह प्रलेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में वे यहाँ आये थे। इनका कथन ‘‘मैं पहले भारतीय हूँ तब मुसलमान’’ सुनकर लोगों ने इन्हें मुबारकवाद दी थी। आज भी इनके ये शब्द  जनमानस के हृदय में गूंजते हैं उन्होंने कहा था कि ‘‘कलम का सौदा करने वाला कभी लेखक नहीं हो सकता’’। उन्होंने यहाँ हर्ष व्यक्त किया था कि बिहार के एक छोटे से गांव गोदरगावां में प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। यह पहला मौका है जब बड़े शहरों में होने वाला अधिवेशन एक गांव में हो रहा है। इसे मैं ऐतिहासिक मानता हूँ। यहां जो लेखक साथी आये हैं गांव की जुबान में अपनी बातें उन तक पहुंचायें। उन्होंने कहा था- अगर लेखक सच न बोले, लेखक मूल्यों से समझौता कर ले तो इससे बढ़कर खतरनाक चीज इस देश के लिए कोई और नहीं हो सकती। मैं उसी को लेखक मानता हूँ जो कभी मूल्यों से समझौता न करे। ये बातें दिवंगत असगर साहब की शोक सभा में बिहार प्रलेस महासचिव राजेन्द्र राजन ने कही।</p>
<p>विप्लव पुस्तकालय के सचिव आनन्द प्र. सिंह ने कहा कि असगर अली इंजीनियर महान विचारक, साम्प्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता के घनघोर विरोधी थे। बोहरा सम्प्रदाय से जुड़कर इन्होंने कट्टरपंथियों के विरूद्ध आजीवन संघर्ष किया। कई बार इनके ऊपर जानलेवा हमले भी हुए। हम इन्हें शत शत नमन करते हैं।</p>
<p>विप्लवी पुस्तकालय में आयोजित इस शोक सभा में उपस्थित लोगों ने असगर अली के निधन को अपूरणीय क्षति बताया। इस अवसर पर बिहार प्रलेस के कई कार्यकर्ता व रचनाकर्मी मौजूद थे। इस शोकसभा की अध्यक्षता रमेश प्र. सिंह ने की। मधेपुरा से आये कवि अरविन्द श्रीवास्तव, विप्लवी पुस्तकालय के मीडिया प्रभारी मनोरंजन विप्लवी, पुस्तकाध्यक्ष अगम विप्लवी, प्रवीण कुमार आदि ने भी अपने-अपने विचार रखें।</p>
<p>इस अवसर पर बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाधर्मी मित्रों यथा डा. खगेन्द्र ठाकुर, कर्मेन्दु शिशिर, संतोष दीक्षित, डा. पूनम सिंह, कवि शहंशाह आलम, राजकिशोर राजन, विभूति कुमार आदि ने अपने शोक संवेदना संदेश भेजकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की..</p>
<p><strong> - अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)</strong><br />
बिहार प्रलेस, मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता<br />
मोबाइल &#8211; 94310 80862.</p>
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		<title>एक औरत के संघर्ष की गाथा है नूर ज़हीर की पुस्तक !</title>
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		<pubDate>Thu, 02 May 2013 07:56:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[- दक्षिण पूर्व एशिया में महिलाओं की व्यथा कथा कहती है यह पुस्तक। पटना. 28 अप्रैल... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/05/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>-<b> दक्षिण पूर्व एशिया में महिलाओं की व्यथा कथा कहती है यह पुस्तक।</b></p>
<p><img class="alignleft size-medium wp-image-8060" alt="DSC02037" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/05/DSC02037-194x300.jpg" width="194" height="300" />पटना. 28 अप्रैल । प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के तत्वावधान मं में स्थानीय केदार भवन के कविवर कन्हैया कक्ष में चर्चित लेखिका एवं समाजिक कार्यकर्ता नूर जहीर के ‘माई गौड इज़ ए वूमन’ का हिन्दी अनुवाद ‘अपना खुदा एक औरत’ पर विचार -गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने की तथा संचालन शहंशाह आलम ने किया।</p>
<p>इस अवसर पर युवा कवि राजकिशोर राजन ने कहा कि प्रस्तुत पुस्तक एक मुसलमान औरत के खु़द की तकदीर चूनने की कथा ही नहीं है अपितु हर उस औरत की कथा है जो ख़ुदमोख्तार होना चाहती है।</p>
<p>मधेपुरा से पधारे अरविन्द श्रीवास्तव ने नूर ज़हीर से अपनी मुलाकात का हवाला देते हुए कहा कि नूर ज़हीर जब अपनी इस पुस्तक के उर्दू संस्करण प्रकाशित करने संबन्ध में जब लाहौर गई थीं तब वहाँ के साहित्यकार साथियों ने कहा था कि इस पुस्तक का उर्दू संस्करण छपवा देते हैं और फिर ‘तुम भी मरो और हम भी मरते हैं’।</p>
<p>चर्चित शायर विभूति कुमार ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि नूर ज़हीर की यह कृति कट्टरपंथी सोच के प्रति गहरे आक्रोश से पैदा हुई है। यह पुस्तक सभी से यह सवाल करती है कि क्या औरत वह खुदा नहीं बन सकती है जो उसे हमेशा से बनना था। <a href="http://www.parikalpna.com/2013/05/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/dsc02086/" rel="attachment wp-att-8061"><img class="alignright size-thumbnail wp-image-8061" alt="DSC02086" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/05/DSC02086-150x150.jpg" width="150" height="150" /></a></p>
<p>वहीं युवा कवि शहंशाह आलम ने नूर ज़हीर की इस गाथा पर बोलते हुए कहा कि नूर ज़हीर की प्रस्तुत  कहीं  से अनुदित नहीं लगती बल्कि लगता है कि हम मूल कृति पढ़ रहे हैं। यह कृति सिर्फ मुस्लिम महिलाओं  के बारे में नहीं कहती बल्कि इसी बहाने पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में महिलाओं की व्यथा कथा भी कहती है।</p>
<p>अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में राजेन्द्र राजन ने नूर ज़हीर के संबन्ध में अपनी मुलाकात के कई संस्मरण को साझा किया। उन्होंने कहा कि नूर ज़हीर की इस किताब पर चर्चा करने का अर्थ पूरे स्त्री समाज पर चर्चा करना है।</p>
<p>इस अवसर पर राकेश प्रियदर्शी, परमानंद राम, मुकेश तिवारी, चन्द्रमोहन मिश्र तथा मनोज कुमार मिश्र ने भी अपने-अपने विचारों को रखा।<br />
धन्यवाद ज्ञापन राजकिशोर राजन ने किया।<br />
- <b>अरविन्द श्रीवास्तव</b> (मधेपुरा)<br />
<wbr />              मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता बिहार प्रलेस<br />
मोबाइल &#8211; 9431080862.</p>
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		<title>सुखद प्रतीत होता है शब्दों के अरण्य में विचरण करते हुए&#8230;..</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Apr 2013 06:03:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पुस्तक-समीक्षा `शब्दों के अरण्य में&#8217; विचरण करते हुए बहुत सुखद प्रतीत होता है। जैसे कोई... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/04/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8b/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"><strong>पुस्तक-समीक्षा</strong></span></p>
<div id="attachment_7985" class="wp-caption alignright" style="width: 219px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/04/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8b/skam-front_cover/" rel="attachment wp-att-7985"><img class="size-medium wp-image-7985" alt="पुस्तकः शब्दों के अरण्य में (सजिल्द) (60 कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ) विधाः कविता संपादनः रश्मि प्रभा मुद्रित पृष्ठः 96 मूल्यः रु 200 प्रकाशकः हिंद-युग्म, 1, जिया सराय, नई दिल्ली-110016 फोनः 9968755908, 9873734046" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/04/SKAM-Front_Cover-209x300.jpg" width="209" height="300" /></a><p class="wp-caption-text"><strong>पुस्तकः शब्दों के अरण्य में (सजिल्द)</strong><br />(60 कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ)<br />विधाः कविता<br /><strong>संपादनः रश्मि प्रभा</strong><br />मुद्रित पृष्ठः 96<br />मूल्यः रु 200<br />प्रकाशकः हिंद-युग्म, 1, जिया सराय, नई दिल्ली-110016<br />फोनः 9968755908, 9873734046</p></div>
<p>`शब्दों के अरण्य में&#8217; विचरण करते हुए बहुत सुखद प्रतीत होता है। जैसे कोई अरण्य विभिन्न प्रकार के रूप-रंग, गुण-गंध, सुंगंध, आकार-प्रकार वाले पेड़-पौधों से सुरभित और सुशोभित होता है। तमाम विविधिताओं के बावजूद एक नाम से जाना-पहचाना जाता है ठीक उसी प्रकार रश्मि जी ने विविध प्रकार की रचनाओं का समन्वय करके `शब्दों के अरण्य में&#8217;  साठ कविताओं का विविधवर्णी और विविध गंध-सुगंध का एक गुलदस्ता बनाया है। निश्चित ही यह प्रशंसनीय एवं श्रमसाध्य कार्य है। संपादक रश्मि जी और हिंद युग्म प्रकाशन बधाई के पात्र हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भावनाओं, विचारों और संवेदनाओं का यह सफ़र निरंतर गतिमान रहे और ऊर्जस्वित करत़ा रहे ताकि यह धारणा गलत सिद्ध हो जाए कि कविता मृतप्राय हो रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि रश्मि जी ने वरिष्ठ और नवोदित रचनाकारों की भावनाओं और ज़ज्बात को एक साथ संजोया है, अक्सर ऐसा नहीं होता।</p>
<p style="text-align: justify;">उनकी चिंता यह भी है कि रचनाएँ भले ही अलग-अलग विधा या रंग-रूप की हों लेकिन अगर सब साथ मिलकर चलें तो अरण्य हम सबका हो जाता है। अकेले एक ध्रुवतारा का महत्व तब है जब अन्य तारे भी आकाश में हों। रात न हो तो दिन का क्या महत्व, लघुता न हो तो गुरुता का महत्व ही क्या? संसार में हर वस्तु का प्रयोजन है बिना प्रयोजन यहाँ कुछ घटित नहीं होता। यह बात अलग है कि हम इसे समझ न पाएँ। रचना की उपादेयता रचना का स्थान निर्धारित करती है। अत: रचनाकार को सर्जनात्मकता की गुणात्मकता का ध्यान रखना चाहिए। जितनी अधिक उपादेयता होगी रचना शीर्षस्थ आसन पर आरूढ़ होती जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;शब्दों के अरण्य में&#8217; जब मैंने पढ़ा तो तरह-तरह की अनुभूतियों, अहसासों से मन उद्वेलित होने लगा। हर रचना अलग-अलग अनुभूति लिए हुए लगी। सबसे पहले उन सभी रचनाकारों को शुभकामनाएँ जिनकी रचना इस संग्रह में स्थान पा सकी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अंजू अनन्या-</strong> `दृष्टिकोण&#8217; को परिभाषित करते हुए कहती हैं- `जीवन, जीवन होता है / भिन्न होता है तो / दृष्टिकोण&#8217;। सच है तभी तो कहा गया है कि सौंदर्य देखनेवाले की नज़र में होता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अनुलता राज नायर-</strong> `सच और झूठ &#8216; के द्वंद्व को बताते हुए कहती हैं कि झूठ चाहे जितनी चालें चले किन्तु जीत सच की ही होती है। देखिये- `झूठ की सूली पर /चढ़कर/सत्य अपना शरीर त्याग देता है /मगर सच की आत्मा /अमर होती है/सच कभी मरता नहीं&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अपर्णा मनोज-</strong> &#8220;विष का रंग क्या तेरे वर्ण-सा है कान्हा&#8217; यह प्रश्न है कान्हा के साथ-साथ पूरी पुरुष जाति से। उत्तर स्वयं की आत्मा में ही मिलेगा। स्त्री को कभी भी, किसी भी युग में न्याय नहीं मिला। पुरुष कुछ भी करे उसका गुणगान और बखान होता है- `मेरा पारस- स्पर्श तुझे याद है? अठ्ठारह पर्वों में तेरी गीता- हाँ! तेरी राजनीति की संपूर्ण समीक्षा थी /थी न /सच है ये /और मेरे नेह की समीक्षा-एक टीका भी न लिख पाया ?&#8217; कटु सत्य है भगवान् भी स्त्री के साथ न्याय नहीं कर पाया चाहे वो राम हो या कृष्ण।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमरेन्द्र `अमर&#8217;-</strong> `मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने&#8217; में कहते हैं कि इंसान का नज़रिया बदलता रहता है- `जो कभी पराये से लगे थे /वो नहीं बदले, न बदली उसकी तासीर /बदला तो केवल मेरा नजरिया&#8217;। सच है समय के साथ-साथ मनुष्य की सोच भी बदल जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमित आनंद पांडेय-</strong> `लवकुश का आक्रोश&#8217; कविता में शाश्वत और ज्वलंत प्रश्न। स्त्री, पत्नी और माँ का अपमान जब स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने किया तब संतान लवकुश का आक्रोश स्वाभाविक और न्याय सगत है। युग युगों तक राम (पुरुष) को इस घृणित कृत्य के लिए क्षमा नहीं किया जाएगा- `हमारा शैशव/ अभावग्रस्त क्यूँ राम /हमारी माँ /तुम्हारी अर्धांगिनी /आखिर उसको ही क्या /दे पाए तुम&#8217;?