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	<title>परिकल्पना ब्लॉगोत्सव</title>
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	<description>अनेक ब्लॉग नेक हृदय</description>
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		<title>हिन्दी का कहानी लेखक हमेशा ही बेचारा रहा है&#8230;तेजेन्द्र शर्मा</title>
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		<pubDate>Sat, 05 May 2012 12:11:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
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		<description><![CDATA[हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को जगरांव, (पंजाब) में... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/05/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: red; background-color: pink;" rowspan="2">
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/At_Leicester_2.jpg"><img class="size-full wp-image-7329 alignleft" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/At_Leicester_2.jpg" alt="" width="195" height="229" /></a>हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार <span style="color: #993300;">श्री तेजेन्द्र शर्मा</span> का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को जगरांव, (पंजाब) में हुआ l वर्तमान में श्री तेजेन्द्र ब्रिटेन में रहकर हिन्दी-साहित्य की सेवा कर रहे हैं l इनकी अब तक की प्रकाशित कृतियों में कहानी संग्रह के अंतर्गत क़ब्र का मुनाफ़ा , बेघर आंखे, यह क्या हो गया, देह की कीमत, ढिबरी टाईट, काला सागर, सीधी रेखा की परतें &#8211; तेजेन्द्र शर्मा समग्र कहानियां (भाग 1), दीवार में रास्ता (शीघ्र प्रकाश्य), तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां – ऑडियो सी.डी. आदि और कविता-संग्रह के अंतर्गत  ये घर तुम्हारा है, तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़लें (सी.डी.), अंग्रेज़ी में &#8211; Black &amp; White (The Biography of a Banker), Lord Byron &#8211; Don Juan, John Keats &#8211; The Two Hyperions, अनूदित कृतियों के अंतर्गत &#8211; ढिबरी टाइट, कल फ़ेर आंवीं (पंजाबी) , पासपोर्ट का रंङहरू (नेपाली), ईंटों का जंगल (उर्दू) आदि प्रकाशित हो चुकी हैं l तेजेंद्र जी को सम्मान के रूप में ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार &#8211; 1995 (प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों। भारतीय उच्चायोग लंदन द्वारा डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (2008), अभिव्यक्ति वैबज़ीन द्वारा आयोजित कथा महोत्सव 2008 में कहानी ओवरफ़्लों पार्किंग को श्रेष्ठ कहानी का 5,000 रुपये का सम्मान, कृति यू.के. द्वारा वर्ष 2002 के लिये &#8220;बेघर आँखें &#8221; को ब्रिटेन की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कहानी का पुरस्कार। प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान – दिल्ली (2007), सरस्वती प्रकाशन, नई दिल्ली। तितली बाल पत्रिका का साहित्य सम्मान – बरेली (2007), सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार – 1998 (सहयोग फ़ाउण्डेशन, मुंबई), सुपथगा सम्मान -1987 &#8211; सुपथगा संस्था (नई दिल्ली)। डी.ए.वी.गर्ल्ज़ कॉलेज, यमुनानगर द्वारा हिन्दी साहित्य मे योगदान के लिये सम्मानित (2007) आदि से नवाजा भी गया है l इनकी अन्य उपलब्धियों में  कथा यू.के. लन्दन के महासचिव, कथा यू.के. के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानन्द साहित्य सम्मान का ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स एवं हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आयोजन। लंदन, बर्मिंघम, यॉर्क, नॉटिंघम एवं वेल्स में कथा गोष्ठियों, कहानी कार्यशालाओं, एवं हिन्दी व कम्पयूटर कार्यशालाओं का आयोजन, टोरोंटो (कनाडा) में हिन्दी कहानी कार्यशाला का संचालन, दिल्ली, मुंबई, भोपाल, शिमला, यमुना नगर, फ़रीदाबाद, गया, वर्धा, लंदन, यॉर्क, बर्मिंघम, वेल्स, न्यूयॉर्क एवं टोरोंटो शहरों में कहानी पाठ। विश्व हिन्दी सम्मेलनों, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों, में भागीदारी एवं मह्त्वपूर्ण योगदान। दूरदर्शन के लिये शांति सीरियल का लेखन। अन्नु कपूर निर्देशित फ़िल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय। एकमात्र प्रवासी साहित्यकार जिसके संपूर्ण साहित्यवालोकन के लिये आलोचनात्मक ग्रंथ तेजेन्द्र शर्मा – वक़्त के आइने में प्रकाशित, जिसमें पैंतीस लेखकों एवं आलोचकों के लेख शामिल हैं (संपादक – हरि भटनागर)। दो वर्षों के लिये ब्रिटेन से प्रकाशित हिन्दी पत्रिका पुरवाई का संपादन, लंदन में हिन्दी फ़िल्मों पर आधारित साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन, कहानियों का ऑल इंडिया रेडियो, मुंबई, एवं दिल्ली व सनराइज़ रेडियो, लंदन से प्रसारण, बीबीसी लंदन (हिन्दी रेडियो), में तीन वर्ष तक समाचार वाचन, ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में वर्ष 1972 से ड्रामा वॉयस, लंदन में हिन्दी नाटकों में अभिनय एवं निर्देशन जिनमें से हास्य नाटक हनीमून एवं वन-एक्ट-प्ले वापसी की ख़ासी चर्चा हुई, लंदन, बर्मिंघम, यॉर्क, मैन्चेस्टर, डर्बी, त्रिनिदाद, टोरोंटो, न्यूयॉर्क, दुबई, भारत के बहुत से शहरों में कवि सम्मेलनों में भाग लेना शामिल है। प्रस्तुत है <span style="color: #993300;">ड़ॉ प्रीत अरोड़ा </span>की श्री तेजेन्द्र शर्मा से एक विशेष मुलाक़ात&#8230;&#8230;</span></h3>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">१)  प्रश्न&#8212;-    ऐसा माना जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, तो तेजेन्द्र जी आपका साहित्य इस उक्ति पर कितना खरा उतरता है ?</span><span style="font-weight: normal;"> </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर- साहित्य समाज का दर्पण होना चाहिये  – आपकी यह बात तो सही है। ऐसा होना ही चाहिये। मगर क्या ऐसा होता है? मुंबई मैं मैने 22 वर्ष बिताये। वहां का एक भी हिन्दी लेखक ऐसा नहीं है जिसका जन्म वहां हुआ हो। यानि कि सभी पहली पीढ़ी के प्रवासी ही वहां हिन्दी लिख रहे हैं। इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि मुंबई का पूरा का पूरा हिन्दी साहित्य प्रवासी साहित्य है। प्रवासी लेखकों की एक ख़ास पहचान होती है नॉस्टेलजिया। वे उस जीवन और समाज के बारे में सोचते हैं जिसे वे पीछे छोड़ आए हैं। शायद इसी लिये उनके साहित्य में उनका अतीत बहुत शिद्दत से उभर कर सामने आता है। जबकि होना यह चाहिये कि लेखक अपने आसपास के समाज के प्रति उदासीन ना हो। जब आप बंगला साहित्य पढ़ते हैं तो आप कोलकता जाए बिना उस शहर को भीतर तक महसूस कर सकते हैं। जबकि मुंबई के हिन्दी साहित्य के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। मुंबई का लेखक जब यू.पी. के किसान के बारे में लिखता है &#8211;  जिसे उसने कभी देखा महसूस नहीं किया &#8211; तो उसका साहित्य समाज का दर्पण कैसे बन सकता है। पिछले 12 वर्षों से मैनें यह मुहिम ब्रिटेन और अमरीका में चला रखी है कि हमें अपने अपनाए हुए देश के परिवेश, संघर्ष, रिश्तों और उपलब्धियों पर अवश्य लिखना चाहिये। जहां तक मेरे साहित्य का सवाल है, उसकी ख़ास बात रही मेरा एअर-इंडियन होना। उस नौकरी की वजह से मैं निरंतर विदेश यात्राएं करता था। जहां एक तरफ़ ईंटों का जंगल, एक ही रंग, किराए का नरक, मलबे की मालकिन, कैंसर, अपराध बोध का प्रेत जैसी कहानियां उस काल में लिखीं वहीं देह की क़ीमत, काला सागर, ढिबरी टाइट, उड़ान, भंवर, कोष्ठक जैसी कहानियां इस लिये लिख पाया क्योंकि एअर इंडिया की नौकरी ने एक भिन्न समाज से मेरा परिचय करवाया।  ब्रिटेन में बसने के बाद मेरी कहानियों में एक विशेष किस्म का परिवर्तन आया। अब मैं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने माहौल को समझने का प्रयास करने लगा। ब्रिटेन आने से पहले मेरे तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। अब नई चुनौतियां थीं, नया परिवेश और नया समाज। क़ब्र का मुनाफ़ा, अभिशप्त, ये क्या हो गया, पापा की सज़ा, छूता फिसलता जीवन, मुझे मार डाल बेटा, तरकीब, कोख का किराया, ज़मीन भुरभुरी क्यों है, कैलिप्सो, होमलेस, कल फिर आना जैसी कहानियां इसी काल में लिखी गई हैं। यानि कि मेरी कहानियां हर उस समाज का दर्पण बनी जहां जहां मैं रहा और जिसकी विशिष्टताओं को मैनें समझने का प्रयास किया। क़ब्र का मुनाफ़ा को कथाकार संपादक हरि भटनागर ने इंडिया टुडे के एक सर्वेक्षण में बीस वर्ष की बीस महत्वपूर्ण कहानियों में शामिल किया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(२) प्रश्न&#8211;जैसाकि आपने बहुत-से देशों  में भ्रमण किया है तो कौन-कौन से देश में नारी की स्थिति को देख कर आपने यह महसूस किया कि यहाँ नारी आज भी अशिक्षित, शोषित व मानवीय अधिकारों से वंचित दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत कर रही है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;बात यह है प्रीत कि सभी धर्मों और देशों में नारी का रुतबा हमेशा से दोयम दर्जे का रहा है। यहां तक कि ब्रिटेन में औरतों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति नहीं होती थी। एक औरत 110 वर्ष पहले रात भर ब्रिटिश संसद की एक अल्मारी में बंद रही ताकि सुबह होने पर अपना वोट डाल सके। शायद उस दिन से पश्चिमी देशों में नारी उत्थान का काम शुरू हो गया था। वैसे नारी को दबाने के लिये धर्म और संस्कृति का सहारा ही लिया गया है। कहीं स्त्री को चेहरा और शरीर छिपा कर रखना पड़ता है तो कहीं उसे संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता। पश्चिमी देशों की स्त्री अपने अधिकार मांगने लगी है शायद इसीलिये वहां विवाह नाम की संस्था की चूलें बुरी तरह हिल गई हैं। यहां अब गर्ल-फ़्रेण्ड और बॉय-फ़्रेण्ड इकट्ठे रहते हैं, बच्चे पैदा करते हैं और कई बार तो तीन तीन बच्चे होने के बाद शादी करते हैं। सिंगल मदर यानि के अकेली माताओं की इन देशों में अलग समस्या है। भारत की महिलाओं की समस्या अलग किस्म की है। जो अशिक्षित हैं, गांव में रहती हैं उन्हें शायद इस बात का ज्ञान भी नहीं हो पाता कि उनका शोषण हो रहा है। क्योंकि जब तक आपको ज्ञान नहीं होगा तब तक आपको महसूस भी कैसे होगा। जहां तक भारत के महानगरों की पढ़ी-लिखी नौकरी-पेशा नारियों का सवाल है, उनकी स्थिति शायद सबसे अधिक ख़राब है। वे बेचारियां अपने पति ही की तरह दफ़्तर जाती हैं, वहां मैनेजर या क्लर्क या जो भी नौकरी करती हैं। ठीक पति की ही तरह बसों और लोकल ट्रेन के धक्के खाती हैं। मगर शाम को वापिस घर आकर खाना बनाना उनका ही काम है। मेरे एक मित्र मुंबई में एक बैंक के जनरल मैनेजर हैं और उनकी पत्नी किसी सरकारी कम्पनी में हिन्दी अधिकारी हैं। मैं देखता हूं कि घर में पत्नी ठीक उसी तरह काम करती है जैसे कि कोई फ़ुल-टाइम हाउसवाइफ़ करती है और पति काम से घर लौट कर टीवी के सामने बैठ जाते हैं और मित्रों से फ़ोन पर बतियाने लगते हैं। भाई को ठीक से चाय तक बनानी नहीं आती। शिक्षा ही शायद मानसिकता को बदल पाएगी। ज़रूरी है मानसिकता को बदलना। पुरुष को समझना होगा कि नारी को बराबर का हक़ मिलना ही चाहिये। नारी भी आज पुरूष की ही तरह काम करती है, मेहनती है, ईमानदार है और कमाल तो यह है कि उतनी ही भ्रष्ठ भी है। आहिस्ता आहिस्ता यह बराबरी सामने आने लगेगी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(३) प्रश्न&#8212;आप कहानीकार भी हैं और कवि भी .आपकी नज़र में कहानी लिखना मुश्किल है या छंदोबद्ध कविता ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; पहले आपके सवाल पर टिप्पणी करना चाहूंगा। मैं अपने आप को कहानीकार मानता हूं मगर कवि नहीं। हां मैं कविता एवं ग़ज़ल लिखने का प्रयास अवश्य करता हूं किन्तु मेरा स्वभाव एक कवि का स्वभाव नहीं है। छंदोबद्ध कविता तो लगभग ग़ायब ही हो गई है। और केवल भारत से ही नहीं टी.एस.ईलियट और डब्ल्यू. एच. ऑडेन के बाद से पूरे विश्व में जैसे छंद की हत्या कर दी गई है। भारत में तो छंदबद्ध कविता लिखना अपराध ही मान लिया गया है। छंद के लिये शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान और अभ्यास की आवश्यक्ता पड़ती है। याद रहे कि तुकांत कविता और तुकबंदी में बहुत अंतर होता है। जब छंद का स्थान तुकबंदी ने ले लिया तो छंदबद्ध कविता अपना स्थान खो बैठी। कविता के लिये प्रतिभा की आवश्यक्ता होती है। जबकि कहानी केवल प्रतिभा से नहीं लिखी जा सकती। कविता सांकेतिक होती है। बिम्ब और कल्पनाशक्ति उसमें महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कहानी में समग्रता होती है। कहानी के विषय समाज की ठोस समस्याओं से जुड़े होते हैं और चरित्रों एवं परिवेश के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और अन्याय का अनावरण किया जाता है। मैं अपनी कहानियों में हमेशा अन्याय के विरुद्ध कमज़ोर व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देता हूं। कविता भावनाओं का त्वरित अधिप्रवाह है तो कहानी रिश्तों और समस्याओं की तर्कसम्मत प्रस्तुति। मैं कहानी में समस्याओं का हल प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूं। यह काम समाज सुधारकों का है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(४) प्रश्न&#8211;आज ई-पत्रिकाओं और ई-पुस्तकों का प्रचलन बढ़ रहा है और समय के अभाव के कारण मुद्रित पत्रिका में प्रकाशित एक कहानीकार की कहानी का पाठक स्वयं लेखक ही बन रहा है ? तो ऐसे में मुद्रित पत्रिकाओं और पुस्तकों का भविष्य क्या है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; यह सवाल बहुत मज़ेदार है। हिन्दी का कहानी लेखक हमेशा ही बेचारा रहा है&#8230; धर्मयुग, सारिका और साप्ताहिक हिन्दुस्तान बंद होने के बाद उसके छपने के लिये केवल लघु पत्रिकाएं ही बचती हैं। यह पत्रिकाएं तीन सौ से लेकर एक हज़ार के बीच ही छपती हैं। हंस और पाखी शायद इसका अपवाद हों। हिन्दी साहित्य के मठाधीशों ने कहानीकारों पर रोक लगा रखी है कि मेरी सहेली, गृहशोभा जैसी व्यवसायिक पत्रिकाओं में रचना भेजी तो उसे साहित्य का दर्जा नहीं मिलेगा। समाचार पत्रों में भी जनसत्ता के अतिरिक्त किसी और अख़बार में छपना मना है। बेचारा कहानीकार इन मठाधीशों को ख़ुश करने के लिये ऐसी पत्रिकाओं में छपने के लिये बाध्य हो जाता है जो लेखकों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं, लेखक ही उसमें छपते हैं और लेखक ही उसे पढ़ते भी हैं। हिन्दी में ई-पुस्तकें अभी अपने शैशव काल में हैं। याद रखिये भारत में हिन्दी आज भी ग़रीब की भाषा है या फिर नारियों की। महानगरीय नई पीढ़ी का हिन्दी से कुछ ख़ास लेना देना नहीं। कम्पयूटर अपेक्षाकृत अमीर लोगों का खिलौना है जिनके घरों में अंग्रेज़ी का राज होता है। इसलिये ई-पत्रिकाएं भी अधिकतर लेखक ही चलाते हैं, लेखक ही लिखते हैं और लेखक ही पढ़ते भी हैं। जिनके पास छपा हुआ साहित्य पढ़ने का समय नहीं है, वे भला कम्पयूटर पर हिन्दी पढ़ने के लिये कैसे समय निकाल सकते हैं। अंग्रेज़ी में किंडल बुक्स (इलेक्ट्रॉनिक) आने के बावजूद साहित्य लिखने और छपने में कोई कमी नहीं आई। बुकर सम्मान के लिये आज भी अच्छी अच्छी किताबें मिलती हैं। हिन्दी की मुद्रित पुस्तकों के लिये निजि पाठकों की बहुत कमी हो गई है। उसका कारण है प्रकाशकों का रवैया। प्रकाशक हिन्दी पुस्तकों को डम्प करता है। निजी पाठकों तक हिन्दी की पुस्तकें नहीं पहुंच पाती हैं। कोई ऐसी दुकानें नहीं हैं जहां आप आसानी से हिन्दी की पुस्तकें ख़रीद सकें। ई-पत्रिकाएं क्योंकि अप्रकाशित रचनाओं की शर्त नहीं रखती हैं इसलिये उन्हें मुफ़्त रचनाएं मिल जाती हैं। ई-पत्रिकाएं और ई-पुस्तकें मुद्रित पत्रिकाओं और पुस्तकों के लिये ख़तरा नहीं हैं, बल्कि उनकी पूरक हैं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(५) प्रश्न- तेजेन्द्र जी किसी भी उभरते हुए लेखक को शुरूआती दिनों में अपनी कृति को प्रकाशित करवाने के लिए प्रकाशकों की जटिल प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है.मेरा अनुभव भी कटु है.इस बारे में आप अपने निजी अनुभव पाठकों के साथ साझा कीजिए ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, मेरा किस्सा थोड़ा अलग किस्म का है। मैंने अपनी पहली हिंदी  कहानी लिखी 1980 में।  उस से पहले मैं अंग्रेज़ी में लिखा करता था। पहली हिंदी कहानी लिखने में सहायता की इंदु जी (मेरी पत्नी) ने। और मैं सुलेख में लिख कर अपनी कहानी ले कर पहुँच गया नवभारत टाइम्स, मुंबई (उस समय बॉम्बे)  के दफ़्तर। वहां नवभारत टाइम्स के रविवार संस्करण में रविवार्ता के संपादक विश्वनाथ सचदेव से मिला और उनको कहानी दे दी। उन्होंने रख ली और 3 या 4 सप्ताह में  मेरी पहली कहानी प्रतिबिम्ब प्रकाशित  हो गयी।। कोई बखेड़ा नहीं। मेरी दूसरी ही कहानी उड़ान (जो कि एक एअर होस्टेस के जीवन पर आधारित थी) को  डॉक्टर देवेश ठाकुर   ने वर्ष 1982 की सर्श्रेष्ठ कहानियों में शामिल कर लिया। हौसला बढ़ गया। काला सागर  कहानी को आलोचकों ने सराहा। जब 10 कहानियां  हो गयीं तो  फ़ाइल ले कर सीधे वाणी प्रकाशन, दिल्ली  पहुँच गया। उस समय वाणी के मालिक अशोक महेश्वरी और अरुण महेश्वरी बंधू थे।  उन्होंने फ़ाइल रख ली और इंतज़ार करने को कहा। बाद में पता चला कि उन्होंने फाइल डॉक्टर प्रभाकर माचवे को भेज दी थी। माचवे जी ने कहानियों को पढ़ा और अपनी तरफ से पास कर दिया। और मेरा पहला कहानी संग्रह काला सागर प्रकाशित हो गया। सोच कर रोमांच होता है कि मेरे पहले कहानी संग्रह की कीमत केवल तीस रुपये थी।  हाँ मुझे उन पत्रिकाओं ने कभी नहीं छापा  जो किसी विचारधारा विशेष से सम्बन्ध रखती थीं जैसे कि पहल आदि। मगर मैं धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, हंस, कादम्बिनी, सबरंग आदि में खूब छपा।  मैं शायद एक नए लेखक के शुरुआती दिनों के संघर्ष के रोमांच से वंचित रह गया। वाणी प्रकाशन से एक अपनेपन का रिश्ता सा बन गया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(६) प्रश्न&#8211;आज साहित्य में प्रसिद्धि और पैसे की दौड़ में अश्लील और उत्तेजित भाषा का प्रयोग करके दैहिक विमर्श व सत्ता विमर्श जैसे बाजारू एवं भ्रष्ट मुद्दों को भी उठाया जा रहा है जिससे लेखन भी अब एक व्यापार का रूप धारण करता जा रहा है। लेकिन मेरा यह मानना है कि इन विषयों के इलावा भी कई ऐसे अन्य विषय हैं जैसे&#8211; भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आंतकवाद, ग़रीबी, बुढ़ापा, नारी के मानवीय अधिकार, बाल-अपराध व पतित युवा पीढ़ी जिनपर लिखकर एक आदर्श एवं उन्नत समाज की स्थापना की जा सकती है.