&#8217; बहुत मार्मिक प्रश्न।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमित अभिमन्यु-</strong> `मौत के बाद क्या?&#8217; मौत के बाद लोग कहाँ चले जाते हैं किसी को इस प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम। `मौत का स्टेशन गुजर चुका है /पूरी ट्रेन में इकलौती जीवंत दिखती चीज बची है एक सवाल-&#8220;मौत के बाद क्या&#8221; ? काश गुजर गए लोगों का कोई पता होता!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अवन्ती सिंह-</strong> `अब मैं&#8217; कविता में कहती हैं कि अब वे कविता का रूप रंग और आकार-प्रकार बदलने लगी हैं। प्रकृति परिवर्तन शील है, परिवर्तन स्वत: स्फूर्त है, साहित्य लेखन में भी परिवर्तन आ रहा है। नई-नई विधाओं में कविता लिखी जा रही है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अश्विनी कुमार-</strong> `प्रेमिका सी कविता&#8217;- प्रेमिका सी कविता ही क्यों बल्कि प्रेम ही कविता है। कविता भी अक्सर हम से रूठ जाती है देखिये- `प्रेमिका-सी कविता/ कई दिन के बाद मिली तो /बात नहीं करती आसानी से /अनमनी सी रहती है /रूठी&#8217;। बात यह है कि प्रेमिका हो या कविता आपका दिल चाहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ऋता शेखर `मधु&#8217;-</strong> `मत संहार करो वृक्षों का&#8217;-पर्यावरण पर अपनी चिंता व्यक्त करती हुई कहती हैं कि अगर इसी तरह वृक्षों को काटते रहे तो भविष्य में हमें साँस लेने को शुद्ध वायु और जल कुछ भी नहीं मिलेगा तब भावी पीढी इसका ज़वाब जरूर अपने पूर्वजों से माँगेगी- `पितामहो !आपने मकान छोड़ा /संपत्ती छोडी /बैंक बैलेंस छोड़ा /क्यों नहीं छोड़ा आपने /शुद्ध हवाएं, निर्मल नदी /वृक्ष की छाया, हरी धरती / पक्षियों का बसेरा, शीतल बयार /क्यों छीन लिया जीवन का मूल आधार/क्यों किया आपने वृक्षों का संहार&#8217;? ज्वलन्त समस्या, उत्तर कौन दे पायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कविता रावत-</strong> `यूँ ही अचानक कुछ नहीं घटता&#8217;, सच है हर घटना का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है। तर्क देखिये- `बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता यूँ ही अचानक कही कुछ नहीं घटता &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैलाश शर्मा-</strong> `नयन ताकते रहे&#8217; सुन्दर-सहज नवगीत, `बात तेरी जब उठी /दर्द हो गए हरे /हो गए बयन नि:शब्द /नयन ताकते रहे &#8216;। सच है जब शब्द मौन हो जाते हैं तब आँखें बात करती हैं।<br />
गार्गी चौरसिया-`अनमोल&#8217; सच है जो रिश्ते आत्मा से बनते हैं वे जिस्मानी रिश्ते से ज्यादा अपने होते हैं, भले ही उसका नाम न हो- `ये बेनाम रिश्ते हम नहीं चुनते /ये तो आत्मा चुनती है /और आत्मा जिस्म नहीं /आत्मा चाहती है &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गार्गी मिश्रा-</strong> `जुगनू&#8217;- युवा रचनाकार जुगनू के माध्यम से अपने प्यार की अभिव्यक्ति की है- `बुलाया भी था कि आ जाओ /लेकिन प्यार की भाषा सुनता कौन है&#8217; या `आ गए होते /बिस्तर भी लगाया था तुम्हारा &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गीता पंडित-</strong> `ओ मृत प्राय पल&#8217; में कहती हैं `होना है तुम्हें फीनिक्स /ओ मृत प्राय पल।जाओ और बनो मेरी मुक्ति के देवदूत /मुझे जन्म लेना है अभी तुम्हारी राख से &#8216;। अद्भुत अभिव्यक्ति।<br />
डॉ. जय प्रकाश तिवारी- `बादल और इंसान&#8217; कविता में बादल और इंसान की साम्यता देख कर तुलना करते हुए कहते हैं- `संवेदनहीनता,स्वच्छंदता /और अनैतिकता का /यह पाठ किसने सिखाया-इंसान ने बादल को /या बादल ने इंसान को ? और निष्कर्ष में पहुंचाते हैं कि बादल इंसान से ज्यादा बेहतर हैं `बादल तो फिर भी प्रायश्चित करते हैं /वे तो इस आचरण पर फिर भी रोते हैं /आत्मग्लानि की बरसात करते हैं /और धरा को उर्वरा बना जाते हैं /लेकिन इंसान भूल गया है करना /आत्मग्लानि और पश्चाताप /आखिर क्यों ?कब? और कैसे &#8216;? सच है इंसान अत्यधिक स्वार्थी और अहंकारी बन गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ कौशलेन्द्र मिश्र-</strong> `फुनगी पर टाँग दिया&#8217; माना कि मोबाइल फ़ोन आधुनिक युग की संचार का सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन इसने मनुष्य की निजता पर भी खलल डाला है। इसलिए कवि ने उसे नीम की फुनगी में टाँग दिया है- `क्या हुआ जो अब मैं / अपने अजीजों से/ बहुत जरुरी बातें भी नहीं कर सकूंगा /कुछ व्यवधान तो आयेंगे, पर&#8217;&#8230;। बात जरूरत की है और आधुनिक सुविधाओं की, अगर कोई बच सके तो अच्छी बात है लेकिन सुविधाओं का हमें गुलाम नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ .जेन्नी शबनम-</strong> `जा तुझे इश्क हो&#8217; कविता में बड़ा ही ख़ूबसूरत अहसास व्यक्त कर रही हैं। काश! इस नाजुक अहसास को पुरुष समझ पाता तब जीवन कितना सुन्दर होता। गैरों के दर्द को महसूस करना और उस दर्द को खुद जीने में अंतर होता है इसलिए तो यह कविता बुननी पड़ी- `एक बार तुम भी जी लो /मेरी ज़िंदगी /जी चाहता है /तुम्हें श्राप दे ही दूं /&#8220;जा तुझे इश्क हो&#8221;। बहुत खूबसूरत, इश्क तो जीवन का वरदान है, जो जीवन को सार्थकता प्रदान करता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ. निधि टंडन-</strong> `मेरी व्यस्तताएँ&#8217; में कहती हैं- प्यार में हमेशा आदमी व्यस्त रहता है कुछ हद तक सही भी है क्योंकि फिर किसी और दिशा में सोचने की इच्छा नहीं रहती पर जीवन निर्वाह के लिए काम भी करना पड़ता है। सिर्फ प्यार से भूख नहीं मिटती। कहा भी गया है `भूखे भजन न होय गोपाला&#8217;। पर जीवन में प्यार की भी अपनी महत्ता है इसके अभाव में जीवन संतुलित नहीं रहता।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ. प्रीत अरोड़ा-</strong> `संस्कारों की जीत&#8217; कविता में कहती हैं कि औरत की नियति हमेशा संस्कारों से निर्धारित और संचालित होती है इसलिए उसे हमेशा अपने अरमानों का गला घोंटना पड़ता है। पुरुष प्रधान समाज ने उसे संस्कारों की बेड़ियों में जकड़कर कभी भी उसकी नियति को बदलने नहीं दिया। देखिये कुछ पंक्तियाँ- `आखिर / जीत जाते संस्कार और हार जाती वो/आदर्श समझाते और समझ जाती वो /सीता, द्रौपदी को सम्मुख खड़ा पाकर /गला घोंट देती स्वयं अपने अरमानों का &#8216;। सच औरत के संस्कार ही उसके अनेक दुखों का कारण हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ. मोनिका शर्मा-</strong> `आखिर क्यों विक्षिप्त हुए हम&#8217;? आधुनिक युग की विकट समस्या स्त्री भ्रूण हत्या के प्रति चिंतित हो कहती हैं- क्या सच में हम विक्षिप्त हो गए हैं, जो बेटियों को कूड़ेदान में फेंक देते हैं या मार देते हैं- `तभी तो कूड़े दान में सिसकती /बेटियाँ यह प्रश्न उठाती हैं /आखिर क्यों विक्षिप्त हुए हम /क्यों ? कैसे मानुष न रहे हम&#8217; ? बहुत भयंकर स्थिति से समाज की विकृत मानसिकता गुजर रही है। पता नहीं यह समाज कब चेतेगा?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ. रमा द्विवेदी-</strong> `शून्य की यात्रा&#8217; में कहती हैं कि जीवन का आरंभ शून्य से ही होता है और फिर शून्य में समाप्त हो जाता है- `शून्य !जीवन यात्रा का आरंभ /जन्म जीवन का अवतरण /न भाषा, न सामर्थ्य /चलना, बोलना सब शून्य &#8216;&#8230;&#8230;.और फिर चरम बिंदु को पाकर /फिर शून्य में बदल जाता है /जीवन का शून्य मृत्यु / मृत्यु का शून्य जीवन &#8216;। अनवरत यह यात्रा चलती ही रहती है।<br />
डॉ. विजय कुमार श्रोत्रिय- `मेरी उड़ान &#8216; में कहते हैं कि पंख होते हुए यदि हम दिशाहीन उड़ान भरें तो पंखों का होना पीड़ादायी हो जाता है- `मुझे पंख दिए (दिशाविहीन) और छोड़ दिया /झाड़ियों के जंगल में &#8230;&#8230;काश! तुम समझ सकते/मेरे पंखों से रिसते लहू की पीडा&#8217;। सच है उड़ान यदि सही दिशा में न हो कई पीडाएं जन्म लेती हैं और भोगनी पड़ती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दिगंबर नासवा-</strong> `कभी ख़त्म नहीं होता&#8217; में कहते हैं कि मनुष्य चाहे जितना प्रयत्न कर ले लेकिन स्मृतियों को भूल नहीं पाता- `ये सच है कि एक सा तो हमेशा कुछ भी नहीं रहता /पर कुछ न कुछ होने का ये अहसास/ शायद कभी ख़त्म भी नहीं होता&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दीपिका रानी-</strong> `पति से बिछुड़ी औरत&#8217; कविता में सामजिक मान्यताओं पर प्रहार करती हुई कहती हैं कि पति के न रहने पर औरत के जीवन का हर सुख और इच्छाएँ छीन ली जाती हैं। इस धारणा को अब बदलना चाहिए क्योंकि पत्नी के न रहने पर पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता बल्कि उसका मान और भी बढ़ जाता है। देखिये- `पत्नी से बिछुड़ा आदमी /किसी बेस्ट सेलर का सेकेण्ड एडीशन है /नई जिल्द, नए कलेवर के साथ /लोग देखते हैं उसे दिलचस्पी से /किसी खाली अलमारी में /उसे सजाने के ख्वाब देखते हैं&#8217;। सच है समाज की यह विडम्बना ही कही जायेगी कि स्त्री-पुरुष के लिए दोहरे मापदंड क्यों?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>निखिल आनंद गिरि-</strong> `खैर, माँ तो माँ है ना&#8217; में कहते हैं कि बहुत दिनों बाद माँ से मिला हूँ तो इतनी सज़ा तो मिलनी वाजिब है न। जो अधूरी नज्म की डायरी थी माँ ने रद्दी में बेंच दी, मन उदास है पर माँ तो माँ है कुछ कह नहीं सकता- `खैर, माँ तो माँ ही है ना /बहुत दिनों बाद लौटा हूँ तो इतनी /सजा जरूरी-सी लगती है&#8217;। माँ के प्रति यह श्रद्धा, यह समर्पण, यह निष्ठा काश हर पुत्र में हो?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नित्यानंद गायेन-</strong> `आख़िरी पेड़ और चिड़िया&#8217; में कहते हैं कि सभ्यता और संस्कृति समाप्तप्राय है। इस युग की अंतिम चिड़िया और अंतिम पेड़ बचा है- `आज मौन है /नदी किनारे का वो वृक्ष /अंतिम चिड़िया के साथ /मेरी तरह &#8216;लेकिन यह भी सच है कि संस्कृतियों और सभ्यता का निर्माण फिर-फिर होता है। बच्चन जी की पंक्तियाँ याद आ गईं- `नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह आह्वान फिर-फिर&#8217;।<br />
पल्लवी त्रिवेदी- `हम सब ऐसे ही तो हैं&#8217; में कहती हैं कि अगर इंसान ने बचपन खो दिया तो इंसान मासूमियत को भी खो देगा और माता-पित़ा और संतान का तालमेल नहीं बैठ पायेगा। बच्चों के बड़े हो जाने पर माता-पिता को बच्चों से मित्रता का व्यवहार करना चाहिए हिटलर का नहीं। &#8216;सच ही तो है /बचपन भले ही चला जाए /बचपना कहाँ जाता है /और शायद यही तो है /जो इंसान की मासूमियत /खोने से बचाता है&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रत्यक्षा-</strong> `मेरे अन्दर का जंगल&#8217; में कहती हैं कि हमारे अन्दर भी तरह-तरह के अनावश्यक विचार पनपते रहते हैं जो हमारे सकारात्मक ऊर्जा को प्रवाहित होने से रोकते हैं- `मेरे अन्दर भी /उग आया है /एक पूरा जंगल/ऐसे वृक्षों का /सोख रहा है जो /धूप का हर एक कतरा&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बाबुषा कोहली-</strong> `जूते &#8216; फैन्टेसी की कविता है। `फाह्यान की आत्मा उसके पैरों में रहती थी / चलना उसका धर्म था/उसके जूतों में जमी धूल की परतें /आस्था में डूबे श्लोक हैं &#8216;। चलने की विवशता और खुद के तलाश का गहरा जीवन दर्शन इस कविता में है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मार्कंडेय राय-</strong> `सब कुछ याद है&#8217; इस कविता में गाँव, घर और ग्राम्य जीवन की यादों का चित्रण हुआ है। कवि को अपने बीते जीवन की तमाम यादें मेले से लेकर दादी-नानी की कहानियाँ खेतों से लेकर बैलों की खनकती घंटियाँ, मीठे की भेली चुराना, पाठशाला से छुप कर भाग जाना इत्यादि सभी का चित्रण है इस कविता में।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मीनाक्षी धन्वंतरी-</strong> `व्यक्तित्व&#8217; में कहती हैं- मानव में मानव के व्यक्तित्व को परखने की संवेदना समाप्त सी हो गई है। कोई किसी को देखकर समझ नहीं पाता कि उसके ऐसा होने का कारण क्या है- `किसी ने नहीं कहा था- वह मानव के छल-कपट से आहत है&#8217;/ किसी ने नहीं कहा था- वह प्रेम रस पीने को व्याकुल है&#8217;। सच मानव बहुत असंवेदनशील हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मीनाक्षी स्वामी-</strong> `रेल में बैठी स्त्री&#8217; में स्त्री जीवन की तुलना रेल से की है। स्त्री के जीवन की रेल तेज दौड़ती है किन्तु उसके सपने कभी पूरे नही होते- `और रेल के भीतर बैठी स्त्री के सपने /वैसे ही बक्से में बंद रहते हैं /जैसे उसने /सहेज कर /रखे थे कभी &#8216;। बिलकुल सत्य, स्त्री जीवन ऐसा ही तो है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मुकेश कुमार सिन्हा</strong> `हाथ की लकीरें&#8217; में बताते हैं कि लकीरों से किसी का भाग्य नहीं बनता, बिगड़ता, मेहनत बहुत जरूरी है- &#8216;एक इमानदार /कोशिश,बस इतना ही /शायद बन जाए शहंशाह /तकदीर से ऊपर /उठकर / मेहनत का बादशाह &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रश्मि प्रभा-</strong>`तथास्तु&#8217; मानव को चेतावनी देती अद्भुत रचना है। मनुष्य कितनी ही मनमानी कर ले वो ईश्वर से ज्यादा शक्तिमान नहीं हो सकता क्योंकि उसे तो बस तथास्तु भर कहना है और सब ख़त्म- `वह सृष्टि के सारे स्रोत सुखा दे/तब तुम क्या करोगे ? और यह उसके लिए अति आसान है / तुम तो मशीनों का सहारा लेते हो /उसे तो बस तथास्तु कहना है /और सब ख़त्म &#8216;।`</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रश्मि रविजा-</strong> `काली कॉफी में उतरती साँझ&#8217;- आधुनिकता का पर्याय काली कॉफी बन गया है और उदासी दूर करने का साधन भी। भागमभाग की तनाव भरी ज़िंदगी के तनाव को दूर करने के लिए उसे एकांत, मद्धम रौशनी और साथ में एक कप काली कॉफी चाहिए-`सारे कॉम्बिनेशन सही हैं /धूसर-सी साँझ /अन्धेरा कमरा /ये उदास मन &#8230;.और काली कॉफ़ी &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राजीव चतुर्वेदी-</strong> `शायद कविता उसको भी कहते हैं&#8217;- कविता कैसे बुनी जाती है या रची जाती है इसको कई प्रकार से परिभाषित कर रहे है- `इस बसंत में जंगल को भी चिंता है /नागफनी में फूल खिले हैं शब्दों से / शायद कविता उसको भी कहते हैं &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राजेंद्र तेला `निरंतर&#8217;-</strong> `नींद मनो रूठ कर बैठ गई&#8217;- आधुनिक युग का एक बड़ा सवाल कि नींद नहीं आती। अत्यधिक भाग दौड़ की ज़िंदगी की चिंताओं ने मनुष्य की नींद पर भी डाका डाला है, लोग शांत मन से बिस्तर पर सोने के लिए नहीं जाते, उस समय भी दिमाग चिंताओं से मुक्त नहीं होता तब नींद कैसे आयेगी- `मुझे बुलाना होतो /विचारों का मंथन त्याग कर /शांत मन और मस्तिष्क से /बुलाओ /परमात्मा का ध्यान करो /मैं तुरंत आकर तुम्हें/ अपनी गोद में ले लूंगी&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लावण्या दीपक शाह-</strong> `ॐ&#8217; की महाध्वनि के माहातम्य को बड़ी ही खूबी से अभिव्यक्त किया है- `उंगलियाँ छूती हैं तार को/बजती महाध्वनि, अघोष &#8216; &#8230;&#8230;स्वर झंकार कर मेरे मन /हों निनादित दिशाएँ /गा उठे पाषाण भी /कलकलित स्वर से बह चले /झरने की धार भी &#8216;। बहुत भावपूर्ण रचना।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लीना मल्होत्रा राव-</strong> `वो जो सीता ने नहीं कहा&#8217;- सीता के चरित्र को नवीन दृष्टि से रेखांकित किया है इनकी सीता राम से प्रश्न पूछती है- `तुम्हारी मर्यादा /और अब /तुम्हारा ही अपराधबोध /तुम्हारा यह स्वार्थ /तुम्हारे पुरुष होने का परिणाम है /या/ मेरे स्त्री होने का दंड ? मैं कभी जान न पाई /इसलिए /आज मेरे मन का यह सौवाँ हिस्सा तुमसे यह पूछता है &#8216;। युग-युगों से प्रश्न अनुत्तरित है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वंदना गुप्ता-</strong> `और श्राप है तुम्हें मगर तब तक नहीं मिलेगा तुम्हें पूर्ण विराम&#8217;- पुरुष की विकृत मानसिकता का चित्रण किया है। पुरुष स्त्री में केवल देह ढूँढ़ता है जब तक पुरुष स्त्री की भावनाओं को नहीं समझेगा तब तक उसे श्राप से मुक्ति नहीं मिल पायेगी। देखिये कुछ पंक्तियाँ- `तब तक, जब तक /नहीं उतरोगे तुम उसके /स्त्रीत्व की परिक्षा में खरे / नहीं भेदोगे जब तक तुम /उसके मन के कोने &#8230;&#8230;&#8230;.बेशक मिलता रहे अर्द्ध विराम /मगर तब तक /नहीं मिलेगा तुम्हें पूर्ण विराम &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वंदना शुक्ला-</strong> `शेष दु:ख&#8217;- में वंदना जी कहती हैं चाहे इंसान हो या प्रकृति शेष रहता है कोई न कोई दु:ख। यही तो ज़िंदगी है। देखिये- `रात &#8230;उम्मीद का पीछा करते शब्दों की निशान देही पर /पहुँच जाती है उस नदी तक /जहाँ चाँद की छाँह में स्मृतियाँ निचोड़ रही होती है /अपने शेष दु:ख &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाणी शर्मा-</strong> `मैं पूर्ण हुई, संपूर्ण हुई&#8217;-यह सच है कि स्त्री का स्त्रीत्व माँ बनकर ही संपूर्ण होता है- `खिली मेरे बगिया में कली /भर गया मेरा अधूरापन/अब कोई सपना अपना नहीं /थमा उसे सपनों की पोटली /निश्चिन्त हुई /मैं पूर्ण हुई /सम्पूर्ण हुई &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विजय कुमार संपत्ति-</strong> &#8216;तलाश&#8217; में कहते हैं- कब और कैसे वो माँ की ममता से विलग हो शहर की भीड़ में खो गये पता ही नहीं चला। आदमी शहर कुछ तलाश में आता है लेकिन पीछे माँ का स्नेह खो जाता है- `आज सिर्फ माँ की याद रह गई है, उसके हाथ नहीं /न जाने / मैं किसकी तलाश में इस शहर आया था&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विभारानी श्रीवास्तव-</strong> &#8216;बात एक ही है&#8217; में कहती हैं कि लड़की को सहन करने का संस्कार क्यों सिखाया जाता है? इन्हीं संस्कारों के कारण ही विवाह के बाद वह ससुराल में घुट-घुट कर जीती है। माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्तेदार सब उसे पराया कर देते है, उसके दु:ख का साथी कोई नहीं होता- `जीने की ख्वाहिश में मरती गई /एक कमरे में चीखती गई /एक बेटी&#8217; / एक माँ जो अपने बच्चों को अच्छी ज्ञान की बातें सिखाती है, एक दिन वह खुद कमजोर सी रोती हुई कहती है-&#8220;मुझे बचा लो न&#8221;। बहुत मार्मिक रचना- `सारे रिश्ते ज़ख्म ही बन कर रह जाते हैं /तो रिश्तों से रु- ब-रु हो /या ज़ख्म कुरेदो /बात एक ही है &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिखा वार्ष्णेय-</strong> `कुछ पल&#8217; में कहती हैं कई बार हमें लगता है कि कुछ पल हमारे लिए हैं लेकिन दूसरे ही पल वे सब मुरझा जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि समय कभी ठहरता नहीं और जो बीत जाता है वो वापस नहीं आता। `शायद फिर से खिल जाएँ /पर पेड़ से गिरे पत्ते /कहाँ फिर पेड़ पर लगते हैं /वो सूखे लम्हे भी /यहाँ-वहाँ बिखरे ही दीखते हैं&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शैफाली गुप्ता-</strong> `तुम्हारी कमी&#8217; बहुत संवेदनशील कविता है। जब प्रिय अंतस मन के गहरे बस जाता है तब हर पल, हर जगह उसका आभास होने लगता है। यह मुमकिन है तभी तो कबीर ने लिखा-`लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल&#8217;। प्रेम की पराकाष्ठा इसे राधा और मीरा ने भी अनुभव किया था। कुछ पंक्तियाँ- `कि छू कर किसी याद को /ऐसा लगे कि जैसे मैंने छुआ हो तुम्हे &#8216;। यादें हमें बीते अहसासों की संवेदना से जोड़ देती हैं और हम उसे महसूस करने लगते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संगीता स्वरूप-</strong> `किसे अर्पण करूँ &#8216;ज़िंदगी में ऐसे अनेक अनुभव होते हैं, किसको वरण करे और किसको त्यागे, किसका तर्पण करे या किसको अर्पण करें यह निश्चित कर पाना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे स्थिति में अपने अंतर्मन और विवेक से ही काम लेना पड़ता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संतोष कुमार `सिद्धार्थ&#8217;-</strong> `मृत्यु: कुछ शब्द चित्र&#8217;, कवि ने मृत्यु के सम्बन्ध में जितने भी तथ्य प्रस्तुत किये हैं, सब सच हैं किन्तु उनका एक प्रश्न है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन में लोग हँसकर क्यों नहीं शरीक होते। यही तो मोहमाया और अज्ञानता है जो हमें ऐसा करने नहीं देती। मनुष्य सदा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर जीवन जीता है और तभी यह प्रश्न जन्म लेता है- `पर क्यों/ हँसकर न शरीक हुए / मिलने पर/आत्मा-परमात्मा के &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संध्या शर्मा</strong>- `चिड़िया&#8217;, में वो अपने बचपन को चिड़िया के माध्यम से चित्रित करती हैं और कहती हैं कि इंसानों ने जो इतने ऊंचे-ऊंचे टॉवर बनाए हैं उससे पक्षी भी दिगभ्रमित हो रहे हैं- `इंसानों ने जो ऊंचे-ऊंचे टॉवर लगाए हैं /ये ही हमारे लिए मुसीबत लाये हैं /हमें जाना कही और होता है /और चले कहीं और जाते है /ये हमें बहुत सताते है /हमें दिग्भ्रमित कर जाते हैं &#8216;। चिड़िया की व्यथा सुन संध्या जी दुविधा में है कि वो तो चिडिया बनना चाहती थी अब बने या नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सतीश सक्सेना-</strong>`तेरी याद में&#8217;, कवि माता-पित़ा के खो जाने से दुखी हैं। सच में माता-पिता से बढकर कुछ भी नहीं है जीवन में। हम कितने ही बड़े हो जाएँ माता-पिता का स्नेह पाने को मन आतुर रहता है- `एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले /कुछ साथ बिताने आ जाओ/एक दिन बेटे की चोटों को /खुद अपने आप देख जाओ /कैसे लोगों संग दिन बीते, कुछ दर्द बताने बैठे हैं /हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं&#8217;। बहुत मार्मिक रचना।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>समीर लाल `समीर&#8217;-</strong> `वापसी&#8217; में बताते हैं कि घर वापस आना कितना सुखद और सुकून भरा होता है- &#8216;साईकिल पर सवार /कारखाने के वापस आते मजदूर/अपने बसेरों की तरफ जाते पंछी /धूल में सने/दिन भर खेल कर /लौटते गाँव के बच्चे&#8217;। भावपूर्ण रचना।