इस बारे में अपनी राय बताएँ ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; आप को शायद याद हो या नहीं कह नहीं सकता;  डी. एच. लारेंस ने   लेडी चैटर्लीज़ लवर 1928 में लिखी थी और तुरंत उस पर बैन लग गया था। उसे  अश्लील और उत्तेजित भाषा का प्रयोग करने वाला उपन्यास घोषित कर दिया गया। मगर आज वही उपन्यास एक क्लासिक कृति कहलाता है। यही बात मंटो के साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। मंटो की कहानियों को भी अश्लील कहा गया और उन पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया। मगर आज वही कहानियां महान हो गई हैं। एक ख़ास विचारधारा के लेखकों ने साहित्य को भ्रष्टाचार, मज़ूदर, किसान और बाज़ारवाद तक सीमित कर दिया था। महत्वपूर्ण लेखक वही हैं जो किसी थीम विशेष से बंध कर नहीं लिखता। महत्वपूर्ण यह है कि लेखक अपने लेखन को लेकर कितना गंभीर है। अपनी कहानियों से उदाहरण नहीं दूंगा, अन्यथा आत्म-प्रचार का दोष मेरे सिर लगा दिया जाएगा। मगर मैं जितने भी गंभीर आलोचकों की तरफ़ देखता हूं, वे सब महत्वपूर्ण लेखकों पर लिख रहे हैं। जमशेदपुर की विजय शर्मा ने हाल ही में दो महत्वपूर्ण लेख लिखे थे – प्रवासी कहानी में वृद्धावस्था और प्रवासी कहानी में युवावस्था। यानि कि वह वर्तमान कहानियों में यह विषय देख रही हैं। पाखी, नया ज्ञानोदय, हंस, कथा देश, आधारशिला, लम्ही, कथाबिम्ब जैसी बहुत सी पत्रिकाएं हैं जिनमें लगभग सभी विषयों पर कहानियां मिल जाती हैं। हिन्दी साहित्य में पैसा कहां है, मैं नहीं जानता। हां फ़िल्म और टीवी में लिखने पर ज़रूर पैसा मिलता है। मैं जानता हूं क्योंकि जब भारत में था, शांति सीरियल के लिखने में भागीदारी की थी। मगर जहां तक साहित्यिक लेखन का सवाल है वहां पैसे और प्रसिद्धि की दौड़ जैसी कोई चीज़ नहीं है। साहित्यिक लेखन कभी समाज में बदलाव नहीं लाता, उसके लिये जागरूक पत्रकारिता काम आती है। किसी भी भारतीय भाषा का कोई भी लेखक क्रांति नहीं ला पाया। हां यह सच है कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के समय कुछ ऐसे गीत अवश्य लिखे गये जो कि हमारे जांबाज़ों का हौसला बढ़ाते थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(७ )प्रश्न&#8211; आप गज़ल भी लिखतें हैं.गज़ल लिखने के लिए उर्दू भाषा का ज्ञान अनिवार्य है I आपने उर्दू की शिक्षा कहाँ से प्राप्त की है और गज़ल लिखने का शौक आपको कब और कैसे पैदा हुआ ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, जो लोग हिन्दी में हाइकू लिखते हैं क्या आपने उनसे कभी पूछा है कि उनको जापानी आती है या नहीं? क्या आपने गुजराती, पंजाबी या मराठी में ग़ज़ल लिखने वालों से पूछा है कि उन्हें उर्दू भाषा का ज्ञान है या नहीं? उनका जवाब बहुत सरल होगा – कि उन्होंने विधा उधार ली है, भाषा नहीं। ठीक उसी तरह हिन्दी में भी हमने ग़ज़ल विधा की तकनीक उधार ली है। बहर, वज़न आदि उर्दू से लिये हैं मगर भाषा हमारे पास है। हम ग़ज़ल को अपनी भाषा में लिखेंगे। यह जो सोच बनी हुई है कि ग़ज़ल लिखने के लिये उर्दू का ज्ञान ज़रूरी है, इसी कारण हिन्दी ग़ज़ल का कोई स्वरूप उभर नहीं पाया। हम भी उर्दू वालों की तरह ‘मेरा’ और ‘तेरा’ को ‘मिरा’ और ‘तिरा’ लिखने लगे हैं। भला ‘मिरा’ और ‘तिरा’ क्या हिन्दी के शब्द हैं? हमारी भाषा में मात्रा गिराने का रिवाज़ नहीं है तो हम क्यों ऐसा करें। हमें वज़न पूरा करने के लिये ऐसी ख़ुराफ़ातें उधार नहीं लेनी। हमारी भाषा में ‘सुबह’ को ‘सुभ’ नहीं बनना। अब आपके सवाल का दूसरा हिस्सा। मैनें उर्दू की बाक़ायदा शिक्षा नहीं ली। मेरे पिता स्वयं उर्दू में शायरी भी करते थे और कहानियां एवं उपन्यास भी लिखते थे। व  पंजाबी भी उर्दू में ही लिखते थे। घर में उर्दू का माहौल था। बस कब उर्दू के शब्द मेरी शब्दावली में शामिल हो गये। मुझे दोहा और ग़ज़ल इस लिये अच्छे लगते हैं क्योंकि दो पंक्तियों में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है। दोहे कभी लिख नहीं पाया मगर ग़ज़ल अपने आप को लिखवा लेती है। मुझे लगता है कि अभी हिन्दी ग़ज़ल को अपना स्थान बनाने में काफ़ी समय लगेगा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(८ )प्रश्न&#8211; आप कथा यू.के के साथ कब और कैसे जुड़े ? इसमें आपकी क्या भूमिका है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; कथा यू.के. का जन्म इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट के रूप में मुंबई में हुआ जहां यह एक रजिस्टर्ड ट्रस्ट है। ट्रस्ट के तीन फ़ाउण्डर ट्रस्टी थे – पत्रकार राहुल देव, पत्रकार एवं कवि विश्वनाथ सचदेव, एवं फ़िल्म अभिनेता नवीन निश्चल। मैं स्वयं ट्रस्ट का मैनेजिंग ट्रस्टी था। इस ट्रस्ट की स्थापना मेरी दिवंगत पत्नी इंदु जी की याद में किया गया जिनका कैंसर से असामयिक निधन हो गया था। ट्रस्ट ने शुरूआत में चालीस वर्ष से कम उम्र के कहानीकारों का सम्मान करने की योजना बनाई और 1995 से 1999 के बीच यह कार्यक्रम मुंबई के एअर इंडिया ऑडिटोरियम में ही किया गया। मेरे ब्रिटेन में बस जाने के बाद वर्ष 2000 से ट्रस्ट के नाम में परिवर्तन किया गया और कथा यूके सामने आई। मैं इस संस्था का महासचिव हूं। काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी इसकी संरक्षक हैं और हाल ही में वरिष्ठ मीडिया हस्ती श्री कैलाश बुधवार ने कथा यू.के. के अध्यक्ष का पद संभाला है। वर्ष 2000 से सम्मान के लिये आयु सीमा हटा दी गई है और कहानी के साथ साथ उपन्यास भी सम्मान के लिये शामिल कर लिये गये हैं। वर्ष 2000 से ही ब्रिटेन में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के लिये पद्मानंद साहित्य सम्मान की भी स्थापना की गई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(९ ) प्रश्न&#8211; भारत में हर शहर में संस्थाएं हैं जो साहित्यिक पुरस्कार देती हैं .इंदु शर्मा कथा सम्मान और पद्मानंद साहित्य सम्मान देने के पीछे आपका क्या उद्देश्य है?</span><br />
<span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8211; प्रीत जी, आपने बिल्कुल ठीक कहा कि भारत में पहले से इतने साहित्यिक सम्मान पहले से दिये जा रहे हैं, तो फिर हमारे सम्मान क्यों। वैसे अब इंदु शर्मा कथा सम्मान को भी 17 साल हो चुके हैं। और तीन वर्षों बाद बीसवां सम्मान समारोह होगा। यानि कि अब हमें भी काम करते हुए कुछ समय तो हो ही गया है। जब पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया गया था तो उसके पीछे कुछ अलग किस्म की सोच थी। इंदु जी का निधन उनके चालीस वर्ष पूरे करने से पहले ही कैंसर से हो गया था। उन्होंने मुझे कहानी लिखना सिखाया था। मुझे महसूस होता था कि मैं तो भाग्यशाली था कि मुझे जीवन में इंदु जी मिलीं। मगर हर युवा लेखक तो इतना भाग्यशाली नहीं हो सकता। इसलिये मैं हर लेखक में टुकड़ा टुकड़ा इंदु बांट रहा था। यह सम्मान चालीस वर्ष से कम उम्र के कथाकारों के लिये शुरू किया गया। जब मैं ब्रिटेन में बसने के लिये आ गया तो सम्मान का स्वरूप बदल गया। अब मेरी चाहत हुई कि इसे हिन्दी के बुकर सम्मान का दर्जा मिलना चाहिये। आयु सीमा हटा दी गई और कहानी के साथ उपन्यास भी शामिल कर दिया गया। यह सम्मान शायद हिन्दी के एकमात्र विश्वसनीय सम्मान के रूप में उभर कर सामने आया है। इसका आयोजन हर साल ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्डस या हाउस ऑफ़ कॉमन्स में किया जाता है। भारतीय उच्चायोग इस सम्मान के साथ संपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है।  पद्मानंद साहित्य सम्मान मूलतः ब्रिटेन में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य का आकलन है और उसे विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रयास है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१०) प्रश्न&#8211;   विदेशों में रह रहे हिंदी रचनाकारों की रचनाओं के साथ प्रवासी शब्द का उपयोग किया जाता है हिंदी की कई पत्रिकाओं में। क्या आप इससे सहमत हैं या असहमत ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;यह सवाल मेरे दिल के बहुत निकट है। मैंने पहली बार दुबई में हुए खाड़ी सम्मेलन में यह सवाल उठाया था कि क्या दुनियां की किसी भी और भाषा में प्रवासी साहित्य पाया जाता है? ब्रिटेन, हॉलेण्ड, फ़्रांस, पुर्तगाल आदि ने विश्व भर में अपनी कॉलोनियां बनाईं। क्या उनकी भाषाओं में प्रवासी साहित्य मौजूद है। विश्व के हर बड़े शहर में एक चाइना टाउन होती है। क्या चीनी भाषा में प्रवासी साहित्य मौजूद है। फिर हिन्दी की यह समस्या क्यों है? विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य को सीधा सादा हिन्दी साहित्य मानने में क्या अड़चन है। दरअसल हिन्दी साहित्य पहले ही ख़ांचों में बंटा हुआ है – कहीं स्त्री लेखन है तो कहीं दलित लेखन। अब यह प्रवासी साहित्य का शोशा। दरअसल प्रवासी साहित्य तो सीधा सादा व्यापार का सिलसिला बन गया है। उन्हें हिन्दी के बाज़ारवाद में भुनवाया जा रहा है। प्रवासी विशेषांक, प्रवासी सम्मेलन आदि आदि। क्या मॉरीशस, सुरीनाम, अमरीका, फ़िजी, ब्रिटेन, युरोप, खाड़ी देशों का हिन्दी साहित्य एक सा ही है जिसे प्रवासी शीर्षक के तले रखा जा सके। मुझे तो लगता है कि यह एक षड़यंत्र है ताकि विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को मुख्यधारा के साहित्य से अलग रखा जा सके। जब हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जाए तो विदेशों में लिखने वालों को केवल एक पैराग्राफ़ में निपटा दिया जाए। मुझे लगता है कि साहित्य जहां जहां रचा जा रहा है, उसमें वहां की सुगन्ध और स्वाद आना चाहिये। हमारे लेखन को पत्रिकाओं के नॉर्मल अंकों में छापा जाए। हमें प्रवासी विशेषांकों का मोहताज ना बनाइये।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(११) प्रश्न&#8211;क्या आप विदेश में रहकर वहाँ की संस्कृति,सभ्यता,रीति-रिवाज और भाषा से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस कर पाते हैं ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211;पहली पीढ़ी के प्रवासी के लिये यह आसान नहीं होता कि वह अपने अपनाए हुए देश की संस्कृति, सभ्यता और रीति-रिवाज से पूरी तरह जुड़ पाए। उसकी जड़ें अपनी मातृभूमि, संस्कारों एवं भाषा से जुड़ी होती हैं। उससे इस बात की अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिये। हां यह आवश्यक है कि उसे इन सब बातों के प्रति कोई रिज़र्वेशन भी नहीं होनी चाहिये। सौभाग्यवश मैं जिस देश में रहता हूं वहां की भाषा मुझे स्थानीय लोगों से बेहतर आती है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी में की है। शायद वही मेरे काम भी आ रही है। सच तो यह है कि स्थानीय लोग कभी कभी मेरे अंग्रेज़ी ज्ञान के प्रति ईर्ष्या व्यक्त कर चुके हैं। लंदन में विविधता इतनी है कि कोई एक सभ्यता ना तो दिखाई देती है और ना ही सुनाई। यदि हमें इंगलैण्ड की पुरानी परंपराओं को समझना है तो हमें बड़े शहरों से बाहर जाना होगा। मैं ब्रिटेन की कुछ बातों का क़ायल हूं। यहां आम आदमी की बहुत क़दर है। यहां इन्सान को इन्सान समझा जाता है। यहां टुच्चा भ्रष्टाचार नहीं है। एक हज़ार पाउण्ड के घोटाले के लिये भी सांसदों को त्यागपत्र देना पड़ता है बल्कि जेल तक भी हो गई है। विकलांगों के लिये जो सुविधाएं यहां मौजूद हैं उनको देख कर लगता है कि ना जाने हम किस ग्रह पर रह रहे हैं। हम जिस भारतीय संस्कृति की डींगें मारते हैं, वो संस्कृति यहां प्रेक्टिकल रूप में दिखाई दे जाती है। सच्चा समाजवाद अगर कहीं देखा है तो सामंतवाद के इस गढ़ में देखा है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१२) प्रश्न&#8211; आपके द्वारा रचित पुस्तकों के बारे में बताएँ (चाहे वे कहानी-संग्रह ,कविता संग्रह,समीक्षात्मक पुस्तकें ही क्यों न हो ); और इन पुस्तकों में किन-किन विषयों को लिया गया है?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212;प्रीत जी तरीके से तो आपको स्वयं मेरी रचनाओं के बारे में मुझे बताना चाहिए कि आप को कैसी लगती हैं। फिर भी आप को बता देता हूँ कि आज तक जो मेरे कहानी संग्रह छपे हैं उनके नाम हैं काला सागर, ढिबरी टाईट, देह की कीमत, ये क्या हो गया, बेघर आँखें, क़ब्र का मुनाफ़ा, और सीधी रेखा की परतें ( जिस में मेरे पहले तीन कहानी संग्रह समग्र भाग-1 के तौर पर छपे हैं)। एक कहानी संग्रह दीवार में रास्ता प्रकाशक के पास प्रकाशनार्थ पड़ा है जिसमें 16 कहानियां शामिल हैं जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरा एक कविता और ग़ज़ल संग्रह भी प्राकशित हो चुका है जिसका नाम है ये घर तुम्हारा है। मैंने चार पुस्तकों का सम्पादन किया है जिस में प्रवासी कविता, ग़ज़ल  और कहानी के संकलन शामिल हैं। मेरे कुछ अन्य भाषाओँ में भी कहानी संकलन प्रकाशित हो चुके हैं &#8211; ईंटों का जंगल (उर्दू), पासपोर्ट का रङहरू (नेपाली), ढिबरी  टाईट एवं कल फेर आंवीं (पंजाबी)। अंग्रेजी में मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ब्लैक एंड वाईट (एक बैंकर की जीवनी), लॉर्ड बायरन, जॉन कीट्स । वैसे एक आलोचनात्मक ग्रन्थ मेरे साहित्य पर भी प्रकाशित हो चुका है तेजेंद्र शर्मा &#8211; वक़्त के आइने में जिसका सम्पादन कथाकार हरी भटनागर ने किया है। मेरे लेखन कि एक विशेषता ही कि मैं विजेता के साथ जश्न नहीं मना पाता। मैं हमेशा अपने आप को हारे हुए इंसान के साथ खड़ा पाता हूँ। ब्रिटेन में बसने के बाद मेरे साहित्य के विषयों में बदलाव आया है। आज मैं विदेशों में बसे भारतीयों की समस्याओं, उपलब्धिओं और संघर्ष की ओर अधिक ध्यान देता हूँ। मैं देखता हूँ कि मेरे चारों ओर जीवन अर्थ से संचालित है, रिश्तों में खोखलापन समा रहा है, बाज़ारवाद इंसान कि सोच को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। पैदा होने से मृत्यु तक हम कैसे बाज़ार के नियमों तले दब रहे हैं, ये सब मेरे साहित्य में परिलक्षित होता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१३) प्रश्न&#8212; टेलीविज़न के बहुचर्चित सीरियल शांति में आपका क्या योगदान रहा है ? क्या इससे आपको प्रसिद्धि प्राप्त हुई ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; हुआ यूं कि मेरे मित्र दिनेश ठाकुर को शांति सीरियल के मुख्य पात्र का रोल करने को कहा गया। जो कलाकार पहले रोल कर रहा था उसकी टी.आर.पी. में कुछ कमी आ गई थी। दिनेश ने यू.टी.वी. को मेरा नाम सुझाया। वैसे भी वे लोग किसी साहित्यिक लेखक को अपनी टीम में शामिल करना चाहते थे। मुझे इससे पहले टी.वी. लेखन का कोई अनुभव नहीं था। मैनें कभी भी फ़िल्मी लेखन को साहित्य के मुक़ाबले दोयम दर्जे का नहीं माना। मुझे लगता है कि दोनों तरह के लेखन एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं। मैं प्रेमचन्द की सोच से इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि साहित्य दूध होने का दावेदार है जबकि सिनेमा ताड़ी या शराब की भूख को शान्त करता है। मैं कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी को इस मामले में आदर्श मानता हूं जिन्होंने साहित्य और सिनेमा में एक ख़ूबसूरत समन्वय बना कर रखा। मुझे एपिसोड लिखने का काम मिला। हम तीन लेखक आपस में बांट कर एपिसोड लिखा करते थे। समीर की कहानी थी और हम तीनों उस कहानी से एपिसोड बनाते थे। मुझे कोर्ट के सीनों का एक्सपर्ट माना जाता था। मुझे इस सिलसिले में एक वकील के साथ प्रशिक्षण के लिये भी भेजा गया। शुरू शुरू में मेरे निर्देशक ने शिक़ायत की कि मैं लम्बे लम्बे संवाद लिखता हूं। उसका कहना था कि उसे कैमरा रखने में मुश्किल होती है। तीन तीन कैमरे काम कर रहे हैं, अगर डॉयलॉग छोटे होंगे तो उसे कैमरा प्लेस करने में अधिक सुविधा होगी। मेरी केवल एक ही शर्त थी कि यदि मेरा लिखा हुआ बदलना है तो वह मैं ही बदलूंगा। कोई कलाकार या निर्देशक नहीं। मेरी यह बात उन्होंने मान ली। शांति के बाद की मेरी कहानियों में आप संवादों का अच्छा इस्तेमाल पाएंगे। मुझे लगता है कि संवाद बहुत बार कहानी को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं। मेरे लिखे हुए संवाद भी जीवन से जुड़ी भाषा में होते थे। मैं राजकुमार टाइप भारी भरकम डॉयलॉग में विश्वास नहीं रखता। फिर भी कभी कभी सीन की मांग पर ऐसा करना पड़ता था। प्रसिद्धि अवश्य मिली लेकिन उस प्रसिद्धि को कैश करने से पहले ही मैं भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा बन गया&#8230;. यानि कि लंदन में बसने के लिये आ गया। मगर आज भी जिन लोगों ने शांति सीरियल देख रखा है उनको जब पता चलता है कि मैं भी उसके लेखन से जुड़ा था, तो अचानक उनकी आंखों में मेरे प्रति आदर बढ़ जाता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१४) प्रश्न&#8212;आज की हिंदी आलोचना के बारे में आपका क्या विचार है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; हमारी पीढ़ी के साहित्यकारों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने अपने आलोचक नहीं पैदा किये। हम आज भी उन्हीं आलोचकों की ओर देखते हैं जो कि पिचहत्तर और अस्सी पार कर चुके हैं। एक लम्बे अर्से से हिन्दी साहित्य में आलोचना किसी गुट विशेष के लेखकों को उछालती रही है। यदि आप उस विचारधारा के गुट के हैं तो आपके साहित्य की समीक्षा होगी, आपकी चर्चा होगी वर्ना आप जगदीश चंद्र, पानू खोलिया, सुरेन्द्र अरोड़ा की तरह गुमनाम रह जाएंगे। मुझे याद पड़ता है एक पत्रिका हुआ करती थी ‘पहल’। उसके संपादक उस पत्रिका में एक सूचना प्रकाशित किया करते थे – ‘कृप्या हमें रचना ना भेजें। यदि हमें आवश्यक्ता होगी तो हम स्वयं आपसे रचना मंगवा लेंगे।’ यानि कि वे किसी विचारधारा विशेष की रचनाएं ही छापना चाहते थे। आलोचना आपके लिखे साहित्य की नहीं होती। आलोचना आपकी निजि सोच, निजि विचारधारा की होती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि आपकी समीक्षक के साथ कैसी पहचान है। जबसे मुख्यधारा सिमट कर पांच सात सौ लोगों तक रह गई है, लेखक ही पाठक भी बन गये हैं। साहित्य का जनाधार लगभग समाप्त हो चुका है। मुझे एक कहानी याद आती है ‘कामरेड का कोट’। उस कहानी को इतना उछाला गया कि उसका लेखक उसके बाद कुछ नहीं लिख पाया। पिछली तीन पीढ़ियां नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव से शाबाशी पाने की लालसा में साहित्य रचती रही है। जमशेदपुर की विजय शर्मा, दिल्ली के अजय नावरिया और साधना अग्रवाल व वर्धा के शंभु गुप्त में संभावनाएं हैं कि यदि वे आलोचना को गंभीरता से लें, तो हमारी पीढ़ी को सशक्त आलोचक मिल सकते हैं। पुरानी पीढ़ी नये साहित्य को भी पुरानी दृष्टि से देखती है। हमारे सरोकार उन तक पहुंच नहीं पाते। और ख़ास तौर पर प्रवासी सरोकार तो पुरानी पीढ़ी के आलोचकों की समझ के दायरे में बिल्कुल नहीं आते।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१५) प्रश्न&#8212; तेजेन्द्र जी जो भारतीय परिवार विदेशों में जाकर पूर्ण रूप से बस गए हैं ? क्या उन परिवारों के बुजुर्गों को एंकाकीपन खलता है ? इस बारे में आपकी क्या राय है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8212; आपने बहुत सही सवाल पूछा है। आपके सवाल के दो पहलू हैं। एक जो भारतीय परिवार विदेशों में जा कर बस गये हैं उन परिवारों के बुज़ुर्गों को विदेश में एकाकी पन खलता है? और दूसरा पहलू है कि जो भारतीय परिवार विदेशों में जा कर बस गये हैं उन परिवारों के बुज़ुर्गों को भारत में एकाकीपन खलता है? दोनों ही स्थितियां बुज़ुर्गों के लिये सहानुभति पैदा करती हैं। बच्चों के विदेश में बस जाने के बाद जब मां बाप अकेले भारत में रह जाते हैं तो उनके अकेलेपन की ख़लिश उन्हें कचोटती रहती है। बच्चे पैसे भेज कर अकेलेपन की भरपाई करते हैं। मगर यह मां-बाप के ख़ालीपन को भर नहीं पाता। किन्तु मां बाप के पास एक तसल्ली होती है कि वे अपनी ज़मीन से कटे नहीं होते। उसी जगह रह रहे होते हैं जहां कभी उन्होंने संघर्ष किया था और उनके संघर्ष के साथी, पड़ोसी उनका साथ देते हैं। विदेश में स्थिति और भी भयावह है। वहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी इतनी आत्ममगन है कि बूढ़े दादा दादी बहुत अकेले पड़ जाते हैं। वे बातचीत का हिस्सा बनना चाहते हैं मगर घर की नकारा वस्तुओं की  तरह महसूस करने लगते हैं। अब क्योंकि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोग ख़ासी बड़ी संख्या में बस गये हैं; सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियां बढ़ गई हैं; इसलिये हमारे बुज़ुर्ग किसी न किसी तरह अपने आपको व्यस्त रख पाते हैं। बहुत से भारतीय बुज़ुर्गों की दोहरी समस्या है। उनका प्रवासन पहले भारत में हुआ जब पाकिस्तान बना या वे प्रवास करने अफ़्रीका गये। उनका दूसरा प्रवासन हुआ जब उनकी अगली पीढ़ी विदेश रहने आ गई या फिर इदी अमीन ने उनको अफ़्रीका से निकाल फेंका। यह दोहरे प्रवासन की मार का असर बहुत गहरा है। मगर फिर भी शारीरिक तौर पर स्वस्थ बुज़ुर्ग अपने आपको किसी ना किसी सामाजिक काम से जोड़े रखते हैं। मैं कुछ ऐसे लोगों से परिचित हूं जो कि उम्र में सत्तर साल से अधिक हैं और वे सप्ताह में एक या दो दिन हस्पतालों में जाकर वॉलंटीयर का काम करते हैं और मरीज़ों की सहायता करते हैं। वैसे अकेलापन मैनें स्थानीय अंग्रेज़ों के बुज़ुर्गों में कहीं अधिक देखा है, जिनके बच्चे उन्हें केवल मदर्ज़ डे, फ़ादर्ज़ डे या फिर क्रिसमिस पर ही याद करते हैं। वर्ना वे ओल्ड पीपल्ज़ होम में जीवन बिता देते हैं – चेहरों पर एक अजीब सा ख़ालीपन लिये।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१६) प्रश्न&#8212;&#8211; आपने बिल्कुल ठीक  कहा कि बुजुर्ग वर्ग ओल्ड पीपल्ज़ होम में जीवन बिता देतें हैं – चेहरों पर एक अजीब सा ख़ालीपन लिये, पर क्या विदेश में ऐसी कोई संस्थाएँ हैं, जो युवा वर्ग को अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए शिक्षाप्रद कार्यक्रम करती हो जिससे वे भारतीय सँस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रख सकें.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8211;बात यह है प्रीत कि ओल्ड पीपल्ज़ होम बनाए ही इसीलिये गये थे क्योंकि ब्रिटेन के स्थानीय बूढ़े मांबाप को उनके बच्चे अकेला छोड़ अपनी ज़िन्दगी जीना शुरू कर देते थे। सरकार ने सोचा कि बूढ़े मां बाप अकेले सड़कों पर जीने को मजबूर न हो जाएं इसलिये उनके रहने के लिये प्रावधान किया गया। वहीं एक दूसरे तरह के भी ओल्ड पीपल्ज़ होम मौजूद हैं जहां बूढ़े मां बाप के बच्चे हर महीने के पैसे देते हैं और उनकी देखभाल वहां करवाते हैं। इसका कारण यह है कि बेटा और बहू नौकरी करते हैं और अपने बूढ़े मांबाप को अकेला घर में नहीं छोड़ना चाहते। ब्रिटेन में क़रीब 20 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। अभी यह नहीं देखा गया कि भारतीय मूल के मां बाप बड़ी संख्या में ओल्ड पीपल्ज़ होम में दिखाई दे रहे हों। यह एक स्थानीय समस्य़ा है जो आहिस्ता आहिस्ता भारतवंशियों तक पहुंच रही है। जहां तक भारतीय संस्कृति और संस्कारों की बात है तो भारतीय विद्या भवन के साथ साथ ऐसी बहुत से संस्थाएं हैं जो कि इस सब के लिये काम कर रही हैं। यहां मंदिर और गुरूद्वारे केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं। यह सामुदायिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं का काम भी निभाती हैं। कथा यू.के. हिन्दी साहित्य के लिये काम कर रही है तो यू.के. हिन्दी समिति हिन्दी शिक्षण के प्रति कटिबद्ध है। भारतीय उच्चायोग इसमें बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। पिछले वर्ष उच्चायोग ने स्वतंत्रता दिवस को भी आम भारतवंशी के लिये एक अनुष्ठान बना दिया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१७) प्रश्न&#8212;-कहते हैं कि सफलता के पीछे  किसी का  हाथ होता है .     आपकी सफलता के पीछे किसका हाथ है ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तरः आपके प्रश्न का उत्तर देने का अर्थ है कि मैं पहले आपकी बात से सहमत हूं कि मैं सफल हूं। मुझे नहीं पता कि सफलता के आपके मानदण्ड क्या हैं। मैं एक कहानीकार हूं जो कि हाशिये पर है। विदेशों में हिन्दी भाषा और साहित्य को स्थापित करने में संघर्षरत हूं। सभी हिन्दी प्रेमियों एवं साहित्यकारों का स्नेह मिलता रहा है, शायद इसीलिये एक के बाद एक कार्यक्रम और आयोजन होते चले गये। जब कभी मुझे ऐसा अहसास होगा कि मैं एक सफल व्यक्ति हूं, मैं अवश्य जानने का प्रयास करूंगा कि मेरी सफलता के पीछे किस मित्र का हाथ है। यह सच है कि जीवन के इस मुकाम पर भी संघर्ष करने से डरता नहीं।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१८ )प्रश्न&#8212;&#8211;ब्रिटेन की युवा पीढ़ी के बारे में आप क्या कहेंगे ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">उत्तर&#8212; यह सवाल बहुत गहरा है और बहुत लम्बा जवाब मांगता है। कोशिश करता हूँ कि कम से कम फ़ुटेज खाते हुए जवाब दे सकूं। कुछ साल पहले ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण करवाया गया था जिसके नतीजे बहुत चौंका देने वाले थे। यहाँ के क़रीब पचीस प्रतिशत युवा युद्ध की परिस्थितियों में अपने देश के लिए लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने इस सर्वेक्षण से घबरा कर एक कविता भी लिखी थी। कितना भयावह ख़्याल है कि आपके देश के युवा वर्ग के मन में अपने देश के प्रति ज़रा भी देशभक्ति का भाव ना हो। मारग्रेट थैचर जब ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थीं उन्होंने एक क़ानून बनाया था कि माता पिता अपने बच्चों को शारीरिक दण्ड नहीं दे सकते। यहां बच्चों के मानवीय अधिकारों की रक्षा को बहुत गंभीरता से लिया गया और लिया जाता भी है। बच्चों के सिर से डंडा ग़ायब हो गया। तो युवा पीढ़ी आत्मकेंद्रित होती चली गई। फिर जो मध्य वर्गीय बच्चे यहां विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं वे सभी सरकारी लोन ले कर पढ़ाई करते हैं। जब नौकरी लग जाती है तो अपना कर्ज़ा उतार लेते हैं। इससे भी बच्चों के मन में यह भावना घर कर जाती है कि मां बाप ने उन पर कोई ख़ास ख़र्चा तो किया नहीं। बच्चा बहुत जल्दी परिवार से दूर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बना लेता है। फिर विवाह नाम की संस्था यहां अपना आकर्षण खो चुकी है। शादी से पहले सेक्स ने उसे और अधिक बेकार की संस्था बना दिया है। टूटे परिवारों के बच्चे वैसे भी संस्कारों के मामले में ग़रीब रह जाते हैं। भारतवंशी बच्चे भी बहुत अलग नहीं हैं। जहां मां बाप अमीर है और उनके पास पैसा और प्रॉपर्टी है, उनके बच्चों का व्यवहार अलग है और जहां मां बाप संघर्षशील हैं, उनके बच्चे जल्दी से अपना अलग संसार बसा लेते हैं। अब ओल्ड पीपल्ज़ होम में भारतीय मूल के लोग भी दिखाई देते हैं। मेरा अपनी सोच यह है कि अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद किसी ओल्ड पीपल्ज़ होम में जा कर उन की सेवा करूं जिनके हाथ पांव जवाब दे गये हैं। वहीं रहूं, वहीं सेवा करूं और वहीं करूं अपने अंतिम दिनों का लेखन।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(१९) प्रश्न&#8211;तेजेंद्र जी किसी भी कहानी की रचना-प्रक्रिया में  मुख्य रूप से किन-किन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए ?</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211;रचना प्रक्रिया कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं है। हर लेखक कहानी अपने ढंग से लिखता है। मैं स्वयं भी हर कहानी एक ही ढंग से नहीं लिखता। कभी कभी कोई घटना दिल पर ऐसा असर करती है कि अपने आपको कहानी को रूप में लिखवा कर ही दम लेती है। कभी कभी कोई व्यक्ति कोई एक बात कह जाता है तो वो बात ही इतना आंदोलित कर जाती है कि कहानी का रूप धारण कर लेती है। जैसे मैं देह की कीमत के किसी चरित्र से स्वयं नहीं मिला। बस मेरे एक मित्र ने यह दो पंक्तियों की घटना मुझे विमान में सुना दी थी। मगर उस घटना ने मेरी नींद हराम कर दी और जब तक कहानी नहीं लिखी गई वो तीन चार महीने मेरे लिये तनाव की पराकाष्ठा थे। लंदन में एक महिला अपने निजी जीवन के विषय में बात करते करते रो पड़ी और उसने कहा कि अब तो लगता है कि कोई मेरा रेप ही करदे तो शायद सुख के कुछ क्षण मुझे नसीब हो जाएं। उस एक वाक्य ने कल फिर आना जैसी कहानी लिखवा दी जो कि हंस में प्रकाशित हुई और उसकी बहुत चर्चा भी हुई। फिर भी एक बात कहना चाहूंगा कि घटना कहानी नहीं होती। घटना को कहानी के रूप में लिखने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिये। घटना स्थूल है, उसके पीछे की सूक्ष्म भावनाओं को पकड़ना होगा। उसमें लेखक अपनी कल्पना शक्ति एवं उद्देश्य का तड़का लगाए, तब कहीं कहानी का जन्म होता है। कहानी को अंतिम रूप देने से पहले जुगाली करना बहुत ज़रूरी है। जब तक लेखक स्वयं कहानी से संतुष्ट ना हो जाए, उसे कहानी प्रकाशन के लिये नहीं भेजनी चाहिये। कई बार लेखक कहानी की सामग्री को कहानी समझ कर छपने के लिये भेज देता है। कहानी की सामग्री और कहानी में अंतर स्पष्ट होना बहुत ज़रूरी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;">(२०) प्रश्न&#8212;आप आज के युवा रचनाकारों और हिन्दी साहित्य प्रेमियों को क्या सन्देश देना चाहेंगे</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> उत्तर&#8211; प्रीत जी, आपके प्रश्न से लगता है कि जैसे मैं कोई बड़ा वरिष्ठ लेखक बन गया हूं जिसे युवा रचनाकारों को संदेश देने का हक़ मिल गया है। दरअसल मैं तो स्वयं अभी अपने आपको साहित्य का विद्यार्थी मानता हूं। मैं युवा लेखकों से स्वयं कुछ सीखने का प्रयास करता हूं। जब मैं किसी युवा लेखक की रचना पढ़ता हूं तो पाता हूं कि यह पीढ़ी आत्मविश्वास से भरपूर है। पंकज सुबीर, मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, प्रत्यक्षा, संजय कुंदन, अजय नावरिया, अल्पना मिश्र के साथ साथ और बहुत से नाम हैं जो कि बेहतरीन कहानियां लिख रहे हैं। इनमें से कुछ एक नाम तो स्थापित लेखक बन चुके हैं और उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। फिर भी इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि यह पीढ़ी इस बात की परवाह ना करे कि पुराने स्थापित या वरिष्ठ आलोचक इनकी रचनाओं के बारे में क्या राय रखते हैं। इस पीढ़ी को अपने लिए लिखना है; अपने पाठकों के लिये लिखना है। सबसे बड़ी बात कि इस पीढ़ी को अपने आलोचक भी स्वयं पैदा करने होंगे। हमारी पीढ़ी की समस्या यही रही कि हमारी पीढ़ी उन आलोचकों की ओर देखती रही जिन्हें हमारे सरोकारों से कोई वास्ता नहीं था। आज के युवा आलोचक साहित्य की समीक्षा तो कर रहे हैं मगर हमें उनसे अपेक्षा है कि वे आलोचना को नई परिभाषाएं भी दें। विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य को भी प्रतीक्षा है कि कोई उस ओर गंभीरता से ध्यान दे। हिन्दी पाठकों और प्रेमियों के लिये यह शुभ घड़ी है कि आज का लेखक विचारधारा के दबाव में साहित्य रचना नहीं कर रहा। आज का लेखक पाठक के लिये सृजन करने की ओर कदम बढ़ा चुका है। एक बात युवा लेखकों से भी कहना चाहूंगा और हिन्दी प्रेमियों से भी – साहित्य के लिये सबसे महत्वपूर्ण है कि उसे पढ़ा जाए। युवा लेखक जब तक अच्छा पढ़ेंगे नहीं तो अच्छा लिखेंगे कैसे। और यदि हिन्दी प्रेमी नहीं पढ़ेंगे तो साहित्य बचेगा कैसे।</span></h3>
<table border="1" cellspacing="5" cellpadding="5" width="100%">
<tbody>
<tr>
<th style="color: green; background-color: orange;" rowspan="2">
<h3 style="text-align: left;"><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #0000ff;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/PRIT-ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd.jpg"><img class="size-full wp-image-7330 alignleft" title="PRIT ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/PRIT-ARORA_ec67d488aeadce8fe9b5b1d81c2a05bd.jpg" alt="" width="77" height="96" /></a>साक्षात्कार प्रस्तुति : ड़ॉ प्रीत अरोड़ा</span></span></h3>
<p style="text-align: left;"><span style="font-weight: normal;"><span style="color: #0000ff;">जन्म &#8211; २७ जनवरी. शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनों वर्षों में प्रथम स्थान के साथ और मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य . कार्यक्षेत्र-. अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद।</span></span><span style="font-weight: normal; text-align: justify; background-color: orange;"> </span></p>
</th>
</tr>
</tbody>
</table>
]]></content:encoded>
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		<title>डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण -आकांक्षा के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन</title>
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		<pubDate>Sat, 05 May 2012 11:03:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/05/%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a3-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/KKYadav-Jangal_men_cricket-vimochan.jpg"><img class="size-medium wp-image-7326 alignleft" title="KKYadav-Jangal_men_cricket-vimochan" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/05/KKYadav-Jangal_men_cricket-vimochan-300x210.jpg" alt="" width="240" height="168" /></a>युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह &#8216;जंगल में क्रिकेट&#8217; एवं &#8216;चाँद पर पानी&#8217; का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"> इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल</span> <span style="font-weight: normal;">डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है. </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">( रत्नेश कुमार मौर्या की रपट )</h3>
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		<title>हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया एक दूसरे के पूरक</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Apr 2012 07:23:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नई दिल्‍ली, भारत की राजधानी के दिल कनॉट प्‍लेस के द एम्‍बेसी रेस्‍तरां में एक... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b6/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/blogger-meet-image.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-7322" title="blogger meet image" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/blogger-meet-image-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>नई दिल्‍ली, भारत की राजधानी के दिल कनॉट प्‍लेस के द एम्‍बेसी रेस्‍तरां में एक हिंदी ब्‍लॉगर संगोष्‍ठी लखनऊ से पधारे हिन्‍दी के मशहूर ब्‍लॉगर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के सम्‍मान में सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़डॉटकॉम के तत्‍वावधान में शनिवार को आयोजित की गई। इस मौके पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के प्रभाव के सबने एकमत से स्‍वीकारा। देश विदेश में हिंदी के प्रचार प्रसार में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के महत्‍व को सबने स्‍वीकार किया और इसकी उन्‍नति के मार्ग में आने वाली कठिनाईयों पर व्‍यापक रूप से विचार विमर्श किया गया। संगोष्‍ठी में दिल्‍ली, नोएडा, गाजियाबाद के जाने माने हिंदी ब्‍लॉगरों से शिरकत की। सोशल मीडिया यथा फेसबुक, ट्विटर को हिंदी ब्‍लॉगिंग का पूरक माना गया। एक मजबूत एग्रीगेटर के अभाव को सबसे एक स्‍वर से महसूस किया और तय किया गया कि इस संबंध में सार्थक प्रयास किए जाने बहुत जरूरी है। फेसबुक आज एक नेटवर्किंग के महत्‍वपूर्ण साधन के तौर पर विकसित हो चुका है। इसका सर्वजनहित में उपयोग करना हम सबकी नैतिक जिम्‍मेदारी है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर एवं चर्चित व्‍यंग्‍यकार  अविनाश वाचस्‍पति ने हिंदी ब्‍लॉगिंग को समाज की बुराईयों से बचाने और प्राइमरी कक्षाओं में इसके पाठ्यक्रम आरंभ करने को वक्‍त की जरूरत के मामले को इस अवसर पर भी दोहराया। जिसका सभी उपस्थिति ब्‍लॉगरों ने सर्वसम्‍मति से समर्थन किया।  एक और हिंदी ब्‍लॉगर संतोष त्रिवेदी ने कहा कि बहुत ही छोटे से नोटिस पर दूर दराज से ब्‍लॉगरों का इस संगोष्‍ठी में शामिल होना साबित करता है कि हिंदी ब्‍लॉगिंग का प्रभाव शिखर की ओर तेजी से बढ़ रहा है। कंटेंट के स्‍तर पर आ रही गिरावट पर चिंता व्‍यक्‍त करते हुए जनसत्‍ता के संपादकीय विभाग में कार्यरत् फजल इमाम मल्लिक ने माना कि ऐसी स्थितियां तो प्रत्‍येक तकनीक के आरंभ में  आती ही हैं। यह एक ऐसा मंच है जिसका पूरी जिम्‍मेदारी के साथ तभी उपयोग किया जा सकता है जबकि इस प्रकार के मेल मिलाप होते रहें। उन्‍होंने सबसे आवाह्न किया कि ब्‍लॉगर अपने अपने क्षेत्रों में इस प्रकार के भरसक प्रयास करें।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/blogger-meet-image1.jpg"><img class="size-medium wp-image-7323 alignleft" title="blogger meet image1" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/blogger-meet-image1-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">भड़ासफॉरमीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह ने जानकारी दी कि आगरा में एक ब्‍लॉगर अपने तकनीक ब्‍लॉग के जरिए एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह तक कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा भी कई जगहों पर ब्‍लॉगिंग से कमाई हो रही है। यह स्थिति निश्‍चय ही सुखद है। प्रत्‍यक्ष न सही, परंतु परोक्ष रूप से हिंदी ब्‍लॉगिंग से हो रही कमाई को अविनाश वाचस्‍पति ने भी स्‍वीकारा।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी ब्‍लॉगों के मॉडरेटर के. राधाकृष्‍णन, पी 7 से जुड़े हर्षवर्द्धन त्रिपाठी, स्‍वतंत्र पत्रकार विष्‍णु गुप्‍त, अयन प्रकाशन के भूपाल सूद, डॉ. टी. एस. दराल, हिंद युग्‍म के शैलेश भारतवासी, सुलभ सतरंगी, कुमार कार्तिकेयन, गौरव त्रिपाठी, खुशदीप सहगल इत्‍यादि ने हिंदी ब्‍लॉगिंग के स्‍वस्‍थ विकास के लिए कई पहलुओं पर उद्देश्‍यपूर्ण चिंतन किया। सबने माना कि फिजूल की अश्‍लील एवं धार्मिक उन्‍माद संबंधी पोस्‍टों पर जाने से हर संभव बचा जाए। इस दूषित प्रवृत्ति पर भी चिंता प्रकट की गई कि चार पोस्‍टें लिखकर स्‍वयं को साहित्‍यकार समझने वालों को अपनी आत्‍ममुग्‍धता से निजात पानी चाहिए। यह बुराईयां स्‍वस्‍थ ब्‍लॉगिंग के विकास के लिए हितकर नहीं हैं।</span></h3>