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सरस दरबारी-</strong>`यादें&#8217;, यादे कभी छूटती नहीं और न पूछती हैं। अपने आप चली आती हैं। कभी आह्लादित तो कभी उदास कर जाती हैं। `बीते किस्से-बीते लम्हें वह अहसास हैं जो /रूह को छूकर हर सिम्त से गुजर जाते हैं /खुशनुमा पल और कुछ दुःख के कहर /डूबते-उतराते कभी तैरते चले जाते हैं &#8216;। बहुत सच, यादें ऐसी ही होती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सलिल वर्मा-</strong>`भिक्षुक ,&#8217; यह निराला की कविता की याद दिलाती है। दिसंबर की ठिठुरती ठण्ड में कवि जब इस भिक्षुक को देखता है तो करुणावश उसे दस रुपये दे देता है तब दूसरा व्यक्ति बोलता है यह एक्टिंग कर रहा है। बेकार आपने रूपये दिए तब कवि ने सोचा अगर यह एक्टिंग है तो अद्भुत है उसने अपनी कला को कौड़ियों के भाव बेंचा है तभी तो भीख मांगता है। अभिनेताओं पर करारा व्यंग्य है- `यदि एक्टिंग है ये तो अद्भुत है /करोड़ों से कम तो अमिताभ भी लेता नहीं/ इस एक्टिंग के/इस बेचारे ने करोड़ों का खजाना /कौड़ियों के मोल बेंचा है&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साधना वैद्य-</strong>`सुमित्रा का संताप&#8217;, रामायण के पात्र सुमित्रा के चरित्र को परम्परा से हटकर विश्लेषित किया है। मैथली शरण गुप्त ने `कैकेयी का संताप&#8217; लिखा था। सुमित्रा का प्रश्न है कि क्या मैंने पुत्र विछोह का संताप कौशिल्या से कम झेला है बल्कि मैंने उनसे ज्यादा झेला है क्योंकि पुत्रवधू उर्मिला की पीड़ा भी मैंने झेली है तो फिर कैसे मेरा मूल्यांकन कम किया गया। सिर्फ इसलिए कि वो मर्यादा पुरुषोत्तम राम की माँ है! पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-`फिर मेरी पीड़ा का आकलन /यह संसार कम कैसे कर लेता है ? मेरा दुःख गौड़ और बौना /क्या सिर्फ इसलिए हो जाता है कि मैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम/की माँ कौशिल्या नहीं /उनके अनुज लक्ष्मण/ की माँ सुमित्रा हूँ &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सीमा सिंघल-</strong> `ज़िंदगी का कोई सवाल नहीं था&#8217;, में कहती हैं कि बचपन से बड़ों का सम्मान और विनम्रता का पाठ पढ़ा और उसे किया भी किन्तु अपने लिए अपमान कैसे सहन करती? बस इसी वजह से अपनों से अलग हो गई। अब वह अपनी आत्मा को ज़वाब दे सकती है किन्तु सिर्फ अपने लिए। वैसे भी ज़िंदगी ने उससे कोई सवाल नहीं किये। देखिये- `वह खुद के लिए /हेय दृष्टि कैसे सहन करती /और क्रूर हो जाती अपनी आत्मा के प्रति /बस कर लिया बँटवारा /अब उसके पास ज़वाब तो हैं /सिर्फ अपने लिए /क्योकि ज़िंदगी का कोई सवाल नहीं था उससे &#8216;। सच है अपने आत्म-सम्मान को आहत करके जीना दुश्वार हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सुनीता शानू-</strong> `एक विचार&#8217;, में कहती हैं कि दुखदायी अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता, काली परछाई बन आत्मा को सालता रहता है- `इनकी काली परछाईं /नहीं छोडती कभी / आत्मा को अकेले /सालती रहती है /टीस बनकर /उम्रभर।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सुशीला शिवराण-</strong> `दाह का उत्सव&#8217;, सती प्रथा पर कुठाराघात करते हुए कहती हैं कि ज़िंदा स्त्री के सती हो जाने का उत्सव ढोल-नगाड़े बजाकर मनाया जाता है। सच में यह हमारे समाज का कटु और घिनौना कृत्य है। एक ज्वलंत प्रश्न वह पुरुष प्रधान समाज से पूछती है- `क्यों नहीं पुण्य कमाते पति /कर पत्नी के शव पर निज दाह /क्या है कोंई ज़वाब /बोल मेरे पुरुष-प्रधान समाज?&#8217; उत्तर सदियों से अनुत्तरित है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सोनिया बहुखंडी गौड़-</strong>`ये यादें&#8217; में कहती हैं कि यादें किसी और की होती हैं और कष्ट किसी और को देती हैं। लोग अपरिचित हो जाते हैं पर यादें कभी अपरिचित नहीं होतीं-`जैसे तुम अपरिचित हुए /ये यादें क्यों न हुईं अपरिचित ?/अपने साथ पीड़ा की आयु भी बढ़ा रही है /ये यादें।कितनी भ्रष्ट हैं-ये यादें सम्बंधित तुमसे हैं और /परिचय मुझसे बढाती हैं&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वाति भालोटिया-</strong>`अभिलाषित हुई&#8217; यह एक प्रेम कविता है। जो प्रेम अब बहुत-बहुत दूर हो गया है लेकिन उसकी याद और अहसास अब भी महसूस होती हैं लेकिन सामाजिक बन्धनों के कारण चाहकर भी उसे प्राप्त नहीं कर सकती। पर मुरादें रहती हैं-`रहीं मुरादें गीली-सी /गीली वो पूरी शाम रही /जंग लगी पुरानी लगन /फिर लगती है होठों से /फिर कहती है &#8220;प्यास लगी है &#8221;&#8230;&#8230;&#8230;!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हरकीरत हीर-</strong>`मैं तुम्हें मुक्त करती हूँ&#8217;, में कहती हैं कि स्त्री-पुरुष के रिश्ते बहुत तिक्त और बेसुरे हो गए हैं। रिश्तों में कडुवाहट इतनी बढ़ गई है कि वाणी से वे उसे दोहराना नहीं चाहते और न झगड़ना चाहते। बस उस रिश्ते से मुक्त होना चाहते हैं। लड़ने-झगड़ने से रिश्ते कभी नहीं निभते ऐसे रिश्तों से मुक्त हो जाना ही दोनों के लिए हितकर है पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-`हाँ! आज मैं मुहब्बत की अदालत में खडी होकर/ तुम्हें हर रिश्ते से मुक्त करती हूँ &#8216;।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;शब्दों के अरण्य में&#8217; कविता-संग्रह बहुत सारगर्भित और पर्याप्त सार्थकता को गहरे समेटे हुए है। यह स्तरीय, पठनीय और संग्रहणीय संकलन है। पाठक इसे पढ़कर अवश्य ही लाभान्वित होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रूफ रीडिंग की त्रुटियाँ नहीं हैं। कवर पेज अर्थपूर्ण और आकर्षक है और संपादन और प्रकाशन बहुत कुशलता पूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किताब को ऑनलाइन ऑर्डर करने के लिंकः</strong></p>
<div>फ्लिपकार्टः <a href="http://www.flipkart.com/shabdon-ke-aranya-mein-hindi/p/itmdbk4gfqzgg3zh?pid=9789381394137" target="_blank">http://www.<wbr />flipkart.com/shabdon-ke-<wbr />aranya-mein-hindi/p/<wbr />itmdbk4gfqzgg3zh?pid=<wbr />9789381394137</a></div>
<div></div>
<div>इंफीबीमः <a href="http://www.infibeam.com/Books/shabdon-ke-aranya-mein-editor-rashmi-prabha/9789381394137.html" target="_blank">http://www.infibeam.<wbr />com/Books/shabdon-ke-aranya-<wbr />mein-editor-rashmi-prabha/<wbr />9789381394137.html</a></div>
<div></div>
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<div></div>
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<div>होमशॉप18: <a href="http://www.homeshop18.com/shabdon-ke-aranya-mein/author:editor-rashmi-prabha/isbn:9789381394137/books/poetry/product:30436126/cid:10938/?pos=1" target="_blank">http://www.<wbr />homeshop18.com/shabdon-ke-<wbr />aranya-mein/author:editor-<wbr />rashmi-prabha/isbn:<wbr />9789381394137/books/poetry/<wbr />product:30436126/cid:10938/?<wbr />pos=1</a></div>
<p style="text-align: justify;"><strong>समीक्षक : डॉ . रमा द्विवेदी</strong></p>
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		<title>नवसाम्राज्यवाद के विरूद्ध वैश्विक जन प्रतिरोध के लिए साहित्यकारों का लगा जमघट&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Mar 2013 06:02:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[- देश को अपनों से ही खतरा: डा. रामजी सिंह - विश्व के तमाम संसाधनों पर... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div>
<div id="attachment_7974" class="wp-caption alignright" style="width: 207px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/dsc02013/" rel="attachment wp-att-7974"><img class=" wp-image-7974    " alt="सभा को संबोधित करते श्री ए वी बर्द्धन " src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC02013.jpg" width="197" height="148" /></a><p class="wp-caption-text">सभा को संबोधित करते श्री ए वी बर्द्धन</p></div>
<p><span style="font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><b><span style="color: #222222;" data-mce-mark="1">- देश को अपनों से ही खतरा: </span><span style="color: #330099;" data-mce-mark="1">डा. रामजी सिंह</span></b></span></div>
<div><span style="font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><b><span style="color: #222222;" data-mce-mark="1">- विश्व के तमाम संसाधनों पर कब्जा जमाने का प्रयास हो रहा है: </span><span style="color: #330099;" data-mce-mark="1">ललित सुरजन</span></b></span></div>
<div><span style="font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><b><span style="color: #222222;" data-mce-mark="1">- नवसाम्राज्यवाद से क्षेत्रवाद जातिवाद बढ़ा है:</span><span style="color: #330099;" data-mce-mark="1"> वेदप्रकाश</span></b></span></div>
<div><span style="font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><b><span style="color: #222222;" data-mce-mark="1">- डेमोक्रेसी लाने के नाम पर देशों की ऐतिहासिक संस्कृति पर बर्बर हमला किया जा रहा है: </span><span style="color: #330099;" data-mce-mark="1">एबी वर्द्धन</span></b></span></div>
<div><span style="font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><b><span style="color: #222222;" data-mce-mark="1">- हमारी सोच का स्पेश सिमटता जा रहा है: </span><span style="color: #330099;" data-mce-mark="1">नूर जहीर</span></b></span></div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"><strong>गोदरगावां,बेगूसराय (बिहार) । </strong> साम्राज्यवाद ने अपनी स्वार्थों को पूरा करने की जिम्मेदारी नवसाम्राज्यवाद को सौंप दिया है। बगैर वामपंथ का साथ लिए हम नवसाम्राज्यवाद से नहीं </span><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> लड़ सकते। नवसाम्राज्यवाद मंडलीयकरण का नारा देता है लेकिन इस नारे से देश में क्षेत्रवाद और जातिवाद बढ़ा है इस कारण भारत की राजनीति </span><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1">पूंजीपति के हाथ में चली गई है। २३ एवं २४ </span>को<span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> मार्च </span>बेगूसराय के गोदरगांवा स्थित विप्लवी पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव में ‘नवसाम्राज्यवाद के विरूद्ध वैश्विक जन प्रतिरोध की दिशा और भारत’ विषयक संगोष्ठी में आलोचक वेदप्रकाश ने कही।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">
<div id="attachment_7975" class="wp-caption alignleft" style="width: 179px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/dsc02025/" rel="attachment wp-att-7975"><img class=" wp-image-7975    " alt="ललित सुरजन का अध्यक्षीय वक्तव्य" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC02025.jpg" width="169" height="127" /></a><p class="wp-caption-text">ललित सुरजन का अध्यक्षीय वक्तव्य</p></div>
</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> इसके पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए भाकपा के पूर्व महासचिव एवी वर्द्धन ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज़ के निधन पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि शावेज़ कोई कम्युनिस्ट पार्टी से नहीं थे, वे जनता के थे। वे 58 वर्ष की आयु में चले गये साम्राज्यवादी बाट जोह रहे हैं कि वेनेजुएला कब साम्राज्यवादियों का अड्डा बन जाये। शावेज अमर हो गये हैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। </span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> एक मिनट मौन के पश्चात उक्त विषय पर प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक व पूर्व सांसद डा. रामजी सिंह ने  कहा कि विचारों को उन्मुक्त होना चाहिए। आज कांग्रेस ने समाजवाद के साथ-साथ लोकतंत्र का भी श्राद्ध कर दिया है। गांधी ने कहा था हम पृथ्वी के पति नहीं पुत्र हैं। आज हमारे सामने बाहर से नहीं बल्कि अपने लोगों से खतरा है&#8230; साम्यवाद या गांधीवाद अगर अंतिम व्यक्ति के लिए नहीं सोचता तो वह बेकार है..। भारत ही नहीं चीन भी नवसाम्राज्यवाद के कब्जे में है..। संधर्ष के अलावे दूसरा कोई रास्ता नहीं होता। </span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकार व साहित्यकार ललित सुरजन ने की। श्री सुरजन कहा कि विश्व के तमाम संसाधनों पर कब्जा जमाने की साम्राज्यवादी होड़ चल रही है। उन्होंने कहा कि साम्राज्यवाद में प्रत्यक्ष रूप से लूट होती थी और पूंजीवाद में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूप से लूट जारी है। </span></div>
<div style="text-align: justify;">
<div id="attachment_7976" class="wp-caption alignright" style="width: 190px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/dsc02009/" rel="attachment wp-att-7976"><img class=" wp-image-7976 " alt="साहित्यकारों का जनमार्च" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC02009-300x225.jpg" width="180" height="135" /></a><p class="wp-caption-text">साहित्यकारों का जनमार्च</p></div>
</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> दिल्ली से पधारे प्रो. अजय तिवारी ने कहा कि गांव में जहां ज्ञान के साधन नहीं पहुंचते हैं वहां अधिक जिज्ञासा होती है, यह जिज्ञासा पीड़ा से भी जुड़ी होती है.. एक ओर अंबानी 54 हजार करोड़ में मकान बनाये हैं वही हमारी बड़ी आबादी 18 रू. रोज पर जीवन यापन करते हैं.. साम्प्रदायिकता अंग्रेजों की देन है, पहला साम्प्रदायिक दंगा 1861 में हुआ था.. तानाशाही व धर्मान्घता अमरीकी नीति का हिस्सा है.. कोई भी लोकतांत्रिक राजनीति समाज के दबे कुचले की उपेक्षा नहीं कर सकता है, गांधी और माक्र्स दोनों दुनिया को बदलना चाहते थे।</span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> लेखिका नूर जहीर ने कहा कि हमारे सोचने के लिए स्पेश सिमटता जा रहा है..टेªड यूनियन में मजदूर नहीं पहुँच सके ऐसी व्यवस्था की जा रही है। सभ्य समाज में औरतों पर जुल्म हो रहा है, मजहब के नाम पर औरतों को नही बांटा जा सकता क्योंकि सभी की पीड़ा एक सी है&#8230;।</span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> संगोष्ठी के दूसरे दिन 24 मार्च को ‘वर्तमान संकट तथा प्रगतिशील आंदोलन की चुनौतियां’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन ने कहा कि आज के दौर में एक षड्यंत्र के तहत किसी समस्या को खंड-खंड कर देखा जा रहा है। भारत का एक नागरिक &#8211; एक ओर जहां वोटर है, वह कहीं उपभोक्ता भी है! भाषा के सवाल पर उन्होंने कहा कि जिस दिन हिन्दी समाप्त हो जायेगी प्रेमचंद भी खत्म हो जायेंगे। उन्होंने ‘जयपुर लिट्ररी फेस्टिवल’ पर भी कई सवाल उठाये..।</span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> एबी वर्द्धन ने कहा कि फासिज्म की कल्पपना है कि किताबों को जला दें&#8230; डेमोक्रेसी के नाम पर उन देशों की ऐतिहासिक संस्कृति पर बर्बर हमला किया जा रहा है। 38 मुल्कों के भाड़े के सिपाही सीरिया में लड़ रहे हैं.. साम्राज्यवाद  क्या है उसकी समझ हमें आनी चाहिए तभी हम नवसाम्राज्यवाद को समझ पायेंगे। माक्र्स ने कहा था &#8211; यह जो सर्वहारा वर्ग है वही समाज को बदलेंगे। किसी ने  हिंसा को स्थान नहीं दिया..। शीतयुद्ध के दिनों अमरीका का हाथ रोकने के लिए सोवियत संघ था.. हिटलरी फासिज्म से दुनिया को अपनी कुर्बानी देकर सोवियत संघ ने बचाया था। सोवियत युनियन खत्म होने से अमरीका बादशाह बन गया उसको रोकने वाला नहीं रहा, जनता ने कहा हम हताश हैं लेकिन अमरीका से 90 किलोमीटर दूर क्यूबा चुनौती देने के लिए खड़ा है। वियतनाम ने हो ची मिन्ह के नेतृत्व में जापान, फ्रेंच और अमरीकी साम्राज्यवाद को मुकाबला किया&#8230;।</span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">
<div id="attachment_7978" class="wp-caption alignleft" style="width: 220px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/dsc01976/" rel="attachment wp-att-7978"><img class=" wp-image-7978 " alt="डा. रामजी सिंह, ललित सुरजन, राजेन्द्र राजन, प्रो. अजय तिवारी, राकेश, वेद प्रकाश, अरविन्द श्रीवास्तव आदि" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC01976-300x225.jpg" width="210" height="158" /></a><p class="wp-caption-text">डा. रामजी सिंह, ललित सुरजन, राजेन्द्र राजन, प्रो. अजय तिवारी, राकेश, वेद प्रकाश, अरविन्द श्रीवास्तव आदि</p></div>
</div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> संगोष्ठी में अजय तिवारी, नूर जहीर, वेद प्रकाश, राकेश, रामवचन राय, विजेन्द्र ना. सिंह आदि ने अपने विचार रखे।   </span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif;" data-mce-mark="1"> इस समारोह के संयोजक राजेन्द्र राजन ने सूचित किया कि डा. विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पत्नी की अस्वस्थता की वजह से आयोजन में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने डा. त्रिपाठी के शुभकामना संदेश को पढ़ कर सुनाया।</span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">
<div id="attachment_7979" class="wp-caption alignright" style="width: 220px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d/dsc02042/" rel="attachment wp-att-7979"><img class=" wp-image-7979 " alt="आमसभा को संबोधित करते अतिथि वक्ताओं में - एबी वर्द्धन, नूर जहीर, प्रो. अजय तिवारी, वेद प्रकाश, ललित सुरजन एवं राजेन्द्र राजन .." src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC02042-300x225.jpg" width="210" height="158" /></a><p class="wp-caption-text">आमसभा को संबोधित करते अतिथि वक्ताओं में &#8211; एबी वर्द्धन, नूर जहीर, प्रो. अजय तिवारी, वेद प्रकाश, ललित सुरजन एवं राजेन्द्र राजन ..</p></div>
</div>
<div style="text-align: justify;">समारोह में विप्लव पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘हाँक’ अंक 4 का लोकार्पण उपस्थित साहित्यकारों ने किया।</div>
<div style="text-align: justify;">
<div></div>
<div> समारोह के मुख्य आकर्षण का केन्द्र बना ’कबीर’ की मुर्ति.. जिसका अनावरण कामरेड एबी वर्द्धन ने किया</div>
<div></div>
<div>प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक डा. रामजी सिंह एवं कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव एबी वर्द्धन को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।</div>
<div></div>
<div> समारोह का एक मुख्य आकर्षण बीहट इप्टा के दिलीप जी का गायन एवं लखनऊ इप्टा द्वारा ब्रेख्त के नाटक ‘नियम और अपवाद’ का वेदाराकेश द्वारा मंचन व रंगकर्मी राकेश का संचालन था।</div>
<div></div>
<div>
<div>बेगूसराय स्थित गोदरगावां के वैदेही सभागार में दो दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन का संचालन श्री कुन्दन एवं दूसरे दिन का श्री राजेन्द्र राजन एवं प्रों. रामअकबाल सिंह ने किया।</div>
<div></div>
<div>धन्यवाद ज्ञापन अमरनाथ सिंह एवं रमेश प्रसाद सिंह ने किया।</div>
</div>
</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">प्रो. शचीन्द्र, अरविन्द श्रीवास्तव, मनोरंजन विप्लवी, कृष्ण कुमार आदि ने उपस्थित रहकर इस महत्वपूर्ण आयोजन की सफलता को सुनिश्चित किया।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">बेगूसराय स्थित गोदरगावां के वैदेही सभागार में दो दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन का संचालन श्री कुन्दन एवं दूसरे दिन का श्री राजेन्द्र राजन एवं प्रों. रामअकबाल सिंह ने किया।</p>
<div></div>
<div><strong>(बेगूसराय स्थित गोदरगावां से डॉ अरविंद श्रीवासताव की रपट) </strong></div>
</div>
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		<title>कांशीराम &#8221;चमचा युग&#8221; के आईने से</title>
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		<pubDate>Fri, 15 Mar 2013 05:41:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[कांशीराम जयंती 15 मार्च पर विशेष o संजीव खुदशाह दलित सिख परिवार में 15 मार्च... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%88%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft" style="font-size: 13px; text-align: justify;" alt="" src="http://hindi.oneindia.in/img/2012/03/15-kanshi-ram-300.jpg" width="240" height="180" /></p>
<h3 style="text-align: right;"><span style="text-decoration: underline;" data-mce-mark="1">कांशीराम जयंती 15 मार्च पर विशेष</span></h3>
<h3 style="text-align: left;">o संजीव खुदशाह</h3>
<p style="text-align: justify;">दलित सिख परिवार में 15 मार्च को जन्मे मान्यवर कांशीराम ने भारत के बहुजन समाज को जो नेयमते बक्शी है वह काबिले गौर है, पूणे में सरकारी सेवा में रहते हुए उन्होने महसूस किया कि दलित बहुजन बिखरा हुआ और शोषित है, इसलिए पहले-पहल उन्होने कर्मचारियों का संगठन खड़ा कर पूरे भारत में बामसेफ के रूप में स्थापित किया। उन्हे यकीन था कि बहुजन समाज का नौकरी पेशा वाला तबका अपने समाज को जागृत कर सकता है। उन्होने डा.अम्बेडकर महसूस किया की बाबा साहेब की काबिलियत महाराष्ट्र तक सीमित है। उन्हे केवल बुध्द के साथ फोटो रखकर पूजा जाने के लिए प्रयोग किया जाता है। उनके बौध्दिक आन्दोलन पर कुछेक लोगो ने कब्ज कर रखा है। मान्यवर कांशीराम ने बामसेफ कर्मचारी संगठन के माध्यम से बाबा साहेब के संदेश को जन-जन तक पहुचाने की मुहीम चलाया। खासकर ओबीसी समाज के बीच आम्बेडकर को लाने का श्रेय कांशीराम को ही जाता है। गौरतलब है कि ये मुहीम तब रंग लाई जब उन्होने महाराष्ट्र के अलावा मध्यप्रदेश, बंगाल, उत्तर प्रदेश में काम शुरू किया। जो आगे चल कर राजनैतिक दल बहुजन समाज पार्टी के रूप में परिणित हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 1982 में उनकी कालजयी किताब &#8221;चमचा युग&#8221; (An Era of the Stooges) प्रकाशित हुई। यह किताब आम्बेडकर के अभ्युदय से लेकर पूना पैक्ट, शोषित समाज के नकली नेतृत्व से होती हुई स्थायी समाधान तक पहुचती है। कुल जमा चार भागो में विभक्त यह किताब मात्र 127 पृष्ठों की है। गौरतलब है कि कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का औपचारिक गठन 1984 में किया।</p>
<p style="text-align: justify;">मूलतः अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब का सरल सहज हिन्दी में अनुवाद रामगोपाल आजाद ने किया है। जो महात्मा जोतिराव फुले जी को समर्पित की गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">कांशीराम इस पुस्तक के उद्देश्‍य के बारे में लिखते है कि &#8221;इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्‍य दलित शोषित समाज को और उसके कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दलित शोषित समाज में व्यापक स्तर पर विद्यमान पिट्ठू तत्वो के बारे में शिक्षित, जागृत और सावधान करना है। इस पुस्तक को जनसाधारण को और विशेषकर कार्यकर्ताओ को सच्चे एवं नकली नेतृत्व के बीच अन्तर को पहचानने की समझ पैदा करने की दृष्टि से भी लिखा गया है। उन्हे यह समझना भी आवश्‍यक है कि वे किस प्रकार के युग में रह रहे है और कार्य कर रहे है- यह पुस्तक इस उद्देश्‍य की पूर्ति भी करती है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञातव्य है कि मान्यवर कांशीराम ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत छत्तीसगढ़ से की यहां उनके कार्यकर्ता उनके लिए अपनी जान छिड़कते थे। जांजगीर लोकसभा चुनाव के दौरान वे स्वयं एक हाथ में नीला रंग, दूसरे हाथ में कूची(ब्रस) लेकर गलियों में बसपा के नारे लिखते थे। वे कार्यकर्ताओं के बीच हमेशा एक मिशनरी कार्यकर्ता के रूप में ही रहे। आज ऐसे नेता दुलर्भ है। यहां बसपा भले ही अपनी अंतिम सांसे गिन रही है लेकिन पुराने कार्यकर्ता उन्हे आज भी याद करते है। वे बतलाते है कि नये कार्यकार्ता को उनकी किताब चमचा युग पढ़ने के लिए दी जाती एवं केडर केम्प में शामिल किया जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">काशीराम अपनी किताब चमचा युग में उद़त करते है कि किस प्रकार प्रसिध्द डा. अम्बेडकर को उनके ही बिरादरी के अनजाने प्रत्याषी ने हरा दिया। वे कहते है कि डा.अम्बेडकर को इसकी आशंका पूना पैक्ट के दौरान थी इसलिए उन्होने पृथक निर्वाचक मण्डल की वकालत की। डा आंबेडकर का यह कथन ध्यान देने योग्य है-</p>
<p style="text-align: justify;">&#8221;संयुक्त निर्वाचक मण्डल और सुरक्षित सीटों की प्रणाली के अन्तर्गत स्थिति और भी बदतर हो जायेगी, जो एतत्पष्चात पूना-पैक्ट की शर्तो के अनुसार लागू होगी। यह कोरी कल्पना मात्र नही है। पिछले चुनाव ने 1946 निर्णायक रूप से यह सिध्द कर दिया है कि अनुसूचित जातियों के संयुक्त निर्वाचक मण्डल से पूर्ण रूपेण मताधिकारच्युत किया जा सकता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डा.बी.आर.अम्बेडकर</strong><br />