<h3>(नई दिल्ली से पवन चन्दन की रपट)</h3>
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		<title>‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’ पुस्तक का लोकार्पण</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Apr 2012 06:31:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गत दिनों ( 13 अप्रैल 2012 ) दिल्ली विश्वविधालय के नौर्थ कैम्पस स्थित केन्द्रीय सभागार... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e2%80%98%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%89%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a4%a1/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div id="attachment_7316" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC008341.jpg"><img class="size-medium wp-image-7316" title="DSC00834" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC008341-300x225.jpg" alt="डा. मोहय्या अब्दुरहमान (ताशकंद), अरविन्द श्रीवास्तव , डा. असगर अली इंजीनियर, सतीश कालसेकर (मराठी साहित्यकार) व डा. चौथी राम यादव (पूर्व आचार्य बीएचयू) " width="300" height="225" /></a><p class="wp-caption-text">डा. मोहय्या अब्दुरहमान (ताशकंद), अरविन्द श्रीवास्तव , डा. असगर अली इंजीनियर, सतीश कालसेकर (मराठी साहित्यकार) व डा. चौथी राम यादव (पूर्व आचार्य बीएचयू) </p></div>
<p>गत दिनों ( 13 अप्रैल 2012 ) दिल्ली विश्वविधालय के नौर्थ कैम्पस स्थित  केन्द्रीय सभागार में मधेपुरा के युवा कवि अरविन्द श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’ का लोकार्पण ताशकंद (उज़बेकिस्तान) से आयी लेखिका डा. मोहय्या अब्दुरहमान के साथ विद्वान आलोचक डा. असगर अली इंजीनियर, मराठी साहित्यकार सतीश कालसेकर तथा बीएचयू के पूर्व आचार्य डा. चैथी राम यादव ने किया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">समारोह में डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा. अली जावेद व रंगकर्मी नूर जहीर आदि की गरिमामय उपस्थिति ने लोकार्पण समारोह को महत्वपूर्ण बना दिया। यह आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में किया गया था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div id="attachment_7317" class="wp-caption alignright" style="width: 127px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/ScannedImage-14.jpg"><img class="size-medium wp-image-7317 " title="ScannedImage-14" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/ScannedImage-14-195x300.jpg" alt="पुस्तक ’राजधानी में एक उज़बेक लड़की’" width="117" height="180" /></a><p class="wp-caption-text">पुस्तक ’राजधानी में एक उज़बेक लड़की’</p></div>
<p>‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’ समसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशिया महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">(डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव की रपट)</h3>
]]></content:encoded>
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		<title>मधेपुरा में भारतीय जन नाट्य संध ‘इप्टा’ का तीन दिवसीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव संपन्न</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Apr 2012 06:19:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[लोक संस्कृति की समृद्धि एवं नई पहचान के साथ मधेपुरा की धरती पर इप्टा का... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%9c%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div id="attachment_7307" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00938.jpg"><img class="size-medium wp-image-7307" title="DSC00938" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00938-300x225.jpg" alt="विचार गोष्ठी के मुख्यवक्ता साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’" width="300" height="225" /></a><p class="wp-caption-text">विचार गोष्ठी के मुख्यवक्ता साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’</p></div>
<p>लोक संस्कृति की समृद्धि एवं नई पहचान के साथ मधेपुरा की धरती पर इप्टा का तीन दिवसीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव सम्पन्न हुआ। 20 से 22 अप्रैल तक चले इस समारोह में कोसी इलाके में प्रचलित नारदी, भगैत, जट-जटिन, डोमकछ, दीनाभद्री जैसी लोक गाथाओं सहित पश्चिम बंगाल व असम से आये इप्टा कलाकारों के नाटक व लोक नृत्यों का ऐतिहासिक मंचन को मधेपुरा की जनता लंबे वक्त तक याद रखेगी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">समारोह के अन्तिम दिन ‘आधुनिकता की दौर में ग्रामीण रंगमंच’ विषयक विचार गोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए प्रो. श्यामल किशोर यादव (मधेपुरा इप्टा के संरक्षक) ने रंगमंच और फिल्मों की पृष्ठभूमि में अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हबीब तनवीर ने रंग और कला का अद्भुत सामंजस्य किया&#8230; आज रंगमंच की प्रासंगिकता एक चुनौति है फिर भी हम आशान्वित हैं। विचार गोष्ठी का उद्धाटन करते हुए डा. के. एन. ठाकुर ने बताया कहा कि जितनी ललित कलाएँ हैं उसमे  नाटक का विशेष महत्व है। नाटक हमारी संस्कृति को परिष्कृत करता है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए नाटक की जरूरत है। पूर्वजों से कट जाने के बाद कोई संस्कार नहीं रह जाता। दीनाभद्री या लोरिक को जब हम याद करते हैं तो हम संस्कृति को स्मरण भी करते हैं। मधेपुरा इप्टा के पूर्व अध्यक्ष डा. आलोक कुमार, कवि सिद्धेश्वर काश्यप एवं डा. विवेक भारती ने विषयक को आगे बढ़ाते हुए  ग्रामीण नाटक की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किये। दैनिक ‘प्रभात खबर’ के ब्यूरो प्रमुख रुपेश कुमार श्रीवास्तव ने सवाल उठाये कि जिस तरह पाठ्यक्रम में चित्रकला और संगीतकला शामिल है उस तरह नाट्य कला क्यों नहीं ? उन्होंने नाट्य कला को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर बल दिया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div id="attachment_7308" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00942.jpg"><img class="size-medium wp-image-7308 " title="DSC00942" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00942-300x225.jpg" alt=". ‘इप्टा’ स्मारिका का लोकार्पण करते हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ व अन्य" width="300" height="225" /></a><p class="wp-caption-text">. ‘इप्टा’ स्मारिका का लोकार्पण करते हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ व अन्य</p></div>
<p>विश्वविधालय के पूर्व परीक्षा नियंत्रक डा. भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि आधुनिकता में हम कितने भी आगे क्यों न निकलें, नाटक की जरूरत रहेगी ही। उन्होंने डा. होमी जहाँगीर भाभा के सांस्कृतिक योगदान की चर्चा करते हुए उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की बात कही। डा. रामचन्द्र प्रसाद यादव ने नाटक को साहित्य की सबसे प्रभावकारी विधा बताया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">विचार गोष्ठी के मुख्यवक्ता श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने पारसी ड्रामे की चर्चा की तथा कई ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ नाट्य विषयक अपने अनुभव को सुनाया। उन्होंने कहा कि आज अगर गांव के रंगमंच का हृास हो रहा है तो उसके लिए विज्ञान जिम्मेवार नहीं है &#8230; इप्टा अपने विचारों को लोकोन्मुख बनावे !<br />
संध्याकाल में रवीन्द्र नाथ टैगोर लिखित नाटक ‘अभिसार’ का मंचन कोलकता से आये कलाकारों द्वारा देवाशीष दत्ता के निर्देशन में किया गया। समारोह का एक मुख्य आकर्षण ‘स्मारिका का विमोचन एवं लोकापर्ण’ था जो वरिष्ठ साहित्यकार, क्षेत्रीय इतिहासकार एवं कवि श्री हरिशंकर श्रीवांस्तव ‘शलभ’ के द्वारा सम्पन्न हुआ उन्होंने अपने उद्बोधन में इप्टा के जनपक्षीय कार्यों की सराहना की।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">असम के ‘राभा कामनीटी’ का ‘बोगेजरी’ एवं ‘बीहू’ नृत्य गौतम एवं साथियों की प्रस्तुति  ने दर्शको को रोमांचित कर दिया। इन्हें मंच पर ‘बुके’ देकर प्रदेश इप्टा के उपाध्यक्ष प्रो. शचीन्द्र एवं प्रलेस के बिहार मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता अरविन्द श्रीवास्तव ने सम्मानित किया।  मंच पर लोकगायक माधव प्रसाद यादव का वाद्य वादन को दर्शकों ने बेहद सराहा। विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा प्रस्तुत नृत्य भी इस समारोह का आकर्षण रहा।  इस सफल आयोजन के लिये मधेपुरा इप्टा के अध्यक्ष डा. अमोल राय, सचिव तुरवसु एवं कार्यक्रम संयोजक सुभाष चन्द्र को दर्शकों ने बधाइयाँ दी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">(मधेपुरा से डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव की रपट )</h3>
]]></content:encoded>
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		<title>तरह तरह की अनुभूतियों से सजी ओड़िया-भाषा की प्रतिनिधि कविताएं</title>
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		<pubDate>Thu, 19 Apr 2012 10:28:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[पुस्तक समीक्षा : हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक ओड़िया-गद्य साहित्य के साथ-साथ आधुनिक... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;">पुस्तक समीक्षा :</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक ओड़िया-गद्य साहित्य के साथ-साथ आधुनिक ओड़िया कविताओं की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के अंत में हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासन ने सन 1903 में ओड़िशा को अपने अधिकार में लिया तथा उसे बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन रखा । मगर यहाँ ब्रिटिश शासन का प्रभाव दिखने में काफी समय लगा । खासकर 1966 में भयंकर अकाल के बाद, जिसमें लाखों लोग मौत के शिकार हुए, ओड़िशा की रक्षणशील मानसिकता में नई-नई अनुभूतियों और विचारधाराओं का विकास हुआ । सामाजिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के उस दौर में आधुनिक ओड़िया साहित्य और आधुनिक ओड़िया कविताओं का प्रादुर्भाव  हुआ। </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सबसे पहले प्रमुख आधुनिक ओड़िया कवि हैं राधानाथ राय (1848-1901)। वे ओड़िशा के शिक्षा विभाग के प्रमुख थे, अपने सहयोगी मित्र मधुसूदन राव (1853-1912) के साथ मिलकर ओड़िया पाठ्य-पुस्तकें लिखने के उद्देश्य से कई कविताएँ लिखीं, जो आगे जाकर नूतन ओड़िया कविताओं की नींव की ईंट बनी । राधानाथ राय ने अधिकतर लम्बे-लम्बे वर्णनात्मक काव्य लिखे। ये सारे काव्य पहले लिखे हुए काव्य-कविताओं की  शैली, सरंचना , दृष्टिकोण  तथा भाव की दृष्टि से  पूरी तरह भिन्न थे और समकालीन पाठकीय अभिरुचि से मेल खाने की वजह से ज्यादा लोकप्रिय साबित हुए । सन 1886 से लेकर 1897 के भीतर-भीतर उनके तीन मुख्य काव्य-खंडों ‘पांडवों की महायात्रा’ , ‘ओड़िशा का इतिहास’,‘भूगोल तथा स्थानीय परिवेश की विस्तृत जानकारी’ का प्रकाशन हुआ । तत्कालीन भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोहात्मक महाकाव्य ‘ महायात्रा’(1896), पूर्वी तट की प्रसिद्ध झील चिलिका के अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णनात्मक काव्य ‘ चिलिका’(1892) और बंगाल, बिहार और ओड़िशा के ब्रिटिश शासकों को कटक के बड़े-बड़े राजाओं द्वारा सम्मानित करने पर उनके द्वारा लिखे गए व्यंग्यात्मक आलेख ‘दरबार’(1897) प्रकाशित हुए। राधानाथ जी के ये काव्य-ग्रंथ न केवल अपने समय में अत्यंत लोकप्रिय थे वरन सौ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद आज भी उतने ही लोकप्रिय एवं प्रासंगिक हैं । इस तरह वे ओड़िशा के अन्यतम श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राधानाथ जी की  इस धारा को उस जमाने के जिन तीन कवियों ने आगे बढाया, उनके नाम हैं मधुसूदन राव , गंगाधर मेहेर ( 1862-1924) एवं नन्द किशोर बल (1885-1928) । मधुसूदन राव और नन्द किशोर बल दोनों ओड़िशा के शिक्षा विभाग में उच्च पद पर आसीन थे और दोनों ही राधानाथ जी की तरह ही कटक और ओड़िशा के तटीय अंचल के निवासी थे, मगर गंगाधर मेहेर  पश्चिम ओड़िशा के संबलपुर जिले के बरपाली गाँव के रहने वाले थे । </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"></p>
<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_7303" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px;">
<dt class="wp-caption-dt" style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/Odiya-bhasha-ki-kavita.jpg"><img class="size-medium wp-image-7303" title="Odiya bhasha ki kavita" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/Odiya-bhasha-ki-kavita-300x215.jpg" alt="TRANSLATED BY DINESH KUMAR MALI / ISBN 978-93-81945-20-9 / Price 495/-" width="300" height="215" /></a></dt>
<h3><span style="font-weight: normal;">TRANSLATED BY DINESH KUMAR MALI / ISBN 978-93-81945-20-9 / Price 495/-</span></h3>
</dl>
</div>
<p><span style="font-weight: normal;">मधुसूदन ने किसी काव्य की रचना नहीं की । उन्होंने छोटी लिरिक (गीतात्मक) कविताएँ लिखीं,जिनके छह संकलन सन 1875 से लेकर 1908 के भीतर प्रकाशित हुए ।  मधुसूदन जी की कविताओं में तीन विशिष्ट काव्यानुभव देखें जा सकतें हैं, पहला, अनन्य भक्तिभाव और आध्यात्मिक संवेदना, जिनकी वजह से पाठक मण्डली में वे भक्त-कवि के रूप में विख्यात हैं, दूसरा, प्रकृति प्रेम और प्राकृतिक सौन्दर्य की उपासना और तीसरा, अपने देश के प्रति प्रगाढ़ प्रेम और गौरव-बोध की भावना । राधानाथ जी के समय में लम्बे काव्य लिखने की एक परम्परा थी,मगर उन्होंने नए तरीके से नए दृष्टिकोण तथा नए विषय-वस्तु को लेकर काव्य रचना प्रारंभ की, जबकि मधुसूदन ने ओड़िया में पहली बार छोटी लिरिक कविताएं लिखने की परम्परा का प्रतिपादन किया, जो आगे चलकर आधुनिक ओड़िया कविताओं की एक विशेष विशिष्ट धारा के रूप में रूपांतरित हुई.।  ‘बसंत गाथा’(1902), ‘उत्कल गाथा’(1903) एवं ‘कुसुमांजलि’ (1903) आदि उनके कविता संकलन हैं। उसके अतिरिक्त 158 पंक्तियों की लम्बी कविता &#8216; हिमाचले उदय उत्सव’(1911) एवं ‘ऋषिप्राणे देवावतरण’  में  कवि ने  अपने सौंदर्य प्रेम एवं आध्यात्मिक चेतना को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है ।उदाहरण के तौर पर &#8216; हिमाचले उदय उत्सव’ के ‘कंचनजंगा में सूर्योदय’ की ये पंक्तियाँ ली जा सकती है :- </span></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“सहसा रहस्यमय महामहोल्लास से<br />
वह ज्योति जल उठी प्राची आकाश में<br />
पश्चिम के दूरतम अतल पाताल में<br />
मिटाते रात के घनघोर तमोजाल<br />
गिरि की स्फटिक-गौर यज्ञवेदी में<br />
जल उठी जैसे अग्नि नभ-मण्डल में &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसी प्रकार ‘ऋषिप्राणे देवावतरण’ में अचानक उनकी आध्यात्मिक चेतना का स्फुरण हुआ :-<br />
“सहसा सहस्र सूर्यों की ज्योति को कर पराभूत<br />
हुई ऋषि-अंतर में स्फुरित छवि महामृत<br />
अमूर्त मूर्त आहा रूप निरूपम<br />
अनंत अनल व्याप्त स्थावर जंगम<br />
देश कालातीत दृश्य कल्पनातीत<br />
फिर भी ज्योतिर्मय चक्षु अग्र-स्फित&#8230; “</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">गंगाधर मेहेर ने राधानाथ जी की तरह काव्य लिखने के साथ-साथ छोटी-छोटी लिरिक कविताओं की भी रचना की।विशेषकर ऋषि वाल्मिकी के आश्रम में सीता की अवस्थिति को आधार बनाकर लिखा गया उनका काव्य &#8221; तपस्विनी &#8221; (1914 ) आधुनिक युग के अन्यतम श्रेष्ठ काव्यों में गिना जाता है । उनके दूसरे लोकप्रिय काव्य थे ‘कीचक-वध’(1903) तथा दुष्यंत शकुन्तला के प्रणय पर आधारित काव्य ‘प्रणय-वल्लरी’(1915)। गंगाधर जी की लेखनी सरल, सुबोध तथा संगीतमय थी । प्रकृति एवं प्राकृतिक-सौन्दर्य के प्रति गहरी संवेदनशीलता ही उनकी कविताओं का विशिष्ट गुण है। वाल्मिकी के आश्रम में प्रभात-बेला में सीताजी की वंदना करने के लिए प्रकृति के आयोजन का एक सुन्दर वर्णन ( हिन्दी अनुवाद:- डॉ॰ हरे कृष्ण मेहेर ) स्तुतय है:- </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ समंगल आई सुन्दरी<br />
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,<br />
हृदय में ले गहरी<br />
जानकी-दर्शन की तृषा ।<br />
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में,<br />
सती-कुटीर के बाहर<br />
आंगन में खड़ी होकर<br />
बोली कोकिल-स्वर में :<br />
‘दर्शन दो, सती अरी !<br />
बीती विभावरी ॥’ (1)<br />
अरुणिमा कषाय परिधान,<br />
सुमनों की चमकीली मुस्कान<br />
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :<br />
आकर कोई योगेश्वरी<br />
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी<br />
सारा दुःख मिटाने पास<br />
कर रही हैं आह्वान ।<br />
मानो स्वर्ग से उतर<br />
पधारी हैं धरती पर<br />
करने नया जीवन प्रदान ॥ (२)<br />
गाने लगी बयार<br />
संगीत तैयार ।<br />
वीणा बजाई भ्रमर ने,<br />
सौरभ लगा नृत्य करने<br />
उषा का निदेश मान ।<br />
कुम्भाट [1]भाट हो करने लगा स्तुति गान ।<br />
कलिंग[2]आया पट्टमागध बन,<br />
बोला बिखरा ललित मधुर स्वन :<br />
‘उठो सती-राज्याधीश्वरि !<br />
बीती विभावरी ॥’ (3)&#8230;”<br />
पादटीका :<br />
[1] कुम्भाट = पक्षीविशेष ।<br />
[2] कलिंग = पक्षीविशेष ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रकृति की तरह ही भक्ति भाव भी कवि की कविताओं का एक विशिष्ट गुण है । उनकी एक छोटी–सी कविता “भक्ति” इस तरह का उदाहरण है.-<br />
“ विश्वजीवन, हे , तुमको करुणा-सिंधु<br />
पुकारने को  मन चाहता नहीं<br />
सिंधु , तुम्हारी कृपा-बिन्दु मात्र<br />
तुम्हारे भजने में होंगे नहीं, नाथ<br />
माला जपने को बाध्य<br />
कोटि-कोटि ग्रह कंठी जिस माला की<br />
किसके जपने से भला होगी साध्य ?<br />
लेने को तुम्हारी चरण-धूल<br />
मेरे सिर पर दिया नहीं बल<br />
कोटि-कोटि रवि धूल की तरह<br />
तुम्हारे चरणों में विराजमान&#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">नन्द किशोर बल गंगाधर जी की तरह छोटी-छोटी कविताओं के अलावा  काव्य लिखते थे,मगर उनकी ख्याति छोटी लिरिक कविताओं से हुई , जो सन 1900 से 1916 के अन्दर प्रकाशित और संकलित हुई।.नन्द किशोर जी की कविताओं में तरह-तरह के अनुभवों के पुट हैं,जैसे  सामाजिक, राजनैतिक और  आध्यात्मिक । मगर उन्होंने विशेषकर पल्ली-प्रकृति एवं ग्राम्य-जीवन के बारे में लिखा ।शिक्षा विभाग के उच्च पदाधिकारी होने के कारण उन्होंने कई जगहों का भ्रमण किया, इसलिए उनकी कविताओं में ओड़िशा के ग्राम्य-जीवन का चित्रण सजीवता से प्रस्तुत हुआ है। यही वजह है कि उन्हें ओड़िशा के  ‘पल्ली-कवि’ के रूप में जाना जाता है। उनके प्रसिद्ध कविता-संग्रह हैं –‘पल्ली-चित्र’,‘निर्झरिणी’, ‘बसंत-कोकिल’,‘प्रभात-संगीत’,‘संध्या-संगीत’, ‘नाना वाया गीत’ इत्यादि । गाँव की एक सुबह का उनका सुंदर वर्णन प्रस्तुत है :-<br />
“इस समय तज निद्राशय<br />
शून्यप्राण में छोडा निलय<br />
सोचा भ्रमण से होगा शांत मन<br />
देखा गगन-पथ में सुर-वधू उषा<br />
पहने खड़ी चारु शुक्लभूषा  &#8230;&#8230; (पल्ली-पथ)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">या तेज-बारिश की अनुभूति की एक झलक इस प्रकार हैं :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“देखते देखते होने लगी घनघोर वर्षा<br />
खेती का काम पूरा कर चले गए चषा<br />
घनघोर गरजता गगन<br />
तेज बहती पवन<br />
वज्रपात  से टूट रहा भरोसा<br />
देखते देखते होने लगी घनघोर वर्षा &#8230;(एकुटिया चषा गीत )”<br />
( नोट :- चषा=किसान )</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">या अन्य तरीके से गाँव में प्रेम : प्रेम-प्रतीक्षा का एक अद्भुत दृश्य :-<br />
“भाव भरे हृदय से जलाकर प्रदीप<br />
रख हवन नारियल शैय्या समीप<br />
ऐसे समय कौन चलेगा बाट<br />
छम-छम पदचाप खोलते कबाट &#8230;(मधुशय्या)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस तरह उन्नीसवीं सदी के अंतिम दो दशक तथा बीसवीं सदी  के प्रारम्भिक दो दशकों की समयावधि में नई-नई अनुभूतियों,विचारधाराओं ,अभिरुचियों एवं भाषाओं से आधुनिक ओड़िया कविता प्रारम्भ होते हुए राधानाथ , मधुसूदन ,गंगाधर और नंदकिशोर जी की काव्य-कविताओं में जीवंत रूप से मुखरित  हुई । .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">यह समय था आधुनिक ओडिया कविताओं के शुभारम्भ का । फिर इन्ही कविताओं के ओजस्वी  स्रोत अलग-अलग रूप में फैलने लगे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम तथा बीसवीं सदी का प्रारम्भिक समय भारत वर्ष में राष्ट्रीय आंदोलन का समय था । राधानाथ जैसे कवियों की काव्य &#8211; कविताओं में इसी राष्ट्रीय भावना का प्रभाव जगह-जगह पर देखने को मिलता है, मगर यह राष्ट्र-प्रेम ओड़िशा में विशेषकर ओड़िया साहित्य एवं कविताओं में सन 1909 से स्पष्ट रूप से झलकता है,जब पुरी  के निकटवर्ती सत्यवादी नामक जगह पर कुछ इच्छुक व्यक्तियों के प्रयास  से एक आवासीय विद्यालय की स्थापना हुई तो वह जगह राष्ट्रीय आंदोलन का प्राणकेंद्र बन गया। इस गोष्ठी का मुखपत्र &#8221; सत्यवादी &#8221; सन 1915 में प्रकाशित हुआ तथा सन 1921 तक चला, जब तक यह आवासीय विद्यालय बंद हो गया । इस संस्था के संपर्क में आए व्यक्ति  देशभक्ति से ओत- प्रोत ओड़िया साहित्य लिखने में पारंगत होकर अपनी कविताओं में देशभक्ति की धारा को एक शक्तिशाली स्रोत के रूप में प्रवाहित करना प्रारम्भ किया । बीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में ओड़िया कविताओं में राष्ट्र-प्रेम के सशक्त स्वर उभर कर सामने आए।इसके साथ अनेक लेखक जुड़े हुए थे । जिन लेखकों के नाम विशेष रूप से उल्लेख किए जा  सकते हैं,  वे हैं गोपबंधु दास (1877-1928) , नीलकंठ दास (1884-1967) और गोदावरीश मिश्र (1886-1956)। ये सभी राष्ट्रीय  कांग्रेस में विभिन्न पदों पर रहते हुए सक्रियता से जुड़े हुए थे और गोपबंधु दास भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस में ओड़िशा की ओर से प्रमुख व्यक्ति थे ।  उनके प्रसिद्ध कविता-संग्रह में   गोपबंधु की ‘बंदीर आत्मकथा’(1923) और ‘कारा-कविता’ (1928)&#8217; ,नीलकंठ की “’कोणार्के’(1919) , गोदावरीश की ‘कलिका’(1921), ‘किशलय’(1922), ‘आलेखिका’(1923) थी। उनकी कविताओं में पहले की तरह  प्रकृति-प्रेम , भगवत-विश्वास , अथवा व्यक्तिगत आशाओं-निराशाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय चेतना के स्वर प्रमुख रूप से मुखर थे। गोपबंधु की कविताओं में विदेशी हुकूमत के खिलाफ घोर विरोध था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ भारत प्रशासन पर व्यवस्था स्वतंत्र<br />
यहाँ अमात्य संस्था राजनैतिक यंत्र<br />
कहाँ यहाँ राजा ?,यह तो  नौकरशाही<br />
प्रजा-सुख शांति के नाम पर  धर्म की झूठी दुहाई<br />
प्रजाहित प्रजामत छलावा केवल<br />
पोष्य गोष्ठी इच्छाधीन से शासन कल<br />
जो नीति नहीं प्रजामत अनुकूल<br />
शोषण से प्रजा विवृत व्याकुल<br />
जिसके व्यूह में एक देश में अन्य अधिगत<br />
एक जाति दूसरी जाति से चिर पदानत<br />
जिसके चक्र में तीस करोड़ भारत संतान<br />
निजवास में परवासी ,निज देश में श्वान<br />
अपराध नहीं निश्चय नीति उल्लंघन<br />
भारत का धर्म जिसका उच्छेद साधन &#8230;. (पितृपक्ष तर्पण)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">ऐसे ही नीलकंठ की कविता में देश की गुलामी पर तीव्र आक्रोश था :-<br />
“विजयी या पराजयी , मैं और क्या कहूँ<br />
तस्कर तो इस घर का पुत्रवत<br />
विदेशी तस्कर हड़पते प्रजाधन<br />
कहलाते जगत में तुंग क्षत्रिय<br />
भगवान ,हाय ! तूने ये क्या किया<br />
घर कहने को भी नहीं फूटते स्वर<br />
इस नीले विपिन श्यामल केदार में<br />
कितने गाँव बस्तियाँ गई उजड़<br />
अनाहार से मरे चुपचाप किसान<br />
कौन जानता है उनकी व्यथा अरमान<br />
राजजन कहकर ये दुष्ट तस्कर<br />
खुले घूमते गाँव जंगल अक्सर ॰ &#8230; (मायादेवी)”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस प्रकार सत्यवादी गोष्ठी के कवियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में उनकी  कविताओं में राष्ट्रीय आन्दोलन की चेतना, अस्थिरता और क्रोध के स्वर प्रमुख थे । यह तत्कालीन पाठकों की अभिरुचि का परिणाम ही नहीं था, बल्कि उनकी सोच को भी काफी प्रभावित किया था ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तीसरे दशक के मध्य से छठे दशक के मध्य तक लगभग तीस साल तक अनवरत ओड़िया कविताओं की प्रगति मुख्यतया  दो दिशाओं में हुई । ये दोनों दिशाएँ परस्पर एक दूसरे से अलग थीं, ऐसी बात नहीं है ।काफी समय तक दोनों दिशाएँ एक होकर तत्कालीन कवियों की सम्पूर्ण  विचारधारा में समाहित हो जाती थी । पहली दिशा के बारे में कहा जा सकता है, जीवन के प्रति रोमांटिक अनुभवों जैसे प्रकृति-प्रेम , सौन्दर्य की उपासना तथा आध्यात्मिक और रहस्यवादी अनुभवों के सम्मिश्रण ने सारे काव्य-संगठनों  और काव्य-शैली को सुदृढ़ बना समकालीन कविताओं में नवीनता और सजीवता भर दी । दूसरी दिशा को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं -, पूर्ववर्ती सत्यवादी गोष्ठी और साहित्य के प्रभाव से रचित सामाजिक, राजनैतिक चेतना जगाने वाली कविताएँ समकालीन चौथे और पाँचवें दशक में तेजी से बदल रहे सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों से सरोकार रखने लगीं ।  उनकी काव्य-संरचना में खासकर व्यंग्यात्मक तथा काव्य स्वर में विरक्ति और क्रोध के भाव थे । इन्हीं  विभिन्न विशिष्टताओं  वाले प्रमुख कवि थे,  पहली कोटि के पदम् चरण पटनायक (1885-1956) , कुंतला कुमारी सावत ( 1900-1938) , कालंदी चरण पाणिग्रही (1901-1994),बैंकुंठ  पटनायक ( 1904-1978) ,मायाधर मानसिंह (1905-1973 ) ,राधामोहन गडनायक (1911-2000) तथा दूसरी कोटि के लक्ष्मीकांत महापात्र (1889-1953) , गोदावरीश महापात्र (1897-1966) ,अनंत पटनायक (1912-1987) , और सच्चिदानंद राउतराय   (1913-2004) । </span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">स्वाधीनता से पहले की ओड़िया कविताओं की ये दोनों मुख्य धाराएं विभिन्न कवियों के काव्य कविताओं से बार-बार मेल खाती थीं अर्थात पहली गोष्ठी के उदाहरण स्वरुप कवि बैंकुंठ नाथ और मानसिंह की इस तरह की अनेक कविताएँ हैं, मगर उन्हें दूसरी गोष्ठी में लिया जा सकता है ।ठीक इसी तरह दूसरी गोष्ठी के अन्यतम कवि अनंत पटनायक को पहली गोष्ठी के कवियों में भी शामिल किया जा सकता है।  इन कवियों के कई विशिष्ट कविता संकलन हैं :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पदमचरण के ‘पदमपाखुड़ा’, (1928), ‘गोलापी- गुच्छ’ , (1932) और ‘सूर्यमुखी’ ( 1945) , कुंतला कुमारी के ‘उच्छ्वास’(1924),’अर्चना’(1927) , और ‘प्रेम चिंतामणि’ (1930) , कालंदी चरण के ‘छुरीटिए लोड़ा,(939) , ‘मनेनाहि’ (1947) और’महाद्वीप’ (1948) , बैंकुंठ नाथ के ‘ काव्य संचयन’ (1943,1953) , और ‘उत्तरायण’ (1963) , मानसिंह के ‘धूप’ (1931) , ‘हेमशस्य’ ( 1933), ‘हेमपुष्प’ (1935) , और ’कमलायन’ (1946) , गड़नायक के ‘काव्य-नायिका’ (1943)  , ‘स्मरणिका’   (1950) और ‘मौसमी’ (1951), लक्ष्मीकांत महापात्र के ‘जातीय संगीत’,’जीवन संगीत’ ,और ‘लालिका’ , गोदावरीश  के ‘हे मोर कलम’ (1951),’कंटा और फूल’ (1958), और ‘बंका ओ सिधा’ (1964) , अनंत पटनायक के ‘किंचित’(1959), ‘अलोड़ा लोडा’ (1964), और ‘छाईर छिंटा’(1966) , सच्चिदानंद के ‘पल्ली श्री’(1941),’पांडुलिपि’ (1947), और’स्वगत’(1958)।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जैसे पदमचरण की ’धौली-पहाड़’ में ओड़िशा के अतीत गौरव के अवसान पर दुःख प्रकट करना –<br />
“कई जातियाँ मिलकर आगे बढ़ीं<br />
आगे बढ़कर रखा अपना नाम<br />
सत्य-साहस की इस जन्मभूमि के लिए<br />
सचमुच विधि हो गई बाम !&#8221;<br />
राजघरानें खत्म हो गए<br />
बह गए सारे दयानदी में<br />
परछाई तक नजर नहीं आई<br />
विलीन हो गए सारे महाशून्य में<br />
धवलचूल में !”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कुंतला कुमारी के  ‘नीरव-निशीथ’ में प्रेम और भक्ति का मिश्रण इस प्रकार है –<br />
“नीरव निशीथ में सुनाई पड़ी कानों में<br />
किसकी मधुर वाणी ?<br />
सहसा चमक उठा प्राण<br />
बहा आँखों से पानी।<br />
कौन-सी दिव्य मूर्ति देखी सपने में<br />
अपूर्व अद्भुत अचल<br />
पहचानने से पहले, कौनसे मंत्र से<br />
उसने पैदा की मेरे हृदय में हलचल।“</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">कालंदी चरण पाणिग्रही  की कविता ‘मने नाहिं’ में जीवन  का स्पर्श और कवि के आनंद की अनुभूति :-<br />
“ रास्ते-घाट में देखी  मधुर मुस्कानें याद नहीं<br />
मन में जगी सब कुंठित कहानियाँ  मगर याद रही<br />
मेरी मौत पर बरसा अमृत बनकर शत-धार<br />
पुलकित हुआ यह देह उत्सव में बार-बार”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बैकुंठनाथ की  कविता ‘ यात्रा-संगीत’ में रहस्यवादी संवेदना का प्रकाश मिलता है :-<br />
“मानस-हंस मैं, मानसरोवर जाऊंगा उड़<br />
अपने दोषों से भटककर घूमता अविरत<br />
मेरी अल्प भूख-प्यास तुम्हारी सुधा<br />
तृप्त हूँ फिर भी कामना मर्त्य की<br />
जिंदगी में लेना-देना सारी सर्जना उसकी<br />
देखा नहीं, दिल खोलकर हँसते उस महादानी को<br />
पौष के पतझड़ का पेड़ जब पाता उसका स्पर्श<br />
होता पल्लवित, आहा, तब सोचने की बात क्या ?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मायाधर मानसिंह की ‘ दक्षिणा प्रति ’ कविता में सुदूर सपनें तथा प्रेम परिपूर्ण  रोमांटिक मनोभावों की एक झलक देखने को मिलती है :-<br />
“ फैलाकर छाती ले जाओ मुझे, हे चंचला ! हे शीतलदेही !<br />
जहां तुम्हारे उस देश की नीले-सागर की स्वर्णिम वेला<br />
विरहिणी की तरह कबरी का फेन-पुष्प खोलकर<br />
रोते, माथा पीटते अहर्निश कांपती है ।<br />
जलपरी का अट्टहास तोड़ती महानीरवता<br />
अप्सरा-पदों से मथती वह वेला<br />
ले जाओ मुझे उस देश में, बांह फैलाए पकड़ो मुझे<br />
सनातन, जहां संसार के इस स्वपनरूपी-जंजाल को तज पाऊँगा।”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दूसरी तरफ अनंत पटनायक और गोदवारीश महापात्र की सामाजिक और राजनैतिक चेतना से भरी कविताएं थीं । अनंत पटनायक की कविता ‘चइति चिट्ठी आजि’  कविता में प्यार और रिश्तों के संवेदनाओं से जुड़ी सामाजिक बदहाली की सूचना दी गई है :-<br />
“ हे प्रियतमा ! तुमने यह नई चिट्ठी लिखी है<br />
जिसमे नहीं कहीं पूर्ण विराम या कोमा<br />
मिला नहीं वेतन,अगहन से पाना है अभी बाकी<br />
भूखी-प्यासी तड़पते समझ सकी वह दुखी&#8230;&#8230;.<br />
होते ही कल सुबह आएगी बच्चों की टोली<br />
बुखार से तड़पते,भूख से बिलखते आएंगे हमजोली<br />
चैत चला गया तो क्या हुआ फिर लौट न आएगा<br />
आग लगे चिट्ठी को, मेरे प्रीति फरमासी का क्या होगा ?”<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दवारीश महापात्र की कविता ‘पेचा’में उल्लू को प्रतीक बनाकर विरल प्रजातियों की विलुप्ति एवं असहायता पर प्रकाश डाला गया है :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“ विशाल वे दोनों आँखें, तीक्ष्ण चोंच नुकीले नाखून<br />
पंख झाड़कर उड़ते ही मन में होता डर प्रखर<br />
हे दिवान्ध ! चकाडोला भीरु जैसे छिपकर रहते हो कहाँ<br />
अंधेरे में शिकार करते, किसे पता चलता नहीं यहाँ &#8230;..<br />
मानव बन गया उल्लू आज, उल्लूमय यह समाज<br />
अंधकार  चारों ओर, केवल बनावटी सज-धज<br />
चलती है ‘अंधारि बिजें’ तुम्हारी नजर और चोंच की<br />
चलती है पैशाचिक लीला भत्ता ले राजकोष से दौर की”<br />
इसी प्रकार गोदवारीश की कविता ‘तुमे ओ आमे’ में राजनेताओं की असाधुता के प्रति सीधे सीधे तीव्र कटाक्ष किया गया है :-<br />
“ तुम किस तरह की बातें किया करते हो<br />
हरदम केवल मिलता नहीं, मिलता नहीं<br />
हमारे दरवाजे पर हरदम गोलमाल<br />
कोई कहे घी , कोई कहे ले जाओ तेल।<br />
तुम कहते हो मिलता नहीं कुछ भी धान<br />
लूट लिए मारवाड़ी सारा सामान<br />
हम तो देख रहे हैं वे रहते आपके साथ<br />
दिन हो या रात , दे जाते वे आपके हाथ॥”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">ये सब अधिकतर स्वतंत्रता से पहले के काव्य-आभिमुख्य  हैं । छठे दशक की शुरुआत से विभिन्न सामाजिक , राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में बदलाव के साथ- साथ पाठकों की रुचि में भी परिवर्तन आया और पहले का बहुत सारा काव्य-आभिमुख्य अनावश्यक अथवा गौण हो गया । उदाहरण के तौर पर देशभक्ति अथवा राष्ट्रीय चेतना , भक्ति-भावना और रहस्यवादी मनोभाव , प्रेम और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता , तरल मधुर रोमांटिक कल्पनाएँ , वामपंथी प्रगतिवादी विचारधाराएँ और पृथ्वी को नए सिरे से बदलने की इच्छाएँ इत्यादि काव्य-आभिमुख्य सन 1950 के बाद ओड़िया कविताओं में और ज्यादा महत्वपूर्ण  नहीं रहा और इसके बदले  कविगण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी स्थिति के बारे में विशेष जागरूक हो गए और उनकी कविताओं में बदलती परिस्थितियों के विभिन्न आयाम जैसे अंतरंगता,असहायता, अस्थिरता आदि एकत्रित होकर एक नए रूप का विकास हुआ। सच्चिदानंद राउतराय की कविताओं की सरंचना- शैली में पहले से ही यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से नजर आने लगा था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सच्चिदानंद की कविताएं बीसवीं सदी के तीसरे दशक के उनकी तरुण अवस्था से प्रकाशित हुई थी और 1950 तक स्वाभाविक रूप से उनकी काव्य-कविताओं में समकालीन काव्य-धाराओं का प्रभाव दिखने लगा था जैसे &#8216; पाथेय ( 1931 ),  &#8216; पूर्णिमा&#8217; ( 1933)    में रोमांटिक कल्पनाएँ  , ‘पल्ली श्री’ (1941) में पल्ली-प्रकृति , ‘बाजि राउत &#8216; ( 1943) में शहीदों तथा स्वतंत्रता सेनानियों के साहस , सपने और शहादत का महत्व और &#8216; भानुमतीर देश &#8216; (1949 ) में प्रकृति और प्रेम , &#8216; पांडुलिपि &#8216; ( 1947 )  संकलन में कवि के विभिन्न आभिमुख्यों की कविताएँ सम्मिलित  रूप से प्रकाशित हुई थीं । जहाँ एक तरफ रोमांटिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और सपनें जुड़े हुए हैं , वहीँ दूसरी तरफ सामाजिक, राजनैतिक परिवर्तन की सूचना और रूस विप्लव से प्रभावित प्रगतिवादी विचारधाराओं में विश्वास जो कवि की उस समय की कविताओं में बारम्बार प्रकट हुआ है। इसके बावजूद , ‘पांडुलिपि &#8216; में कुछ नई अनुभूतियों  की कविताएँ थी जो मनुष्य की  निराश्रय परिस्थितियों,परिचय और अकेलेपन को दर्शाती हैं । इस संकलन की &#8216; प्रतिमा-नायक &#8216; एक ऐसी कविता है जिसमें कवि ने अपनी एक परिचित नारी का चित्र प्रस्तुत किया है :-<br />
“चेहरे पर मुहाँसे और हाथ में चमड़े का बैग<br />
पिचके गालों पर फूटे व्यर्थ अकपटी दाग<br />
बीमार तन, मुहांसों से मलिन सारा मुख<br />
श्लथ, रुग्ण देह पर ढकी खाकी पोशाक<br />
&#8230;&#8230;.<br />
प्रतिमा नायक के मुस्कराते होठों पर स्वप्निल आभास<br />
चेहरे पर खाकी हंसी और आँखों में रात का इशारा<br />