<strong> पृ.85 चमचा युग</strong><br />
यानि बाबा साहेब ये मानते थे कि वर्तमान मतदान प्रणाली दलित बहुजन को अपने सच्चे प्रतिनीधि चुनने के काम नही आयेगी। हिन्दू जिन आरक्षित सीटों में दलित बहुजन को खड़ा करेगे वे दलितों के नही वरन हिन्दूओं के चमचे (हितैषी) होगे।</p>
<p style="text-align: justify;">मान्यवर कांशीराम पुस्तक के प्रारंभ में चमचा/पिटठु की परिभाषा बतलाते है- &#8221;चमचा एक देशी शब्द है जो ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो अपने आप क्रियाशील नही हो पाता है बल्कि उसे सक्रिय करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की आवश्‍यकता पड़ती है। वह अन्य व्यक्ति चमचे को सदैव अपने व्यक्ति उपयोग और हित में अथवा अपनी जाति की भलाई में इस्तेमाल करता है जो स्वयं चमचे की जाति के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है।&#8221; <strong>पृष्ठ-80 चमचा युग</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इस प्रकार कांशीराम मुख्य रूप से चमचों/ मौका परस्तों को छःभागो में बांटते है-</strong></p>
<p style="text-align: justify;">1. जाति या समुदायवार चमचे</p>
<p style="text-align: justify;">o अनुसूचित जाति -(अनिच्छुक चमचे)- इन्होने संघर्ष करके उज्जवल युग में प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन गांधी और कांग्रेस ने अनिच्छुक चमचा बना दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">o अनुसूचित जनजाति-(नवदीक्षित चमचे)- इन्हे दलितों के संघर्ष के कारण पहचान एवं अधिकार मिल गया लेकिन ये अपने उत्पीड़क को अपना हितैषी समझते है।</p>
<p style="text-align: justify;">o अन्य पिछड़ा वर्ग-(महत्वकांक्षी चमचे)-ये अब महसूस करते है कि वे दलितों से भी पीछे हो गये है इसलिए इन्हे महत्वकांक्षा बहुत है। इसी कारण बहुजन आंदोलन से जुड़ रहे है।</p>
<p style="text-align: justify;">o अल्पसंख्यक-(मजबूर चमचे)- इसाई, मुसलमान, सिक्ख, बौध्द ये मजबूर चमचे है क्योकि ये शासक जातियों के रहमों करम पर है।</p>
<p style="text-align: justify;">2. पार्टीवार चमचे-ये चमचे अपने आपको दलीय अनुशासन में जकड़े होने का हवाला देकर समाज विरोधी कार्य करते है।</p>
<p style="text-align: justify;">3. अबोध या अज्ञानी चमचे- ये वो चमचे है जो अपने शोषको को ही अपना उध्दारक मानते है।</p>
<p style="text-align: justify;">4. ज्ञानी चमचे या अम्बेडकर वादी चमचे- ये वो लोग है जो बड़ी- बड़ी बाते करते है अम्बेडकर को पढ़ते और कोड भी करते है लेकिन आचरण उसके विपरीत करते है। कांशीराम इन चम्मचों से सबसे ज्यादा आहत थे।</p>
<p style="text-align: justify;">5. चमचों के चम्मच- ये राजनैतिक चम्मच अपनी जाति या समुदाय में पैठ दिखाने के लिए अपने चमचे बनाते है। जो शासक जातियों की पूरी सेवा करने के लिए तत्पर रहते है। शिक्षित-नौकरी पेशा वाले लोगो अपने निजी फायदे के लिए इन चम्मचों की चमचागिरी करते है।</p>
<p style="text-align: justify;">6. चमचे विदेशों में &#8211; विदेश में रहने वाल अछूत जिन्हे लगता है कि भारत में चमचों की कमी है तो वे भारत आकर शासक जाति की चमचागीरी चालू करते है और अपने आपको आम्बेडकर समझने लगते है। जैसे ही दलित बहुजन आंदोलन गति पकड़ेगा वे पुनः खुले रूप में बाहर आ जायेगे।</p>
<p style="text-align: justify;">उनकी यह किताब किसी भी दलित बहुजन को परिस्कृत करने के लिए काफी है। आज हम जान सकते है कि किस प्रकार चमचों के कारण बसपा कमजोर हो गई। बहुजन आन्दोलन गद्दारों का आन्दोलन न बन पाये इसलिए भविष्य को ध्यान में रखकर उन्होने आगाह करने के लिए यह किताब लिखीं । यह किताब आम्बेडकर आन्दोलन को एक कदम आगे ले जाने के लिए प्रेरित करती । वे अम्बेडकर के शब्दो को मंत्रो की तरह रटने के लिए नही बल्कि उसका अंगीकार करने के लिए जोर देते। इस किताब में घटनाओं एवं तथ्यों का विशलेषण तथा व्याख्या महत्वपूर्ण।<br />
कांशीराम को सभी जानते होगे, लेकिन समझ वही सकते है जिन्होने उनकी किताब चमचा युग पढ़ी होगी। आज भी उनकी किताब प्रासंगीक है ओर हमेशी रहेगी। बहुजन आंदोलन के लोग इस किताब को बाईबल की तरह सम्मान देते है।</p>
<h3 style="text-align: justify;">संजीव खुदशाह</h3>
<p style="text-align: justify;">एम-II/156 फेस-1/संत थामस स्कूल के पास/कबीर नगर, रायपुर (छग)/पिन-492099</p>
<p><a href="sanjeevkhudshah@gmail.com"></p>
<p style="text-align: justify;">sanjeevkhudshah@gmail.com</p>
<p></a></p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>त्रिवेणीगंज में साहित्यक समागम: कविवर तरुण की जयन्ती मनाई गयी।</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Mar 2013 14:24:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[10 मार्च, ,रविवार को त्रिवेणीगंज में ‘कविवर भारती भूषण तारानंदन तरुण जयंती समारोह’ में कोसी क्षेत्र... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%9c-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">10 मार्च, ,रविवार को त्रिवेणीगंज में ‘कविवर भारती भूषण तारानंदन तरुण जयंती समारोह’ में कोसी क्षेत्र के रचनाकारों का साहित्यिक समागम हुआ। कार्यकम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने कहा कि कोसी सदृश्य नदियाँ कलमकारों को प्रेरणा देती है। बाढ़ व सुखाड़ जैसी त्रासदी से ही रचनाकारों का जनम होता है। कविवर तरुण ने इन त्रासदियों को देखा व झेला था। जैसे सोना  तप कर निखरता है वैसे तरुण जी अपनी लेखनी के माध्यम से सामने आये थे। उन्होंने इस  इलाके से साहित्यिक पत्रिका ‘क्षणदा’ का प्रकाशित कर क्षेत्र का बड़ा उपकार किया..।</div>
<div style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%9c-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95/dsc01956/" rel="attachment wp-att-7964"><img class=" wp-image-7964 alignright" alt="DSC01956" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC01956.jpg" width="281" height="211" /></a></div>
<div style="text-align: justify;">दरभंगा से प्रकाशित दैनिक ‘मिथिला आवाज’ के संपादक अरविन्द ठाकुर ने कहा कि विराट व्यक्तित्व किसी की निजी नहीं बल्कि समाज की सम्पत्ति बन जाता है। तरुण जी समाज की सम्पत्ति बन चुके है। उनके कर्ज को चुकाने का दायित्व समस्त समाज का है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">गज़लकार शांति यादव ने कहा कि तरुण जी ने जो आत्मसंघर्ष एवं जिजीविषा से कार्य किया है उसी तरह नई पीढ़ी को भी करना होगा।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">भूपेन्द्र ना. यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि मार्च का महीना क्रांतिकारियों का महीना होता है..। दशरथ सिंह ने कवि तरुण की स्मृतियों को सहेजने की बात कही। अन्य वक्ताओं में डा. सिद्धेश्वर काश्यप, महेन्द्र नारायण ‘पंकज’ आदि थे। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए डा. आर सी पी यादव ने आरंभ में कहा कि हिन्दी साहित्य के पुनर्मूल्यांकण की जरूरत है, नये मानक खोजने होंगे.. तरुण जी उसी मानक को ताउम्र खोजते रहे। डा. अरुण कुमार ने  कवि तरुण के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को रेखांकित किया।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">समारोह के द्वितीय सत्र में कवि सम्मेलन का आगाज डा. शांति यादव की गजल से हुआ। कवि हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने &#8211; ‘यह कोसी तट बंशी वट है, ग्राम्य किशोरी को पनघट है.. कविता का सस्वर पाठ कर वातावरण में ताजगी भर दी।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%9c-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95/dsc01953/" rel="attachment wp-att-7965"><img class="alignleft  wp-image-7965" alt="DSC01953" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/DSC01953.jpg" width="281" height="211" /></a>अररिया से आये शायर हारुण रशीद ‘गाफिल’ ने कहा कि &#8211; ‘हवाओं को मैंने कहानी सुना दी, / बड़े शोक  से अपनी दुनिया लुटा दी / जिसे पहली फुर्सत में मैंने दुआ दी / उसी ने मुझे सबसे पहले सजा दी / अगर साथ चलने की हिम्मत नहीं थी/ तो फिर क्यों मुहब्वत की आंधी चला दी।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">सहरसा से आयी शायरा रियाज़ बानू फातमी ने कहा &#8211; ‘गुजिस्ता साल भयानक था बेटियों के लिए&#8230;। कवि दशरथ सिंह ने कविता पाठ करते हुए कहा कि &#8211; &#8230;एक समुन्दर ने आवाज दी, मुझको पानी पिला दिजीए..। कवि अरविन्द ठाकुर ने कहा कि &#8211; अदम की बाग का पता मत दे, जिगर की आग को हवा मत दे&#8230;। अन्य कवियों में डा. विनय चैधरी, डा. शचीन्द्र महतो, अरविन्द श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं से समां बांध दिया। कार्यक्रम का संचालन प्रथम सत्र में विश्वनाथ सराफ एवं द्वितीय सत्र में अरुणाभ ने किया।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">त्रिवेणीगंज के इस सहित्यिक समागम में कोसी क्षेत्र के साहित्यकारों एवं श्रोताओं की पुरजोर उपस्थित ने समारोह को यादगार बना दिया।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>(अरविन्द श्रीवास्तव/ मधेपुरा, (बिहार) की रपट)</strong></div>
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		<title>पुस्तक समीक्षा ‘‘ढूंढते रह जाओगे मीडिया में दलित’’</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Mar 2013 07:59:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[(समीक्षक : कीर्ति सिंह) आज शायद ही कोई ऐसा हो जो मीडिया से परिचित न हो... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a5%87/media-dalit-162x250/" rel="attachment wp-att-7960"><img class="alignleft size-full wp-image-7960" alt="media-dalit-162x250" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/media-dalit-162x250.jpg" width="162" height="250" /></a></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>(समीक्षक :</strong> <b>कीर्ति सिंह)</b></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">आज शायद ही कोई ऐसा हो जो मीडिया से परिचित न हो ! पहले मिशन, फिर प्रोफेशन और आज बाजारवाद के प्रभाव में मीडिया है। इन सब के बीच भारतीय मीडिया पर अक्सर मनुवादी मानसिकता का आरोप लगता रहा है। व्यवसाय में तब्दील मीडिया पर जातिवाद, भाई- भतीजावाद आदि के आरोप भी लगते रहे हैं। सर्वे रिपोर्ट ने इसका खुलासा भी किया है। मीडिया में दलित हिस्सेदारी एवं दलित सरोकारों की अनदेखी सहित अन्य मुद्दों को <b>लेखक- पत्रकार संजय कुमार</b> ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक <b>‘‘</b><b>मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’’</b> में उठाया है। पुस्तक का शीर्षक  खुद-ब-खुद वस्तुस्थिति को पटल पर ला खड़ा कर जाता है। यानी दलितों की हिस्सेदारी मीडिया में नहीं है। भारतीय मीडिया में दलितों के सवालों के प्रवेश पर अघोषित प्रतिबंध को किताब बेनकाब करता है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">यह पुस्तक संजय कुमार के मीडिया और दलित मुद्दों पर लिखे गये लेखों का संग्रह है। समसामयिक घटनाओं का उदाहरण और आँकड़ा देते हुए उन्होंने अपने लेखों को विस्तार दिया है। दलित मीडिया से संबंधित चौदह आलेख पुस्तक में हैं। दलित संवेदना को कविता में पिरोकर दलितों की आवाज बुलंद करने वाले ‘हीरा डोम’ को पुस्तक समर्पित किया गया है। आलेखों में हीरा डोम की 1914 में की गई दलित की शिकायत को आज भी प्रासंगिक बताया गया है। लेखक उदाहरण और आँकड़ों से बताते हैं कि अभी भी समाज में बराबरी और गैर बराबरी का जो फासला है उसके लिए द्विज ही जिम्मेदार हैं। ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ में सप्रमाण यह सिद्ध किया गया है कि मीडिया घरानों पर ऊँचें पदों पर सवर्ण ही आसीन हैं और उन्होंने ऐसा चक्रव्यूह रच रखा है कि किसी दलित का या तो वहाँ पहुंच पाना ही असंभव होता है। अगर किसी तरह पहुँच भी गया तो, टिक पाना मुश्किल है। संजय ने शोध आलेखों में चौंकाने वाले तथ्य दिए है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><b>मीडिया में जाति के सवाल को लेकर प्रभाष जोशी और प्रमोद रंजन के बीच हुए बहस को पुस्तक में रखा गया है।</b> वहीं <b>‘</b><b>मीडिया भी जाति देखता है’</b> में <b>मीडिया के जाति प्रेम</b> को रेखांकित किया गया है। पुस्तक में दलित सवालों की अनदेखी व दलितों से मुंह फेरते मीडिया को घेरने का प्रयास किया गया है। किस तरह से दलित आंदोलन को मीडिया तरजीह नहीं देता है, उसे भी उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया गया है। मनुवादी भारतीय मीडिया के समक्ष दलित मीडिया को खड़ा करने की सुगबुगाहट को भी जोरदार ढंग से उठाया गया है। दलित पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए, इसे खड़ा करने के प्रयासों पर चर्चा किया गया है। वर्षों से उपेक्षित दलितों के बराबरी के मसले को उठाते हुए बहस की संभावना तलाशी गयी है। बराबरी के लिए सरकारी प्रयासों पर विरोध और दलितों को मुख्यधारा से अलग रखने की साजिश को बेनकाब किया गया है। सोशल मीडिया पर दलित विरोध को भी उदाहरण और तस्वीर के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">दलितों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं का विरोध करते हुए सोशल मीडिया पर दलितों के प्रति भ्रामक सामग्री को रखते हुए, समाज के उस वर्ग को बेनकाब किया गया है जो नहीं चाहता कि दलित आगे आयें। संजय ने समाज के सवालों को जोरदार, लेकिन सहज ढंग से रखा है। पुस्तक के लेखक स्वयं लम्बे समय से मीडिया से जुड़े हुये हैं, ऐसे में पुस्तक के लेखों में मीडिया में दलितों और दलित सवालों की अनदेखी पर सशक्त तरीके से कलम चलाई है। भाषा काफी सहज व सरल है। ‘‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’’ के तमाम आलेख सवर्णो के खिलाफ ही जाते हैं। हालाँकि लेखक ने अपनी बात में साफ लिखा है कि उनका मकसद किसी जाति- धर्म- संप्रदाय को निशाना बनाना नहीं है बल्कि, भारतीय मीडिया पर ऊँची जाति का कब्जा जो शुरू से ही बरकरार रहा है उसे पाटते हुए बराबरी- गैरबराबरी के फासले को कम करना है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">पुस्तक ने गंभीर मुद्दे को उठाया है। बस देखना है कि यह बहस दे जाता है या फिर यह भी मनुवादियों की भेंट चढ़ जाता है ?</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"> <b>पुस्तक-  “मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे”</b></div>
<div style="text-align: justify;"><b>लेखक – संजय कुमार</b></div>
<div style="text-align: justify;"><b>पृष्ठ संख्या  – एक सौ चार</b></div>
<div style="text-align: justify;"><b>मूल्य- रु॰ 70/-</b></div>
<div style="text-align: justify;"><b>प्रकाशक- सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिमपुरी, नई दिल्ली- 110063</b></div>
<div style="text-align: justify;">mo-9810249452,9818390161</div>
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		<title>आँखें मूंदकर रचना संवेदनहीनता का परिचायक है-डॉ सत्यनारायण व्यास</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Mar 2013 07:45:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[(यथार्थपरक कविताओं से सार्थक हुयी अपनी माटी की संगोष्ठी) चित्तौड़गढ़ 10 मार्च,2013 &#8220;रचनाकार को अपने वैयक्तिक जीवन... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%a8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">(यथार्थपरक कविताओं से सार्थक हुयी अपनी माटी की संगोष्ठी)</h3>
<p style="text-align: justify;">चित्तौड़गढ़ 10 मार्च,2013</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><i><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%a8/kavita-sangoshthi-at-dr-satya-narayan-vyass-house-in-chittorgarhwww-apnimaati-com/" rel="attachment wp-att-7955"><img class="alignleft  wp-image-7955" alt="Kavita Sangoshthi at Dr satya Narayan Vyas's House in Chittorgarh(www.apnimaati.com)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/Kavita-Sangoshthi-at-Dr-satya-Narayan-Vyass-House-in-Chittorgarhwww.apnimaati.com_.jpg" width="269" height="179" /></a> &#8220;रचनाकार को अपने वैयक्तिक जीवन के साथ ही सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखकर रचनाएं गढ़ना चाहिए।जो लेखक सच और सामने आते हालातो को दरकिनार कर ग़र आज भी प्रकृति और प्यार में ही लिख रहा है तो ये समय और समाज कभी उसे माफ़ नहीं करेगा।वे तमाम शायर मरे ही माने जाए जो अपने वक़्त की बारीकियां  नहीं रच रहे हैं।इस पूरी प्रक्रिया में ये सबसे पहले ध्यान रहे कि कविता सबसे पहले कविता हो बाद में और कुछ।&#8221;</i></strong></p>
<p style="text-align: justify;"> ये विचार साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी के संरक्षक और हिंदी समालोचक डॉ सत्यनारायण व्यास ने नौ मार्च को चित्तौड़ में संपन्न कवि संगोष्ठी में व्यक्त किये।युवा समीक्षक डॉ कनक जैन के संचालन और गीतकार अब्दुल ज़ब्बार,वरिष्ठ कवि शिव मृदुल की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन में नगर के चयनित कवियों ने प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच कवितायेँ पढ़ी। संगोष्ठी की शुरुआत में नगर की लेखक बिरादरी में शामिल दो नए साथियों ने पहली बार रचनाएं पढ़ी। अरसे बाद किसी अनौपचारिक माहौल में हुए इस कार्यक्रम में प्रगतिशील युवा कवि विपुल शुक्ला ने <i>पढ़ना, समय, सीमा, </i>जैसी रचनाएं और कौटिल्य भट्ट &#8216;सिफ़र&#8217; ने दो गज़लें पढ़कर वर्तमान दौर पर बहुतरफ़ा कटाक्ष किये।इससे ठीक पहले लोकगीतों की जानकार चंद्रकांता व्यास ने सरवती वन्दना सुनायी।</p>
<p><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%a8/kavita-sangoshthi-at-dr-satya-narayan-vyass-house-in-chittorgarh-21/" rel="attachment wp-att-7956"><img class=" wp-image-7956 alignright" alt="Kavita Sangoshthi at Dr satya Narayan Vyas's House in Chittorgarh (21)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/Kavita-Sangoshthi-at-Dr-satya-Narayan-Vyass-House-in-Chittorgarh-21.jpg" width="235" height="157" /></a></p>
<p style="text-align: justify;"> अपनी माटी संस्थापक माणिक ने हाशिये का जीवन जीते आदिवासियों पर केन्द्रित कविता <i>आखिर कभी तो </i>और व्यंग्य प्रधान कविता <i>आप कुछ भी नहीं हैं  </i>सुनायी।सुनायी जा रही कविताओं में यथासमय श्रोताओं ने भी अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ देकर संगोष्ठी को सार्थक बनाया।दूसरे दौर में डॉ रमेश मयंक ने <i>अजन्मी बेटी के सवाल</i> और <i>आओ कल बनाएँ </i>जैसे शीर्षक की कविताओं के बहाने जेंडर संवेदनशीलता और समकालीन राजनीति पर टिप्पणियाँ की।राजस्थानी गीतकार नंदकिशोर निर्झर ने कुछ मुक्तक पढ़ने के बाद आज़ादी के बाद के पैंसठ सालों को आज़ादी के पहले के सालों पर तुलनापरक कविता सुनायी जिसे बहुत सराहा गया।</p>
<p style="text-align: justify;"> राष्ट्रीय पहचान वाले मीठे गीतकार रमेश शर्मा ने अपना नया गीत <i>मेरा पता </i>सुनाकर हमारे देश में ही बसे दो तबकों के जीवन में मौलिक ढंग से झांकने और उसका विवरण देने की कोशिश की। गीतों में आयी नयी शब्दावली से उनके गंवई परिवेश की खुशबू हम तक आती है। इसी बीच अब्दुल ज़ब्बार ने अपने प्रतिनिधि शेर और एक गीत <i>गरीब के साथ विधाता है</i> पढ़ा ।उनके चंद शेर</p>
<p style="text-align: justify;"> <b>बेकार वो कश्ती जो किनारा न दे सके</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>बेकार वो बस्ती जो भाईचारा न दे सके।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>बेकार जवानी </b><b>वो </b><b>ज़ब्बार ज़हाँ में </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>बुढापे में जो माँ -बाप को सहारा न दे सके।।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>                                                                   </b> -अब्दुल ज़ब्बार</p>
<p style="text-align: justify;"><b> </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>जब ज़िंदगी ही कम है मुहब्बत के वास्ते</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>लाऊँ कहाँ से वक़्त नफ़रत के वास्ते।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>शराफत नाम रखने से शराफत कब मयस्यर है </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>शराफत भी ज़रूरी है शराफत के वास्ते।।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>                                                                        </b>-अब्दुल ज़ब्बार</p>
<p style="text-align: justify;"><b> </b></p>
<p style="text-align: justify;">इस अवसर पर कविवर शिव मृदुल ने अपने कुछ मुक्तक,छंद और दोहे प्रस्तुत किये। आखिर में आम आदमी की पीड़ा विषयक कविता सुनायी। डॉ सत्यनारायण व्यास ने अपनी पहचान के विपरीत पहली बार दो गज़लें सुनायी।जिसके चंद शेर ये रहे कि</p>
<p style="text-align: justify;"><b>जंगल में जैसे तेंदुआ बकरी को खा गया </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>थी झोंपड़ी गरीब की बिल्डर चबा गया।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>                                                                                 -</b>डॉ सत्यनारायण व्यास</p>
<p style="text-align: justify;"><b> </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>नज़रें गढ़ी थी और फिर मौक़ा मिला ज्यों ही </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>बेवा के नन्हे खेत को ठाकुर दबा गया।</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>                                                                                  -</b>डॉ सत्यनारायण व्यास</p>
<p style="text-align: justify;"><b> </b></p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने<b> </b>और फिर एक कविता <i>तू वही  </i>सुनायी जिसमें ज़िंदगी की सार्थक परिभाषाएं सामने आ सकी।इस असार संसार में उलझे बगैर हमें मानव जीवन के सार्थक होने का सोच करना चाहिए जैसा चिंतन निकल कर आया।</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी माटी की इस संगोष्ठी में समीक्षक डॉ राजेश चौधरी, चिकित्सक डॉ महेश सनाढ्य, शिक्षाविद डॉ ए एल जैन, कोलेज प्राध्यापिका डॉ सुमित्रा चौधरी, कुसुम जैन, सरिता भट्ट, गिरिराज गिल, विकास अग्रवाल ने अपनी टिप्पणियों के साथ शिरकत की। आभार युवा विचारक डॉ रेणु व्यास ने व्यक्त किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><b>रिपोर्ट : </b>माणिक,चित्तौड़गढ़</p>