दोनों तरफ द्रुत वन  ,गतिशील नक्षत्रों की धारा&#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इसी तरह &#8216; पांडुलिपि &#8216; संकलन की एक और कविता &#8216; ज्यामिति &#8216; को देखा जा सकता है। इस कविता में प्रेम, प्रकृति और प्रेम की अभिलाषा और परिणाम  को आपस में काव्य-अनुभूति के दर्द, संदेह, दुविधा और एक प्रकार की मानसिक शून्यता को आधिभौतिक इकाई के साथ जोड़कर देखा गया है । सच्चिदानंद जी के काव्य-मंडल के  &#8216; पांडुलिपि &#8216; संकलन में पहली बार मनुष्य की स्थिति और अस्तित्व को लेकर प्रकाशित काव्यनुभव ने उन्हें स्वतंत्रता पूर्व ओडिया कविताओं की नई धारा और काव्यनुभव से अलग कर दिया और वे स्वतंत्रता पश्चात कविता की नई धारा और जीवन की  नए अनुभूतियों का अनुसंधान करने वाले कवि के रूप में स्वीकृत हुए। उसके बाद उनके प्रकाशित नए कविता संकलनों में जैसे &#8216;स्वगत&#8217; ( 1958)   &#8216;कविता-1962 &#8216; (1962)   कविता-1969’, (1970) &#8216; कविता-1971’, (1972) इत्यादि में नए अनुभवों का प्रसार और समावेश हुआ है.। इस दिशा में उनकी  कुछ विशिष्ट कविताओं का उल्लेख किया जा सकता है, जैसेकि &#8216;स्वगत&#8217; से  ‘एक बांधबीर जन्मदिन &#8216; और &#8216; उत्तर तिरिश &#8216; &#8216;कविता-1962 &#8216; से &#8216; स्मृति लेखा &#8216; &#8216; आश्विन &#8216; ( 1958 ) ,&#8217;अंतराल&#8217; और ‘खरा कविता-1969’   से ‘ नदीकु एक दर्जा’ ‘ कविता- 1971से  &#8216; हेयरपिन&#8217;, &#8216; लाल स्कूटर&#8217; और ‘मेघ &#8216; तथा &#8216; कविता- 1974’   से ‘शबरी &#8216;,और  &#8216; हंसपुर &#8216; इत्यादि । एक ओर  रोमांटिक कविताएँ और दूसरी ओर  प्रगतिवादी कविताओं की पृष्ठभूमि में काव्य-पुरुष सच्चिदानंद राउतराय का उद्भव हुआ । परन्तु बाद में उनकी परिणत आयु में लिखी गई कविताओं में गहरे  आधिभौतिकवाद,स्थिति सचेतन काव्य स्वर और काव्य संरचना का समावेश हुआ , आजादी के बाद वाली नई ओड़िया कविताओं में उनका  महत्वपूर्ण योगदान है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">स्वतंत्रता के बाद की नई ओड़िया कविताओं  में मुख्य रूप से उभरकर सामने आए- कवि गुरु प्रसाद मोहंती ( 1924- 2004)। उनकी कविताएँ छठे दशक में प्रकाशित हुई। मगर उनका पहला कविता संकलन &#8216; समुद्र- स्नान&#8217; कुछ देरी से सन 1970 में प्रकाशित हुआ। बाद में एक और संकलन      &#8216; आश्चर्य-अभिसार&#8217; 1988  में और उनके द्वारा लिखी गई लगभग 80 कविताओं का सम्पूर्ण संकलन &#8216; कविता-समग्र &#8216; 1995 में प्रकाशित हुआ। भले ही, गुरु प्रसाद के द्वारा लिखी गई कविताएँ गिनती में कम हैं, मगर उनकी कविताओं के सशक्त काव्य-स्वर ने आजादी के पश्चात की ओड़िया कविताओं में नई विचारधारा और शैली का प्रवर्तन किया ।यही कारण था कि समसामयिक तरुण कवियों ने उन्हें अपने आदर्श के रूप में ग्रहण किया । गुरुप्रसाद जी की ज्यादातर कविताएँ आत्म-कथन की तरह है। उनकी कविताओं में नायक,समय के अवक्षय और जीवन की उद्देश्यहीनता, निसंगता और अनिश्चितताओं से दुखी मानव आत्मा है जो समझ में न आने वाली इस धरती पर जीवित रहने की लगातार कोशिशें करने के बाद असफल होती है  और उनके जीवन मूल्य-बोध अस्थिर होने के साथ साथ कोई भी अनुभूति जीवन में जीने देना  नजर नहीं आता है , गुरुप्रसाद जी की कविताएँ छठे दशक में प्रकाशित होने से मानो रक्षणशीलता  का   बांध टूट गया और उसके बहाव में छठे दशक और उसके परवर्ती समय में ओड़िया कविताओं की शैली और सरंचना पूरी तरह से बदल गई ।  गुरुप्रसाद जी की उस समय की प्रसिद्ध कविता है,&#8217;काल-पुरुष &#8216; ,जो कवि के काव्य-प्रतिभा का अन्यतम श्रेष्ठ नमूना है । इस लम्बी कविता ( लगभग 170 पंक्तियाँ ) को पाँच भागों में बांटा गया है और मूल विषय-वस्तु जीवन में मृत्यु-बोध और समस्त प्रयासों के बाद भी नायक की जीवन-यात्रा असफल और अमीमांसित नजर आती है । &#8216;काल-पुरुष&#8217; के मूल अनुभव स्वतंत्रता के बाद ओड़िशा के शहरी-जीवन और संस्कृति से जुड़ा है  और कथित मौलिक ओड़िया भाषा की सहज शक्ति से संजीवित हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">छठे दशक की  नई ओड़िया कविताओं के अन्य प्रमुख कवि थे गुरुप्रसाद जी के सहयोगी भानुजी राव (1926-2001) ,जो भक्त-कवि मधुसूदन राव के पड़पोते हैं ।  उनका पहला कविता-संग्रह ‘विषाद एक ऋतु’ गुरुप्रसाद जी के ‘समुद्र-स्नान’ के प्रकाशित होने के बाद सन 1973 में प्रकाशित हुआ  , जिसमें साठ और सत्तर के दशक में लिखी गई लगभग 80 से ज्यादा कविताओं का संकलन हैं । मगर भानुजी की कविताएँ गुरुप्रसाद जी से ज्यादा हैं और उनके मृत्यु-पर्यंत लगातार बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक प्रकाशित होती रही । उनके कुछ विशिष्ट कविता-संकलन इस तरह हैं &#8211; &#8216; नई आरपारि&#8217; (1986), &#8216;चंदन वनरे एका&#8217;(1994), ‘दर्पण आगरे’ (1995),’ एका एवं एका एका’(1996), और ‘हल्दी पत्रर वास्ना’(1997) इत्यादि । गुरुप्रसाद के काव्य-आभिमुख्य की तरह ही भानुजी के काव्य-आभिमुख्य में जीवन के विचार विशेषकर जीवन की प्रतिकूलताओं और उससे संघर्ष करते अकेले होने के दर्द को झेलती कवि की आत्मा की अनुभूतियाँ सन्निहित हैं ।  यद्यपि भानुजी ने लम्बी कविताएँ नहीं लिखी थीं ,परन्तु उनकी अनेक छोटी-छोटी कविताएँ बार बार प्रकाशित होती रहीं ।  उनमें परिव्याप्त था जीवन के विभिन्न खण्डों के साथ-साथ प्रेम , प्रकृति,व्यक्तिगत-आवेगों तथा जीवन का निरानंद-बोध । मगर एक गंभीर अस्थिरता, अनिश्चितता और उद्देश्यहीनता से कवि की दुखी आत्मा समय के बदलते प्रवाह में और ज्यादा  संकुचित हो जाती है ।  उदाहरणस्वरुप उनकी ‘म्याग्नोलिया’ कविता में प्रेम निरूपण में दुःख , कष्ट और शून्यता की मर्मांतक संवेदना उभरकर सामने आई ।<br />
“चिड़िया, हाय ! कहाँ गई उड़<br />
किस पेड़ पर बनाया नीड़<br />
उलझी डाल के सपनों में ड़ुबी<br />
अकेली रह गई शून्यता चारों ओर से”<br />
और ‘नदी,नारी और नक्षत्र’ में इसी तरह ,<br />
“ तुम तो खो गई हो समय के अतल-गव्हर में<br />
मैं यहाँ अकेला पड़ा हूँ अविन्यस्त विभक्त आकाश<br />
मैंने सहा भयंकर धूप ,वर्षा और सर्दी का स्पर्श<br />
रंग मेरा नहीं आया रह गया जला ठूंठ घास &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">छठे दशक में दोनों भानुजी और गुरुप्रसाद जी की अपनी अनुभूतियों से जो नई कविताओं की शुरुआत हुई ,उसका प्रभाव हम तरुण कवियों में भी देख सकते हैं । इसी तरह के नए अनुभवों को आत्मसात करने वाले दो तरुण कवि हैं रमाकांत रथ (1934) और सीताकांत महापात्र (1936 )।  उनकी कविताएँ सातवें दशक से प्रकाशित होना शुरू हुई।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रमाकांत जी का पहला कविता संग्रह &#8221; केते दिनर &#8221; सन 1962  में प्रकाशित हुआ, जिसमें  1962 से पहले की लिखी गई कविताओं को संकलित किया गया था। मगर उनका पहला महत्वपूर्ण नए अनुभवों का संकलन था उनका द्वितीय संकलन &#8216; अनेक कोठरी &#8216; (1967)।  इसमें उनकी ज्यादातर नए अनुभवों की कविताएँ प्रकाशित होकर रमाकांत जी को नई काव्य-प्रणाली में विशिष्ट कवि के रूप में स्थापित किया ।उनके अन्य विशिष्ट ग्रन्थ थे &#8211; &#8216; संदिग्ध मृगया’(1971), &#8216; सप्तम  ऋतु’ (1977), ‘सचित्र अंधार&#8217; ( 1982 ) और &#8216; श्रीराधा&#8217; (1985) इत्यादि । जबकि सीताकांत जी का पहला कविता-संग्रह &#8216; दीप्ति और द्युति &#8216; रमाकांत जी के &#8216; केते दिनर&#8217; प्रकाशित होने के एक साल बाद अर्थात 1963 में प्रकाशित हुआ था।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तत्पश्चात सीताकांत जी के विशिष्ट कविता –संकलनों &#8216; अष्टपदी &#8216; ( 1967) &#8216; शब्दर आकाश &#8216; ( 1971), ‘समुद्र &#8216; (1977), &#8216; चित्रनदी&#8217; ( 1979 ) &#8216; आरदृश्य &#8216; (1981 ) &#8216; समयर  शेषनाम &#8216; (1984 ) और &#8216; फेरी असिवार वेल &#8216; (1991) इत्यादि का सिलसिला प्रारम्भ हो गया । शुरू से ही दोनों रमाकांत जी और सीताकांत जी की कविताओं में सुस्पष्ट काव्य-शैली , काव्य-सरंचना में बोलचाल की भाषा और आंतरिक मनोभावों को भाषा में प्रकाशित करने का प्रभावी सामर्थ्य आदि कई काव्य-गुण भरपूर थे । इसके अतिरिक्त, काव्य-आभिमुख्य को प्रकाशित करने के विभिन्न स्तर और व्यंग्य की सहायता से इन स्तरों का पारस्परिक मेलजोल भी था । यही नहीं , उनकी अनुभूतियों  का सूक्ष्म-विश्लेषण करने पर पाठकों के मनोभावों तथा बुद्धि को आत्म-संतुष्टि के समान धरातल पर पहुंचा देना उनके काव्य शैली की ख़ास विशिष्टता थी । सामान्यतया दोनों की कविताओं में यही विचार यथार्थ होने के बावजूद तरह-तरह के नई अनुभूतियों जुड़ती गई । उदाहरण के तौर पर रमाकांत जी के दूसरे संकलन  ‘अनेक कोठरी’  में एक विशेष अनुभूति निर्जनता, शुष्कता , निर्जीवता , और मृत्यु के इर्द-गिर्द थी ।  इस  संकलन की एक लम्बी कविता &#8216; बाघ-शिकार &#8216; की कथा-वस्तु में नायक की  जीवन यंत्रणा का मार्मिक वर्णन है ।  किस प्रकार से नायक  अपने अपूर्ण तथा असफल चक्र से मुक्त होकर नए जीवन और नई शक्ति को प्राप्त करने का प्रयास करता है &#8211; केवल उसकी प्रबल इच्छा-शक्ति का वर्णन है ।  रमाकांत जी के बाद वाले संकलनों में भी इन्ही अनुभूतियों का विशेष विस्तार हुआ है। और खासकर उनकी शुरूआती कविताओं में रेटरिक अर्थात वाग्मिता की  धारा कम होकर काव्य सरंचना मुक्त और स्वच्छंद हो गई है।  यही उनके काव्य-सरंचना के सशक्त  कथा-वस्तु की .निविड़ता के साथ सहज व स्वच्छंद काव्य-प्रवाह था। उनके  &#8216;सप्तम-ऋतु &#8216; संकलन की &#8216; ‘आमर विमर्ष भाग्य &#8216; कविता एक अच्छा उदाहरण है,   जहाँ नायक जीवन के अनेक जंजालों में फंसे हुए भी जागरूक है , मगर अंत में नए जीवन और नए सुख के लिए वह सपना देखता है:-<br />
“कितनी रातों में नींद टूट जाती है, जब और नींद नहीं आती<br />
उस समय आकाश बहुत बड़ा दिखता<br />
उस समय कानाफूसी करते पेड़<br />
सूर्यास्त के विषय में जिसके जादुई स्पर्श से<br />
इंतजार के गीत सुनाई पड़ते तारों के मुक्त अंतपुर में”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रमाकांत जी के सुगठित सर्वोत्तम काव्य-शैली में प्रकाशित एक कविता-गुच्छ &#8216; श्री राधा &#8216; है ।  जिसमे पुराण पृष्ठ-भूमि,  माध्यम और दृष्टिकोण  का स्पष्ट प्रतिपादन है। नायिका के रूप में राधा वर्तमान युग की वह त्रस्त आत्मा है जो जीवन और मृत्यु के कष्ट के अन्दर सदा आंदोलित रहती है ।  वियोग की संवेदना का जिक्र इस प्रकार है  :-<br />
“ मैं जानती हूँ श्यामवर्ण मेरे प्रियतम, जानती हूँ<br />
शनै–शनै तुम काले रंग के हो जाओगे<br />
उसके बाद अदृश्य हो जाओगे ,निराकार हो जाओगे<br />
निरखूंगी मैं पर तुम्हारी तिरछी निगाहें<br />
और मुस्कान दिखाई नहीं देगी ”<br />
स्थान ,काल से परे जीवन-मृत्यु के संधिवेला में पूरी तरह से एकीभूत हो जाने की संवेदना :-<br />
“जब मैं तुम्हें अपने सीने से चिपकाऊंगा<br />
जब मेरे सारे अंगों पर<br />
तुम्हारा हाथ घुम रहा होगा<br />
जब मर नहीं पा रही होगी अथवा<br />
जिंदा रहना भी पूरी तरह असंभव हो रहा होगा । ”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सीताकांत जी की कविताओं के दो विशिष्ट गुण उनकी प्रारम्भिक कविताओं में  देखे जा सकते हैं। पहला,पौराणिक परिस्थितियों अथवा मिथकों का व्यवहार , दूसरा, आधुनिक युग के  बिगड़ते वातावरण में अपने परिचय की तलाश ।  उनकी काव्य-सरंचना में इन दोनों का आपसी मेल है। खासकर उनकी कविताओं में मिथक प्रतिरूप और प्रतीक दोनों रूप में होने के साथ साथ  काव्य-उपलब्धि के  अंश और समकालीन जीवन के प्रति कवि की  नैतिक प्रतिक्रिया  बनकर उभरकर सामने आता हैं । कवि का दूसरा संकलन &#8216; अष्टपदी &#8216; इसी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण  है ,जिसमें  आठ लम्बी कविताओं को एक व्यापक रूपक के रूप में दर्शाया गया है जबकि पृष्ठभूमि में महाभारत और श्री कृष्ण जी के जीवन की पौराणिक घटनाओं में वर्तमान समय की वेदना और कष्ट प्राप्ति के साथ- साथ मृत्यु का अतिक्रम करने के आनंद , सौंदर्य और पूर्णता की अनुभूति दर्शाई गई है।  बाद वाले संकलन &#8216; समुद्र &#8216; में यह स्पष्टता अधिक  दृष्टिगोचर होती है ।  संकलन के तीन भाग &#8216; परिचय&#8217;, &#8216;प्रतिवेशी&#8217; और &#8216; परिणाम &#8216; जीवन यात्रा और परम्पराओं का एक साथ हो जाने का सन्देश देते हैं ।  कहा जा सकता है कि जीवन और मृत्यु या  जीवन और जीवनहीनता अथवा अन्य रूप से जीवनहीनता के परिसर में जीवन की संभावना के पुट सीताकांत जी की कविताओं में विभिन्न रूप में  रूपकों तथा प्रतीकों के माध्यम से सामने आते हैं, जिसने कवि के दृष्टिकोण को एक अलग तरीके से प्रभावित किया।  उनके &#8216; चित्रनदी &#8216; संकलन में &#8216; आत्मरक्षा &#8216; कविता का एक सुन्दर उदाहरण है ।  जिसमें  बाहर से आए शत्रु द्वारा दुर्ग पर आक्रमण तथा दुर्ग के अंतपुर वासियों द्वारा अपनी आत्मरक्षा के प्रयास का चित्रण प्रस्तुत किया गया है ।  मगर यह चित्रण एक अन्य अर्थ का प्रतीक भी है । कारण शत्रु है ऋतुराज बसंत, जो कि एक नए जीवन का वाहक है और इस नए जीवन के लिए दुर्गवासियों का अनाग्रह और भय , इसलिए अपनी आत्मरक्षा के उद्यम की  प्रस्तुति की गई जिसकी झलक इस प्रकार है  :-<br />
“ अंधड़ अचानक आया<br />
राजधानी की अंतिम छोर पर ऋतुराज बसंत की छावनी<br />
फूलों और सपनों के अनेक रंगीन तम्बू<br />
अनेक अग्निशिखा,गुंजन और बहुत मधुमक्खियाँ”<br />
इसी तरह बसंत के आगमन पर नगरवासियों का भय :-<br />
“वे सब कांपने लगे<br />
नगरवासी भय से कातर<br />
व्याकुल हुए सभी<br />
बुलाई गई सभा<br />
सही में, आज सब टूटकर चूरचूर हो जाएंगे<br />
दुर्ग शृंखला के सारे बंधन ”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सीताकांत जी और रमाकांत जी की  कविताओं में हम जीवन की अभिज्ञता और जीवन की स्थिति के बारे में उस चेतना के स्वरूप को देखते है ,  जो क्लेश और यंत्रणा से धीरे-धीरे आनंद और परमशांति की ओर अग्रसर होती है। कह सकते हैं कि रमाकांत जी और सीताकांत जी दोनों की कविताओं ने स्वतंत्रता के बाद विकसित हुई ओड़िया कविताओं में समग्र रूप से महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किया है , जो कि गुरुप्रसाद और भानुजी के बाद नई अनुभूतियों, नई विचारधाराओं , नए स्वरुपों और नई सरंचनाओं के रूप में ओड़िया कविताओं के लिए मजबूत नींव का पत्थर साबित हुई ।  बाद में लगभग  बीसवीं सदी के अंत तक ज्यादातर  नए कवियों ने  स्वतंत्रता परवर्ती नए अनुभवों और शैली में कविताओं की धाराओं से अनुप्राणित होकर  ज्यादा उच्च कोटि की  कविताओं की रचना की ।  ये केवल गुरुप्रसाद इत्यादि का प्रभाव नहीं., वरन उस समय में यह स्वाभाविक ही था ।  द्वितीय महायुद्ध के परवर्ती जीवन और परिवर्तित विश्व मानविकता के साथ ये जडित है और सम्मलित रूप से अपने व्यक्ति , स्थिति का विश्लेषण ही उनका प्रमुख आभिमुख्य बना ।  विशेष रूप से बुद्धि , विद्रूप , द्वैतार्थ , विरोधाभास यहाँ तक कि मिथकों के द्वारा ये रचे गए ।  छठे दशक से ये धाराएं क्रमश: विभिन्न रूप से प्रसारित होती आ रही हैं और विगत प्राय: 50  सालों से  स्वतंत्रता परवर्ती ओड़िया  कविताओं की ये प्रधान धाराएं हैं ।  इस प्रसंग में कुछ विशिष्ट कवियों का नाम उल्लेख किया जा सकता है, जैसेकि सौभाग्य कुमार मिश्र (1943 ) , राजेन्द्र किशोर पंडा (1944) , जगन्नाथ प्रसाद दास (1935 ) , दीपक मिश्र (1939), सौरीन्द्र बारीक (1938 ) , हरिहर मिश्र (1944 ) ,फनी मोहंती (1944 ) , वंशीधर षडंगी (1940 ), प्रतिभा शतपथी (1945 ), हर प्रसाद दास (1945 ), मनोरमा विश्वाल महापात्र (1947),प्रमोद मोहंती (1942 ), और हर प्रसाद परिछा पटनायक (1953 ), इत्यादि । .उनके कुछ महत्वपूर्ण कविता संकलन इस प्रकार हैं जैसे  सौभाग्य जी के  &#8221; अंध महुमाछि &#8221; (1977 ), और  “द्वा सुपर्णा” (1984 ), राजेन्द्र जी के &#8220;शैलकल्प&#8221; (1982 ), और &#8220;आद्या” (1988 ), जगन्नाथ जी के &#8220;प्रथम पुरुष&#8221; (1971) , और &#8220;जे जाहार निर्जनता &#8221; (1979 ), सौरीद्र जी के &#8221; आकाश परि निविड़&#8221; ( 1985 )और  &#8221; अनुभारत &#8221; (1990 ), दीपक जी के &#8221; निर्जन नक्षत्र&#8221;    (1971), और &#8220;शून्यतार शोष&#8221; (1981), प्रतिभा  जी  के  &#8221; नियत वसुधा &#8221; ( 1980 ), और &#8221; शबरी &#8221; ( 1991 ), फनी जी के &#8221; माया दर्पण &#8221; ( 1990 ), और &#8220;अहल्या  &#8220;(1996 ), वंशीधर जी के &#8221; स्थविर अश्वारोही &#8221; (1988 ),और “ शबरी  चर्या &#8221; (1989 ), हरिहर जी के &#8221; चाहाणी मंडप &#8221; ( 1987 ), और &#8221; ,भित्तिरि चंदन &#8220;( 1994 ), हरप्रसाद जी के &#8221; मंत्रपाठ &#8221; ( 1991 ), &#8221; गर्भगृह&#8221;  (1993 ), प्रमोद जी के &#8221; देवी पाद &#8221; ( 1981 )  और “अकात कात”(1995), मनोरमा जी के “एकला नईर गीत”(1990),’थरे खालि डाकि देले &#8216;( 1992 ) , परिछा पटनायक जी के &#8216; अथय सूर्य&#8217; ( 1990 ), और &#8216; सबु अंधार आजि राति रे &#8216; ( 1992 ), इत्यादि ।. उदाहरण के तौर पर सौभाग्य जी की &#8216; कुआलालम्पुर&#8217; कविता में,जहां विनाश की मानसिकता और अनिश्चितता के मनोभाव स्पष्ट है ।  कुआलालम्पुर शहर बनकर नहीं रहा , बल्कि जीवन के अपरिचित गंतव्य स्थान का प्रतीक बन गया।  जिसके जरिए जीवन के सीमित सर्तक परिवेश से मुक्ति मिल सकती है , मगर ऐसा होना ज्यादा विश्वास योग्य नहीं है:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">“कल की विचित्र जादुई शाम<br />
रसिकलाल नहीं ,कोई नहीं , मै भी नहीं<br />
किसी ने देखा नहीं कुआलालम्पुर<br />
प्लेटफार्म एक से प्लेटफार्म दो   तक<br />
सीधे चलते जाना हमारा साहस<br />
प्लेटफार्म दो से प्लेटफार्म  एक तक<br />
सीधे बाहर आना हमारी सजगता<br />
कहीं बीच में अचानक ट्रेन आ जाए<br />
कौनसी ट्रेन ? कहाँ जाए ? कहाँ जाएँ ?<br />
कुआलालम्पुर , कुआलालम्पुर । &#8220;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जगन्नाथ जी की &#8216; संध्या ठीक छअटा &#8216; कविता में दोनों प्रेम और मृत्यु की संवेदना और सामाजिक धरातल पर अशुभ और अमंगल का जिक्र है:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; शहर की सीमा में आज असंभव भीड़<br />
दोपहर की सारी घड़ियाँ एकदम बंद<br />
सिर्फ तुम और मैं<br />
शाम को ठीक छह बजे<br />
और शहर की भौचक जनता &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अथवा सौरीन्द्र जी की &#8221; महायात्रा &#8221; कविता में हिमालय  के विपुल विस्तार में युधिष्ठिर की चिंताएं , अपने लम्बे जीवन की धुंधली स्मृतियाँ तथा आकाश की विराट शून्यता की संवेदनाओं के स्वर प्रस्फुटित होते हैं:-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; उसके बाद कोई शिखर नहीं , यात्री नहीं , यात्रा नहीं<br />
कुंज्झटिका नहीं , झड़ नहीं<br />
नीलिमा भी नहीं<br />
अँधेरा उजाला नहीं<br />
आदि अंत कुछ भी नहीं<br />
ये जैसे अंत का अंत , शून्य की शून्यता .&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">अथवा राजेन्द्र जी के &#8216; शैलकल्प &#8216; कविता में जीवन के विभिन्न स्तरों  के विस्तृत अनुभवों का उल्लेख है , उस आस्था के साथ जिसे मृत्यु अथवा अमरत्व प्राप्त हो , उस प्रत्येक व्यक्ति को दोनों शिखर तथा अपनी अंतिम स्थिति को प्राप्त करना होता है :- .</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8216;देखो  देखो<br />
ईश्वर के उठे हाथ की<br />
अंगुली के ऊपर में<br />
गोवर्धन की तरह तुम<br />
और गोवर्धन पर्वत के उच्चतम बिन्दु  पर<br />
कोमल किसलय शाखा की तरह मैं<br />
स्थिर खड़ा हूँ<br />
हाँ<br />
उतनी निर्दिष्ट ऊँचाई पर मैं<br />
स्थिर हो गया हूँ<br />
अवश्य  बिजली गिरने  के  इन्तजार में  ? &#8230;”</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">दूसरी प्रकार से राजनैतिक और सामजिक दुरावस्था  का वर्णन.फनी जी की कविता &#8216; आस जिबा एरसमा&#8221; .कविता जिसकी पृष्ठभूमि है 1999 का चक्रवात और पूरी तरह विध्वस्त एरसमा अंचल । उसके उद्धार में लगे स्वार्थी व्यक्तियों की इस कविता में तीव्र भर्त्सना की गई है :-</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">&#8221; एरसमा के ध्वंस स्तूप में आइए<br />
फादर आइए<br />
आइए,अन्डरवर्ल्ड  के बादशाह<br />
चम्पकलाल<br />
आइए  महागठबंधन के  खलनायक<br />
जनाब सल्लाउद्दीन एक के बाद एक आइए ,<br />
प्रतिद्वंद्वी जैसे महेंद्र लग्न में<br />
संभ्रांत शैली  में आइए<br />
ठीक समय मगरमच्छी आंसू बहा<br />
पहाड़ से ऊंचे आश्वासन दीजिए, एरसमा को<br />
रोम जैसे बनाने का सपना दिखाइए.&#8221;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राधानाथ जी से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक एक लंबा मार्ग तय करती हुई  तरह तरह की अनुभूतियों से ओत-प्रोत,व्यक्तिगत संबंधों की अस्थिरता , प्रवाहमान समय की क्षणभंगुरता , स्थिति और अस्थिति का अनुभव और इन सब के उत्तरण  में स्थिरता और  प्राज्ञ अनुभूति लिए सौ वर्ष से ज्यादा समय की अवधि में ओड़िया कविताओं की निरंतर परिवर्तनशील परिसर  में चेतना और संवेदनशीलता से रचित साहित्य जितना महत्वपूर्ण है  उतना आनंददायक भी । आशा करता हूँ कि दिनेश कुमार माली द्वारा अनूदित कविताओं की इस पुस्तक का हिन्दी जगत में भरपूर स्वागत होगा ।<br />
</span></h3>
<h2>यतीन्द्र मोहन मोहंती</h2>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">1573,भक्त मधु नगर<br />
भुवनेश्वर 751030<br />
मोबाइल :- 9438731580<br />
दूरभाष :- 0674-2350284 </span></h3>
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		<title>प्रगतिशील लेखक संघ का 15 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Apr 2012 10:00:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
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		<description><![CDATA[प्रगतिशील चेतना के साथ सांप्रदायिकता को बेनकाव करने की जरूरत !&#8230;&#8230;&#8230;.  पूँजीवाद, जातिवाद व सांप्रदायिकता... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b2-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%95%e0%a4%be-15-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%81/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="mceTemp">
<dl id="attachment_7298" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px;">
<h3><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00835.jpg"><img class="size-medium wp-image-7298" title="DSC00835" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00835-300x225.jpg" alt="प्रगतिशील चेतना के साथ सांप्रदायिकता को बेनकाव करने की जरूरत !  पूँजीवाद, जातिवाद व सांप्रदायिकता देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती !  लोकतांत्रिक उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष रचनाशील संगठनों का प्रगतिवादी साझा मंच एक ऐतिहासिक जरूरत !  मिश्र, जापान, उज़बेकिस्तान व पाकिस्तानी प्रतिनिधियों सहित देश के चार सौ लेखकों की हिस्सेदारी !" width="300" height="225" /></a></h3>
<h3 style="text-align: justify;">प्रगतिशील चेतना के साथ सांप्रदायिकता को बेनकाव करने की जरूरत !&#8230;&#8230;&#8230;.  पूँजीवाद, जातिवाद व सांप्रदायिकता देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती !&#8230;&#8230;. लोकतांत्रिक उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष रचनाशील संगठनों का प्रगतिवादी साझा मंच एक ऐतिहासिक जरूरत !&#8230;&#8230;&#8230;  मिश्र, जापान, उज़बेकिस्तान व पाकिस्तानी प्रतिनिधियों सहित देश के चार सौ लेखकों की हिस्सेदारी !</h3>
</dl>
</div>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">‘कलम शांति और सद्भाव के लिए‘ इस आदर्श वाक्य के साथ देश की राजधानी स्थित दिल्ली विश्वविधालय के नार्थ कैंपस के केन्द्रिय सभागार में तीन दिनों ( 12,13 व 14 अप्रैल 2012.) तक चले प्रगतिशील लेखक संध के 75 वें राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान लेखक व रंगकर्मियों की जोरदार उपस्थिति ने सम्मेलन को ऐतिहासिक व यादगार बना दिया। डा. नामवर सिंह, डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, डा. मैनेजर पाण्डेय, डा. अली जावेद, डा. चौथी राम यादव, डा. असगर अली इंजीनियर, राजेन्द्र राजन, गितेश शर्मा, अमिताभ चक्रवर्ती, संजय श्रीवास्तव, विनीत तिवारी, डा. हेलमी हदीदी ( मिश्र), बाबर अयाज ( पाकिस्तान ), प्रो. हागा आकियो (जापान), डा. मुहय्या अब्दुरहमान ( उज़बेकिस्तान), डा. पुन्नीलन &#8211; तमिलनाडु,  सतीश कालसेकर- महाराष्ट्र सहित देश के तमाम प्रान्तों से आये हिन्दी-उर्दू व स्थानीय भाषा के लेखक, कवि, आलोचक-साहित्यकार व रंगकर्मियों की बड़ी जमात ने उपस्थित बुद्धिजीवियों व रचनाकारों में नये उत्साह का संचार किया। डा. अली जावेद ने कहा भी &#8211; कि आज देश के तकरीबन हर राज्य में हमारी इकाईयाँ सक्रिय हैं और हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि प्रलेस एक मात्र ऐसा संगठन है जो तमाम भारतीय भाषाओं में एक आन्दोलन के रूप में सिर्फ मौजूद ही नहीं बल्कि सक्रिय भी है। इस राष्ट्रीय अधिवेशन को बेशक अंतराष्ट्रीय आयोजन का सम्मान दिया जा सकता है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">तीन दिवसीय इस आयोजन के प्रथम दिन-प्रथम सत्र का आगाज़ अभिज्ञान नाट्य मंच द्वारा फ़ैज अहमद फ़ैज की नज़्म के साथ हुआ। इप्टा के महासचिव जीतेन्द्र रघुवंशी, जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर जोशी व जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण के शुभकामना संदेश  में तमाम प्रगतिशील संगठनों की एकजुटता एवं साझा रूप से आज की चुनौतियों का सामना करने की बात कही गयी। पाकिस्तान से आये बाबर अयाज ने इंसानी जीवन को बेहतर बनाने के लिए अमन की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने पाकिस्तान प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से शुभकामनाएँ व्यक्त की। डा. असगर अली इंजीनियर ने अंग्रेजी में वक्तव्य देते हुए अमरीकी साम्राज्यवाद के वैश्विक प्रभाव की चर्चा की तथा साम्प्रदायिक आतंकवाद से धरती को बचाने की अपील की। डा. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि हमारी समस्याएँ विचित्र  ढंग से बढ़ रही है। आज अमरीका फासिज्म का निर्यात कर रहा है। पूंजी का भूमंडलीयकरण हो रहा है, भाषा बदलती जा रही है। अब ‘कर्ज’ को फाइनांस के रूप में बोला जाता है। प्रो. हागा आकियो (जापान) ने हिंदी में बोलते हुए अपने देश में जलजले से हुए तबाही का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया। इस सत्र के मुख्य अतिथि इजिप्ट से पधारे डा. हेलमी हदीदी ने सामाजिक न्याय व लोकतंत्र की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि हमारे पड़ोस में क्रांति के नाम पर सैनिक बल प्रयोग किया जा रहा है। क्रांति के नाम पर मध्यवर्गीय युवा को हथियार देकर युनाइटेड स्टेट अपनी नीति लागू करने का मंसूवा पाले है। खाड़ी देशों में बुश के कार्यकाल से हस्तक्षेप प्रारंभ हो गया था, यह सबकुछ लोकतंत्र के नाम पर किया जा रहा है। जनता भूखी है, वह रोटी चाहती है, शिक्षा चाहती है यह देख कर दुख होता है, गाज़ा की आग लगातार सुलग रही है&#8230;। समारोह का संचालन करते हुए डा. अली जावेद ने घोषणा की &#8211; कि यह कांफ्रेंस डा. कमला प्रसाद को समर्पित है तथा दिल्ली प्रलेस के सचिव अर्जुमन्द आरा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00769.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-7299" title="DSC00769" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00769-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>प्रथम दिवस के दूसरे सत्र का शुभारंभ करते हुए डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हम मौजूदा समस्याओं पर विचार नहीं करेंगे तो कौन करेगा। उन्होंने कई सवाल उठाये, कहा सरकार विकल्प नहीं देगी तो अतिवाद फैलेगा। श्रीपत जोशी (महाराष्ट्र) ने सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के बदलते चेहरे को रेखांकित किया। गीतेश शर्मा का मानना था कि सामंती ढांचा के लिए अमरीका को गाली देना सही नहीं है, हमें अपने गिरेवां में भी देखना चाहिए। डा. साहिना रिजवी ने कहा कि जिस भाषा में दम है वह कायम रहेगी। कुसुम जैन का मानना था कि पितृ सत्ता के साथ साम्राज्यवादी सत्ता काम करती है।  इस सत्र में केपी रमन व वी मोहनदास ने भी आंग्ल में अपने-अपने विचारों को रखा। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात तमिल लेखक पुन्नीलन ने तमाम विद्वतजनों को शुभकामनाएँ दी। इसी सत्र में साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ तथा ‘उम्मीदें शहर की बात सुनों’ एवं ‘प्यार के दो-चार पल’ पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। संध्या सत्र का कवि सम्मेलन विनीत तिवारी के कुशल संचालन में सम्पन्न हुआ। देश के विभिन्न हिस्सों से आये कवियों ने अपनी काव्य-रचना से सत्र को सफल बनाया। कवियों में सर्वश्री शैलेन्द्र शैली, दिनेश प्रियमल, तरुण गुहा नियोगी, मूलचन्द्र सोनकर, वीआर त्रिपाठी ‘रूद्र’, पूनम सिंह, सतीस कालसेकर, सुधा त्रिपाठी, संदीप अवस्थी, कुसुम जैन, जवाहर लाल कौल, सुरेन्द्र सिंह, दिनेश श्रीवास्तव, देवनारायण देव, रवि श्रीवास्तव, डा. अमोल राय, अनिल पतंग, श्रीमती मुकुल लाल, सरोज खान बातिश, के एल सोनकर, रमेश ऋतंभर एवं अरविन्द श्रीवास्तव सहित पचास कवियों की पुरजोर भागीदारी दर्ज की गयी।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00820.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7300" title="DSC00820" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC00820-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>सम्मेलन के दूसरे दिन सतीश कालसेकर, डा. मोहय्या अब्दुरहमान (ताशकंद), डा. असगर अली इंजीनियर की उपस्थिति एवं विनीत तिवारी के संचालन में श्री आनन्द शुक्ल, महेश कटारे सुगम, विभूति ना. सिंह, महेन्द्र सिंह, निहार स्नातक, रमाकांत श्रीवास्तव, गंगाराम राजी आदि की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। अरविन्द श्रीवास्तव का कविता संग्रह ‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’’ ( यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली) का लोकार्पण ताशकंद से आयी डा. मोहय्या अब्दुरहमान, डा. असगर अली इंजीनियर, सतीश कालसेकर एवं डा. चौथी राम यादव ने संयुक्त रूप से किया।  इसी सत्र में ‘दलित, आदिवासी, महिला लेखन विमर्श’ पर वक्तव्य देते हुए डा. चौथी राम यादव ने कहा कि स्त्री व दलित लेखन के लिए इन्हें कलम क्यों उठाने की जरूरत पड़ी, कभी कबीर व रैदास ने भी कलम उठायी थी। किसी भी क्रांतिकारी विचारधारा को परंपरावदी इसकी धार को कुंद करने का प्रयास करते हैं। हमारी रचनाएँ जितनी भी लोकतांत्रिक रही है उसकी आलोचना अलोकतांत्रिक होती है। कबीर ऐसा व्यक्तित्व है  जो जनवादी सांस्कृतिक विरासत के साथ हमारे सामने खड़ा दिखता है। हिन्दुस्तान में जातिवादी समस्या जटिल हो चुकी है, यह सामंती व्यवस्था का दुष्परिणाम है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">प्रसिद्ध आलोचक डा. मैनेजर पाण्डेय ने कहा कि लोकतंत्र व राष्ट्रीय चेतना को बचाने के लिए जाति व्यवस्था से लड़ने की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान के विकास की दो प्रक्रिया है,  पहला एकान्त साधना  तथा दूसरा जन आन्दोलन। स्त्रियों की हत्या के चार प्रसंग हैं पहला  पैदा होने से पहले इसे मारा जा रहा, दूसरा प्रेम करने के लिए स्त्रियों को मारा जा रहा, यूपी व हरियाणा आदि राज्यों में। तीसरा विवाह के बाद हत्या तथा चैथा जहाँ हत्या की सुविधा नहीं होती वहाँ स्त्रियों को अत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है&#8230; हाल के वर्षों मे पूंजीवाद के विस्तार के साथ सेक्स की जो इंडस्ट्री खुली है उसमें सभी लगे हैं.. धार्मिक व्यक्ति भी!</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">विमर्श को आगे बढ़ाते हुए तरुण गुहा नियोगी ने कहा कि समाज में स्त्री को बराबरी से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है, उन्होंने कई उदाहरण से इसे स्पष्ट किया। शकील सिद्दिेकी ने कहा कि जब-जब जनसंघर्ष तेज हुए हैं जातिवाद व सम्प्रदायवाद को चोट पहुँचा है। तमिल, मलयालम व तेलगू साहित्य में संघर्ष की लंबी परंपरा रही है। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि जब हाशिए के समाज ने जनतंत्र में अपनी हिस्सेदारी दर्ज करायी तब हमारे साहित्य की धारा में क्या परिवर्तन आया उस पर विचार की जरूरत है। ‘री क्लास’ और ‘री कास्ट’ होने की परिक्रिया पुनः शुरू हुई है। जयप्रकाश धुमकेतु का मानना था कि जो प्रेम करना नहीं जानता वह क्रांति नहीं कर सकता.. हर लेखक, रंगकर्मी प्रतिरोध की धार को आगे बढायेंगे। इनके अलावे अफ़्जे जफर, अली अहमद फातमी, मोहन सिंह जी, इप्टा के राकेश आदि ने इस विमर्श आगे बढ़ाया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि कबीर ने जात के साथ मुठभेड़ किया तो कबीर पंथ एक जात बन गया&#8230; उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ लोग अपनी रोटी सेंक रहे हैं। दलित व स्त्री विमर्श पर आप क्रांतिकारी वाणी बोलते हैं तो आप क्रांतिकारी नहीं हैं आप बाहर किसान व मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकते हैं तभी आप प्रगतिशील आन्दोलन को आगे बढ़ा सकते हैं। रंगकर्मी नूर जहीर ने कहा कि मर्द मौका मिलते ही सत्ता हथिया लेता है फिर औरतों पर अत्याचार का दौर शुरू हो जाता है। उन्होंने दक्षिण एशिया में महिला लेखिकाओं की लेखनी की चर्चा की तथा स्त्री शोषण को उकेरती उनकी कविताओं के बारे में बताया। डा. असगर अली इंजीनियर ने जोरदार शब्दों में कहा कि मुसलमान औरतों की हालत बुरी है उलेमा उसे बेहतर नहीं होने देते। सियासत में जात-पात का खेल खेेला जा रहा है। हमें बहुत गहराई से अपने अंदर झांकना होगा.. जिस तरह की शिक्षा पद्धति है उसमें स्त्रियों का उत्थान नहीं दिखता। इसी सत्र में महाराष्ट्र से आयीं संगीता महाजन ने प्रसिद्ध मराठी कवि नारायण सूर्वे की कविता का सस्वर पाठ सुनाया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">बंगाल से आये कलाकारों द्वारा रवीन्द्र गायन के पश्चात समारोह के अगले सत्र में ‘साम्प्रदायिकता के खिलाफ लेखकों की जिम्मेदारियाँ’ विषयक परिचर्चा के मुख्य वक्ता के रूप  में डा. खगेन्द्र ठाकुर का बीज वक्तव्य हुआ। उन्होंने कहा कि हर धर्म की शुरूआत पीडि़तों के पक्ष में हुई है लेकिन जब धर्म सबल हुआ तो उसमें कट्टरता आ गयी। उन्होंने कहा कि सम्प्रदायवाद -साम्राज्यवाद की सेवा कर रहा है। जातिवाद का जन्म हुआ सामंतवाद में अब सामंतवाद नहीं है अब पूंजीवाद ने अपनी रक्षा के लिए इसे अपना लिया है।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सतीश कालसेकर ने अपने विचार को प्रारंभ करते हुए मुक्तिबोध की पंक्ति &#8211; ‘जो है उससे बेहतर चाहिए’ से विमर्श को आगे बढ़ाया। उन्होंने मराठी की लेखन परंपरा में प्रगतिशील धारा का इतिहास बताया। मराठी में अब दलित ही नहीं लिख रहे- पत्थर काटने वाले भी लिख रहे हैं।  विमर्श में शैलेन्द्र शैली, सुभाष चैपड़ा, रामाकंात श्रीवास्तव, जयनंदन, रणेन्द्र, रंगीता महाजन , पूनम सिंह, देवनारायण पासवान देव, ईश्वरचंद जी, त्रिवेणी शर्मा सुधाकर  आदि ने अपनी सार्थक भागीदारी से विमर्श को महत्वपूर्ण बनाया। प्रभाकर चैवे की अध्यक्षता में यह विमर्श सत्र ऐतिहासिक बन गया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन डा. खगेन्द्र ठाकुर, राजेन्द्र राजन व अमिताभ चक्रवर्ती की अध्यक्षता में ताशकंद से आयीं डा. मोहय्या अब्दुरहमान ने हिन्दुस्तान व उज़बेकिस्तान के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबन्धों पर आलेख पाठ किया । उन्होंने  प्रेमचंद, मंटो, कृष्णचंदर व सरदार अली जाफ़री के साहित्य को उज़बेकिस्तान में प्राप्त सम्मान के बारे में सविस्तार बताया। उन्होंने एक नज़्म के साथ अपने वक्तव्य को विराम दिया। मप्र प्रलेस के महासचिव विनीत तिवारी ने राज्यों से प्राप्त प्रतिवेदन को पटल पर रखा। महासचिव के प्रतिवेदन के पश्चात प्रान्तों के प्रतिनिधियों ने भी अपने प्रस्ताव पढ़े। डा. खगेन्द्र ठाकुर ने राष्ट्रीय कमिटी की बैठक रिर्पोट पेश किया। इसी सत्र में एक मिनट का मौन रख कर 2008 के गोदरगांवा सम्मेलन के पश्चात दिवंगत हुए साहित्यकारों कोे श्रद्धांजलि दी गयी जिसका संचालन अर्जुमन आरा ने किया।  धन्यवाद ज्ञापन प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. अली जावेद ने किया।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">सम्मेलन में जेएनयू इप्टा के साथियों द्वारा अवतार सिंह पास, मखदूम के नज़्म साथ ही  अभिज्ञान नाट्य मंडली द्वारा मशहूर शायर फ़ैज अहमद फ़ैज के जीवन पर बना नाटक ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ का दिल्ली विश्वविधालय के शंकर लाल हाॅल में मंचन किया गया। लेखक परवेज अहमद व निर्देशक लोकेन्द्र त्रिवेदी के इस नाटक में फ़ैज की जिन्दगी के कई पहलुओं को छूने की कोशिश की गई, इस नाटक ने दर्शकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी। कई अर्थो में प्रलेस का यह राष्ट्रीय अधिवेशन महत्वपूर्ण एवं चिर स्मरणीय रहेगा।<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">अरविन्द श्रीवास्तव,<br />