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		<title>डाक विभाग ने महाशिवरात्रि पर जारी किया विशेष डाक आवरण</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Mar 2013 07:34:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[डाक विभाग द्वारा कुम्भ पर्व में महाशिवरात्रि के स्नान पर विशेष आवरण का विरूपण एवं... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/releasing_special_cover-mahashivratri-kk_yadav_prof_ak_bakshi/" rel="attachment wp-att-7951"><img class="alignleft  wp-image-7951" alt="Releasing_Special_Cover-Mahashivratri-KK_Yadav_Prof_AK_Bakshi" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/Releasing_Special_Cover-Mahashivratri-KK_Yadav_Prof_AK_Bakshi.jpg" width="269" height="179" /></a>डाक विभाग द्वारा कुम्भ पर्व में महाशिवरात्रि के स्नान पर विशेष आवरण का विरूपण एवं विमोचन जारी किया गया। इलाहाबाद प्रधान डाकघर में आयोजित कार्यक्रम में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविधालय के कुलपति प्रो. ए॰ के॰ बक्शी ने पोस्टमास्टर जनरल लेफ्टिनेंट कर्नल ए॰ के॰ गुप्ता व निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ विशेष आवरण का विरूपण एवं विमोचन किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><a name="0.1.0.2_h_gjdgxs"></a>इस अवसर पर अपने उदबोधन में मुख्य अतिथि प्रो॰ ए॰ के॰ बक्शी ने कहा कि भारत में प्राचीन काल से ही धर्म एवं आध्यात्म की एक लम्बी परंपरा रही है और कुम्भ उन सभी को आत्मसात करते हुए एक लघु भारत का एहसास है। उन्होने कुम्भ पर्व के अंतिम स्नान महाशिवरात्रि पर जारी विशेष आवरण की सराहना करते हुए कहा कि इनके माध्यम से प्रयाग एवं कुम्भ की संस्कृति देश ही नहीं विदेशों में भी सुवासित होगी। पोस्टमास्टर जनरल लेफ्टिनेंट कर्नल ए॰ के॰ गुप्ता ने महाशिवरात्रि पर्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मनाया  जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान शंकर और भगवती पार्वती का विवाह हुआ था। यह पर्व हमें कल्याणकारी कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">इलाहाबाद क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जैसे कुम्भ में भिन्न मत-मतांतर एवं धर्मों के अनुयायियों का समावेश होता है वैसे ही भगवान शंकर की प्रकृति भी समस्त विरोधाभाषों को समावेशित करते हुए एकता का संदेश देती है। श्री यादव ने कहा कि धर्म जीवन का एक मूलभूत तत्व है पर इसे आज सामाजिक सरकारों के साथ जोड़ने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">कार्यक्रम का संचालन सहायक निदेशक श्री आर॰ एन॰ यादव, अतिथियों का स्वागत प्रवर अधीक्षक डाकघर इलाहाबाद श्री रहमतुल्लाह व आभार ज्ञापन श्री ए॰ के॰ श्रीवास्तव, कुम्भ मेला अधिकारी (डाक) द्वारा किया गया। कार्यक्रम में सहायक निदेशक मधुसुदन प्रसाद मिश्रा, सीनियर पोस्टमास्टर टी. बी. सिंह, अधीक्षक आर॰ एन॰ यादव,निरीक्षक दीपक कुमार, अर्जित सोनी, रजनीश श्रीवास्तव सहित तमाम अधिकारी, कर्मचारी, फिलाटेलिस्ट, साहित्यकार आदि उपस्थित थे।</p>
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		<title>आवश्यकता है आज समाज को नया दृष्टिकोण अपनाने की</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Mar 2013 04:28:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[महिला दिवस पर विशेष  आज भारत विश्व के विकासशील देशों में अग्रणी माना जाता है... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_7946" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/2013/03/%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be/shoshan/" rel="attachment wp-att-7946"><img class="size-full wp-image-7946" title="फोटो साभार : गूगल " alt="shoshan" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2013/03/shoshan.jpg" width="300" height="225" /></a><p class="wp-caption-text">फोटो साभार : गूगल</p></div>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;">महिला दिवस पर विशेष </span></h3>
<p style="text-align: justify;">आज भारत विश्व के विकासशील देशों में अग्रणी माना जाता है .जहाँ औद्योगिक क्षेत्र से लेकर सामाजिक क्षेत्र की दशा व दिशा दोनों में ही अत्यधिक परिवर्तन हुआ है .परन्तु प्रश्न उठता है कि आज भी समाज की संकीर्ण सोच में आखिर कितना परिवर्तन आया है ? विड़म्बना तो यह है कि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक स्त्री पीड़ित, शोषित ,प्रताड़ित एवं काम -वासना का शिकार बनती हुई आयी है .यह सत्य है कि पितृसत्तात्मक सत्ता के वर्चस्व के कारण नारी का जीवन सदैव प्रतिबंधित रहा है . पितृसत्तात्मक समाज में नारी का मनोबल कानून व व्यवस्था आदि पर पुरुषों का कब्जा होता है जहां वह नियम , कायदे , कानून ,परम्परा ,नैतिकता ,आदर्श ,न्याय एवं सिद्धांत द्वारा नारी -जीवन को नियत्रिंत करने की प्रक्रिया का निर्माण करते हैं और इस तरह वे नियंत्रण करके नारी -वर्ग पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं जिसके फलस्वरूप शुरू होता है -<b>शोषण का घिनौना सिलसिला. </b></p>
<p style="text-align: justify;"><b>            </b><b>        </b>शोषण ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा पितृसत्तात्मक समाज विजयी घोषित होकर नारी को अबला ,पददलित व पराश्रित बना सकता है . इसलिए आज समाज में नारी के साथ होने वाला दैहिक,मानसिक,आर्थिक व शैक्षणिक शोषण का सिलसिला दिन -प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है . आज कहने को तो नारी ने जीवन की सभी परिभाषाएं बदल दी हैं . वह जीवन में निरर्थक से सार्थक बनकर परीक्षाओं व प्रतियोगिताओं में स्वयं को सशक्त भी सिद्ध कर रही है .यहाँ तक कि वह अपने पाँवों पर खड़ी होकर स्वाभिमानी जीवन भी व्यतीत कर रही है इसी कारण वर्ष २००१ को नारी सशक्तीकरण के नाम से भी घोषित किया गया है परन्तु इतिहास गवाह है कि नारी -समाज का अत्याचारों द्वारा प्रताड़ित होने के सिलसिले में तेजी से इजाफा हो रहा है . आज की स्वतंत्र नारी भारतीय समाज की संकीर्ण सोच के समक्ष हर नजरिये से परतंत्र बना दी जाती है . जहाँ उस नारी द्वारा अपने अधिकारों के लिए चलाई गई हर मुहिम भी दम तोड़ती नज़र आती है .</p>
<p style="text-align: justify;">                       आज भी महिला पढ़ी लिखी हो अथवा अनपढ़ ,गृहकार्य में दक्ष गृहस्वामिनी हो या चहारदीवारी लाँघकर अपने कन्धों पर दोहरा भार उठाने वाली परन्तु उसके प्रति समाज का दृष्टिकोण क्रूर ही नज़र आता है .ऐसे में उसे पुरुष सन्दर्भ के द्वारा ही पत्नी ,माँ ,बहन व बेटी का दर्जा ही प्राप्त होता है .इसके अतिरिक्त उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीँ माना जाता .</p>
<p style="text-align: justify;">                        आज की नारी चाहे घर की चारदीवारी के भीतर हो या घर से बाहर कार्यक्षेत्र में .शोषण का दबदबा हर जगह कायम होता जा रहा है .अभी हालही में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार किसी सभ्य समाज का उदाहरण प्रस्तुत नहीँ करता .इस घिनौनी घटना ने पूरे भारतवर्ष को दहला कर रख दिया .न जाने अभी और कितनी मासूमों की जान ली जाएगी. आज समाज में नारी को बुरी दृष्टि से देखना ,छेड़छाड़ ,यौन-उत्पीड़न व अपहरण जैसी दर्दनाक घटनाएँ अखबारों व टी.वी . चैनलों पर चर्चा का विषय बनती जा रही हैं .पर क्या कहीँ इन बढ़तीं वारदातों को विराम मिल रहा है ? .दुख तो इस बात का है कि नारी – शोषण की असहनीय पीड़ा को मूक साधिका बनकर सहन करने को विवश हो जाती है .कई बार हिम्मत करके वह कानून के कटघरे में इन्साफ के लिए गुहार तो लगाती है परन्तु  पितृसत्तात्मक समाज में कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण अत्याचारी दरिंदे सरेआम रिहा हो जाते हैं और शोषण का अगला इतिहास रचते हैं .</p>
<p style="text-align: justify;">                     कहीं न कहीं नारी के साथ होने वाले शोषण के पीछे एक बड़ा कारण परिवार में ही लिंग – भेदभाव करना , लड़कियों की पराया धन के रूप में मान्यता इत्यादि मानसिकता भी है .फलस्वरूप उसे वह सारे सुअवसर प्राप्त नहीं होते जिससे उसका बौद्धिक व नैतिक विकास सुचारू रूप से हो सके . आज भी पारिवारिक परिवेश के अन्तर्गत ऐसे कई हजारों उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ पुरुष कदम-कदम पर नारी से सहयोग की अपेक्षा करता है जिसके कारण नारी की अपनी खुशियाँ ,इच्छायें  और अभिव्यक्तियाँ पारिवारिक कल्याण और सुख शान्ति के नाम पर गौण हो जाती हैं .आज भी आए दिन लड़की के सुसराल वालों की अतृप्त माँगोँ के पूरे न होने पर विवाहिता को जलाने या आत्महत्या करने की कोशिश जैसी घटनाएँ सुनी – सुनाई जाती हैं परन्तु प्रताड़ना का यह सिलसिला कहीं थमता नज़र नहीँ आता.जहाँ आज अत्याचारों से पीड़ित घरेलू नारी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है वहीं कार्यक्षेत्र में कामकाजी नारी भी शोषण के चक्रव्यूह में फँसी नज़र आ रही है .कई बार कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत भी नारी पुरुष के निर्भीक वर्चस्व ,स्वार्थपरता व पितृसत्तात्मक शक्ति के कारण भयावह जीवन व्यतीत करती है . उसे कार्यक्षेत्र में प्रतियोगी ,सहयोगी व बास जैसे पुरुषों के व्यग्यं –उपहास एवं बदनाम व्यवहार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है .यदि हम एक नज़र पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज पर भी ड़ालें तो वहाँ नारी की स्थिति और भी दयनीय है . पिछड़े इलाकों और ग्रामीण समाज में नारी को प्रत्येक क्षेत्र में कमज़ोर मानकर मानसिक रूप से विखंडित किया जाता है .आज भी वहां नारी को घर की दासी,विलासिता की वस्तु और सन्तान पैदा करने का यंत्र माना जाता है नारी को पुरुष के समान स्वतंत्र चिन्तन की छूट नहीं दी जाती है.इसका प्रमुख कारण है कि भारतीय समाज कुण्ठाओं और वर्जनाओं से भरपूर समाज है जहाँ आज भी अनेकानेक प्रकार की सामाजिक कुरीतियां व रूढ़ियाँ बरकरार हैं .</p>
<p style="text-align: justify;">                     पितृसत्तात्मक समाज नारी के अधिकारों पर विविध वर्जनाओं व निषेधों का पहरा बिठा चुका है .जहाँ समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं से मुक्ति पाना इतना आसान नहीं दिखता .अगर हम आज के पढ़े – लिखे व सभ्य समाज की सकुंचित अवधारणा से मुक्ति पाने के लिए शिक्षा को एक मात्र हथियार माने तो वह भी किस हद तक सफल सिद्ध हुआ है ? मैं मानती हूँ कि शिक्षा के अभाव में नारी असभ्य ,अदक्ष ,अयोग्य एवं अप्रगतिशील बन जाती है .परन्तु सच तो यह भी है कि आज सबसे ज्यादा कामकाजी व पढ़ी –लिखी नारी के साथ ही शोषण के हादसे हो रहे हैं .शिक्षित होकर भी नारी खुलेआम प्रताड़ना का शिकार होती है .</p>
<p style="text-align: justify;">                          हर साल आठ मार्च को ‘ महिला दिवस ’ की दुहाई देकर अनेक सम्मेलन , सगोष्ठियां व जलसे निकाले जाते हैं .अखबारों व पत्रिकाओं में नारी – विशेषांक निकाले जाते हैं परन्तु समाज की सोच में कितने प्रतिशत परिवर्तन होता है .इसका अन्दाज़ा दिनदहाड़े होने वाली वारदातों से लगाया जा सकता है .चूंकि  सबके पीछे एक बड़ा कारण हमारे समाज की संकीर्ण सोच है और जबतक सोच में बदलाव नहीं आएगा तबतक ऐसे ही शोषण का चक्र अपने भीतर न जाने कितनी नारियों की दासता को समेटता चला जाएगा.हम सिर्फ और सिर्फ कठपुतली बनकर टी .वी . चैनलों ,अखबारों व किताबों में वारदातों के किस्से पढ़तें एवं देखतें रहेंगें.इसलिए आज आवश्यकता है समाज को अपनी संकीर्ण सोच में बदलाव लाकर एक नया दृष्टिकोण अपनाने की जिससे भारतीय सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव आएगा और नारी अपने समस्त अधिकारों से परिचित होकर समाज व परिवार में सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकेगी.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>डॉ.प्रीत अरोड़ा (युवा लेखिका )</strong></h3>
<p>मकान नम्बर&#8212;405,गुरूद्वारे के पीछे, दशमेश नगर,खरड़,जिला&#8211;मोहाली (पँजाब)</p>
<p>पिन नम्बर—140301</p>
<p style="text-align: justify;">फोन—08054617915</p>
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