<span style="font-weight: normal;"> बिहार प्रलेस मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता</span><span style="font-weight: normal;"><br />
</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>वेब मीडिया पर अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार : पुस्तक हेतु आलेख आमंत्रित</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Apr 2012 07:12:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परिकल्पना संपादकीय टीम</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आगामी शैक्षणिक वर्ष 2012-2013 की 11-12 जनवरी को के.एम. अग्रवाल महाविद्यालय,कल्याण,महाराष्ट्र,भारत का हिंदी विभाग वेब... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/hindi-vibhag-web-media-page-1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7294" title="hindi vibhag web media page (1)" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/hindi-vibhag-web-media-page-1-178x300.jpg" alt="" width="178" height="300" /></a></span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"></h3>
<h3 style="text-align: justify;"></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आगामी शैक्षणिक वर्ष 2012-2013 की 11-12 जनवरी को के.एम. अग्रवाल महाविद्यालय,कल्याण,महाराष्ट्र,भारत का हिंदी विभाग वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश्य -इस विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित करने जा रहा है ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस परिसंवाद में देश- विदेश से कई मेहमानों के शामिल होने की संभावना है । विश्व विद्यालय अनुदान आयोग, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और कई अन्य संस्थाओं से अनुदान प्राप्त करने के प्रयास जारी हैं । साथ ही साथ कई हिंदी से जुड़ी विदेशी संस्थाओं से भी अनुदान के प्रयास जारी हैं ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">वेब मीडिया और हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य इस विषय पर एक पुस्तक निकालने की भी योजना पर काम कर रहा हूँ । आप सभी अपने आलेख इस पुस्तक के लिए भेज सकते हैं । आप का आलेख संपादन मंडल द्वारा स्वीकृत किये जाने के बाद आप को तुरंत इसकी सूचना दी जाएगी । इस पुस्तक में अपने आलेख सम्मिलित कराने के लिए आप को किसी तरह शुल्क नहीं देना होगा । पुस्तक ISBN नंबर के साथ छपेगी । पुस्तक छपने के बाद उसकी एक प्रति आप को मुफ्त में उपलब्ध करायी जाएगी ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">पुस्तक के लिए आलेख भेजने की अंतिम तिथि 30 जून 2012 है ।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">आप जिन उप विषयों पे आलेख लिखें, वो इस प्रकार हों</h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">मीडिया का बदलता स्वरूप और इन्टरनेट<br />
व्यक्तिगत पत्रकारिता और वेब मीडिया<br />
वेब मीडिया और हिंदी<br />
हिंदी के विकास में वेब मीडिया का योगदान<br />
भारत में इन्टरनेट का विकास<br />
वेब मीडिया और शोसल नेटवरकिंग साइट्स<br />
लोकतंत्र और वेब मीडिया<br />
वेब मीडिया और प्रवासी भारतीय<br />
हिंदी ब्लागिंग स्थिति और संभावनाएं<br />
इंटरनेट जगत में हिंदी की वर्तमान स्थिति<br />
हिंदी भाषा के विकाश से जुड़ी तकनीक और संभावनाएं<br />
इन्टरनेट और हिंदी ; प्रौद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा<br />
व्यक्तिगत पत्रकारिता और ब्लागिंग<br />
हिंदी ब्लागिंग पर हो रहे शोध कार्य<br />
हिंदी की वेब पत्रकारिता<br />
हिंदी की ई पत्रिकाएँ<br />
हिंदी के अध्ययन-अध्यापन में इंटरनेट की भूमिका<br />
हिंदी भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण साफ्टव्येर<br />
हिंदी टंकण से जुड़े साफ्टव्येर और संभावनाएं<br />
वेब मीडिया , सामाजिक सरोकार और व्यवसाय<br />
शोसल नेटवरकिंग का इतिहास<br />
वेब मीडिया और अभिव्यक्ति के खतरे<br />
वेब मीडिया बनाम सरकारी नियंत्रण की पहल<br />
वेब मीडिया ; स्व्तंत्रता बनाम स्वछंदता<br />
इन्टरनेट और कापी राइट<br />
वेब मीडिया और हिंदी साहित्य<br />
वेब मीडिया पर उपलब्ध हिंदी की पुस्तकें<br />
हिंदी वेब मीडिया और रोजगार<br />
भारत में इन्टरनेट की दशा और दिशा<br />
हिंदी को विश्व भाषा बनाने में तकनीक और इन्टरनेट का योगदान<br />
बदलती भारती शिक्षा पद्धति में इन्टरनेट की भूमिका<br />
लोकतंत्र , वेब मीडिया और आम आदमी<br />
सामाजिक न्याय दिलाने में वेब मीडिया का योगदान<br />
भारतीय युवा पीढ़ी और इन्टरनेट<br />
वेब मीडिया सिद्धांत और व्यव्हार<br />
आप अपने आलेख भेज सहयोग करे । आप के सुझाओ का भी स्वागत है ।<br />
आलेख यूनिकोड में भेजें ।<br />
आप इस साहित्यिक अनुष्ठान मे जिस तरह भी सहयोग देना चाहें, आप अवश्य सूचित करें ।<br />
</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;">डॉ मनीष कुमार मिश्रा<br />
<span style="font-weight: normal;"> अध्यक्ष &#8211; हिंदी विभाग</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> के . एम . अग्रवाल महाविद्यालय 421301</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> गांधारी विलेज, पडघा रोड , कल्याण &#8211; पश्चिम</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> महाराष्ट्र</span> <span style="font-weight: normal;">8080303132</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> manishmuntazir@gmail.com</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> www.onlinehindijournal.blogspot.com</span><br />
<span style="font-weight: normal;"> www.kmagrawalcollege.org</span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा आयोजित राजभाषा सेमिनार 2012-13 में “ओड़िया भाषा की प्रतिनिधि कविताएं” विमोचित</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Apr 2012 05:45:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेश कुमार माली</dc:creator>
				<category><![CDATA[गतिविधियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड के बुर्ला,जागृति विहार स्थित मुख्यालय के आडिटोरियम में आयोजित कोल इंडिया स्तरीय... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/04/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%87/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC01431.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7288" title="DSC01431" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/04/DSC01431-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड के बुर्ला,जागृति विहार स्थित मुख्यालय के आडिटोरियम में आयोजित कोल  इंडिया स्तरीय दो दिवसीय राजभाषा सेमिनार 2012-13 ( दिनांक 11 व 12 अप्रेल ) के उदघाटन उत्सव के दौरान विगत बुधवार को एमसीएल के वरिष्ठ अधिकारी तथा लिंगराज क्षेत्र के राजभाषा अधिकारी दिनेश कुमार माली द्वारा अनूदित “ओड़िया भाषा की प्रतिनिधि कविताएं”नामक पुस्तक का विमोचन सम्पन्न हुआ ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस भव्य आयोजन में कोल-इंडिया की एसईसीएल,बीसीसीएल,एनसीएल,एनईसी इत्यादि अनुषंगी कंपनियों के राजभाषा अधिकारियों के अतिरिक्त देश के कोने-कोने से पधारे हिन्दी के शताधिक मूर्धन्य साहित्यकारों की उपस्थिति में श्री माली की अद्यतन पुस्तक के विमोचन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ ।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों में एमसीएल के निदेशक ए॰के॰सिंह,बीजेबी कॉलेज भुवनेश्वर के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ शंकर लाल पुरोहित,केंद्रीय हिन्दी निदेशालय,नई दिल्ली के सलाहकार डॉ॰के॰ विजय कुमार , गंगाधर मेहेर कॉलेज सम्बलपुर के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष कीर्ति प्रकाश गुप्त ,भारत सरकार के गृह मंत्रालय की हिन्दी शिक्षण योजना,पुणे के सहायक निदेशक  आर॰पी॰वर्मा व हिन्दी शिक्षण योजना,सम्बलपुर के हिन्दी प्राध्यापक डॉ हरिशचन्द्र शर्मा, केरल विश्वविद्यालय के पूर्व डीन तथा हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ वी॰पी॰कुंज मेत्तर तथा संसदीय राजभाषा समिति के पूर्व सचिव के॰के॰ ग्रोवर  इत्यादि शामिल थे।</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इस अवसर पर अतिथियों ने पुस्तक का विमोचन करते हुए श्री माली को श्रीफल,शाल तथा शील्ड प्रदान कर साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया। इससे पूर्व उन्हें अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन ,थाइलेण्ड में ‘सृजन-श्री’ से भी सम्मानित किया जा चुका है । </span></h3>
]]></content:encoded>
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		<title>आदरणीय वित्त-मंत्री जी,</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Mar 2012 06:55:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Abhishek Prasad</dc:creator>
				<category><![CDATA[हास्य-व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>

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		<description><![CDATA[आदरणीय वित्त-मंत्री जी, सबसे पहले तो सादर अभिनन्दन स्वीकार करें. इतने बड़े लोकतान्त्रिक देश का... <a class="meta-more" href="http://www.parikalpna.com/2012/03/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80/">more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="font-weight: normal;"><a href="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/03/pranab-mukherje_1331882459.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-7280" title="pranab-mukherje_1331882459" src="http://www.parikalpna.com/wp-content/uploads/2012/03/pranab-mukherje_1331882459-300x132.jpg" alt="" width="300" height="132" /></a></p>
<h3><span style="font-weight: normal;">आदरणीय वित्त-मंत्री जी,<br />
सबसे पहले तो सादर अभिनन्दन स्वीकार करें.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">इतने बड़े लोकतान्त्रिक देश का वित्तीय विभाग संभालना अपने-आप में हिमालय अकेले तोड़ने के बराबर है और वो भी सामान हिस्सों में&#8230;. और इस कार्य के लिए मैं तहे दिल से आपको बधाई देना चाहता हूँ. इतने बड़े कार्य में मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है&#8230; हर टुकड़े को बिलकुल एक सामान रूप में काट पाना तो बड़े-से-बड़े कलाकार के लिए भी असंभव सा है&#8230; खैर ये सब तो और बातें है&#8230; पर महोदय इस बार के बजट को देखते हुए क्या आपको लगता है कि अब भी आम आदमी को चुप बैठना चाहिए (वो अलग बात है कि हम आम आदमी चुप ही बैठे है, बोल कर ही क्या कर लेंगे)&#8230; लेकिन फिर भी आप खुद ही बताइए क्या ये अब भी चुप बैठने का समय है??? नहीं न&#8230; देखा मुझे पता था आपका भी यही जवाब होगा&#8230; इस देश का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति यही जवाब देगा&#8230;.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपने हम गरीबो पर एक बड़ा उपकार किया है इनकम टैक्स में दो लाख तक की छुट देकर&#8230; पर क्या ये छुट हम गरीबों से ज्यादा अमीरों के लिए फायदे मंद नहीं है??? अगर पिछले टैक्स स्लैब से इस स्लैब की तुलना कर के देखी जाये तो उन लोगों को ज्यादा फायदा नजर होते दिखता है जो लोग आठ-नौ लाख से ऊपर हर साल वेतन पाते है. इतने बड़े देश के वित्त-मंत्री होने के नाते ये बात आपको भी नजर आई होगी&#8230; या हो सकता है कार्य-बोझ के कारण चुक गए हों&#8230; कोई बात नहीं होता है&#8230; जो भी थोडा बहुत फायदा हम गरीबो को है उससे ही मैं खुश हूँ&#8230; लेकिन जैसे ही मैं इस ख़ुशी के साथ आगे बढ़ता हूँ मेरी ख़ुशी ऐसे हवा हो गयी जैसे उसका सबसे बड़ा दुश्मन मैं हूँ&#8230; आखिर मेरी गलती क्या है अगर आपने सर्विस टैक्स में २ प्रतिशत का इजाफा कर दिया&#8230; मतलब अब हर सौ रुपये के लिए दो रुपये और ज्यादा देने होंगे&#8230; जबकि हम इनकम टैक्स तो देते ही है&#8230; मुझे एक बात आज तक समझ में नहीं आई, व्यापारी गण कहते है सर्विस टैक्स बढ़ने से उन्हें तकलीफ हो रही है&#8230; भैया तकलीफ तो हमें हो रही है&#8230; सर्विस टैक्स व्यापारी बंधू अपने घर से तो देते नहीं है&#8230; हर सर्विस के लिए टैक्स हमें ही भरना पड़ता है वो भी अपने इनकम की टैक्स अदा करने के बाद&#8230;. मतलब हम सरकार को कमाने के लिए भी टैक्स देते है और खर्च करने के लिए भी&#8230; कहीं चैन नहीं हमें&#8230;.</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">पेट्रोल-गैस के दाम फिर बढ़ने वाले है&#8230; आपने तो यहाँ तक घोषणा कर दिया कि गैस पर सब्सिडी हटाई जा सकती है&#8230; मैं कहता हूँ बेशक हटा लीजिये&#8230; सरकार जितने भी सब्सिडी देती है सब हटा लीजिये&#8230; आखिर हम जनता पर इतना अहसान क्यों&#8230; आप सब्सिडी देना बंद करें और हम टैक्स देना बंद करते है&#8230; बात बराबर रहेगी&#8230; न आपको शिकवा न हमें गिला&#8230; ऐसा ही क्यों न करें कि इस देश से सरकार नाम का स्तम्भ ही उखाड़ फेंका जाये&#8230;. जब सब कुछ हमें ही झेलना है तो किसी सरकार की जरूरत क्या है&#8230; अपने अपने हिसाब से जी लेंगे सब&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपका कहना है कि हालात देखते हुए ऐसा बजट जरूरी है&#8230; मैं कहता हूँ कि ऐसे हालात है ही क्यों??? इस देश का बच्चा-बच्चा जानता होगा कि भ्रष्टाचार हो रहा है&#8230;. हमारी अरबों-खरबों से भी कई गुना ज्यादा संपत्ति किसी स्वीस के किसी बैंक में पड़े-पड़े काले हो रहे है&#8230; फिर ये बातें आपको कैसे नहीं पता??? दुनिया ने देख लिया कैसे कुछ लोगों ने मिलकर २जी में अरबों का घपला कर लिया&#8230; क़ानून ने भी इस २जी को खारिज कर दिया&#8230;. तो आखिर इसका पैसा फिर गया कहाँ??? हमारे देश में आम-धन (commonwealth) के खेल हुए&#8230;. लोगों ने ख़ास रूप से धन बना लिए&#8230;. सबको पता चल गया&#8230; लेकिन आखिर वो पैसा कहाँ गया???&#8230; दो साल होने को आ रहे है पर पैसे का पता नहीं&#8230; ये दो उदाहरण तो मैंने इस लिए दिए कि हालिया घटना है आपको याद होंगे&#8230;. पीछे से गिनती शुरू करूँ तो बचपन में पापा ने जितनी भी गिनती मुझे सिखाई थी मैं यही-अभी भूल जाऊंगा&#8230;. आखिर क्या हुआ उन अरबों-खरबों का (इससे आगे क्या होता है मुझे पता नहीं&#8230; इसलिए इसी शब्द से काम चला रहा हूँ)&#8230; ???</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जो भी सरकार आई उसने कहा हालात ऐसे है-वैसे है&#8230; किसी ने ये क्यों नहीं कहा कि हम उन काले धन को वापस लायेंगे और सफ़ेद कर के इस हालात को मिटायेंगे&#8230;. इस देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के सबसे मजबूत स्तम्भ की हर एक ईंट खोखली है&#8230; कोई ऐसा नजर नहीं आता जिसपर हम भरोषा कर सकें&#8230;. हाल ही में दक्षिण के सुपर-स्टार की एक फिल्म देखी थी&#8230; नाम था शिवाजी&#8230; उस फिल्म में काले धन को वापस लाकर भलाई के कार्यों में उस पैसे के इस्तेमाल को दिखाया गया था&#8230; हमारे बौलीवूड ने भी हाल ही में संजय दत्त साहब और इरफ़ान खान सहन को लेकर इसी काले धन पर एक फिल्म दिखाई थी&#8230; मैं जनता हूँ तीन घंटे की फिल्म की तेजी से हकीकत में ये नहीं हो सकता पर क्या इससे सीख लेटे हुए तीन महीनों में भी असंभव है??? कुछ दिनों पहले एक मेल बहुत ही प्रचलित था जिसमें बताया गया था कि अगर सारा काला-धन वापस आ जाये तो सदियों तक किसी भी नागरिक को कोई टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ेगी&#8230; और भी न जाने क्या-क्या&#8230; मैं सदियों की बात नहीं करता पर अगर उससे एक साल भी अगर ऐसा हुआ तो क्या हमारी अर्थ-व्यवस्था में सुधार नहीं आएगा??? मैं कोई अर्थ-शास्त्री नहीं&#8230; वित्तीय ज्ञान लगभग जीरो है पर इतना तो कोई बच्चा भी समझ सकता है&#8230; फिर आप लोगों को क्या परेशानी है अपने ही देश का पैसा बाहर से अपने घर में लाने में&#8230; मैं आपसे पूछता हूँ अगर आपको पता चले कि आपके घर के किसी भी सदस्य ने घर से रुपये चुरा का किसी जगह छिपा रखे है तो क्या आप उसे वापस लाने का प्रयास नहीं करेंगे? या फिर घरवालों के जीवको-पार्जन में ये कह-कर कमी कर देंगे कि पैसे तो कहीं और पड़े है और मेरे पास सबूत नहीं है???&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">जो छोटी सी बात कोई छोटा सा बच्चा भी समझ सकता है उसे आप जैसे लोग क्यों नहीं समझ पा रहे है??? कुछ सौ-हजार लोग मिल कर सवा अरब लोगों का हक़ मार रहे है, क्या ये सही है?</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">रेल-मंत्री साहब ने किराया बढा दिया है&#8230; जरूरी भी है&#8230; नौ साल में मंहगाई बहुत बढ़ गयी है तो रेल किराए में बढ़ोतरी भी जरूरी है&#8230; पर क्या कभी रेल के डब्बों में झाँक कर देखा है कि वहां की हालात कैसी है? आपही गण-मान्य लोगों में से किसी ने एक बार कहा था कि रेल में सफ़र करने वाले कैटल-क्लास के है&#8230;. मैं कहता हूँ हालात उससे भी बदतर है&#8230; किराए बढ़ाइए पर साथ-साथ कम-से-कम इंसानों जैसी सुविधा भी तो मुहैया करवाइए&#8230; शर्म आती है अब तो दोस्तों को बताने में कि घर भारतीय रेल के स्लीपर-क्लास से जा रहा हूँ&#8230;</span></h3>
<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal;">आपसे विनम्र निवेदन है कि देश की रीढ़ की हड्डी इस कदर न तोडिये कि इस देश का कोई भी नागरिक खड़ा तक न हो सके&#8230; समय अब भी हमारे हाथ में है&#8230;. देर नहीं हुई है&#8230; कहीं ऐसा न हो कि पछताने का मौका तक न मिले&#8230;.</span></h3>
<h3><span style="font-weight: normal;">कोई बात बुरी हो तो दिल से माफ़ी है&#8230;<br />
इस देश का एक आम नागरिक&#8230;.</span></h3>
<h2>अभिषेक प्रसाद</h2>
<p></span></h4>
]]></content:encoded>
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